श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 21–30
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
लम्बुषा देवी भजनीयगुणालयम् ।
वराप्सरा यतः पुत्राः कन्या चेडविडाभवत् ॥३१
तस्यामुत्पादयामास विश्रवा धनदं सुतम् ।
प्रादाय विद्यां परमामृषिर्योगेश्वरात् पितुः ॥३२
विशालः शून्यबन्धुश्च धूम्रकेतुश्च तत्सुताः ।
विशालो वंशकृद् राजा वैशालीं निर्ममे पुरीम् ॥३३
हेमचन्द्रः सुतस्तस्य धूम्राक्षस्तस्य चात्मजः ।
तत्पुत्रात् संयमादासीत् कृशाश्वः सहदेवजः ॥ ३४
कृशाश्वात् सोमदत्तोऽभूद् योऽश्वमेधैरिडस्पतिम् ।
इष्ट्वा पुरुषमापाग्रयां गतिं योगेश्वराश्रितः ॥३५
सौमदत्तिस्तु सुमतिस्तत्सुतो जनमेजयः ।
एते वैशालभूपालास्तृणबिन्दोर्यशोधराः ॥ ३६
उस यज्ञमें इन्द्र सोमपान करके मतवाले हो गये थे और दक्षिणाओंसे ब्राह्मण तृप्त हो गये थे । उसमें परसनेवाले थे मरुद्गण और विश्वेदेव सभासद् थे || २८ || मरुत्तके पुत्रका नाम था दम । दमसे राज्यवर्धन, उससे सुधृति और सुधृतिसे नर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ॥२९ ॥
नरसे केवल, केवलसे बन्धुमान्, बन्धुमान्से वेगवान्, वेगवान्से बन्धु और बन्धुसे राजा तृणबिन्दुका जन्म हुआ ॥ ३० ॥
तृणबिन्दु आदर्श गुणोंके भण्डार थे । अप्सराओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषा देवीने उनको वरण किया, जिससे उनके कई पुत्र और इडविडा नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई ॥ ३१ ॥ मुनिवर
विश्रवाने अपने योगेश्वर पिता पुलस्त्यजीसे उत्तम विद्या प्राप्त करके इडविडाके गर्भसे लोकपाल कुबेरको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया || ३२ || महाराज तृणबिन्दुके अपनी धर्मपत्नीसे तीन पुत्र हुए - विशाल, शून्यबन्धु और धूम्रकेतु । उनमेंसे राजा विशाल वंशधर हुए और उन्होंने वैशाली नामकी नगरी बसायी || ३३ || विशालसे हेमचन्द्र, हेमचन्द्रसे धूम्राक्ष, धूम्राक्षसे संयम और संयमसे दो पुत्र हुए-कृशाश्व और देवज || ३४ || कृशाश्वके पुत्रका नाम था सोमदत्त । उसने अश्वमेध यज्ञोंके द्वारा यज्ञपति भगवान्की आराधना की और योगेश्वर संतोंका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की || ३५ || सोमदत्तका पुत्र हुआ सुमति और सुमतिसे जनमेजय । ये सब तृणबिन्दुकी कीर्तिको बढ़ानेवाले विशालवंशी राजा हुए ॥ ३६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥
१. ज्ञानहृष्टः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
च्चात्र । ***ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ तृतीयोऽध्यायः महर्षि च्यवन और सुकन्याका चरित्र, राजा शर्यातिका वंश श्रीशुक उवाच
शर्यातिर्मानवो राजा ब्रह्मिष्ठः स बभूव ह ।
यो वा अंगिरसां सत्रे द्वितीयमह ऊचिवान् ॥१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! मनुपुत्र राजा शर्याति वेदोंका निष्ठावान् विद्वान् १ उसने अंगिरागोत्रके ऋषियोंके यज्ञमें दूसरे दिनका कर्म बतलाया था ॥१ ॥
सुकन्या नाम तस्यासीत् कन्या कमललोचना ।
तया सार्धं वनगतो ह्यगमच्च्यवनाश्रमम् ॥२
सा सखीभिः परिवृता विचिन्वत्यङ्घ्रिपान् वने ।
वल्मीकरन्ध्रे ददृशे खद्योते इव ज्योतिषी ॥ ३
ते दैवचोदिता बाला ज्योतिषी कण्टकेन वै ।
