श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 151–160
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
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वृषपर्वा तमाज्ञाय प्रत्यनीकविवक्षितम् ।
गुरुं प्रसादयन् मूर्ध्ना पादयोः पतितः पथि ॥२६
क्षणार्धमन्युर्भगवान् शिष्यं व्याचष्ट भार्गवः ।
कामोऽस्याः क्रियतां राजन् नैनां त्यक्तुमिहोत्सहे ॥२७
तथेत्यवस्थिते प्राह देवयानी मनोगतम् ।
पित्रा दत्ता यतो यास्ये सानुगा यातु मामनु ॥२८
स्वानां तत् संकटं वीक्ष्य तदर्थस्य च गौरवम् ।
देवयानीं पर्यचरत् स्त्रीसहस्रेण दासवत् ॥२९
नाहुषाय सुतां दत्त्वा सह शर्मिष्ठयोशना ।
तमाह राजञ्छर्मिष्ठामाधास्तल्पे न कर्हिचित् ॥३०
विलोक्यौशनसीं राजञ्छर्मिष्ठा सप्रजां क्वचित् ।
तमेव वव्रे रहसि सख्याः पतिमृतौ सती ॥३१
राजपुत्र्यार्थितोऽपत्ये धर्मं चावेक्ष्य धर्मवित् ।
स्मरञ्छुक्रवचः काले दिष्टमेवाभ्यपद्यत ॥ ३२
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥३३
गर्भसम्भवमासुर्या भर्तुर्विज्ञाय मानिनी ।
देवयानी पितुर्गेहं ययौ क्रोधविमूर्च्छिता ॥३४
जब वृषपर्वाको यह मालूम हुआ तो उनके मनमें यह शंका हुई कि गुरुजी कहीं शत्रुओंकी जीत न करा दें, अथवा मुझे शाप न दे दें । अतएव वे उनको प्रसन्न करनेके लिये पीछे - पीछे गये और रास्तेमें उनके चरणोंपर सिरके बल गिर गये || २६ || भगवान् शुक्राचार्यजीका क्रोध तो आधे ही क्षणका था । उन्होंने वृषपर्वासे कहा— ' राजन्! मैं अपनी पुत्री देवयानीको नहीं छोड़ सकता । इसलिये इसकी जो इच्छा हो, तुम पूरी कर दो । फिर मुझे लौट चलनेमें कोई आपत्ति न होगी ' ॥२७ ॥ जब वृषपर्वाने ' ठीक है ' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली, तब
देवयानीने अपने मनकी बात कही । उसने कहा - ' पिताजी मुझे जिस किसीको दे दें और मैं जहाँ कहीं जाऊँ; शर्मिष्ठा अपनी सहेलियोंके साथ मेरी सेवाके लिये वहीं चले ' ॥२८ ॥
शर्मिष्ठाने अपने परिवारवालोंका संकट और उनके कार्यका गौरव देखकर देवयानीकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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बात स्वीकार कर ली । वह अपनी एक हजार सहेलियोंके साथ दासीके समान उसकी सेवा करने लगी ॥२९ ॥ शुक्राचार्यजीने देवयानीका विवाह राजा ययातिके साथ कर दिया और
शर्मिष्ठाको दासीके रूपमें देकर उनसे कह दिया- ' राजन्! इसको अपनी सेजपर कभी न आने देना' ॥३० ॥ परीक्षित्! कुछ ही दिनों बाद देवयानी पुत्रवती हो गयी । उसको पुत्रवती
देखकर एक दिन शर्मिष्ठाने भी अपने ऋतुकालमें देवयानीके पति ययातिसे एकान्तमें सहवासकी याचना की ॥ ३१ ॥ शर्मिष्ठाकी पुत्रके लिये प्रार्थना धर्मसंगत है — यह देखकर
धर्मज्ञ राजा ययातिने शुक्राचार्यकी बात याद रहनेपर भी यही निश्चय किया कि समयपर प्रारब्धके अनुसार जो होना होगा, हो जायगा ॥ ३२ ॥ देवयानीके दो पुत्र हुए – यदु और
