श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 191–200

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

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पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्तिः श्रुतश्रवाः ॥३० सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि । उनमें कुकुरका पुत्र वह्नि, वह्निका विलोमा, विलोमाका कपोतरोमा और कपोतरोमाका अनु हुआ । तुम्बुरु गन्धर्वके साथ अनुकी बड़ी मित्रता थी । अनुका पुत्र अन्धक, अन्धकका दुन्दुभि, दुन्दुभिका अरिद्योत, अरिद्योतका पुनर्वसु और पुनर्वसुके आहुक नामका एक पुत्र तथा आहुकी नामकी एक कन्या हुई। आहुकके दो पुत्र हुए - देवक और उग्रसेन । देवकके चार पुत्र हुए ॥१९ -२१ ॥ देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन । इनकी सात बहिनें भी थीं- धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी । वसुदेवजीने इन सबके साथ विवाह किया था ॥२२-२३ ॥ उग्रसेनके नौ लड़के थे— कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान् ॥२४ ॥ उग्रसेनके पाँच कन्याएँ भी थीं - कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू

और राष्ट्रपालिका । इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेवजीके छोटे भाइयोंसे हुआ था ॥२५ ॥

चित्ररथके पुत्र विदूरथसे शूर, शूरसे भजमान, भजमानसे शिनि, शिनिसे स्वयम्भोज और स्वयम्भोजसे हृदीक हुए ॥ २६ ॥ हृदीकसे तीन पुत्र हुए - देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा ।

देवमीढके पुत्र शूरकी पत्नीका नाम था मारिषा ॥ २७ ॥ उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र

उत्पन्न किये — वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, संजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक । ये सब - के - सब बड़े पुण्यात्मा थे । वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे । अतः वे ' आनकदुन्दुभि' भी कहलाये । वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए । वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं- पृथा ( कुन्ती ), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी । वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज । कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी ॥२८-३१ ॥

राजाधिदेवी चैतेषां भगिन्यः पंच कन्यकाः ।

कुन्तेः सख्युः पिता शूरो ह्यपुत्रस्य पृथामदात् ॥३१

साऽऽप दुर्वाससो विद्यां देवहूतीं प्रतोषितात् ।

तस्या वीर्यपरीक्षार्थमाजुहाव रविं शुचिम् ॥३२

तदैवोपागतं देवं वीक्ष्य विस्मितमानसा ।

प्रत्ययार्थं प्रयुक्ता मे याहि देव क्षमस्व मे ॥३३

अमोघं दर्शनं देवि आधित्से त्वयि चात्मजम् ।

योनिर्यथा न दुष्येत कर्ताहं ते सुमध्यमे ॥ ३४

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इति तस्यां स आधाय गर्भं सूर्यो दिवं गतः ।

सद्यः कुमारः संजज्ञे द्वितीय इव भास्करः ॥ ३५

तं सात्यजन्नदीतोये कृच्छ्राल्लोकस्य बिभ्यती ।

प्रपितामहस्तामुवाह पाण्डुर्वै सत्यविक्रमः ॥३६

श्रुतदेवां तु कारूषो वृद्धशर्मा समग्रहीत् ।

यस्यामभूद् दन्तवक्त्र ऋषिशप्तो दितेः सुतः ॥ ३७

कैकेयो धृष्टकेतुश्च श्रुतकीर्तिमविन्दत ।

सन्तर्दनादयस्तस्य पंचासन् कैकयाः सुताः ॥ ३८

राजाधिदेव्यामावन्त्यौ जयसेनोऽजनिष्ट ह ।

दमघोषश्चेदिराजः श्रुतश्रवसमग्रहीत् ॥३९

पृथाने दुर्वासा ऋषिको प्रसन्न करके उनसे देवताओंको बुलानेकी विद्या सीख ली । एक दिन उस विद्याके प्रभावकी परीक्षा लेनेके लिये पृथाने परम पवित्र भगवान् सूर्यका आवाहन किया ॥३२ ॥ उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे । उन्हें देखकर कुन्तीका हृदय विस्मयसे

