श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 11–20
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20
पृष्ठ 11
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किया ॥१ ॥ आपने कहा कि पिछले कल्पके अन्तमें द्रविड़ देशके स्वामी राजर्षि सत्यव्रतने
भगवान्की सेवासे ज्ञान प्राप्त किया और वही इस कल्पमें वैवस्वत मनु हुए । आपने उनके इक्ष्वाकु आदि नरपति पुत्रोंका भी वर्णन किया ॥२-३ ॥ ब्रह्मन्! अब आप कृपा करके उनके वंश और वंशमें होनेवालोंका अलग - अलग चरित्र वर्णन कीजिये । महाभाग! हमारे हृदयमें सर्वदा ही कथा सुननेकी उत्सुकता बनी रहती है || ४ || वैवस्वत मनुके वंशमें जो हो चुके हों, इस समय विद्यमान हों और आगे होनेवाले हों - उन सब पवित्रकीर्ति पुरुषोंके पराक्रमका वर्णन कीजिये || ५ || सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! ब्रह्मवादी ऋषियोंकी सभा में राजा परीक्षित्ने जब यह प्रश्न किया, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् श्रीशुकदेवजीने कहा ॥६ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! तुम मनुवंशका वर्णन संक्षेपसे सुनो । विस्तारसे तो सैकड़ों वर्षमें भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥७ ॥ जो परम पुरुष परमात्मा छोटे-बड़े सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, प्रलयके समय केवल वही थे; यह विश्व तथा और कुछ भी
नहीं था ॥८ ॥ महाराज! उनकी नाभिसे एक सुवर्णमय कमलकोष प्रकट हुआ । उसीमें
चतुर्मुख ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ || ९ || ब्रह्माजीके मनसे मरीचि और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए । उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् ( सूर्य) -का जन्म हुआ ॥१० ॥
विवस्वान्की संज्ञा नामक पत्नीसे श्राद्धदेव मनुका जन्म हुआ । परीक्षित्! परम मनस्वी राजा श्राद्धदेवने अपनी पत्नी श्रद्धाके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न किये । उनके नाम थे – इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूष, नरिष्यन्त, पृषध्र, नभग और कवि ॥११-१२ ॥
तस्य नाभेः समभवत् पद्मकोशो हिरण्मयः ।
तस्मिंजज्ञे महाराज स्वयंभूश्चतुराननः ॥९
मरीचिर्मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यपः ।
दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वानभवत् सुतः ॥१०
ततो मनुः श्राद्धदेवः संज्ञायामास भारत ।
श्रद्धायां जनयामास दश पुत्रान् स आत्मवान् ॥११
इक्ष्वाकुनृगशर्यातिदिष्टधृष्टकरूषकान् ।
नरिष्यन्तं पृषध्रं” च नभगं च कविं विभुः ॥१२
अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल ।
मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजार्थमकरोत् प्रभुः ॥ १३
तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत ।
दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता ॥१४
पृष्ठ 12
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायंस्तत् सुसमाहितः ।
हविषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन्द्विजः ॥ १५
होतुस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् ।
तां विलोक्य मनुः प्राह नातिहृष्टमना गुरुम् ॥१६
भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
विपर्ययमहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया ॥ १७
यूयं मन्त्रविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
कुतः संकल्पवैषम्यमनृतं विबुधेष्विव ॥१८
वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे । उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सन्तानप्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुणका यज्ञ कराया था ॥ १३ ॥ यज्ञके आरम्भमें केवल दूध
पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो ॥१४ ॥ तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने
श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी ॥१५ ॥ जब होताने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञके फलस्वरूप पुत्रके
स्थानपर इला नामकी कन्या हुई । उसे देखकर श्राद्धदेव मनुका मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ । उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजीसे कहा- ॥१६ ॥ ' भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं,
आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है । वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये ॥१७ ॥ आप लोगोंका
मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही; इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्द्रिय भी हैं तथा तपस्याके कारण निष्पाप हो चुके हैं । देवताओंमें असत्यकी प्राप्तिके समान आपके संकल्पका यह उलटा फल कैसे हुआ? ' ॥१८ ॥
तन्निशम्य वचस्तस्य भगवान् प्रपितामहः ।
होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥१९
एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥२०
एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः ।
अस्तौषीदादिपुरुषमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥२१
तस्मै कामवरं' तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः ।
ददाविलाभवत् तेन सुद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥ २२
स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने ।
पृष्ठ 13
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वृतः कतिपयामात्यैरश्वमारुह्य सैन्धवम् ॥२३
प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्च परमाद्भुतान् ।
दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥२४
स कुमारो वनं मेरोरधस्तात् प्रविवेश ह ।
यत्रास्ते भगवाञ्छर्वो रममाणः सहोमया ॥२५
तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा ।
अपश्यत् स्त्रियमात्मानमश्वं च वडवां नृप ॥२६
तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिंगविपर्ययम् ।
दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम् ॥२७
राजोवाच
कथमेवंगुणो देशः केन वा भगवन् कृतः ।
प्रश्नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः ॥ २८
श्रीशुक उवाच
एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयस्तत्र सुव्रताः ।
दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन् ॥२९
परीक्षित्! हमारे वृद्धप्रपितामह भगवान् वसिष्ठने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होताने विपरीत संकल्प किया है । इसलिये उन्होंने वैवस्वत मनुसे कहा— ॥१९ ॥ ‘ राजन्!
तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक- ठीक पूरा नहीं हुआ । फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा ' ॥ २० ॥
परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देनेके लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायणकी स्तुति की ॥२१ ॥ सर्वशक्तिमान्
भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी ॥२२ ॥
महाराज! एक बार राजा सुद्युम्न शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेशके घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये || २३ || वीर सुद्युम्न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत बाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये ॥२४ ॥ अन्तमें सुद्युम्न मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये । उस वनमें भगवान्
शंकर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं ॥ २५ ॥ उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्नने देखा
कि मैं स्त्री हो गया हूँ और घोड़ा घोड़ी हो गया है || २६ || परीक्षित्! साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा । वे सब एक - दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया ॥२७ ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा - भगवन्! उस भूखण्डमें ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया?
पृष्ठ 14
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किसने उसे ऐसा बना दिया था? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥२८ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक दिन भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये ॥२९ ॥
तान् विलोक्याम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम् ।
भर्तुरंकात् समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥ ३०
ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसंगं रममाणयोः ।
निवृत्ताः प्रययुस्तस्मान्नरनारायणाश्रमम् ॥३१
तदिदं भगवानाह प्रियायाः प्रियकाम्यया ।
स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥३२
तत ऊर्ध्वं वनं तद् वै पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥३३
अथ तामाश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् ।
स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः ॥ ३४
सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम् ।
स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥३५
एवं स्त्रीत्वमनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः ।
सस्मार स्वकुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥३६
स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः ।
सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वमुपाधावत शंकरम् ॥३७
तुष्टस्तस्मै स भगवानृषये प्रियमावहन् ।
स्वां च वाचमृतां कुर्वन्निदमाह विशाम्पते ॥३८
मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥३९
उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं । ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं । झटपट उन्होंने भगवान् शंकरकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया ॥३० ॥
पृष्ठ 15
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी - शंकर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर- नारायणके आश्रमपर चले गये ॥ ३१ ॥ उसी समय भगवान् शंकरने
अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि ' मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वही स्त्री हो जायेगा' || ३२ || परीक्षित्! तभी से पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते । अब सुद्युम्न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे ॥३३ ॥
उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत - सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है । उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय ॥३४ ॥ उस
सुन्दरी स्त्रीने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा । इसपर बुधने उसके गर्भसे पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३५ ॥ इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्न स्त्री हो गये । ऐसा सुनते हैं
कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया ॥ ३६ ॥
सुद्युम्नकी यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई । उन्होंने सुद्युम्नको पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शंकरकी आराधना की ॥३७ ॥ भगवान् शंकर
वसिष्ठजीपर प्रसन्न हुए । परीक्षित्! उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही- ॥३८ ॥
‘ वसिष्ठ! तुम्हारा यह यजमान एक महीनेतक पुरुष रहेगा और एक महीनेतक स्त्री । इस व्यवस्थासे सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे' ॥३९ ॥
आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया ।
पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः ॥४०
तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुर्धर्मवत्सलाः ॥४१
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥४२
इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्था- पूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे । परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी ॥ ४० ॥ उनके तीन
पुत्र हुए — उत्कल, गय और विमल। परीक्षित्! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए ॥४१ ॥
बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्नने अपने पुत्र पुरूरवाको राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करनेके लिये वनकी यात्रा की ॥४२ ॥
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे इलोपाख्याने प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
पृष्ठ 16
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१. वंश्यादिचरि० । २. त्वमनुक्रमात् । ३. मात्मैष पु ० । १. पृथुं वस्वं नाभागं । २. गृहीते हविषि वाचं वष० । १. काम्य० । २. रथ० ।
पृष्ठ 17
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ द्वितीयोऽध्यायः पृषध्र आदि मनुके पाँच पुत्रोंका वंश श्रीशुक उवाच
एवं गतेऽथ सुघुम्ने मनुर्वैवस्वतः सुते ।
पुत्रकामस्तपस्तेपे यमुनायां शतं समाः ॥ १
ततोऽयजन्मनुर्देवमपत्यार्थं हरिं प्रभुम् ।
इक्ष्वाकुपूर्वजान् पुत्राँल्लेभे स्वसदृशान् दश ॥२
पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः ।
पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः ॥३
एकदा प्राविशद् गोष्ठं शार्दूलो निशि वर्षति ।
शयाना गाव उत्थाय भीतास्ता बभ्रमुर्व्रजे ॥४
एकां जग्राह बलवान् सा चुक्रोश भयातुरा ।
तस्यास्तत् क्रन्दितं श्रुत्वा पृषध्रोऽभिससार ह ॥५
खड्गमादाय तरसा प्रलीनोडुगणे निशि ।
अजानन्नहनद् बभ्रोः शिरः शार्दूलशंकया ॥६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार जब सुद्युम्न तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये, तब वैवस्वत मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटपर सौ वर्षतक तपस्या की || १ || इसके बाद उन्होंने सन्तानके लिये सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी आराधना की और अपने ही समान दस पुत्र प्राप्त किये, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे ॥२ ॥
