श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 181–190

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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यह कन्या वास्तवमें उपरिचरवसुके वीर्यसे मछलीके गर्भसे उत्पन्न हुई १ दाशों ( केवटों ) -के द्वारा पालित होनेसे वह केवटोंकी कन्या कहलायी ।

पृष्ठ 182

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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः अनु, द्रुह्यु, तुर्वसु और यदुके वंशका वर्णन श्रीशुक उवाच

अनोः सभानरश्चक्षुः परोक्षश्च त्रयः सुताः ।

सभानरात् कालनरः सृजयस्तत्सुतस्ततः ॥१

जनमेजयस्तस्य पुत्रो महाशीलो महामनाः ।

उशीनरस्तितिक्षुश्च महामनस आत्मजौ ॥२

शिबिर्वनः शमिर्दक्षश्चत्वारोशीनरात्मजाः ।

वृषादर्भः सुवीरश्च मद्रः कैकेय आत्मजाः ॥३

शिबेश्चत्वार एवासंस्तितिक्षोश्च रुशद्रथः ।

ततो हेमोऽथ सुतपा बलिः सुतपसोऽभवत् ॥४

अंगवंगकलिंगाद्याः सुह्मपुण्ड्रान्ध्रसंज्ञिताः ।

जज्ञिरे दीर्घतमसो बलेः क्षेत्रे महीक्षितः ॥ ५

चक्रुः स्वनाम्ना विषयान् षडिमान् प्राच्यकांश्च ते ।

खनपानोऽङ्गतो जज्ञे तस्माद् दिविरथस्ततः ॥ ६

सुतो धर्मरथो यस्य जज्ञे चित्ररथोऽप्रजाः ।

रोमपाद इति ख्यातस्तस्मै दशरथः सखा ॥७

शान्तां स्वकन्यां प्रायच्छदृष्यशृङ्ग उवाह ताम् ।

देवेऽवर्षति यं रामा आनिन्युर्हरिणीसुतम् ॥८

नाट्यसंगीतवादित्रैर्विभ्रमालिंगनार्हणैः ।

स तु राज्ञोऽनपत्यस्य निरूप्येष्टिं मरुत्वतः ॥९

प्रजामदाद् दशरथो येन लेभेऽप्रजाः प्रजाः ।

चतुरंगो रोमपादात् पृथुलाक्षस्तु तत्सुतः ॥१०

बृहद्रथो बृहत्कर्मा बृहद्भानुश्च तत्सुताः ।

आद्याद् बृहन्मनास्तस्माज्जयद्रथ उदाहृतः ॥११

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! ययाति- नन्दन अनुके तीन पुत्र हुए — सभानर, चक्षु और परोक्ष । सभानरका कालनर, कालनरका सृजय, सृजयका जनमेजय, जनमेजयका महाशील, महाशीलका पुत्र हुआ महामना । महामनाके दो पुत्र हुए-उशीनर एवं तितिक्षु ॥१-२ ॥ उशीनरके चार पुत्र थे - शिब, वन, शमी और दक्ष। शिबिके चार पुत्र हुए-बृषादर्भ, सुवीर, मद्र और कैकेय । उशीनरके भाई तितिक्षुके रुशद्रथ, रुशद्रथके हेम, हेमके

पृष्ठ 183

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सुतपा और सुतपाके बलि नामक पुत्र हुआ ॥३-४ ॥ राजा बलिकी पत्नीके गर्भसे दीर्घतमा मुनिने छः पुत्र उत्पन्न किये - अंग, वंग, कलिंग, सुह्म, पुण्ड्र और अन्ध्र || ५|| इन लोगोंने अपने - अपने नामसे पूर्व दिशामें छः देश बसाये । अंगका पुत्र हुआ खनपान, खनपानका दिविरथ, दिविरथका धर्मरथ और धर्मरथका चित्ररथ । यह चित्ररथ ही रोमपादके नामसे प्रसिद्ध था । इसके मित्र थे अयोध्याधिपति महाराज दशरथ । रोमपादको कोई सन्तान न थी । इसलिये दशरथने उन्हें अपनी शान्ता नामकी कन्या गोद दे दी । शान्ताका विवाह ऋष्यश्रृंग मुनिसे हुआ । ऋष्यश्रृंग विभाण्डक ऋषिके द्वारा हरिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । एक बार राजा रोमपादके राज्यमें बहुत दिनोंतक वर्षा नहीं हुई । तब गणिकाएँ अपने नृत्य, संगीत, वाद्य, हाव- भाव, आलिंगन और विविध उपहारोंसे मोहित करके ऋष्यश्रृंगको वहाँ ले आयीं । उनके आते ही वर्षा हो गयी । उन्होंने ही इन्द्र देवताका यज्ञ कराया, तब सन्तानहीन राजा रोमपादको भी पुत्र हुआ और पुत्रहीन दशरथने भी उन्हींके प्रयत्नसे चार पुत्र प्राप्त किये । रोमपादका पुत्र हुआ चतुरंग और चतुरंगका पृथुलाक्ष ॥६-१० ॥ पृथुलाक्षके बृहद्रथ, बृहत्कर्मा और बृहद्भानु - तीन पुत्र हुए । बृहद्रथका पुत्र हुआ बृहन्मना और बृहन्मनाका जयद्रथ ॥११ ॥

