श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 161–170
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170
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अथ विंशोऽध्यायः पूरुके वंश, राजा दुष्यन्त और भरतके चरित्रका वर्णन श्रीशुक उवाच
पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि भारत ।
यत्र राजर्षयो वंश्या ब्रह्मवंश्याश्च जज्ञिरे ॥१
जनमेजयो ह्यभूत् पूरोः प्रचिन्वांस्तत्सुतस्ततः ।
प्रवीरोऽथ नमस्युर्वै तस्माच्चारुपदोऽभवत् ॥२
तस्य सुद्युरभूत् पुत्रस्तस्माद् बहुगवस्ततः ।
संयातिस्तस्याहंयाती रौद्राश्वस्तत्सुतः स्मृतः ॥३
ऋतेयुस्तस्य कुक्षेयुः स्थण्डिलेयुः कृतेयुकः ।
जलेयुः सन्ततेयुश्च धर्मसत्यव्रतेयवः ॥ ४
दशैतेऽप्सरसः पुत्रा वनेयुश्चावमः स्मृतः ।
घृताच्यामिन्द्रियाणीव मुख्यस्य जगदात्मनः ॥५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अब मैं राजा पूरुके वंशका वर्णन करूँगा । इसी वंशमें तुम्हारा जन्म हुआ है । इसी वंशके वंशधर बहुत- से राजर्षि और ब्रह्मर्षि भी हुए हैं || १ || पूरुका पुत्र हुआ जनमेजय । जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्का प्रवीर, प्रवीरका नमस्यु और नमस्युका पुत्र हुआ चारुपद ॥२ ॥ चारुपदसे सुधु, सुघुसे बहुगव, बहुगवसे संयाति,
संयातिसे अहंयाति और अहंयातिसे रौद्राश्व हुआ ॥३ ॥
परीक्षित्! जैसे विश्वात्मा प्रधान प्राणसे दस इन्द्रियाँ होती हैं, वैसे ही घृताची अप्सराके गर्भसे रौद्राश्वके दस पुत्र हुए-ऋतेयु, कुक्षेयु, स्थण्डिलेयु, कृतेयु, जलेयु, सन्ततेयु, धर्मेयु, सत्येयु, व्रतेयु और सबसे छोटा वनेयु ॥४-५ ॥
ऋतेयो रन्तिभारोऽभूत् त्रयस्तस्यात्मजा नृप ।
सुमतिर्ध्रुवोऽप्रतिरथः कण्वोऽप्रतिरथात्मजः ॥६
तस्य मेधातिथिस्तस्मात् प्रस्कण्वाद्या द्विजातयः ।
पुत्रोऽभूत् सुमते रैभ्यो दुष्यन्तस्तत्सुतो मतः ॥७
दुष्यन्तो मृगयां यातः कण्वाश्रमपदं गतः ।
तत्रासीनां स्वप्रभया मण्डयन्तीं रमामिव ॥८
विलोक्य सद्यो मुमुहेदेवमायामिव स्त्रियम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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बभाषे तां वरारोहां भटैः कतिपयैर्वृतः ॥ ९
तद्दर्शनप्रमुदितः संनिवृत्तपरिश्रमः ।
पप्रच्छ कामसन्तप्तः प्रहसञ्शलक्ष्णया गिरा ॥१०
का त्वं कमलपत्राक्षि कस्यासि हृदयंगमे ।
किं वा चिकीर्षितं त्वत्र भवत्या निर्जने वने ॥११
व्यक्तं राजन्यतनयां वेद्भ्यहं त्वां सुमध्यमे ।
न हि चेतः पौरवाणामधर्मे रमते क्वचित् ॥१२
शकुन्तलोवाच
विश्वामित्रात्मजैवाहं त्यक्ता मेनकया वने ।
वेदैतद् भगवान् कण्वो वीर किं करवाम ते ॥१३
आस्यतां ह्यरविन्दाक्ष गृह्यतामर्हणं च नः ।
भुज्यतां सन्ति नीवारा उष्यतां यदि रोचते ॥१४
दुष्यन्त उवाच
उपपन्नमिदं सुभ्रु जातायाः कुशिकान्वये ।
स्वयं हि वृणते राज्ञां कन्यकाः सदृशं वरम् ॥१५