तुर्वसु । तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पूरु ॥३३ ॥ जब
मानिनी देवयानीको यह मालूम हुआ कि शर्मिष्ठाको भी मेरे पतिके द्वारा ही गर्भ रहा था, तब वह क्रोधसे बेसुध होकर अपने पिताके घर चली गयी || ३४ || कामी ययातिने मीठी - मीठी बातें, अनुनय- विनय और चरण दबाने आदिके द्वारा देवयानीको मनानेकी चेष्टा की, उसके पीछे - पीछे वहाँतक गये भी; परन्तु मना न सके ॥ ३५ ॥ शुक्राचार्यजीने भी क्रोधमें भरकर
ययातिसे कहा— ‘ तू अत्यन्त स्त्रीलम्पट, मन्दबुद्धि और झूठा है । जा, तेरे शरीरमें वह बुढ़ापा आ जाय, जो मनुष्योंको कुरूप कर देता है ' ॥ ३६ ॥
प्रियामनुगतः कामी वचोभिरुपमन्त्रयन् ।
न प्रसादयितुं शेके पादसंवाहनादिभिः ॥३५
शुक्रस्तमाह कुपितः स्त्रीकामानृतपूरुष ।
त्वां जरा विशतां मन्द विरूपकरणी नृणाम् ॥३६
ययातिरुवाच
अतृप्तोऽस्म्यद्य कामानां ब्रह्मन् दुहितरि स्म ते ।
व्यत्यस्यतां यथाकामं वयसा योऽभिधास्यति ॥३७
इति लब्धव्यवस्थानः पुत्रं ज्येष्ठमवोचत ।
यदो तात प्रतीच्छेमां जरां देहि निजं वयः ॥३८
मातामहकृतां वत्स न तृप्तो विषयेष्वहम् ।
वयसा भवदीयेन रंस्ये कतिपयाः समाः ॥३९
यदुरुवाच
नोत्सहे जरसा स्थातुमन्तरा प्राप्तया तव ।
अविदित्वा सुखं ग्राम्यं वैतृष्ण्यं नैति पूरुषः ॥४०
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तुर्वसुश्चोदितः पित्रा द्रुश्चानुश्च भारत ।
प्रत्याचख्युरधर्मज्ञा ह्यनित्ये नित्यबुद्धयः ॥४१
अपृच्छत् तनयं पूरुं वयसोनं गुणाधिकम् ।
न त्वमग्रजवद् वत्स मां प्रत्याख्यातुमर्हसि ॥४२
पूरुरुवाच
को नु लोके मनुष्येन्द्र पितुरात्मकृतः पुमान् ।
प्रतिकर्तुं क्षमो यस्य प्रसादाद् विन्दते परम् ॥४३
ययातिने कहा — ' ब्रह्मन्! आपकी पुत्रीके साथ विषय- भोग करते- करते अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है । इस शापसे तो आपकी पुत्रीका भी अनिष्ट ही है । ' इसपर शुक्राचार्यजीने कहा - ' अच्छा जाओ; जो प्रसन्नतासे तुम्हें अपनी जवानी दे दे, उससे अपना बुढ़ापा बदल लो’ ॥३७ ॥ शुक्राचार्यजीने जब ऐसी व्यवस्था दे दी, तब अपनी राजधानीमें आकर ययातिने
अपने बड़े पुत्र यदुसे कहा - ' बेटा! तुम अपनी जवानी मुझे दे दो और अपने नानाका दिया हुआ यह बुढ़ापा तुम स्वीकार कर लो । क्योंकि मेरे प्यारे पुत्र! मैं अभी विषयोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। इसलिये तुम्हारी आयु लेकर मैं कुछ वर्षोंतक और आनन्द भोगूँगा' ॥३८-३९ ॥ यदुने कहा — ‘ पिताजी! बिना समयके ही प्राप्त हुआ आपका बुढ़ापा लेकर तो मैं जीना भी नहीं चाहता । क्योंकि कोई भी मनुष्य जबतक विषय- सुखका अनुभव नहीं कर लेता, तबतक उसे उससे वैराग्य नहीं होता' ॥४० ॥ परीक्षित्! इसी प्रकार तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुने
भी पिताकी आज्ञा अस्वीकार कर दी । सच पूछो तो उन पुत्रोंको धर्मका तत्त्व मालूम नहीं था । वे इस अनित्य शरीरको ही नित्य माने बैठे थे ॥४१ ॥ अब ययातिने अवस्थामें सबसे छोटे
किन्तु गुणोंमें बड़े अपने पुत्र पूरुको बुलाकर पूछा और कहा – ' बेटा! अपने बड़े भाइयोंके समान तुम्हें तो मेरी बात नहीं टालनी चाहिये' ॥४२ ॥
पूरुने कहा — ' पिताजी! पिताकी कृपासे मनुष्यको परमपदकी प्राप्ति हो सकती है । वास्तवमें पुत्रका शरीर पिताका ही दिया हुआ है । ऐसी अवस्थामें ऐसा कौन है, जो इस संसारमें पिताके उपकारोंका बदला चुका सके? ॥४३ ॥
उत्तमश्चिन्तितं कुर्यात् प्रोक्तकारी तु मध्यमः ।
अधमोऽश्रद्धया कुर्यादकर्तोच्चरितं पितुः ॥४४
इति प्रमुदितः पूरुः प्रत्यगृह्णाज्जरां पितुः ।
सोऽपि तद्वयसा कामान् यथावज्जुजुषे नृप ॥४५
सप्तद्वीपपतिः सम्यक् पितृवत् पालयन् प्रजाः ।
यथोपजोषं विषयांजुजुषेऽव्याहतेन्द्रियः ॥४६
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देवयान्यप्यनुदिनं मनोवाग्देहवस्तुभिः ।
प्रेयसः परमां प्रीतिमुवाह प्रेयसी रहः ॥४७
अयजद् यज्ञपुरुषं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
सर्वदेवमयं देवं सर्ववेदमयं हरिम् ॥४८
यस्मिन्निदं विरचितं व्योम्नीव जलदावलिः ।
नानेव भाति नाभाति स्वप्नमायामनोरथः ॥४९
तमेव हृदि विन्यस्य वासुदेवं गुहाशयम् ।
नारायणमणीयांसं निराशीरयजत् प्रभुम् ॥५०
एवं वर्षसहस्राणि मनःषष्ठैर्मनःसुखम् ।
विदधानोऽपि नातृप्यत् सार्वभौमः कदिन्द्रियैः ॥५१
उत्तम पुत्र तो वह है जो पिताके मनकी बात बिना कहे ही कर दे । कहनेपर श्रद्धाके साथ आज्ञापालन करनेवाले पुत्रको मध्यम कहते हैं । जो आज्ञा प्राप्त होनेपर भी अश्रद्धासे उसका पालन करे, वह अधम पुत्र है । और जो किसी प्रकार भी पिताकी आज्ञाका पालन नहीं करता, उसको तो पुत्र कहना ही भूल है । वह तो पिताका मल- मूत्र ही है ॥४४ ॥ परीक्षित्! इस प्रकार
कहकर पूरुने बड़े आनन्दसे अपने पिताका बुढ़ापा स्वीकार कर लिया । राजा ययाति भी उसकी जवानी लेकर पूर्ववत् विषयोंका सेवन करने लगे ॥ ४५ ॥ वे सातों द्वीपोंके एकच्छत्र
सम्राट् थे । पिताके समान भलीभाँति प्रजाका पालन करते थे । उनकी इन्द्रियोंमें पूरी शक्ति थी और वे यथावसर यथाप्राप्त विषयोंका यथेच्छ उपभोग करते थे ॥४६ ॥ देवयानी उनकी
प्रियतमा पत्नी थी । वह अपने प्रियतम ययातिको अपने मन, वाणी, शरीर और वस्तुओंके द्वारा दिन - दिन और भी प्रसन्न करने लगी; और एकान्तमें सुख देने लगी ॥४७ ॥ राजा
ययातिने समस्त वेदोंके प्रतिपाद्य सर्वदेवस्वरूप यज्ञपुरुष भगवान् श्रीहरिका बहुत-से बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे यजन किया || ४८ ॥ जैसे आकाशमें दल - के - दल बादल दीखते हैं और कभी नहीं भी दीखते, वैसे ही परमात्माके स्वरूपमें यह जगत् स्वप्न, माया और मनोराज्यके समान कल्पित है । यह कभी अनेक नाम और रूपोंके रूपमें प्रतीत होता है और कभी नहीं भी ॥४९ ॥