विजयस्तस्य सम्भूत्यां ततो धृतिरजायत ।

ततो धृतव्रतस्तस्य सत्कर्माधिरथस्ततः ॥१२

योऽसौ गंगातटे क्रीडन् मंजूषान्तर्गतं शिशुम् ।

कुन्त्यापविद्धं कानीनमनपत्योऽकरोत् सुतम् ॥१३

वृषसेनः सुतस्तस्य कर्णस्य जगतीपतेः ।

द्रुह्योश्च तनयो बभ्रुः सेतुस्तस्यात्मजस्ततः ॥ १४

आरब्धस्तस्य गान्धारस्तस्य धर्मस्ततो धृतः ।

धृतस्य दुर्मनास्तस्मात् प्रचेताः प्राचेतसं शतम् ॥१५

म्लेच्छाधिपतयोऽभूवन्नुदीचीं दिशमाश्रिताः ।

तुर्वसोश्च सुतो वह्निर्वह्नेर्भर्गोऽथ भानुमान् ॥ १६

त्रिभानुस्तत्सुतोऽस्यापि करन्धम उदारधीः ।

मरुतस्तत्सुतोऽपुत्रः पुत्रं पौरवमन्वभूत् ॥१७

दुष्यन्तः स पुनर्भेजे स्वं वंशं राज्यकामुकः ।

ययातेर्ज्येष्ठपुत्रस्य यदोर्वंशं नरर्षभ ॥१८

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वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणाम् ।

यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९

यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृतिः ।

यदोः सहस्रजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः ॥ २०

चत्वारः सूनवस्तत्र शतजित् प्रथमात्मजः महाहयो वेणुहयो हैहयश्चेति तत्सुताः ॥ २१

धर्मस्तु हैहयसुतो नेत्रः कुन्तेः पिता ततः ।

सोहंजिरभवत् कुन्तेर्महिष्मान् भद्रसेनकः ॥२२

दुर्मदो भद्रसेनस्य धनकः कृतवीर्यसूः ।

कृताग्निः कृतवर्मा च कृतौजा धनकात्मजाः ॥ २३

जयद्रथकी पत्नीका नाम था सम्भूति । उसके गर्भसे विजयका जन्म हुआ । विजयका धृति, धृतिका धृतव्रत, धृतव्रतका सत्कर्मा और सत्कर्माका पुत्र था अधिरथ ॥१२ ॥

अधिरथको कोई सन्तान न थी । किसी दिन वह गंगातटपर क्रीडा कर रहा था कि देखा एक पिटारीमें नन्हा- सा शिशु बहा चला जा रहा है । वह बालक कर्ण था, जिसे कुन्तीने कन्यावस्थामें उत्पन्न होनेके कारण उस प्रकार बहा दिया था । अधिरथने उसीको अपना पुत्र बना लिया ॥१३ ॥ परीक्षित्! राजा कर्णके पुत्रका नाम था बृषसेन । ययातिके पुत्र द्रुह्युसे

बभ्रुका जन्म हुआ । बभ्रुका सेतु, सेतुका आरब्ध, आरब्धका गान्धार, गान्धारका धर्म, धर्मका धृत, धृतका दुर्मना और दुर्मनाका पुत्र प्रचेता हुआ । प्रचेताके सौ पुत्र हुए, ये उत्तर दिशामें म्लेच्छोंके राजा हुए । ययातिके पुत्र तुर्वसुका वह्नि, वह्निका भर्ग, भर्गका भानुमान्, भानुमान्का त्रिभानु, त्रिभानुका उदारबुद्धि करन्धम और करन्धमका पुत्र हुआ मरुत। मरुत सन्तानहीन था । इसलिये उसने पूरुवंशी दुष्यन्तको अपना पुत्र बनाकर रखा था ॥१४-१७ ॥ परन्तु दुष्यन्त राज्यकी कामनासे अपने ही वंशमें लौट गये । परीक्षित्! अब मैं राजा ययातिके बड़े पुत्र यदुके वंशका वर्णन करता हूँ ॥१८ ॥