भर गया । उसने कहा-' भगवन्! मुझे क्षमा कीजिये । मैंने तो परीक्षा करनेके लिये ही इस विद्याका प्रयोग किया था । अब आप पधार सकते हैं' ॥ ३३ ॥ सूर्यदेवने कहा – ' देवि! मेरा

दर्शन निष्फल नहीं हो सकता । इसलिये हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूँ । हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दुषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा' ॥३४ ॥

यह कहकर भगवान् सूर्यने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये । उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुआ । वह देखनेमें दूसरे सूर्यके समान जान पड़ता था ॥३५ ॥ पृथा लोकनिन्दासे डर गयी । इसलिये उसने बड़े दुःखसे उस

बालकको नदीके जलमें छोड़ दिया । परीक्षित्! उसी पृथाका विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डुसे हुआ था, जो वास्तवमें बड़े सच्चे वीर थे ॥ ३६॥

परीक्षित्! पृथाकी छोटी बहिन श्रुतदेवाका विवाह करूष देशके अधिपति वृद्धशर्मासे हुआ था । उसके गर्भसे दन्तवक्त्रका जन्म हुआ । यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्वजन्ममें सनकादि ऋषियोंके शापसे हिरण्याक्ष हुआ था ॥ ३७॥ कैकय देशके राजा धृष्टकेतुने

श्रुतकीर्तिसे विवाह किया था । उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए ॥३८ ॥

राजाधिदेवीका विवाह जयसेनसे हुआ था । उसके दो पुत्र हुए -विन्द और अनुविन्द । वे दोनों ही अवन्तीके राजा हुए । चेदिराज दमघोषने श्रुतश्रवाका पाणिग्रहण किया ॥३९ ॥ उसका पुत्र

था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले ( सप्तम स्कन्धमें) कर चुका हूँ । वसुदेवजीके भाइयोंमेंसे देवभागकी पत्नी कंसाके गर्भसे दो पुत्र हुए- चित्रकेतु और बृहद्बल || ४० ॥ देवश्रवाकी पत्नी कंसवतीसे सुवीर और इषुमान् नामके दो पुत्र हुए । आनककी पत्नी कंकाके गर्भसे भी दो पुत्र

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हुए — सत्यजित् और पुरुजित् ॥४१ ॥ संजयने अपनी पत्नी राष्ट्रपालिकाके गर्भसे वृष और

दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्न किये । इसी प्रकार श्यामकने शूरभूमि ( शूरभू) नामकी पत्नीसे हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ॥४२ ॥ मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे

वत्सकके भी वृक आदि कई पुत्र हुए । वृकने दुर्वाक्षीके गर्भसे तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये ॥४३ ॥ शमीककी पत्नी सुदामिनीने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि

कई बालक उत्पन्न किये । कंककी पत्नी कर्णिकाके गर्भसे दो पुत्र हुए —ऋतधाम और जय ॥४४ ॥