उन मनुपुत्रोंमेंसे एकका नाम था पृषध । गुरु वसिष्ठजीने उसे गायोंकी रक्षामें नियुक्त कर रखा था, अतः वह रात्रिके समय बड़ी सावधानीसे वीरासनसे बैठा रहता और गायोंकी रक्षा करता ॥३ ॥ एक दिन रातमें वर्षा हो रही थी । उस समय गायोंके झुंडमें एक बाघ घुस आया ।
उससे डरकर सोयी हुई गौएँ उठ खड़ी हुईं । वे गोशालामें ही इधर- उधर भागने लगीं || ४ || बलवान् बाघने एक गायको पकड़ लिया । वह अत्यन्त भयभीत होकर चिल्लाने लगी । उसका वह क्रन्दन सुनकर पृषध्र गायके पास दौड़ आया ॥५ ॥ एक तो रातका समय और दूसरे
घनघोर घटाओंसे आच्छादित होनेके कारण तारे भी नहीं दीखते थे । उसने हाथमें तलवार उठाकर अनजानमें ही बड़े वेगसे गायका सिर काट दिया । वह समझ रहा था कि यही बाघ है ॥६ ॥
पृष्ठ 18
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
व्याघ्रोऽपि वृक्णश्रवणो निस्त्रिंशाग्राहतस्ततः ।
निश्चक्राम भृशं भीतो रक्तं पथि समुत्सृजन् ॥७
मन्यमानो हतं व्याघ्रं पृषध्रः परवीरहा ।
अद्राक्षीत् स्वहतां बभुं व्युष्टायां निशि दुःखितः ॥८
तं शशाप कुलाचार्यः कृतागसमकामतः ।
न क्षत्रबन्धुः शूद्रस्त्वं कर्मणा भवितामुना ॥९
एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रत्यगृह्णात् कृतांजलिः ।
अधारयद् व्रतं वीर ऊर्ध्वरेता मुनिप्रियम् ॥१०
वासुदेवे भगवति सर्वात्मनि परेऽमले ।
एकान्तित्वं गतो भक्त्या सर्वभूतसुहृत् समः ॥११
विमुक्तसंगः शान्तात्मा संयताक्षोऽपरिग्रहः ।
यदृच्छयोपपन्नेन कल्पयन् वृत्तिमात्मनः ॥ १२
आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञानतृप्तः १ समाहितः ।
विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृतिः ॥ १३
एवंवृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्निमुत्थितम् ।
तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनिः ॥१४
कविः कनीयान् विषयेषु निःस्पृहो विसृज्य राज्यं सह बन्धुभिर्वनम् । निवेश्य चित्ते पुरुषं स्वरोचिषं विवेश कैशोरवयाः परं गतः ॥१५ तलवारकी नोकसे बाघका भी कान कट गया, वह अत्यन्त भयभीत होकर रास्तेमें खून गिराता हुआ वहाँसे निकल भागा || ७ || शत्रुदमन पृषध्रने यह समझा कि बाघ मर गया । परंतु रात बीतनेपर उसने देखा कि मैंने तो गायको ही मार डाला है, इससे उसे बड़ा दुःख हुआ ॥८ ॥
यद्यपि पृषध्रने जान- बूझकर अपराध नहीं किया था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठजीने उसे शाप दिया कि ‘ तुम इस कर्मसे क्षत्रिय नहीं रहोगे; जाओ, शूद्र हो जाओ ' ॥९ ॥ पृषध्रने
अपने गुरुदेवका यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदाके लिये
पृष्ठ 19
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मुनियोंको प्रिय लगनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य व्रतको धारण किया ॥१० ॥
वह समस्त प्राणियोंका अहैतुक हितैषी एवं सबके प्रति समान भावसे युक्त होकर भक्तिके द्वारा परम विशुद्ध सर्वात्मा भगवान् वासुदेवका अनन्य प्रेमी हो गया ॥ ११ ॥ उसकी सारी
आसक्तियाँ मिट गयीं । वृत्तियाँ शान्त हो गयीं । इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं । वह कभी किसी प्रकारका संग्रह - परिग्रह नहीं रखता था । जो कुछ दैववश प्राप्त हो जाता, उसीसे अपना जीवन - निर्वाह कर लेता ॥१२ ॥
वह आत्मज्ञानसे सन्तुष्ट एवं अपने चित्तको परमात्मामें स्थित करके प्रायः समाधिस्थ रहता । कभी - कभी जड, अंधे और बहरेके समान पृथ्वीपर विचरण करता ॥१३ ॥
इस प्रकारका जीवन व्यतीत करता हुआ वह एक दिन वनमें गया । वहाँ उसने देखा कि दावानल धधक रहा है । मननशील पृषध्र अपनी इन्द्रियोंको उसी अग्निमें भस्म करके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गया ॥१४ ॥
मनुका सबसे छोटा पुत्र था कवि । विषयोंसे वह अत्यन्त निःस्पृह था । वह राज्य छोड़कर अपने बन्धुओंके साथ वनमें चला गया और अपने हृदयमें स्वयंप्रकाश परमात्माको विराजमान कर किशोर अवस्थामें ही परम पदको प्राप्त हो गया ॥१५ ॥