परीक्षित्! महाराज यदुका वंश परम पवित्र और मनुष्योंके समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो मनुष्य इसका श्रवण करेगा, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥१९ ॥ इस वंशमें

स्वयं भगवान् परब्रह्म श्रीकृष्णने मनुष्यके से रूपमें अवतार लिया था । यदुके चार पुत्र थे— सहस्रजित्, क्रोष्टा, नल और रिपु । सहस्रजित्से शतजित्का जन्म हुआ । शतजित्के तीन पुत्र थे — महाहय, वेणुहय और हैहय ॥ २० - २१ ॥ हैहयका धर्म, धर्मका नेत्र, नेत्रका कुन्ति, कुन्तका सोहंजि, सोहंजिका महिष्मान् और महिष्मान्‌का पुत्र भद्रसेन हुआ ॥ २२ ॥

भद्रसेनके दो पुत्र थे — दुर्मद और धनक। धनकके चार पुत्र हुए-कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा और कृतौजा ॥२३ ॥ कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन था । वह सातों द्वीपका एकछत्र सम्राट् था । उसने

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भगवान्के अंशावतार श्रीदत्तात्रेयजीसे योगविद्या और अणिमा- लघिमा आदि बड़ी - बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं ॥ २४ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि संसारका कोई भी सम्राट् यज्ञ, दान,

तपस्या, योग, शास्त्रज्ञान, पराक्रम और विजय आदि गुणोंमें कार्तवीर्य अर्जुनकी बराबरी नहीं कर सकेगा ॥२५ ॥ सहस्रबाहु अर्जुन पचासी हजार वर्षतक छहों इन्द्रियोंसे अक्षय विषयोंका

भोग करता रहा । इस बीचमें न तो उसके शरीरका बल ही क्षीण हुआ और न तो कभी उसने यही स्मरण किया कि मेरे धनका नाश हो जायगा । उसके धनके नाशकी तो बात ही क्या है, उसका ऐसा प्रभाव था कि उसके स्मरणसे दूसरोंका खोया हुआ धन भी मिल जाता था ॥२६ ॥ उसके हजारों पुत्रोंमेंसे केवल पाँच ही जीवित रहे । शेष सब परशुरामजीकी

क्रोधाग्निमें भस्म हो गये । बचे हुए पुत्रोंके नाम थे -जयध्वज, शूरसेन, वृषभ, मधु और ऊर्जित ॥२७ ॥

अर्जुनः कृतवीर्यस्य सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत् ।

दत्तात्रेयाद्धरेरंशात् प्राप्तयोगमहागुणः ॥ २४

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।

यज्ञदानतपोयोगश्रुतवीर्यजयादिभिः ॥ २५

पंचाशीतिसहस्राणि ह्यव्याहतबलः समाः ।

अनष्टवित्तस्मरणो बुभुजेऽक्षय्यषड्वसु ॥ २६

तस्य पुत्रसहस्रेषु पंचैवोर्वरिता मृधे ।

जयध्वजः शूरसेनो वृषभो मधुरूर्जितः ॥२७

जयध्वजात् तालजंघस्तस्य पुत्रशतं त्वभूत् ।

क्षत्रं यत् तालजंघाख्यमौर्वतेजोपसंहृतम् ॥२८

तेषां ज्येष्ठो वीतिहोत्रो वृष्णिः पुत्रो मधोः स्मृतः ।

तस्य पुत्रशतं त्वासीद् वृष्णिज्येष्ठंयतः कुलम् ॥ २ ९

माधवा वृष्णयो राजन् यादवाश्चेति संज्ञिताः ।

यदुपुत्रस्य च क्रोष्टोः पुत्रो वृजिनवांस्ततः ॥ ३०

श्वाहिस्ततो रुशेकुर्वै तस्य चित्ररथस्ततः ।

शशबिन्दुर्महायोगी महाभोजो महानभूत् ॥३१

चतुर्दशमहारत्नश्चक्रवर्त्यपराजितः ।

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तस्य पत्नीसहस्राणां दशानां सुमहायशाः ॥३२ जयध्वजके पुत्रका नाम था तालजंघ । तालजंघके सौ पुत्र हुए। वे ‘ तालजंघ ' नामक क्षत्रिय कहलाये । महर्षि और्वकी शक्तिसे राजा सगरने उनका संहार कर डाला ॥ २८ ॥ उन