परीक्षित्! उनमेंसे ऋतेयुका पुत्र रन्तिभार हुआ और रन्तिभारके तीन पुत्र हुए- सुमति, ध्रुव, और अप्रतिरथ । अप्रतिरथके पुत्रका नाम था कण्व ॥६ ॥ कण्वका पुत्र मेधातिथि हुआ ।
इसी मेधातिथिसे प्रस्कण्व आदि ब्राह्मण उत्पन्न हुए । सुमतिका पुत्र रैभ्य हुआ, इसी रैभ्यका पुत्र दुष्यन्त था ॥७ ॥
एक बार दुष्यन्त वनमें अपने कुछ सैनिकोंके साथ शिकार खेलनेके लिये गये हुए थे । उधर ही वे कण्व मुनिके आश्रमपर जा पहुँचे । उस आश्रमपर देवमायाके समान मनोहर एक स्त्री बैठी हुई थी । उसकी लक्ष्मीके समान अंगकान्तिसे वह आश्रम जगमगा रहा था । उस सुन्दरीको देखते ही दुष्यन्त मोहित हो गये और उससे बातचीत करने लगे ॥८ - ९ ॥ उसको देखनेसे उनको बड़ा आनन्द मिला । उनके मनमें कामवासना जाग्रत् हो गयी । थकावट दूर करनेके बाद उन्होंने बड़ी मधुर वाणीसे मुसकराते हुए उससे पूछा- || १० || ' कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली देवि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? मेरे हृदयको अपनी ओर आकर्षित करनेवाली सुन्दरी! तुम इस निर्जन वनमें रहकर क्या करना चाहती हो? ॥११ ॥
सुन्दरी! मैं स्पष्ट समझ रहा हूँ कि तुम किसी क्षत्रियकी कन्या हो । क्योंकि पुरुवंशियोंका चित्त कभी अधर्मकी ओर नहीं झुकता' ॥१२ ॥
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शकुन्तलाने कहा —— आपका कहना सत्य है । मैं विश्वामित्रजीकी पुत्री हूँ । मेनका अप्सराने मुझे वनमें छोड़ दिया था । इस बातके साक्षी हैं मेरा पालन- पोषण करनेवाले महर्षि कण्व । वीरशिरोमणे! मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥१३ ॥ कमलनयन! आप यहाँ बैठिये और
हम जो कुछ आपका स्वागत- सत्कार करें, उसे स्वीकार कीजिये । आश्रममें कुछ नीवार (तिन्नीका भात ) है । आपकी इच्छा हो तो भोजन कीजिये और जँचे तो यहीं ठहरिये ' ॥१४ ॥
दुष्यन्तने कहा – ' सुन्दरी! तुम कुशिकवंशमें उत्पन्न हुई हो, इसलिये इस प्रकारका आतिथ्यसत्कार तुम्हारे योग्य ही है । क्योंकि राजकन्याएँ स्वयं ही अपने योग्य पतिको वरण कर लिया करती हैं ' ॥१५ ॥ शकुन्तलाकी स्वीकृति मिल जानेपर देश, काल और शास्त्रकी
आज्ञाको जाननेवाले राजा दुष्यन्तने गान्धर्व- विधिसे धर्मानुसार उसके साथ विवाह कर लिया ॥१६ ॥ राजर्षि दुष्यन्तका वीर्य अमोघ था । रात्रिमें वहाँ रहकर दुष्यन्तने शकुन्तलाका
सहवास किया और दूसरे दिन सबेरे वे अपनी राजधानीमें चले गये । समय आनेपर शकुन्तलाको एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१७ ॥
ओमित्युक्ते यथाधर्ममुपयेमे शकुन्तलाम् ।
गान्धर्वविधिना राजा देशकालविधानवित् ॥१६
अमोघवीर्यो राजर्षिर्महिष्यां वीर्यमादधे ।
श्वोभूते स्वपुरं यातः कालेनासूत सा सुतम् ॥१७
कण्वः कुमारस्य वने चक्रे समुचिताः क्रियाः ।
बद्ध्वा मृगेन्द्रांस्तरसा क्रीडति स्म स बालकः ॥१८
तं दुरत्ययविक्रान्तमादाय प्रमदोत्तमा ।
हरेरंशांशसम्भूतं भर्तुरन्तिकमागमत् ॥१९
यदा न जगृहे राजा भार्यापुत्रावनिन्दितौ ।