वे परमात्मा सबके हृदयमें विराजमान हैं । उनका स्वरूप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है । उन्हीं सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी भगवान् श्रीनारायणको अपने हृदयमें स्थापित करके राजा ययातिने निष्काम भावसे उनका यजन किया ॥ ५० ॥ इस प्रकार एक हजार वर्षतक उन्होंने अपनी
उच्छृंखल इन्द्रियोंके साथ मनको जोड़कर उसके प्रिय विषयोंको भोगा । परन्तु इतनेपर भी चक्रवर्ती सम्राट् ययातिकी भोगोंसे तृप्ति न हो सकी ॥५१ ॥
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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धेऽष्टादशोऽध्यायः ॥१८ ॥
* बृहस्पतिजीका पुत्र कच शुक्राचार्यजीसे मृतसंजीवनी विद्या पढ़ता था । अध्ययन समाप्त करके जब वह अपने घर जाने लगा तो देवयानीने उसे वरण करना चाहा । परन्तु गुरुपुत्री होनेके कारण कचने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया । इसपर देवयानीने उसे शाप दे दिया कि ' तुम्हारी पढ़ी हुई विद्या निष्फल हो जाय । ' कचने भी उसे शाप दिया कि ' कोई भी ब्राह्मण तुम्हें पत्नीरूपमें स्वीकार न करेगा । ' ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकोनविंशोऽध्यायः ययातिका गृहत्याग श्रीशुक उवाच
स इत्थमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपह्नवमात्मनः ।
बुद्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत ॥१
शृणु भार्गव्यमूं गाथां मद्विधाचरितां भुवि ।
धीरा यस्यानुशोचन्ति वने ग्रामनिवासिनः ॥२
बस्त एको वने कश्चिद् विचिन्वन् प्रियमात्मनः ।
ददर्श कूपे पतितां स्वकर्मवशगामजाम् ॥३
तस्या उद्धरणोपायं बस्तः कामी विचिन्तयन् ।
व्यधत्त तीर्थमुद्धृत्य विषाणाग्रेण रोधसी ॥४
सोत्तीर्य कूपात् सुश्रोणी तमेव चकमे किल ।
तया वृतं समुद्वीक्ष्य बह्वयोऽजाः कान्तकामिनीः ॥५
पीवानं श्मश्रुलं प्रेष्ठं मीढ्वांसं याभकोविदम् ।
स एकोऽजवृषस्तासां बह्वीनां रतिवर्धनः ।
रेमे कामग्रहग्रस्त आत्मानं नावबुध्यत ॥६
तमेव प्रेष्ठतमया रममाणमजान्यया ।
विलोक्य कूपसंविग्ना नामृष्यद् बस्तकर्म तत् ॥७
तं दुर्हृदं सुहद्रूपं कामिनं क्षणसौहृदम् ।
इन्द्रियाराममुत्सृज्य स्वामिनं दुःखिता ययौ ॥८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! राजा ययाति इस प्रकार स्त्रीके वशमें होकर विषयोंका उपभोग करते रहे । एक दिन जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी देवयानीसे इस गाथाका गान किया ॥१ ॥
' भृगुनन्दिनी! तुम यह गाथा सुनो । पृथ्वीमें मेरे ही समान विषयीका यह सत्य इतिहास है । ऐसे ही ग्रामवासी विषयी पुरुषोंके सम्बन्धमें वनवासी जितेन्द्रिय पुरुष दुःखके साथ विचार किया करते हैं कि इनका कल्याण कैसे होगा? ॥२ ॥ एक था बकरा । वह वनमें अकेला ही अपनेको