सौ पुत्रोंमें सबसे बड़ा था वीतिहोत्र । वीतिहोत्रका पुत्र मधु हुआ । मधुके सौ पुत्र थे । उनमें सबसे बड़ा था वृष्णि ॥ २ ९ ॥ परीक्षित्! इन्हीं मधु, वृष्णि और यदुके कारण यह वंश माधव, वार्ष्णेय और यादवके नामसे प्रसिद्ध हुआ। यदुनन्दन क्रोष्टुके पुत्रका नाम था वृजिनवान् ॥३० ॥ वृजिनवान्‌का पुत्र श्वाहि, श्वाहिका रुशेकु, रुशेकुका चित्ररथ और

चित्ररथके पुत्रका नाम था शशबिन्दु। वह परम योगी, महान् भोगैश्वर्यसम्पन्न और अत्यन्त पराक्रमी था ॥३१ ॥ वह चौदह रत्नों* का स्वामी, चक्रवर्ती और युद्धमें अजेय था । परम

यशस्वी शशबिन्दुके दस हजार पत्नियाँ थीं । उनमेंसे एक- एकके लाख-लाख सन्तान हुई थीं । इस प्रकार उसके सौ करोड़- एक अरब सन्तानें उत्पन्न हुईं । उनमें पृथुश्रवा आदि छः पुत्र प्रधान थे । पृथुश्रवाके पुत्रका नाम था धर्म । धर्मका पुत्र उशना हुआ । उसने सौ अश्वमेध यज्ञ

किये थे । उशनाका पुत्र हुआ रुचक । रुचकके पाँच पुत्र हुए, उनके नाम सुनो ॥३२-३४ ॥

पुरुजित्, रुक्म, रुक्मेषु, पृथु और ज्यामघ । ज्यामघकी पत्नीका नाम था शैब्या । ज्यामघके बहुत दिनोंतक कोई सन्तान न हुई । परन्तु उसने अपनी पत्नीके भयसे दूसरा विवाह नहीं किया । एक बार वह अपने शत्रुके घरसे भोज्या नामकी कन्या हर लाया । जब शैब्याने पतिके रथपर उस कन्याको देखा, तब वह चिढ़कर अपने पतिसे बोली- ' कपटी! मेरे बैठनेकी जगहपर आज किसे बैठाकर लिये आ रहे हो? ' ज्यामघने कहा —' यह तो तुम्हारी पुत्रवधू है । ' शैब्यानेमुसकराकर अपने पतिसे कहा— ॥३५-३७ ॥

दशलक्षसहस्राणि पुत्राणां तास्वजीजनत् ।

तेषां तु षट्प्रधानानां पृथुश्रवस आत्मजः ॥३३

धर्मो नामोशना तस्य हयमेधशतस्य याट् ।

तत्सुतो रुचकस्तस्य पंचासन्नात्मजाः शृणु ॥३४

पुरुजिद्रुक्मरुक्मेषुपृथुज्यामघसंज्ञिताः ।

ज्यामघस्त्वप्रजोऽप्यन्यां भार्यां शैब्यापतिर्भयात् ॥३५

नाविन्दच्छत्रुभवनाद् भोज्यां कन्यामहारषीत् ।

रथस्थां तां निरीक्ष्याह शैब्या पतिममर्षिता ॥ ३६

केयं कुहक मत्स्थानं रथमारोपितेति वै ।

स्नुषा तवेत्यभिहिते स्मयन्ती पतिमब्रवीत् ॥३७

अहं वन्ध्यासपत्नी च स्नुषा मे युज्यते कथम् ।

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जनयिष्यसि यं राज्ञि तस्येयमुपयुज्यते ॥ ३८ अन्वमोदन्त तद्विश्वेदेवाः पितर एव च ।

शैब्या गर्भमधात् काले कुमारं सुषुवे शुभम् ।

स विदर्भ इति प्रोक्त उपयेमे स्नुषां सतीम् ॥३९

' मैं तो जन्मसे ही बाँझ हूँ और मेरी कोई सौत भी नहीं है । फिर यह मेरी पुत्रवधू कैसे हो सकती है? ' ज्यामघने कहा -' रानी! तुमको जो पुत्र होगा, उसकी यह पत्नी बनेगी’ ॥३८ ॥

