श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 241–250

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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देवता तो बस वहीं वीर बनते हैं, जहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा न हो । रणभूमिके बाहर वे बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हैं । उनसे तथा एकान्तवासी विष्णु, वनवासी शंकर, अल्पवीर्य इन्द्र और तपस्वी ब्रह्मासे भी हमें क्या भय हो सकता है ॥ ३६ ॥ फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं

करनी चाहिये - ऐसी हमारी राय है । क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही । इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम जैसे विश्वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये ॥ ३७ ॥ जब

मनुष्यके शरीरमें रोग हो जाता है और उसकी चिकित्सा नहीं की जाती — उपेक्षा कर दी जाती है, तब रोग अपनी जड़ जमा लेता है और फिर वह असाध्य हो जाता है । अथवा जैसे इन्द्रियोंकी उपेक्षा कर देनेपर उनका दमन असम्भव हो जाता है, वैसे ही यदि पहले शत्रुकी उपेक्षा कर दी जाय और वह अपना पाँव जमा ले, तो फिर उसको हराना कठिन हो जाता है ॥३८ ॥ देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है, जहाँ सनातनधर्म है ।

सनातनधर्मकी जड़ हैं - वेद, गौ, ब्राह्मण, तपस्या और वे यज्ञ, जिनमें दक्षिणा दी जाती है ॥३९ ॥ इसलिये भोजराज! हमलोग वेदवादी ब्राह्मण, तपस्वी, याज्ञिक और यज्ञके लिये घी

आदि हविष्य पदार्थ देनेवाली गायोंका पूर्णरूपसे नाश कर डालेंगे || ४० || ब्राह्मण, गौ, वेद, तपस्या, सत्य, इन्द्रियदमन, मनोनिग्रह, श्रद्धा, दया, तितिक्षा और यज्ञ विष्णुके शरीर हैं ॥४१ ॥ वह विष्णु ही सारे देवताओंका स्वामी तथा असुरोंका प्रधान द्वेषी है । परन्तु वह

किसी गुफामें छिपा रहता है । महादेव, ब्रह्मा और सारे देवताओंकी जड़ वही है । उसको मार डालनेका उपाय यह है कि ऋषियोंको मार डाला जाय' ॥४२ ॥

किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः ।

नित्यमुद्विग्नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव ॥ ३२

अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः ।

जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः ॥३३

केचित् प्रांजलयो दीना न्यस्तशस्त्रा दिवौकसः ।

मुक्तकच्छशिखाः केचिद् भीताः स्म इति वादिनः ॥३४

न त्वं विस्मृतशस्त्रास्त्रान् विरथान् भयसंवृतान् ।

हंस्यन्यासक्तविमुखान् भग्नचापानयुध्यतः ॥ ३५

किं क्षेमशूरैर्विबुधैरसंयुगविकत्थनैः । रहोजुषा किं हरिणा शम्भुना वा वनौकसा किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता ॥ ३६

तथापि देवाः सापत्न्यान्नोपेक्ष्या इति मन्महे ।

ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान् ॥३७

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यथाऽऽमयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि- र्न शक्यते रूढपदश्चिकित्सितुम् । यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते ॥३८

मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्मः सनातनः ।

तस्य च ब्रह्म गोविप्रास्तपो यज्ञाः सदक्षिणाः ॥ ३ ९

तस्मात् सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः ।

तपस्विनो यज्ञशीलान् गाश्च हन्मो हविर्दुघाः ॥४०

विप्रा गावश्च वेदाश्च तपः सत्यं दमः शमः ।

श्रद्धा दया तितिक्षा च क्रतवश्च हरेस्तनूः ॥४१

स हि सर्वसुराध्यक्षो ह्यसुरद्विड् गुहाशयः ।

तन्मूला देवताः सर्वाः सेश्वराः सचतुर्मुखाः ।

अयं वै तद्वधोपायो यदृषीणां विहिंसनम् ॥४२

श्रीशुक उवाच

एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः ।

ब्रह्महिंसां हितं मेने कालपाशावृतोऽसुरः ॥४३

सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान् ।

कामरूपधरान् दिक्षु दानवान् गृहमाविशत् ॥४४

ते वै रजःप्रकृतयस्तमसा मूढचेतसः ।

सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः ॥ ४५

आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च ।

हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः ॥४६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे । इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय ॥४३ ॥

उसने हिंसाप्रेमी राक्षसोंको संतपुरुषोंकी हिंसा करनेका आदेश दे दिया । वे इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे । जब वे इधर- उधर चले गये, तब कंसने अपने महलमें प्रवेश

पृष्ठ 243

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किया ॥४४ ॥ उन असुरोंकी प्रकृति थी रजोगुणी । तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित और