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प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ ढूँढ़ता हुआ घूम रहा था । उसने देखा कि अपने कर्मवश एक बकरी में गिर पड़ी है ॥ ३ ॥ वह बकरा बड़ा कामी था । वह सोचने लगा कि इस बकरीको किस
प्रकार कूएँसे निकाला जाय। उसने अपने सींगसे कूएँके पासकी धरती खोद डाली और रास्ता तैयार कर लिया ॥४ ॥ जब वह सुन्दरी बकरी कूएँसे निकली तो उसने उस बकरेसे ही प्रेम
करना चाहा । वह दाढ़ी- मूँछमण्डित बकरा हृष्ट- पुष्ट, जवान, बकरियोंको सुख देनेवाला, विहारकुशल और बहुत प्यारा था । जब दूसरी बकरियोंने देखा कि कूएँमें गिरी हुई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको अपना पति बना लिया । वे तो पहलेसे ही पतिकी तलाशमें थीं । उस बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था । वह अकेला ही बहुत - सी बकरियोंके साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध - बुध खो बैठा ॥५-६ ॥ जब उसकी कूएँमेंसे निकाली हुई प्रियतमा बकरीने देखा कि मेरा पति तो अपनी दूसरी प्रियतमा बकरीसे विहार कर रहा है तो उसे बकरेकी यह करतूत सहन न हुई ॥७ ॥ उसने
देखा कि यह तो बड़ा कामी है, इसके प्रेमका कोई भरोसा नहीं है और यह मित्रके रूपमें शत्रुका काम कर रहा है । अतः वह बकरी उस इन्द्रियलोलुप बकरेको छोड़कर बड़े दुःखसे अपने पालनेवालेके पास चली गयी || ८ || वह दीन कामी बकरा उसे मनानेके लिये ‘ में - में ’ करता हुआ उसके पीछे - पीछे चला । परन्तु उसे मार्गमें मना न सका ॥९ ॥ उस बकरीका
स्वामी एक ब्राह्मण था । उसने क्रोधमें आकर बकरेके लटकते हुए अण्डकोषको काट दिया । परन्तु फिर उस बकरीका ही भला करनेके लिये फिरसे उसे जोड़ भी दिया । उसे इस प्रकारके बहुत - से उपाय मालूम थे || १० || प्रिये! इस प्रकार अण्डकोष जुड़ जानेपर वह बकरा फिर कूएँसे निकली हुई बकरीके साथ बहुत दिनोंतक विषयभोग करता रहा, परन्तु आजतक उसे सन्तोष न हुआ ॥११ ॥ सुन्दरी! मेरी भी यही दशा है । तुम्हारे प्रेमपाशमें बँधकर मैं भी
अत्यन्त दीन हो गया। तुम्हारी मायासे मोहित होकर मैं अपने-आपको भी भूल गया हूँ ॥१२ ॥
सोऽपि चानुगतः स्त्रैणः कृपणस्तां प्रसादितुम् ।
कुर्वन्निडविडाकारं नाशक्नोत् पथि संधितुम् ॥९
तस्यास्तत्र द्विजः कश्चिदजास्वाम्यच्छिनद् रुषा ।
लम्बन्तं वृषणं भूयः सन्दधेऽर्थाय योगवित् ॥१०
सम्बद्धवृषणः सोऽपि ह्यजया कूपलब्धया ।
कालं बहुतिथं भद्रे कामैर्नाद्यापि तुष्यति ॥११
तथाहं कृपणः सुभ्रु भवत्याः प्रेमयन्त्रितः ।
आत्मानं नाभिजानामि मोहितस्तव मायया ॥१२
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यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते ॥१३
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥१४
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।
समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥१५
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते ।
तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥१६
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥१७
‘ प्रिये! पृथ्वीमें जितने भी धान्य ( चावल, जौ आदि ), सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं — वे सब- के - सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है ॥१३ ॥ विषयोंके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती । बल्कि
जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगवासनाएँ भी भोगोंसे प्रबल हो जाती हैं ॥१४ || जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं ॥१५ ॥ विषयोंकी तृष्णा ही दुःखोंका उद्गम स्थान है । मन्दबुद्धि लोग बड़ी
कठिनाईसे उसका त्याग कर सकते हैं । शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती जाती है । अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र से शीघ्र इस तृष्णा ( भोग- वासना) का त्याग कर देना चाहिये ॥१६ ॥ और तो क्या— अपनी मा, बहिन और कन्याके साथ भी
अकेले एक आसनपर सटकर नहीं बैठना चाहिये । इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े -बड़े विद्वानों को भी विचलित कर देती हैं ॥१७ ॥
पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयान् सेवतोऽसकृत् ।
तथापि चानुसवनं' तृष्णा तेषूपजायते ॥१८
तस्मादेतामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् ।
निर्द्वन्द्वो निरहंकारश्चरिष्यामि मृगैः सह ॥१९
दृष्टं श्रुतमसद् बुद्ध्वा नानुध्यायेन्न संविशेत् ।
संसृतिं चात्मनाशं च तत्र विद्वान् स आत्मदृक् ॥२०
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इत्युक्त्वा नाहुषो जायां तदीयं पूरवे वयः ।
दत्त्वा स्वां जरसं तस्मादाददे विगतस्पृहः ॥२१
दिशि दक्षिणपूर्वस्यां द्रुह्यं दक्षिणतो यदुम् ।
प्रतीच्यां तुर्वसुं चक्र उदीच्यामनुमीश्वरम् ॥२२
भूमण्डलस्य सर्वस्य पूरुमर्हत्तमं विशाम् ।
अभिषिच्याग्रजांस्तस्य वशे स्थाप्य वनं ययौ ॥२३
आसेवितं वर्षपूगान् षड्वर्गं विषयेषु सः ।
क्षणेन मुमुचे नीडं जातपक्ष इव द्विजः ॥२४
स तत्र निर्मुक्त्तसमस्तसंग आत्मानुभूत्या विधुतत्रिलिंगः । परेऽमले ब्रह्मणि वासुदेवे लेभे गतिं भागवतीं प्रतीतः ॥२५ विषयोंका बार- बार सेवन करते - करते मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गये, फिर भी क्षण -प्रति-क्षण उन भोगोंकी लालसा बढ़ती ही जा रही है ॥१८ ॥ इसलिये मैं अब भोगोंकी वासना-तृष्णाका परित्याग करके अपना अन्तःकरण परमात्माके प्रति समर्पित कर दूँगा और शीत-उष्ण, सुख- दुःख आदिके भावोंसे ऊपर उठकर अहंकारसे मुक्त हो हरिनोंके साथ वनमें
विचरूँगा ॥१९ ॥ लोक- परलोक दोनोंके ही भोग असत् हैं, ऐसा समझकर न तो उनका
चिन्तन करना चाहिये और न भोग ही । समझना चाहिये कि उनके चिन्तनसे ही जन्म- मृत्युरूप संसारकी प्राप्ति होती है और उनके भोगसे तो आत्मनाश ही हो जाता है । वास्तवमें इनके रहस्यको जानकर इनसे अलग रहनेवाला ही आत्मज्ञानी है ' ॥२० ॥