शृण्वतां सर्वभूतानां खे वागाहाशरीरिणी ॥ २०
माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥२१
रेतोधाः पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥२२
पितर्युपरते सोऽपि चक्रवर्ती महायशाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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महिमा गीयते तस्य हरेरंशभुवो भुवि ॥२३
चक्रं दक्षिणहस्तेऽस्य पद्मकोशोऽस्य पादयोः ।
जे महाभिषेकेण सोऽभिषिक्तोऽधिराड् विभुः ॥ २४
पंचपंचाशता मेध्यैर्गंगायामनु वाजिभिः ।
मामतेयं पुरोधाय यमुनायामनु प्रभुः ॥२५
महर्षि कण्वने वनमें ही राजकुमारके जातकर्म आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये । वह बालक बचपनमें ही इतना बलवान् था कि बड़े - बड़े सिंहोंको बलपूर्वक बाँध लेता और उनसे खेला करता ॥१८ ॥
वह बालक भगवान्का अंशांशावतार था । उसका बल- विक्रम अपरिमित था । उसे अपने साथ लेकर रमणीरत्न शकुन्तला अपने पतिके पास गयी || १ ९ || जब राजा दुष्यन्तने अपनी निर्दोष पत्नी और पुत्रको स्वीकार नहीं किया, तब जिसका वक्ता नहीं दीख रहा था और जिसे सब लोगोंने सुना, ऐसी आकाशवाणी हुई ॥२० ॥ ' पुत्र उत्पन्न करनेमें माता तो केवल
धौंकनीके समान है । वास्तवमें पुत्र पिताका ही है । क्योंकि पिता ही पुत्रके रूपमें उत्पन्न होता है । इसलिये दुष्यन्त! तुम शकुन्तलाका तिरस्कार न करो, अपने पुत्रका भरण- पोषण
करो ॥२१ ॥ राजन्! वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र अपने पिताको नरकसे उबार लेता है ।
शकुन्तलाका कहना बिलकुल ठीक है । इस गर्भको धारण करानेवाले तुम्हीं हो ' ॥२२ ॥
परीक्षित्! पिता दुष्यन्तकी मृत्यु हो जानेके बाद वह परम यशस्वी बालक चक्रवर्ती सम्राट् हुआ । उसका जन्म भगवान्के अंशसे हुआ था । आज भी पृथ्वीपर उसकी महिमाका गान किया जाता है ॥२३ ॥ उसके दाहिने हाथमें चक्रका चिह्न था और पैरोंमें कमल- कोषका ।
महाभिषेककी विधिसे राजाधिराजके पद पर उसका अभिषेक हुआ । भरत बड़ा शक्तिशाली राजा था ॥२४ ॥ भरतने ममताके पुत्र दीर्घतमा मुनिको पुरोहित बनाकर गंगातटपर
गंगासागरसे लेकर गंगोत्री - पर्यन्त पचपन पवित्र अश्वमेध यज्ञ किये । और इसी प्रकार यमुनातटपर भी प्रयागसे लेकर यमुनोत्रीतक उन्होंने अठहत्तर अश्वमेध यज्ञ किये । इन सभी यज्ञोंमें उन्होंने अपार धनराशिका दान किया था । दुष्यन्तकुमार भरतका यज्ञीय अग्निस्थापन बड़े ही उत्तम गुणवाले स्थानमें किया गया था । उस स्थानमें भरतने इतनी गौएँ दान दी थीं कि एक हजार ब्राह्मणोंमें प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक बद्ध ( १३०८४ ) गौएँ मिली थीं ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार राजा भरतने उन यज्ञोंमें एक सौ तैंतीस ( ५५ + ७८ ) घोड़े बाँधकर ( १३३ यज्ञ करके ) समस्त नरपतियोंको असीम आश्चर्यमें डाल दिया । इन यज्ञोंके द्वारा इस लोकमें तो राजा भरतको परम यश मिला ही, अन्तमें उन्होंने मायापर भी विजय प्राप्त की और देवताओंके परमगुरु भगवान् श्रीहरिको प्राप्त कर लिया ॥ २७ ॥ यज्ञमें एक कर्म होता है