शिशुपालः सुतस्तस्याः कथितस्तस्य सम्भवः ।

देवभागस्य कंसायां चित्रकेतुबृहद्बलौ ॥४०

कंसवत्यां देवश्रवसः सुवीर इषुमांस्तथा ।

कंकायामानकाज्जातः सत्यजित् पुरुजित् तथा ॥४१

सृजयो राष्ट्रपाल्यां च वृषदुर्मर्षणादिकान् ।

हरिकेशहिरण्याक्षौ शूरभूम्यां च श्यामकः ॥४२

मिश्रकेश्यामप्सरसि वृकादीन् वत्सकस्तथा ।

तक्षपुष्करशालादीन् दुर्वार्थ्यां वृक आदधे ॥ ४३

सुमित्रार्जुनपालादीञ्छमीकात्तु सुदामिनी ।

कंकश्च कर्णिकायां वै ऋतधामजयावपि ॥ ४४

पौरवी रोहिणी भद्रा मदिरा रोचना इला ।

देवकीप्रमुखा आसन् पत्न्य आनकदुन्दुभेः ॥४५

बलं गदं सारणं च दुर्मदं विपुलं ध्रुवम् ।

वसुदेवस्तु रोहिण्यां कृतादीनुदपादयत् ॥४६

सुभद्रो भद्रवाहश्च दुर्मदो भद्र एव च ।

पौरव्यास्तनया ह्येते भूताद्या द्वादशाभवन् ॥४७

नन्दोपनन्दकृतकशूराद्या मदिरात्मजाः ।

कौसल्या केशिनं त्वेकमसूत कुलनन्दनम् ॥४८

रोचनायामतो जाता हस्तहेमांगदादयः इलायामुरुवल्कादीन् यदुमुख्यानजीजनत् ॥४९

विपृष्ठो धृतदेवायामेक आनकदुन्दुभेः ।

शान्तिदेवात्मजा राजञ्छ्रमप्रतिश्रुतादयः ॥ ५०

राजानः कल्पवर्षाद्या उपदेवासुता दश ।

वसुहंससुवंशाद्याः श्रीदेवायास्तु षट् सुताः ॥ ५१

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देवरक्षितया लब्धा नव चात्र गदादयः ।

वसुदेवः सुतानष्टावादधे सहदेवया ॥५२

आनकदुन्दुभि वसुदेवजीकी पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत - सी पत्नियाँ थीं ॥४५ ॥ रोहिणीके गर्भसे वसुदेवजीके बलराम, गद, सारण, दुर्मद,

विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे ॥४६ ॥

पौरवीके गर्भसे उनके बारह पुत्र हुए- भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद् और भद्र आदि ॥४७ ॥ नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिराके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । कौसल्याने एक

ही वंश - उजागर पुत्र उत्पन्न किया था । उसका नाम था केशी ॥४८ ॥ उसने रोचनासे हस्त और

हेमांगद आदि तथा इलासे उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रोंको जन्म दिया ॥४९ ॥

परीक्षित्! वसुदेवजीके धृतदेवाके गर्भसे विपृष्ठ नामका एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवासे श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए || ५० ॥ उपदेवाके पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवाके वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए ॥ ५१ ॥ देवरक्षिता गर्भसे गद आदि नौ

पुत्र हुए तथा जैसे स्वयं धर्मने आठ वसुओंको उत्पन्न किया था, वैसे ही वसुदेवजीने सहदेवाके गर्भसे पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्न किये । परम उदार वसुदेवजीने देवकीके गर्भसे भी आठ पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें सातके नाम हैं- कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र

और शेषावतार श्रीबलरामजी ॥५२-५४ ॥ उन दोनोंके आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे ।

परीक्षित्! तुम्हारी परम सौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकीजीकी ही कन्या थीं ॥५५ ॥

पुरुविश्रुतमुख्यांस्तु साक्षाद् धर्मो वसूनिव ।

वसुदेवस्तु देवक्यामष्ट पुत्रानजीजनत् ॥ ५३

कीर्तिमन्तं सुषेणं च भद्रसेनमुदारधीः ।

ऋजुं सम्मर्दनं भद्रं संकर्षणमहीश्वरम् ॥५४

अष्टमस्तु तयोरासीत् स्वयमेव हरिः किल ।

सुभद्रा च महाभागा तव राजन् पितामही ॥ ५५

यदा यदेह धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्च पाप्मनः ।

तदा तु भगवानीश आत्मानं सृजते हरिः ॥५६

न ह्यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते ।

आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः ॥५७

यन्मायाचेष्टितं पुंसः स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि ।

अनुग्रहस्तन्निवृत्तेरात्मलाभाय चेष्यते ॥५८

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अक्षौहिणीनां पतिभिरसुरैर्नृपलाञ्छनैः ।

भुव आक्रम्यमाणाया अभाराय कृतोद्यमः ॥५९

कर्माण्यपरिमेयाणि मनसापि सुरैश्वरैः ।

सहसंकर्षणश्चक्रे भगवान् मधुसूदनः ॥६०

कलौ जनिष्यमाणानां दुःखशोकतमोनुदम् ।

अनुग्रहाय भक्तानां सुपुण्यं व्यतनोद् यशः ॥ ६१

यस्मिन् सत्कर्णपीयूषे यशस्तीर्थवरे सकृत् ।

श्रोत्राञ्जलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम् ॥६२

भोजवृष्ण्यन्धकमधुशूरसेनदशार्हकैः ।

श्लाघनीयेहितः शश्वत् कुरुसृजयपाण्डुभिः ॥ ६३

जब - जब संसारमें धर्मका ह्रास और पापकी वृद्धि होती है, तब- तब सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं ॥ ५६ ॥ परीक्षित्! भगवान् सबके द्रष्टा और वास्तवमें असंग