राजा ज्यामघके इस वचनका विश्वेदेव और पितरोंने अनुमोदन किया । फिर क्या था, समयपर शैब्याको गर्भ रहा और उसने बड़ा ही सुन्दर बालक उत्पन्न किया । उसका नाम हुआ विदर्भ । उसीने शैब्याकी साध्वी पुत्रवधू भोज्यासे विवाह किया ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे यदुवंशानुवर्णने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३ ॥

* चौदह रत्न ये हैं — हाथी, घोड़ा, रथ, स्त्री, बाण, खजाना, माला, वस्त्र, वृक्ष, शक्ति, पाश, मणि, छत्र और विमान ।

पृष्ठ 188

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अथ चतुर्विंशोऽध्यायः विदर्भके वंशका वर्णन श्रीशुक उवाच

तस्यां विदर्भोऽजनयत् पुत्रौ नाम्ना कुशक्रथौ ।

तृतीयं रोमपादं च विदर्भकुलनन्दनम् ॥१

रोमपादसुतो बभ्रुर्बभ्रोः कृतिरजायत ।

उशिकस्तत्सुतस्तस्माच्चेदिश्चैद्यादयो नृप ॥ २

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! राजा विदर्भकी भोज्या नामक पत्नीसे तीन पुत्र हुए –कुश, क्रथ और रोमपाद । रोमपाद विदर्भवंशमें बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए ॥१ ॥

रोमपादका पुत्र बभ्रु, बभ्रुका कृति, कृतिका उशिक और उशिकका चेदि। राजन्! इस चेदिके वंशमें ही दमघोष एवं शिशुपाल आदि हुए || २|| क्रथका पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्तिका धृष्टि, धृष्टिका निर्वृति, निर्वृतिका दशार्ह और दशार्हका व्योम ॥३ ॥

क्रथस्य कुन्तिः पुत्रोऽभूद् धृष्टिस्तस्याथ निर्वृतिः ।

ततो दशार्हो नाम्नाभूत् तस्य व्योमः सुतस्ततः ॥३

जीमूतो विकृतिस्तस्य यस्य भीमरथः सुतः ।

ततो नवरथः पुत्रो जातो दशरथस्ततः ॥४

करम्भिः शकुनेः पुत्रो देवरातस्तदात्मजः ।

देवक्षत्रस्ततस्तस्य मधुः कुरुवशादनुः ॥ ५

पुरुहोत्रस्त्वनोः पुत्रस्तस्यायुः सात्वतस्ततः ।

भजमानो भजिर्दिव्यो वृष्णिर्देवावृधोऽन्धकः ॥६

सात्वतस्य सुताः सप्त महाभोजश्च मारिष ।

भजमानस्य निम्लोचिः किंकिणो धृष्टिरेव च ॥७

एकस्यामात्मजाः पत्न्यामन्यस्यां च त्रयः सुताः ।

शताजिच्च सहस्राजिदयुताजिदिति प्रभो ॥८

बभ्रुर्देवावृधसुतस्तयोः श्लोकी पठन्त्यमू ।

यथैव शृणुमो दूरात् सम्पश्यामस्तथान्तिकात् ॥९

बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः ।

पुरुषाः पंचषष्टिश्च षट् सहस्राणि चाष्ट च ॥१०

पृष्ठ 189

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येऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि ।