‘ मष्णार’ । उसमें भरतने सुवर्णसे विभूषित, श्वेत दाँतोंवाले तथा काले रंगके चौदह लाख हाथी दान किये ॥२८ ॥ भरतने जो महान् कर्म किया, वह न तो पहले कोई राजा कर सका था
और न तो आगे ही कोई कर सकेगा । क्या कभी कोई हाथसे स्वर्गको छू सकता है? ॥२९ ॥
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भरतने दिग्विजयके समय किरात, हूण, यवन, अन्ध्र, कंक, खश, शक और म्लेच्छ आदि समस्त ब्राह्मणद्रोही राजाओंको मार डाला ॥ ३० ॥ पहले युगमें बलवान् असुरोंने देवताओंपर
विजय प्राप्त कर ली थी और वे रसातलमें रहने लगे थे । उस समय वे बहुत - सी देवांगनाओंको रसातलमें ले गये थे । राजा भरतने फिरसे उन्हें छुड़ा दिया ॥ ३१ ॥ उनके राज्यमें पृथ्वी और
आकाश प्रजाकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण कर देते थे । भरतने सत्ताईस हजार वर्षतक समस्त दिशाओंका एकछत्र शासन किया || ३२ || अन्तमें सार्वभौम सम्राट् भरतने यही निश्चय किया कि लोकपालोंको भी चकित कर देनेवाला ऐश्वर्य, सार्वभौम सम्पत्ति, अखण्ड शासन और यह
जीवन भी मिथ्या ही है । यह निश्चय करके वे संसारसे उदासीन हो गये ॥३३ ॥
अष्टसप्ततिमेध्याश्वान् बबन्ध प्रददद् वसु ।
भरतस्य हि दौष्यन्तेरग्निः साचीगुणे चितः ।
सहस्रं बद्वशो यस्मिन् ब्राह्मणा गा विभेजिरे ॥२६
त्रयस्त्रिंशच्छतं ह्यश्वान् बद्ध्वा विस्मापयन् नृपान् ।
दौष्यन्तिरत्यगान्मायां देवानां गुरुमाययौ ॥२७
मृगाञ्छुक्लदतः कृष्णान् हिरण्येन परीवृतान् ।
अदात् कर्मणि मष्णारे नियुतानि चतुर्दश ॥२८
भरतस्य महत् कर्म न पूर्वे नापरे नृपाः ।
नैवापुर्नैव प्राप्स्यन्ति बाहुभ्यां त्रिदिवं यथा ॥ २ ९
किरातहूणान् यवनानन्ध्रान् कंकान् खशाञ्छकान् ।
अब्रह्मण्यान् नृपांश्चाहन् म्लेच्छान् दिग्विजयेऽखिलान् ॥३०
जित्वा पुरासुरा देवान् ये रसौकांसि भेजिरे ।
देवस्त्रियो रसां नीताः प्राणिभिः पुनराहरत् ॥३१
सर्वकामान् दुदुहतुः प्रजानां तस्य रोदसी ।
समास्त्रिणवसाहस्रीर्दिक्षु चक्रमवर्तयत् ॥ ३२
स सम्राड् लोकपालाख्यमैश्वर्यमधिराट् श्रियम् ।
चक्रं चास्खलितं प्राणान् मृषेत्युपरराम ह ॥३३
तस्यासन् नृप वैदर्भ्यः पत्न्यस्तिस्रः सुसम्मताः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जघ्नुस्त्यागभयात् पुत्रान् नानुरूपा इतीरिते ॥३४
तस्यैवं वितथे वंशे तदर्थं यजतः सुतम् ।
मरुत्स्तोमेन मरुतो भरद्वाजमुपाददुः ॥३५
अन्तर्वत्न्यां भ्रातृपत्न्यां मैथुनाय बृहस्पतिः ।
प्रवृत्तो वारितो गर्भं शप्त्वा वीर्यमवासृजत् ॥३६
तं त्यक्तुकामां ममतां भर्तृत्यागविशंकिताम् ।
नामनिर्वचनं तस्य श्लोकमेनं सुरा जगुः ॥३७
मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते ।
यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥३८
चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम् ।
व्यसृजन् मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥३९
परीक्षित्! विदर्भराजकी तीन कन्याएँ सम्राट् भरतकी पत्नियाँ थीं । वे उनका बड़ा आदर भी करते थे । परन्तु जब भरतने उनसे कह दिया कि तुम्हारे पुत्र मेरे अनुरूप नहीं हैं, तब वे डर गयीं कि कहीं सम्राट् हमें त्याग न दें । इसलिये उन्होंने अपने बच्चोंको मार डाला ॥३४ ॥
इस प्रकार सम्राट् भरतका वंश वितथ अर्थात् विच्छिन्न होने लगा । तब उन्होंने सन्तानके लिये ‘ मरुत्स्तोम ' नामका यज्ञ किया । इससे मरुद्गणोंने प्रसन्न होकर भरतको भरद्वाज नामका पुत्र दिया ॥३५ ॥ भरद्वाजकी उत्पत्तिका प्रसंग यह है कि एक बार बृहस्पतिजीने अपने भाई
उतथ्यकी गर्भवती पत्नीसे मैथुन करना चाहा। उस समय गर्भमें जो बालक ( दीर्घतमा) था, उसने मना किया । किन्तु बृहस्पतिजीने उसकी बातपर ध्यान न दिया और उसे ' तू अंधा हो जा' यह शाप देकर बलपूर्वक गर्भाधान कर दिया ॥ ३६ ॥ उतथ्यकी पत्नी ममता इस बातसे
डर गयी कि कहीं मेरे पति मेरा त्याग न कर दें । इसलिये उसने बृहस्पतिजीके द्वारा होनेवाले लड़केको त्याग देना चाहा । उस समय देवताओंने गर्भस्थ शिशुके नामका निर्वचन करते हुए यह कहा ॥३७ ॥ बृहस्पतिजी कहते हैं कि ' अरी मूढे! यह मेरा औरस और मेरे भाईका क्षेत्रज
-इस प्रकार दोनोंका पुत्र (द्वाज) है; इसलिये तू डर मत, इसका भरण- पोषण कर ( भर) । ' इसपर ममताने कहा— ' बृहस्पते! यह मेरे पतिका नहीं, हम दोनोंका ही पुत्र है; इसलिये तुम्हीं इसका भरण- पोषण करो । ' इस प्रकार आपसमें विवाद करते हुए माता- पिता दोनों ही इसको छोड़कर चले गये । इसलिये इस लड़केका नाम ' भरद्वाज' हुआ ॥ ३८ ॥ देवताओंके द्वारा
नामका ऐसा निर्वचन होनेपर भी ममताने यही समझा कि मेरा यह पुत्र वितथ अर्थात् अन्यायसे पैदा हुआ है । अतः उसने उस बच्चेको छोड़ दिया । अब मरुद्गणोंने उसका पालन किया और जब राजा भरतका वंश नष्ट होने लगा, तब उसे लाकर उनको दे दिया । यही वितथ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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( भरद्वाज ) भरतका दत्तक पुत्र हुआ ॥३९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे विंशोऽध्यायः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकविंशोऽध्यायः भरतवंशका वर्णन, राजा रन्तिदेवकी कथा श्रीशुक उवाच
वितथस्य सुतो मन्युर्बृहत्क्षत्रो जयस्ततः ।
महावीर्यो नरो गर्गः संकृतिस्तु नरात्मजः ॥१
गुरुश्च रन्तिदेवश्च संकृतेः पाण्डुनन्दन ।
रन्तिदेवस्य हि यश इहामुत्र च गीयते ॥२
वियद्वित्तस्य ददतो लब्धं लब्धं बुभुक्षतः ।
निष्किंचनस्य धीरस्य सकुटुम्बस्य सीदतः ॥३
व्यतीयुरष्टचत्वारिंशदहान्यपिबतः किल ।
घृतपायससंयावं तोयं प्रातरुपस्थितम् ॥४
कृच्छ्रप्राप्तकुटुम्बस्य क्षुत्तृड्भ्यां जातवेपथोः ।
अतिथिर्ब्राह्मणः काले भोक्तुकामस्य चागमत् ॥५