अविध्यन्मुग्धभावेन सुस्रावासृक् ततो बहु ॥४
शकृन्मूत्रनिरोधोऽभूत् सैनिकानां च तत्क्षणात् ।
राजर्षिस्तमुपालक्ष्य पुरुषान् विस्मितोऽब्रवीत् ॥५
अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम् ।
व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम् ॥६
सुकन्या प्राह पितरं भीता किञ्चित् कृतं मया ।
द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्ने कण्टकेन वै ॥७
दुहितुस्तद् वचः श्रुत्वा शर्यातिर्जातसाध्वसः ।
मुनिं प्रसादयामास वल्मीकान्तर्हितं शनैः ॥८
तदभिप्रायमाज्ञाय प्रादाद् दुहितरं मुनेः ।
कृच्छ्रान्मुक्तस्तमामन्त्र्य पुरं प्रायात् समाहितः ॥९
सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम् ।
प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभिः ॥१०
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ ।
तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्वरौ ॥११
ग्रहं ग्रहीष्ये सोमस्य यज्ञे वामप्यसोमपोः ।
क्रियतां मे वयो रूपं प्रमदानां यदीप्सितम् ॥ १२
उसकी एक कमललोचना कन्या थी । उसका नाम था सुकन्या । एक दिन राजा शर्याति अपनी कन्याके साथ वनमें घूमते -घूमते च्यवन ऋषिके आश्रमपर जा पहुँचे ॥२ ॥ सुकन्या
अपनी सखियोंके साथ वनमें घूम- घूमकर वृक्षोंका सौन्दर्य देख रही थी । उसने एक स्थानपर देखा कि बाँबी ( दीमकोंकी एकत्रित की हुई मिट्टी ) - के छेदमेंसे जुगनूकी तरह दो ज्योतियाँ दीख रही हैं ॥३ ॥ दैवकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्याने बालसुलभ चपलतासे एक
काँटेके द्वारा उन ज्योतियोंको बेध दिया । इससे उनमें से बहुत सा खून बह चला || ४ || उसी समय राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल- मूत्र रुक गया । राजर्षि शर्यातिको यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने अपने सैनिकोंसे कहा || ५ || ' अरे, तुम लोगोंने कहीं महर्षि च्यवनजीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी- न- किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है ' ॥६ ॥ तब सुकन्याने
अपने पितासे डरते -डरते कहा कि ' पिताजी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है । मैंने अनजानमें दो ज्योतियोंको काँटेसे छेद दिया है' || ७|| अपनी कन्याकी यह बात सुनकर शर्याति घबरा गये । उन्होंने धीरे- धीरे स्तुति करके बाँबीमें छिपे हुए च्यवन मुनिको प्रसन्न किया ॥८ ॥ तदनन्तर च्यवन मुनिका अभिप्राय जानकर उन्होंने अपनी कन्या उन्हें समर्पित
कर दी और इस संकटसे छूटकर बड़ी सावधानीसे उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानीमें चले आये ॥९ ॥ इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें
प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्न करने लगी । वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी ॥ १० ॥ कुछ समय बीत जानेपर
उनके आश्रमपर दोनों अश्विनीकुमार आये । च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘ आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा अवस्था प्रदान कीजिये । मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं । मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपानके अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञमें सोमरसका भाग दूँगा ' ॥११-१२ ॥