आत्मा ही हैं । इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका और कोई भी कारण नहीं है ॥ ५७ ॥ उनकी मायाका विलास ही जीवके जन्म, जीवन

और मृत्युका कारण है । और उनका अनुग्रह ही मायाको अलग करके आत्मस्वरूपको प्राप्त करनेवाला है ॥५८ ॥ जब असुरोंने राजाओंका वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी

सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वीको रौंदने लगे, तब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् मधुसूदन बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए । उन्होंने ऐसी - ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्धमें बड़े - बड़े देवता मनसे अनुमान भी नहीं कर सकते - शरीरसे करनेकी बात तो अलग रही ॥५९-६० ॥ पृथ्वीका भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुगमें पैदा होनेवाले भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान्ने ऐसे परम पवित्र यशका विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करनेसे ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के - सब नष्ट हो जायँगे ॥ ६१ ॥ उनका यश क्या है,

लोगोंको पवित्र करनेवाला श्रेष्ठ तीर्थ है । संतोंके कानोंके लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है । एक बार भी यदि कानकी अंजलियोंसे उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्मकी वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं ॥ ६२ ॥ परीक्षित्! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह,

कुरु, सृजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान्‌की लीलाओंकी आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे ॥६३ ॥

स्निग्धस्मितेक्षितोदारैर्वाक्यैर्विक्रमलीलया ।

नृलोकं रमयामास मूर्त्या सर्वांगरम्यया ॥६४

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यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण- भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम् । नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेश्च ॥ ६५ जातो गतः पितृगृहाद् व्रजमेधितार्थो हत्वा रिपून् सुतशतानि कृतोरुदारः । उत्पाद्य तेषु पुरुषः क्रतुभिः समीजे आत्मानमात्मनिगमं प्रथयञ्जनेषु ॥६६ पृथ्व्याः स वै गुरुभरं क्षपयन् कुरूणा- मन्तःसमुत्थकलिना युधि भूपचम्वः । दृष्ट्या विधूय विजये जयमुद्विघोष्य प्रोच्योद्भवाय च परं समगात् स्वधाम ॥६७ उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था । उन्होंने उस मनोरम विग्रहसे तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीलाके द्वारा सारे मनुष्यलोकको आनन्दमें सराबोर कर दिया था ॥ ६४ ॥ भगवान्‌के मुखकमलकी शोभा तो निराली ही थी ।

मकराकृति कुण्डलोंसे उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे । उनकी आभासे कपोलोंका सौन्दर्य और भी खिल उठता था । जब वे विलासके साथ हँस देते, तो उनके मुखपर निरन्तर रहनेवाले आनन्दमें मानो बाढ़ - सी आ जाती । सभी नर- नारी अपने नेत्रोंके प्यालोंसे उनके मुखकी माधुरीका निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते । वे उसका रस ले - लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरनेसे उनके गिरानेवाले निमिपर खीझते भी ॥ ६५ ॥

लीलापुरुषोत्तम भगवान् अवतीर्ण हुए मथुरामें वसुदेवजीके घर, परन्तु वहाँ रहे नहीं, वहाँसे गोकुलमें नन्दबाबाके घर चले गये । वहाँ अपना प्रयोजन -जो ग्वाल, गोपी और गौओंको सुखी करना था — पूरा करके मथुरा लौट आये । व्रजमें, मथुरामें तथा द्वारकामें रहकर अनेकों शत्रुओंका संहार किया । बहुत - सी स्त्रियोंसे विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्न किये । साथ ही लोगोंमें अपने स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियोंकी मर्यादा स्थापित करनेके लिये अनेक यज्ञोंके द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया ॥ ६६ ॥ कौरव और