करूषान्मानवादासन् कारूषाः क्षत्रजातयः ।
उत्तरापथगोप्तारो ब्रह्मण्या धर्मवत्सलाः ॥ १६
धृष्टाद् धार्ष्टमभूत् क्षत्रं ब्रह्मभूयं गतं क्षितौ ।
नृगस्य वंशः सुमतिर्भूतज्योतिस्ततो वसुः ॥ १७
वसोः प्रतीकस्तत्पुत्र ओघवानोघवत्पिता ।
कन्या चौघवती नाम सुदर्शन उवाह ताम् ॥१८
चित्रसेनो नरिष्यन्तादृक्षस्तस्य सुतोऽभवत् ।
तस्य मीढ्वांस्ततः कूर्च इन्द्रसेनस्तु तत्सुतः ॥१९
वीतिहोत्रस्त्विन्द्रसेनात् तस्य सत्यश्रवा अभूत् ।
उरुश्रवाः सुतस्तस्य देवदत्तस्ततोऽभवत् ॥२०
ततोऽग्निवेश्यो भगवानग्निः स्वयमभूत् सुतः ।
कानीन इति विख्यातो जातूकर्ण्यो महानृषिः ॥२१
ततो ब्रह्मकुलं जातमाग्निवेश्यायनं नृप ।
नरिष्यन्तान्वयः प्रोक्तो दिष्टवंशमतः शृणु ॥२२
नाभागो दिष्टपुत्रोऽन्यः कर्मणा वैश्यतां गतः ।
भलन्दनः सुतस्तस्य वत्सप्रीतिर्भलन्दनात् ॥२३
वत्सप्रीतेः सुतः प्रांशुस्तत्सुतं प्रमतिं विदुः ।
खनित्रः प्रमतेस्तस्माच्चाक्षुषोऽथ विविंशतिः ॥ २४
पृष्ठ 20
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विविंशतिसुतो रम्भः खनिनेत्रोऽस्य धार्मिकः ।
करन्धमो महाराज तस्यासीदात्मजो नृप ॥२५
तस्यावीक्षित् सुतो यस्य मरुत्तश्चक्रवर्त्यभूत् ।
संवर्तोऽयाजयद् यं वै महायोग्यंगिरःसुतः ॥२६
मरुत्तस्य यथा यज्ञो न तथान्यस्य कश्चन ।
सर्वं हिरण्मयं त्वासीद् यत् किञ्चिच्चास्य' शोभनम् ॥२७
मनुपुत्र करूषसे कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न हुए । वे बड़े ही ब्राह्मणभक्त, धर्मप्रेमी एवं उत्तरापथके रक्षक थे ॥१६ ॥
धृष्टके धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए । अन्तमें वे इस शरीरसे ही ब्राह्मण बन गये । नृगका पुत्र हुआ सुमति, उसका पुत्र भूतज्योति और भूतज्योतिका पुत्र वसु था ॥१७ ॥ वसुका पुत्र
प्रतीक और प्रतीकका पुत्र औघवान्। ओघवान्के पुत्रका नाम भी ओघवान् ही था । उनके एक ओघवती नामकी कन्या भी थी, जिसका विवाह सुदर्शनसे हुआ || १८ || मनुपुत्र नरिष्यन्तसे चित्रसेन, उससे ऋक्ष, ऋक्षसे मीढ्वान, मीढ्वान्से कूर्च और उससे इन्द्रसेनकी उत्पत्ति हुई ॥१९ ॥ इन्द्रसेनसे वीतिहोत्र, उससे सत्यश्रवा, सत्यश्रवासे उरुश्रवा और उससे देवदत्तकी
उत्पत्ति हुई ॥२० ॥
देवदत्तके अग्निवेश्य नामक पुत्र हुए, जो स्वयं अग्निदेव ही थे । आगे चलकर वे ही कानीन एवं महर्षि जातूकर्ण्यके नामसे विख्यात हुए || २१ || परीक्षित्! ब्राह्मणोंका ' आग्निवेश्यायन ' गोत्र उन्हींसे चला है । इस प्रकार नरिष्यन्तके वंशका मैंने वर्णन किया, अब दिष्टका वंश सुनो ॥२२ ॥ दिष्टके पुत्रका नाम था नाभाग । यह उस नाभागसे अलग है,
जिसका मैं आगे वर्णन करूँगा । वह अपने कर्मके कारण वैश्य हो गया । उसका पुत्र हुआ भलन्दन और उसका वत्सप्रीति ॥ २३ ॥ वत्सप्रीतिका प्रांशु और प्रांशुका पुत्र हुआ प्रमति ।
प्रमतिके खनित्र, खनित्रके चाक्षुष और उनके विविंशति हुए ॥२४ ॥ विविंशतिके पुत्र रम्भ
और रम्भके पुत्र खनिनेत्र - दोनों ही परम धार्मिक हुए । उनके पुत्र करन्धम और करन्धमके अवीक्षित्। महाराज परीक्षित्! अवीक्षित्के पुत्र मरुत्त चक्रवर्ती राजा हुए । उनसे अंगिराके पुत्र महायोगी संवर्त्त ऋषिने यज्ञ कराया था ॥ २५-२६ ॥ मरुत्तका यज्ञ जैसा हुआ वैसा और किसीका नहीं हुआ । उस यज्ञके समस्त छोटे - बड़े पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोनेके बने हुए थे ॥२७ ॥
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।
मरुतः परिवेष्टारो विश्वेदेवाः सभासदः ॥ २८
मरुत्तस्य दमः पुत्रस्तस्यासीद् राज्यवर्धनः ।
सुधृतिस्तत्सुतो जज्ञे सौधृतेयो नरः सुतः ॥२९
तत्सुतः केवलस्तस्माद् बन्धुमान् वेगवांस्ततः ।
बन्धुस्तस्याभवद् यस्य तृणबिन्दुर्महीपतिः ॥ ३०