महाभोजोऽपि धर्मात्मा भोजा आसंस्तदन्वये ॥११

वृष्णेः सुमित्रः पुत्रोऽभूद् युधाजिच्च परंतप ।

शिनिस्तस्यानमित्रश्च निम्नोऽभूदनमित्रतः ॥१२

सत्राजितः प्रसेनश्च निम्नस्याप्यासतुः सुतौ ।

अनमित्रसुतो योऽन्यः शिनिस्तस्याथ सत्यकः ॥१३

युयुधानः सात्यकिर्वै जयस्तस्य कुणिस्ततः ।

युगन्धरोऽनमित्रस्य वृष्णिः पुत्रोऽपरस्ततः ॥ १४

श्वफल्कश्चित्ररथश्च गान्दिन्यां च श्वफल्कतः ।

अक्रूरप्रमुखा आसन् पुत्रा द्वादश विश्रुताः ॥ १५

आसंगः सारमेयश्च मृदुरो मृदुविद् गिरिः ।

धर्मवृद्धः सुकर्मा च क्षेत्रोपेक्षोऽरिमर्दनः ॥ १६

व्योमका जीमूत, जीमूतका विकृति, विकृतिका भीमरथ, भीमरथका नवरथ और नवरथका दशरथ हुआ || ४ || दशरथसे शकुनि, शकुनिसे करम्भि, करम्भिसे देवरात, देवरातसे देवक्षत्र, देवक्षत्रसे मधु, मधुसे कुरुवश और कुरुवशसे अनु हुए || ५ || अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे आयु और आयुसे सात्वतका जन्म हुआ। परीक्षित्! सात्वतके सात पुत्र हुए – भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज । भजमानकी दो पत्नियाँ थीं एकसे तीन पुत्र हुए- निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्नीसे भी तीन पुत्र हुए— शताजित्, सहस्राजित् और अयुताजित् ॥६-८ ॥ देवावृधके पुत्रका नाम था बभ्रु । देवावृध और बभ्रुके सम्बन्धमें यह बात कही जाती है —'हमने दूरसे जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकटसे देखते भी हैं ॥ ९ ॥

बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओंके समान है । इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृधसे उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पदको प्राप्त कर चुके हैं । ' सात्वतके पुत्रोंमें महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसीके वंशमें भोजवंशी यादव हुए ॥१०-११ ॥ परीक्षित्! वृष्णिके दो पुत्र हुए- सुमित्र और युधाजित् । युधाजितके शिनि और अनमित्र – ये दो पुत्र थे । अनमित्रसे निम्नका जन्म हुआ ॥१२ ॥ सत्राजित् और प्रसेन नामसे प्रसिद्ध

यदुवंशी निम्नके ही पुत्र थे । अनमित्रका एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि । शिनिसे ही सत्यकका जन्म हुआ ॥१३ ॥

इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए । सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ । अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था । वृष्णिके दो पुत्र हुए –श्वफल्क और चित्ररथ। श्वफल्ककी पत्नीका नाम था गान्दिनी । उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके

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अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्न हुए – आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु । इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा । अक्रूरके दो पुत्र थे - देववान् और उपदेव। श्वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत - से पुत्र हुए- जो वृष्णि - वंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं ॥१४-१८ ॥

शत्रुघ्नो गन्धमादश्च प्रतिबाहुश्च द्वादश ।

तेषां स्वसा सुचीराख्या द्वावक्रूरसुतावपि ॥१७

देववानुपदेवश्च तथा चित्ररथात्मजाः ।

पृथुर्विदूरथाद्याश्च बहवो वृष्णिनन्दनाः ॥ १८

कुकुरो भजमानश्च शुचिः कम्बलबर्हिषः ।

कुकुरस्य सुतो वह्निर्विलोमा तनयस्ततः ॥ १ ९

कपोतरोमा तस्यानुः सखा यस्य च तुम्बुरुः ।

अन्धको दुन्दुभिस्तस्मादरिद्योतः पुनर्वसुः ॥२०

तस्याहुकश्चाहुकी च कन्या चैवाहुकात्मजौ ।

देवकश्चोग्रसेनश्च चत्वारो देवकात्मजाः ॥२१

देववानुपदेवश्च सुदेवो देववर्धनः ।

तेषां स्वसारः सप्तासन् धृतदेवादयो नृप ॥ २२

शान्तिदेवोपदेवा च श्रीदेवा देवरक्षिता ।

सहदेवा देवकी च वसुदेव उवाह ताः ॥२३

कंसः सुनामा न्यग्रोधः कंकः शंकुः सुहूस्तथा ।

राष्ट्रपालोऽथ सृष्टिश्च तुष्टिमानौग्रसेनयः ॥२४

कंसा कंसवती कंका शूरभू राष्ट्रपालिका ।

उग्रसेनदुहितरी वसुदेवानुजस्त्रियः ॥ २५

शूरो विदूरथादासीद् भजमानः सुतस्ततः ।

शिनिस्तस्मात् स्वयम्भोजो हृदीकस्तत्सुतो मतः ॥२६

देवबाहुः शतधनुः कृतवर्मेति तत्सुताः ।

देवमीढस्य शूरस्य मारिषा नाम पत्न्यभूत् ॥२७

तस्यां स जनयामास दश पुत्रानकल्मषान् ।

वसुदेवं देवभागं देवश्रवसमानकम् ॥२८

सृजयं श्यामकं कंकं शमीकं वत्सकं वृकम् ।

देवदुन्दुभयो नेदुरानका यस्य जन्मनि ॥ २ ९

वसुदेवं हरेः स्थानं वदन्त्यानकदुन्दुभिम् ।