परीक्षित्! ययातिने अपनी पत्नीसे इस प्रकार कहकर पूरुकी जवानी उसे लौटा दी और उससे अपना बुढ़ापा ले लिया । यह इसलिये कि अब उनके चित्तमें विषयोंकी वासना नहीं रह गयी थी ॥२१ ॥ इसके बाद उन्होंने दक्षिण- पूर्व दिशामें द्रुह्यु, दक्षिणमें यदु, पश्चिममें तुर्वसु
और उत्तरमें अनुको राज्य दे दिया ॥ २२ ॥ सारे भूमण्डलकी समस्त सम्पत्तियोंके योग्यतम
पात्र पूरुको अपने राज्यपर अभिषिक्त करके तथा बड़े भाइयोंको उसके अधीन बनाकर वे वनमें चले गये ॥२३ ॥ यद्यपि राजा ययातिने बहुत वर्षोंतक इन्द्रियोंसे विषयोंका सुख भोगा
था — परन्तु जैसे पाँख निकल आनेपर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है, वैसे ही उन्होंने एक क्षणमें ही सब कुछ छोड़ दिया || २४ || वनमें जाकर राजा ययातिने समस्त आसक्तियोंसे छुट्टी पा ली । आत्म - साक्षात्कारके द्वारा उनका त्रिगुणमय लिंगशरीर नष्ट हो गया । उन्होंने माया-मलसे रहित परब्रह्म परमात्मा वासुदेवमें मिलकर वह भागवती गति प्राप्त की, जो बड़े - बड़े भगवान्के प्रेमी संतोंको प्राप्त होती है ॥२५ ॥
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श्रुत्वा गाथां देवयानी मेने प्रस्तोभमात्मनः ।
स्त्रीपुंसोः स्नेहवैक्लव्यात् परिहासमिवेरितम् ॥२६
सा संनिवासं सुहृदां प्रपायामिव गच्छताम् ।
विज्ञायेश्वरतन्त्राणां मायाविरचितं प्रभोः ॥२७
सर्वत्र संगमुत्सृज्य स्वप्नौपम्येन भार्गवी ।
कृष्णे मनः समावेश्य व्यधुनोल्लिंगमात्मनः ॥२८
नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।
सर्वभूताधिवासाय शान्ताय बृहते नमः ॥२९
जब देवयानीने वह गाथा सुनी, तो उसने समझा कि ये मुझे निवृत्तिमार्गके लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं । क्योंकि स्त्री- पुरुषमें परस्पर प्रेमके कारण विरह होनेपर विकलता होती है, यह सोचकर ही इन्होंने यह बात हँसी -हँसीमें कही है ॥२६ ॥ स्वजन- सम्बन्धियोंका –जो
ईश्वरके अधीन है —एक स्थानपर इकट्ठा हो जाना वैसा ही है, जैसा प्याऊपर पथिकोंका । यह सब भगवान्की मायाका खेल और स्वप्नके सरीखा ही है । ऐसा समझकर देवयानीने सब पदार्थोंकी आसक्ति त्याग दी और अपने मनको भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके बन्धनके हेतु लिंगशरीरका परित्याग कर दिया-वह भगवान्को प्राप्त हो गयी ॥२७-२८ ॥ उसने भगवान्को नमस्कार करके कहा- ' समस्त जगत्के रचयिता, सर्वान्तर्यामी, सबके आश्रयस्वरूप सर्वशक्तिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है । जो परमशान्त और अनन्त तत्त्व है, उसे मैं नमस्कार करती हूँ' ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ १. नुदिवसं । २. सद्विद्वान् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******