बाढमित्यूचतुर्विप्रमभिनन्द्य भिषक्तमौ ।
निमज्जतां भवानस्मिन् ह्रदे सिद्धविनिर्मिते ॥१३
इत्युक्त्वा जरया ग्रस्तदेहो धमनिसन्ततः ।
ह्रदं प्रवेशितोऽश्विभ्यां वलीपलितविप्रियः ॥१४
पुरुषास्त्रय उत्तस्थुरपीच्या' वनिताप्रियाः ।
पद्मस्रजः कुण्डलिनस्तुल्यरूपाः सुवाससः ॥१५
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तान् निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान् सूर्यवर्चसः ।
अजानती पतिं साध्वी अश्विनौ शरणं ययौ ॥१६
दर्शयित्वा पतिं तस्यै पातिव्रत्येन तोषितौ ।
ऋषिमामन्त्र्य ययतुर्विमानेन त्रिविष्टपम् ॥१७
यक्ष्यमाणोऽथ शर्यातिश्च्यवनस्याश्रमं गतः ।
ददर्श दुहितुः पार्श्वे पुरुषं सूर्यवर्चसम् ॥१८
राजा दुहितरं प्राह कृतपादाभिवन्दनाम् ।
आशिषश्चाप्रयुंजानो नातिप्रीतमना इव ॥१९
चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनिः । यत् त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम् ॥२० कथं मतिस्तेऽवगतान्यथा सतां कुलप्रसूते कुलदूषणं त्विदम् । बिभर्षि जारं यदपत्रपा कुलं पितुश्च भर्तुश्च नयस्यधस्तमः ॥२१ वैद्यशिरोमणि अश्विनीकुमारोंने महर्षि च्यवनका अभिनन्दन करके कहा, ' ठीक है । ’ और इसके बाद उनसे कहा कि ' यह सिद्धोंके द्वारा बनाया हुआ कुण्ड है, आप इसमें स्नान कीजिये' ॥१३ ॥ च्यवन मुनिके शरीरको बुढ़ापेने घेर रखा था । सब ओर नसें दीख रही थीं,
झुर्रियाँ पड़ जाने एवं बाल पक जानेके कारण वे देखनेमें बहुत भद्दे लगते थे । अश्विनीकुमारोंने उन्हें अपने साथ लेकर कुण्डमें प्रवेश किया ॥ १४ ॥ उसी समय कुण्डसे तीन पुरुष बाहर
निकले । वे तीनों ही कमलोंकी माला, कुण्डल और सुन्दर वस्त्र पहने एक- से मालूम होते थे । वे बड़े ही सुन्दर एवं स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाले थे ॥ १५ ॥ परम साध्वी सुन्दरी सुकन्याने जब
देखा कि ये तीनों ही एक आकृतिके तथा सूर्यके समान तेजस्वी हैं, तब अपने पतिको न पहचानकर उसने अश्विनीकुमारोंकी शरण ली ॥१६ ॥ उसके पातिव्रत्यसे अश्विनीकुमार बहुत
सन्तुष्ट हुए । उन्होंने उसके पतिको बतला दिया और फिर च्यवन मुनिसे आज्ञा लेकर विमानके द्वारा वे स्वर्गको चले गये ॥१७ ॥
कुछ समयके बाद यज्ञ करनेकी इच्छासे राजा शर्याति च्यवन मुनिके आश्रमपर आये । वहाँ उन्होंने देखा कि उनकी कन्या सुकन्याके पास एक सूर्यके समान तेजस्वी पुरुष बैठा हुआ है ॥१८ ॥ सुकन्याने उनके चरणोंकी वन्दना की। शर्यातिने उसे आशीर्वाद नहीं दिया
******ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
और कुछ अप्रसन्न -से होकर बोले ॥ १ ९ ॥ 'दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है ॥२० ॥ तेरा
जन्म तो बड़े ऊँचे कुलमें हुआ था। यह उलटी बुद्धि तुझे कैसे प्राप्त हुई? तेरा यह व्यवहार तो कुलमें कलंक लगानेवाला है । अरे राम- राम! तू निर्लज्ज होकर जार पुरुषकी सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने पिता और पति दोनोंके वंशको घोर नरकमें ले जा रही है ' ॥२१ ॥
एवं ब्रुवाणं पितरं स्मयमाना शुचिस्मिता ।
उवाच तात जामाता तवैष भृगुनन्दनः ॥२२