पाण्डवोंके बीच उत्पन्न हुए आपसके कलहसे उन्होंने पृथ्वीका बहुत-सा भार हलका कर दिया तथा युद्धमें अपनी दृष्टिसे ही राजाओंकी बहुत- सी अक्षौहिणियोंको ध्वंस करके संसारमें अर्जुनकी जीतका डंका पिटवा दिया । फिर उद्धवको आत्मतत्त्वका उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधामको सिधार गये ॥ ६७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीसूर्यसोमवंशानुकीर्तने यदुवंशानुकीर्तनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४ ॥

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इति नवमः स्कन्धः समाप्तः हरिः ॐ तत्सत्

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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् दशमः स्कन्धः (पूर्वार्धः ) अथ प्रथमोऽध्यायः भगवान्के द्वारा पृथ्वीको आश्वासन, वसुदेव - देवकीका विवाह और कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या राजोवाच

कथितो वंशविस्तारो भवता सोमसूर्ययोः ।

राज्ञां चोभयवंश्यानां चरितं परमाद्भुतम् ॥१

यदोश्च धर्मशीलस्य नितरां मुनिसत्तम ।

तत्रांशेनावतीर्णस्य विष्णोर्वीर्याणि शंस नः ॥२

अवतीर्य यदोर्वंशे भगवान् भूतभावनः ।

कृतवान् यानि विश्वात्मा तानि नो वद विस्तरात् ॥३

निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तम श्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥४ पितामहा मे समरेऽमरंजयै- र्देवव्रताद्यातिरथैस्तिमिंगिलैः । राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! आपने चन्द्रवंश और सूर्यवंशके विस्तार तथा दोनों वंशोंके राजाओंका अत्यन्त अद्भुत चरित्र वर्णन किया। भगवान्‌के परम प्रेमी मुनिवर! आपने स्वभावसे ही धर्मप्रेमी यदुवंशका भी विशद वर्णन किया । अब कृपा करके उसी वंशमें अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए भगवान् श्रीकृष्णके परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये ॥१-२ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके जीवनदाता एवं सर्वात्मा हैं । उन्होंने यदुवंशमें अवतार लेकर जो-जो लीलाएँ कीं, उनका विस्तारसे हमलोगोंको श्रवण कराइये ॥३ ॥ जिनकी तृष्णाकी प्यास सर्वदाके लिये बुझ चुकी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष

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जिसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनोंके लिये जो भवरोगका रामबाण औषध है तथा विषयी लोगोंके लिये भी उनके कान और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले, गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त और ऐसा कौन है जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे? ॥४ ॥ ( श्रीकृष्ण तो मेरे कुलदेव ही हैं । ) जब कुरुक्षेत्रमें महाभारत- युद्ध हो रहा था और

देवताओंको भी जीत लेनेवाले भीष्मपितामह आदि अतिरथियोंसे मेरे दादा पाण्डवोंका युद्ध हो रहा था, उस समय कौरवोंकी सेना उनके लिये अपार समुद्रके समान थी— जिसमें भीष्म आदि वीर बड़े - बड़े मच्छोंको भी निगल जानेवाले तिमिंगिल मच्छोंकी भाँति भय उत्पन्न कर रहे थे । परन्तु मेरे स्वनामधन्य पितामह भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी नौकाका आश्रय लेकर उस समुद्रको अनायास ही पार कर गये – ठीक वैसे ही जैसे कोई मार्गमें चलता हुआ स्वभावसे ही बछड़ेके खुरका गड्ढा पार कर जाय ॥५ ॥ महाराज! मेरा यह शरीर- जो

आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था— अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था । उस समय मेरी माता जब भगवान्की शरणमें गयीं, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की ॥६ ॥

( केवल मेरी ही बात नहीं ) वे समस्त शरीरधारियोंके भीतर आत्मारूपसे रहकर अमृतत्वका दान कर रहे हैं और बाहर कालरूपसे रहकर मृत्युका* । मनुष्यके रूपमें प्रतीत होना, यह तो उनकी एक लीला है। आप उन्हींकी ऐश्वर्य और माधुर्यसे परिपूर्ण लीलाओंका वर्णन कीजिये ॥७ ॥