तस्मै संव्यभजत् सोऽन्नमादृत्य श्रद्धयान्वितः ।
हरिं सर्वत्र संपश्यन् स भुक्त्वा प्रययौ द्विजः ॥६
अथान्यो भोक्ष्यमाणस्य विभक्तस्य महीपते ।
विभक्तं व्यभजत् तस्मै वृषलाय हरिं स्मरन् ॥७
याते शूद्रे तमन्योऽगादतिथिः श्वभिरावृतः ।
राजन् मे दीयतामन्नं सगणाय बुभुक्षते ॥८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! वित्थ अथवा भरद्वाजका पुत्र था मन्यु । मन्युके पाँच पुत्र हुए — बृहत्क्षत्र, जय, महावीर्य, नर और गर्ग । नरका पुत्र था संकृति ॥१ ॥ संकृतिके
दो पुत्र हुए- गुरु और रन्तिदेव। परीक्षित्! रन्तिदेवका निर्मल यश इस लोक और परलोकमें सब जगह गाया जाता है ॥२ ॥ रन्तिदेव आकाशके समान बिना उद्योगके ही दैववश प्राप्त
वस्तुका उपभोग करते और दिनोंदिन उनकी पूँजी घटती जाती । जो कुछ मिल जाता उसे भी दे डालते और स्वयं भूखे रहते । वे संग्रह- परिग्रह, ममतासे रहित तथा बड़े धैर्यशाली थे और अपने कुटुम्बके साथ दुःख भोग रहे थे || ३ || एक बार तो लगातार अड़तालीस दिन ऐसे बीत ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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गये कि उन्हें पानीतक पीनेको न मिला । उनचासवें दिन प्रातःकाल ही उन्हें कुछ घी, खीर, हलवा और जल मिला ॥४ ॥ उनका परिवार बड़े संकटमें था । भूख और प्यासके मारे वे लोग
काँप रहे थे । परन्तु ज्यों ही उन लोगोंने भोजन करना चाहा, त्यों ही एक ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ गया ॥५ ॥ रन्तिदेव सबमें श्रीभगवान्के ही दर्शन करते थे । अतएव उन्होंने बड़ी
श्रद्धासे आदरपूर्वक उसी अन्नमेंसे ब्राह्मणको भोजन कराया । ब्राह्मणदेवता भोजन करके चले गये ॥६ ॥
परीक्षित्! अब बचे हुए अन्नको रन्तिदेवने आपसमें बाँट लिया और भोजन करना चाहा । उसी समय एक दूसरा शूद्र- अतिथि आ गया । रन्तिदेवने भगवान्का स्मरण करते हुए उस बचे हुए अन्नमेंसे भी कुछ भाग शूद्रके रूपमें आये अतिथिको खिला दिया ॥७ ॥
जब शूद्र खा - पीकर चला गया, तब कुत्तेंको लिये हुए एक और अतिथि आया । उसने कहा — ' राजन्! मैं और मेरे ये कुत्ते बहुत भूखे हैं । हमें कुछ खानेको दीजिये ' ॥८ ॥ रन्तिदेवने
अत्यन्त आदरभावसे, जो कुछ बच रहा था, सब का सब उसे दे दिया और भगवन्मय होकर उन्होंने कुत्ते और कुत्तोंके स्वामीके रूपमें आये हुए भगवान्को नमस्कार किया ॥९ ॥ अब
केवल जल ही बच रहा था और वह भी केवल एक मनुष्यके पीनेभरका था । वे उसे आपसमें बाँटकर पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डाल और आ पहुँचा । उसने कहा — ‘ मैं अत्यन्त नीच हूँ । मुझे जल पिला दीजिये' ॥१० ॥ चाण्डालकी वह करुणापूर्ण वाणी जिसके उच्चारणमें
भी वह अत्यन्त कष्ट पा रहा था, सुनकर रन्तिदेव दयासे अत्यन्त सन्तप्त हो उठे और ये अमृतमय वचन कहने लगे ॥११ ॥ ' मैं भगवान्से आठों सिद्धियोंसे युक्त परम गति नहीं