शशंस पित्रे तत् सर्वं वयोरूपाभिलम्भनम् ।
विस्मितः परमप्रीतस्तनयां परिषस्वजे ॥ २३
सोमेन याजयन् वीरं ग्रहं सोमस्य चाग्रहीत् ।
असोमपोरप्यश्विनोश्च्यवनः स्वेन तेजसा ॥२४
हन्तुं तमाददे वज्रं सद्योमन्युरमर्षितः ।
सवज्रं स्तम्भयामास भुजमिन्द्रस्य भार्गवः ॥२५
अन्वजानंस्ततः सर्वे ग्रहं सोमस्य चाश्विनोः ।
भिषजाविति यत् पूर्वं सोमाहुत्या बहिष्कृतौ ॥ २६
उत्तानबर्हिरानर्तो भूरिषेण इति त्रयः ।
शर्यातेरभवन् पुत्रा आनर्ताद् रेवतोऽभवत् ॥२७
सोऽन्तः समुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम् ।
आस्थितोऽभुङ्क्त विषयानानर्तादीनरिन्दम ॥२८
तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुद्मिज्येष्ठमुत्तमम् ।
ककुद्मी रेवतीं कन्यां स्वामादाय विभुं गतः ॥२९
कन्यावरं परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकमपावृतम् ।
आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितोऽलब्धक्षणः क्षणम् ॥३०
तदन्त आद्यमानम्य स्वाभिप्रायं न्यवेदयत् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तच्छ्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा प्रहस्य तमुवाच ह ॥३१ राजा शर्यातिके इस प्रकार कहनेपर पवित्र मुसकानवाली सुकन्याने मुसकराकर कहा ——पिताजी! ये आपके जामाता स्वयं भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ही हैं ' ॥ २२ ॥ इसके बाद
उसने अपने पितासे महर्षि च्यवनके यौवन और सौन्दर्यकी प्राप्तिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया । वह सब सुनकर राजा शर्याति अत्यन्त विस्मित हुए । उन्होंने बड़े प्रेमसे अपनी पुत्रीको गलेसे लगा लिया ॥२३ ॥
महर्षि च्यवनने वीर शर्यातिसे सोमयज्ञका अनुष्ठान करवाया और सोमपानके अधिकारी न होनेपर भी अपने प्रभावसे अश्विनीकुमारोंको सोमपान कराया || २४ || इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं । इसलिये उनसे यह सहा न गया । उन्होंने चिढ़ कर शर्यातिको मारनेके लिये वज्र उठाया । महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया ॥२५ ॥
तब सब देवताओंने अश्विनीकुमारोंको सोमका भाग देना स्वीकार कर लिया । उन लोगोंने वैद्य होनेके कारण पहले अश्विनीकुमारोंका सोमपानसे बहिष्कार कर रखा था ॥२६ ॥
परीक्षित्! शर्यातिके तीन पुत्र थे -उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण । आनर्तसे रेवत
हुए ॥२७ ॥ महाराज! रेवतने समुद्रके भीतर कुशस्थली नामकी एक नगरी बसायी थी ।
उसीमें रहकर वे आनर्त आदि देशोंका राज्य करते थे ॥२८ ॥
उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे ककुद्मी । ककुद्मी अपनी कन्या रेवतीको लेकर उसके लिये वर पूछनेके उद्देश्यसे ब्रह्माजीके पास गये । उस समय ब्रह्मलोकका रास्ता ऐसे लोगोंके लिये बेरोक- टोक था । ब्रह्मलोकमें गाने - बजानेकी धूम मची हुई थी । बातचीतके लिये अवसर न मिलनेके कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये ॥ २ ९ -३० ॥
उत्सवके अन्तमें ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने अपना अभिप्राय निवेदन किया ।
उनकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने हँसकर उनसे कहा— ॥३१ ॥