दुरत्ययं कौरवसैन्यसागरं कृत्वातरन् वत्सपदं स्म यत्प्लवाः ॥५ द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदंगं सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम् । जुगोप कुक्षिंगत आत्तचक्रो मातुश्च मे यः शरणं गतायाः ॥६ वीर्याणि तस्याखिलदेहभाजा- मन्तर्बहिः पूरुषकालरूपैः । प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं च मायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन् ॥७

रोहिण्यास्तनयः प्रोक्तो रामः संकर्षणस्त्वया ।

देवक्या गर्भसम्बन्धः कुतो देहान्तरं विना ॥ ८

कस्मान्मुकुन्दो भगवान् पितुर्गेहाद् व्रजं गतः ।

पृष्ठ 200

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क्व वासं ज्ञातिभिः सार्धं कृतवान् सात्वतांपतिः ॥९

व्रजे वसन् किमकरोन्मधुपुर्यां च केशवः ।

भ्रातरं चावधीत् कंसं मातुरद्धातदर्हणम् ॥१०

भगवन्! आपने अभी बतलाया था कि बलरामजी रोहिणीके पुत्र थे । इसके बाद देवकीके पुत्रोंमें भी आपने उनकी गणना की । दूसरा शरीर धारण किये बिना दो माताओंका पुत्र होना कैसे सम्भव है? ॥८ ॥ असुरोंको मुक्ति देनेवाले और भक्तोंको प्रेम वितरण करनेवाले भगवान्

श्रीकृष्ण अपने वात्सल्य-स्नेहसे भरे हुए पिताका घर छोड़कर व्रजमें क्यों चले गये? यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल प्रभुने नन्द आदि गोप-बन्धुओंके साथ कहाँ- कहाँ निवास किया? ॥९ ॥ ब्रह्मा और शंकरका भी शासन करनेवाले प्रभुने व्रजमें तथा मधुपुरीमें रहकर

कौन - कौन - सी लीलाएँ कीं? और महाराज! उन्होंने अपनी माँके भाई मामा कंसको अपने हाथों क्यों मार डाला? वह मामा होनेके कारण उनके द्वारा मारे जाने योग्य तो नहीं था ॥१० ॥ मनुष्याकार सच्चिदानन्दमय विग्रह प्रकट करके द्वारकापुरीमें यदुवंशियोंके साथ

उन्होंने कितने वर्षोंतक निवास किया? और उन सर्वशक्तिमान् प्रभुकी पत्नियाँ कितनी थीं? ॥११ ॥ मुने! मैंने श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ पूछी हैं और जो नहीं पूछी हैं, वे सब आप

मुझे विस्तारसे सुनाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं और मैं बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहता हूँ ॥१२ ॥ भगवन्! अन्नकी तो बात ही क्या, मैंने जलका भी परित्याग कर

दिया है । फिर भी वह असह्य भूख - प्यास ( जिसके कारण मैंने मुनिके गलेमें मृत सर्प डालनेका अन्याय किया था) मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमलसे झरती हुई भगवान्‌की सुधामयी लीला- कथाका पान कर रहा हूँ ॥१३ ॥

हं मानुषमाश्रित्य कति वर्षाणि वृष्णिभिः ।

यदुपुर्यां सहावात्सीत् पत्न्यः कत्यभवन् प्रभोः ॥११

एतदन्यच्च सर्वं मे मुने कृष्णविचेष्टितम् ।

वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ श्रद्दधानाय विस्तृतम् ॥१२

नैषातिदुःसहा क्षुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते ।

पिबन्तं त्वन्मुखाम्भोजच्युतं हरिकथामृतम् ॥ १३

सूत उवाच एवं निशम्य भृगुनन्दन साधुवादं वैयासकिः स भगवानथ विष्णुरातम् । प्रत्यर्च्य कृष्णचरितं कलिकल्मषघ्नं व्याहर्तुमारभत भागवतप्रधानः ॥१४