चाहता। और तो क्या, मैं मोक्षकी भी कामना नहीं करता । मैं चाहता हूँ तो केवल यही कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हो जाऊँ और उनका सारा दुःख मैं ही सहन करूँ, जिससे और किसी भी प्राणीको दुःख न हो ॥१२ ॥ यह दीन प्राणी जल पी करके जीना चाहता था ।
जल दे देनेसे इसके जीवनकी रक्षा हो गयी । अब मेरी भूख- प्यासकी पीड़ा, शरीरकी शिथिलता, दीनता, ग्लानि, शोक, विषाद और मोह– ये सब - के - सब जाते रहे । मैं सुखी हो गया ' ॥१३ ॥ इस प्रकार कहकर रन्तिदेवने वह बचा हुआ जल भी उस चाण्डालको दे दिया ।
यद्यपि जलके बिना वे स्वयं मर रहे थे, फिर भी स्वभावसे ही उनका हृदय इतना करुणापूर्ण था कि वे अपनेको रोक न सके । उनके धैर्यकी भी कोई सीमा है? ॥१४ ॥ परीक्षित्! ये
अतिथि वास्तवमें भगवान्की रची हुई मायाके ही विभिन्न रूप थे । परीक्षा पूरी हो जानेपर अपने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले त्रिभुवनस्वामी ब्रह्मा, विष्णु और महेश– तीनों उनके सामने प्रकट हो गये ॥१५ ॥ रन्तिदेवने उनके चरणोंमें नमस्कार किया । उन्हें कुछ लेना
तो था नहीं । भगवान्की कृपासे वे आसक्ति और स्पृहासे भी रहित हो गये तथा परम प्रेममय
भक्तिभावसे अपने मनको भगवान् वासुदेवमें तन्मय कर दिया । कुछ भी माँगा नहीं ॥१६ ॥
परीक्षित्! उन्हें भगवान्के सिवा और किसी भी वस्तुकी इच्छा तो थी नहीं, उन्होंने अपने मनको पूर्णरूपसे भगवान्में लगा दिया । इसलिये त्रिगुणमयी माया जागनेपर स्वप्न- दृश्यके समान नष्ट हो गयी ॥१७ ॥ रन्तिदेवके अनुयायी भी उनके संगके प्रभावसे योगी हो गये और
सब भगवान्के ही आश्रित परम भक्त बन गये ॥१८ ॥
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स आदृत्यावशिष्टं यद् बहुमानपुरस्कृतम् ।
तच्च दत्त्वा नमश्चक्रे श्वभ्यः श्वपतये विभुः ॥९
पानीयमात्रमुच्छेषं तच्चैकपरितर्पणम् ।
पास्यतः पुल्कसोऽभ्यागादपो देह्यशुभस्य मे ॥१०
तस्य तां करुणां वाचं निशम्य विपुलश्रमाम् ।
कृपया भृशसन्तप्त इदमाहामृतं वचः ॥११
न कामयेऽहं गतिमीश्वरात् परा- मष्टर्द्धयुक्तामपुनर्भवं वा ।
आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजा- मन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः ॥१२
क्षुत्तृट्श्रमो गात्रपरिश्रमश्च
दैन्यं क्लमः शोकविषादमोहाः ।
सर्वे निवृत्ताः कृपणस्य जन्तो- र्जिजीविषोर्जीवजलार्पणान्मे ॥१३
इति प्रभाष्य पानीयं म्रियमाणः पिपासया ।
पुल्कसायाददाद्धीरो निसर्गकरुणो नृपः ॥१४
तस्य त्रिभुवनाधीशाः फलदाः फलमिच्छताम् ।
आत्मानं दर्शयाञ्चक्रुर्माया विष्णुविनिर्मिताः ॥ १५
स वै तेभ्यो नमस्कृत्य निःसंगो विगतस्पृहः ।
वासुदेवे भगवति भक्त्या चक्रे मनः परम् ॥१६
ईश्वरालम्बनं चित्तं कुर्वतोऽनन्यराधसः ।
माया गुणमयी राजन् स्वप्नवत् प्रत्यलीयत ॥ १७
तत्प्रसंगानुभावेन रन्तिदेवानुवर्तिनः ।
अभवन् योगिनः सर्वे नारायणपरायणाः ॥१८
गर्गाच्छिनिस्ततो गार्ग्यः क्षत्राद् ब्रह्म ह्यवर्तत । ******ebook converter DEMO Watermarks *******