अहो राजन् निरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृताः ।
तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणां गोत्राणि च न शृण्महे ॥३२
कालोऽभियातस्त्रिणवचतुर्युगविकल्पितः ।
तद् गच्छ देवदेवांशो बलदेवो महाबलः ॥३३
कन्यारत्नमिदं राजन् नररत्नाय देहि भोः ।
भुवो भारावताराय भगवान् भूतभावनः ॥३४
अवतीर्णो निजांशेन पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
इत्यादिष्टोऽभिवन्द्याजं नृपः स्वपुरमागतः ।
त्यक्तं पुण्यजनत्रासाद् भ्रातृभिर्दिक्ष्ववस्थितैः ॥३५
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुतां दत्त्वानवद्यांगीं बलाय बलशालिने ।
बदर्याख्यं गतो राजा तप्तुं नारायणाश्रमम् ॥३६
‘ महाराज! तुमने अपने मनमें जिन लोगोंके विषयमें सोच रखा था, वे सब तो कालके गालमें चले गये । अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियोंकी तो बात ही क्या है, गोत्रोंके नाम भी नहीं सुनायी पड़ते ॥३२ ॥
इस बीचमें सत्ताईस चतुर्युगीका समय बीत चुका है । इसलिये तुम जाओ । इस समय भगवान् नारायणके अंशावतार महाबली बलदेवजी पृथ्वीपर विद्यमान हैं ॥३३ ॥ राजन्!
उन्हीं नररत्नको यह कन्यारत्न तुम समर्पित कर दो । जिनके नाम, लीला आदिका श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है - वे ही प्राणियोंके जीवनसर्वस्व भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने अंशसे अवतीर्ण हुए हैं । ' राजा ककुद्मीने ब्रह्माजीका यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणोंकी वन्दना की और अपने नगरमें चले आये । उनके वंशजोंने यक्षोंके भयसे वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ- तहाँ यों ही निवास कर रहे थे ॥ ३४-३५ ॥ राजा ककुद्मीने अपनी सर्वांगसुन्दरी पुत्री परम बलशाली बलरामजीको सौंप दी और स्वयं तपस्या करनेके लिये भगवान् नर- नारायणके आश्रम बदरीवनकी ओर चल दिये ॥३६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१. रापीच्या । २. पुरुषान् सू० । ३. आशिषो न प्रयु० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ चतुर्थोऽध्यायः नाभाग और अम्बरीषकी कथा श्रीशुक उवाच
नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातरः कविम् ।
यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम् ॥१
भ्रातरोऽभाङ्क्त किं मह्यं भजाम पितरं तव ।
त्वां ममार्यास्तताभाक्षुर्मा पुत्रक तदादृथाः ॥ २
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! मनुपुत्र नभगका पुत्र था नाभाग । जब वह दीर्घकालतक ब्रह्मचर्यका पालन करके लौटा, तब बड़े भाइयोंने अपनेसे छोटे किन्तु विद्वान् भाईको हिस्सेमें केवल पिताको ही दिया ( सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपसमें बाँट ली थी ) ॥१ ॥ उसने अपने भाइयोंसे पूछा — ' भाइयो! आपलोगोंने मुझे हिस्सेमें क्या दिया है? '
तब उन्होंने उत्तर दिया कि ' हम तुम्हारे हिस्सेमें पिताजीको ही तुम्हें देते हैं । ' उसने अपने पितासे जाकर कहा — ' पिताजी! मेरे बड़े भाइयोंने हिस्सेमें मेरे लिये आपको ही दिया है । ' पिताने कहा — ' बेटा! तुम उनकी बात न मानो ॥२ ॥
इमे अंगिरसः सत्रमासतेऽद्य सुमेधसः ।
षष्ठं षष्ठमुपेत्याहः कवे मुह्यन्ति कर्मणि ॥३
तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्वदेवे महात्मनः ।
ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मनः ॥४
दास्यन्ति तेऽथ तान् गच्छ तथा स कृतवान् यथा ।
तस्मै दत्त्वा ययुः स्वर्गं ते सत्रपरिशेषितम् ॥५
तं कश्चित् स्वीकरिष्यन्तं पुरुषः कृष्णदर्शनः ।
उवाचोत्तरतोऽभ्येत्य ममेदं वास्तुकं वसु ॥६
ममेदमृषिभिर्दत्तमिति तर्हि स्म मानवः ।
स्यान्नौ ते पितरि प्रश्नः पृष्टवान् पितरं तथा ॥७
यज्ञवास्तुगतं सर्वमुच्छिष्टमृषयः क्वचित् ।
चक्रुर्विभागं रुद्राय स देवः सर्वमर्हति ॥८
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किल वास्तुकम् ।
इत्याह मे पिता ब्रह्मञ्छिरसा त्वां प्रसादये ॥ ९
यत् ते पितावदद् धर्मं त्वं च सत्यं प्रभाषसे ।
ददामि ते मन्त्रदृशे ज्ञानं ब्रह्म सनातनम् ॥१०
देखो, ये बड़े बुद्धिमान् आंगिरसगोत्रके ब्राह्मण इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं । परन्तु मेरे विद्वान् पुत्र! वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्ममें भूल कर बैठते हैं || ३ || तुम उन महात्माओंके पास जाकर उन्हें वैश्व- देवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञसे बचा हुआ अपना सारा धन तुम्हें दे देंगे । इसलिये अब तुम उन्हींके पास चले जाओ । ' उसने अपने पिताके आज्ञानुसार वैसा ही किया । उन आंगिरसगोत्री ब्राह्मणोंने भी यज्ञका बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्गमें चले गये ॥४-५ ॥ जब नाभाग उस धनको लेने लगा, तब उत्तर दिशासे एक काले रंगका पुरुष आया । उसने कहा — ‘ इस यज्ञभूमिमें जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है ' ॥६ ॥
नाभागने कहा — ' ऋषियोंने यह धन मुझे दिया है, इसलिये मेरा है । ' इसपर उस पुरुषने कहा — ‘ हमारे विवादके विषयमें तुम्हारे पितासे ही प्रश्न किया जाय। ' तब नाभागने जाकर पितासे पूछा ॥७ ॥ पिताने कहा - 'एक बार दक्षप्रजापतिके यज्ञमें ऋषिलोग यह निश्चय कर
चुके हैं कि यज्ञभूमिमें जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेवका हिस्सा है । इसलिये वह धन तो महादेवजीको ही मिलना चाहिये ' ॥ ८ ॥
नाभागने जाकर उन काले रंगके पुरुष रुद्र- भगवान्को प्रणाम किया और कहा कि ' प्रभो! यज्ञ- भूमिकी सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिताने ऐसा ही कहा है । भगवन्! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ' ||९ || तब भगवान् रुद्रनॆ कहा — ' तुम्हारे पिताने धर्मके अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है । तुम वेदोंका अर्थ तो पहलेसे ही जानते हो । अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान देता हूँ ॥१० ॥
गृहाण द्रविणं दत्तं मत्सत्रे परिशेषितम् ।
इत्युक्त्वान्तर्हिनो रुद्रो भगवान् सत्यवत्सलः ॥११
य एतत् संस्मरेत् प्रातः सायं च सुसमाहितः ।
कविर्भवति मन्त्रज्ञो गतिं चैव तथाऽऽत्मनः ॥१२
नाभागादम्बरीषोऽभून्महाभागवतः कृती ।
नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्वचित् ॥१३
राजोवाच भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि राजर्षेस्तस्य धीमतः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******