अनुचितके विवेकसे रहित हो गया था । उनके सिरपर मौत नाच रही थी । यही कारण है कि उन्होंने सन्तोंसे द्वेष किया ॥ ४५ ॥ परीक्षित्! जो लोग महान् सन्त पुरुषोंका अनादर करते हैं,

उनका वह कुकर्म उनकी आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, धर्म, लोक -परलोक, विषय - भोग और सब - के-सब कल्याणके साधनोंको नष्ट कर देता है ॥४६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

* भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रसंगमें यह प्रकट किया कि जो मुझे प्रेमपूर्वक अपने हृदयमें धारण करता है, उसके बन्धन खुल जाते हैं, जेलसे छुटकारा मिल जाता है, बड़े - बड़े फाटक टूट जाते हैं, पहरेदारोंका पता नहीं चलता, भव- नदीका जल सूख जाता है, गोकुल ( इन्द्रिय-समुदाय ) की वृत्तियाँ लुप्त हो जाती हैं और माया हाथमें आ जाती है । १. सुदृक् । * जिनके गर्भमें भगवान्ने निवास किया, जिन्हें भगवान्‌के दर्शन हुए, उन देवकी-वसुदेवके दर्शनका ही यह फल है कि कंसके हृदयमें विनय, विचार, उदारता आदि सद्गुणोंका उदय हो गया । परन्तु जबतक वह उनके सामने रहा तभीतक ये सद्गुण रहे । दुष्ट मन्त्रियोंके बीचमें जाते ही वह फिर ज्यों- का - त्यों हो गया! १. बन्धुव० । २. क्षया ० । ३. राज ।

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अथ पञ्चमोऽध्यायः गोकुलमें भगवान्‌का जन्ममहोत्सव श्रीशुक उवाच

नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्लादो महामनाः ।

आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलंकृतः ॥ १

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे । पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया । उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर- सुन्दर वस्त्रा- भूषण धारण किये । फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म - संस्कार करवाया । साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी ॥१-२ ॥ उन्होंने ब्राह्मणोंको वस्त्र और आभूषणोंसे सुसज्जित दो लाख गौएँ दान कीं । रत्नों और सुनहले वस्त्रोंसे ढके हुए तिलके सात पहाड़ दान किये ॥३ ॥ ( संस्कारोंसे ही गर्भशुद्धि होती है - यह प्रदर्शित

करनेके लिये अनेक दृष्टान्तोंका उल्लेख करते हैं - ) समयसे ( नूतनजल, अशुद्ध भूमि आदि ), स्नानसे ( शरीर आदि ), प्रक्षालनसे ( वस्त्रादि ), संस्कारोंसे ( गर्भादि ), तपस्यासे ( इन्द्रियादि ), यज्ञसे ( ब्राह्मणादि ), दानसे ( धन- धान्यादि ) और संतोषसे ( मन आदि ) द्रव्य शुद्ध होते हैं । परन्तु आत्माकी शुद्धि तो आत्मज्ञानसे ही होती है ॥४ ॥ उस समय

ब्राह्मण, सूत, * मागध और वंदीजन+ मंगलमय आशीर्वाद देने तथा स्तुति करने लगे । गायक गाने लगे । भेरी और दुन्दुभियाँ बार- बार बजने लगीं ॥ ५ ॥ व्रजमण्डलके सभी

घरोंके द्वार, आँगन और भीतरी भाग झाड़ -बुहार दिये गये; उनमें सुगन्धित जलका छिड़काव किया गया; उन्हें चित्र - विचित्र, ध्वजा - पताका, पुष्पोंकी मालाओं, रंग- बिरंगे वस्त्र और पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे सजाया गया || ६ || गाय, बैल और बछड़ोंके अंगोंमें हल्दी - तेलका लेप कर दिया गया और उन्हें गेरू आदि रंगीन धातुएँ, मोरपंख, फूलोंके हार, तरह -तरहके सुन्दर वस्त्र और सोनेकी जंजीरोंसे सजा दिया गया ॥७ ॥ परीक्षित्!

सभी ग्वाल बहुमूल्य वस्त्र, गहने, अँगरखे और पगड़ियोंसे सुसज्जित होकर और अपने हाथोंमें भेंटकी बहुत- सी सामग्रियाँ ले - लेकर नन्दबाबाके घर आये ॥८ ॥

वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै ।

कारयामास विधिवत्’ पितृदेवार्चनं तथा ॥२

धेनूनां नियुते प्रादाद् विप्रेभ्यः समलंकृते ।

तिलाद्रीन् सप्त रत्नौघशातकौम्भाम्बरावृतान् ॥ ३

कालेन स्नानशौचाभ्यां संस्कारैस्तपसेज्यया ।

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शुध्यन्ति दानैः सन्तुष्ट्या द्रव्याण्यात्माऽऽत्मविद्यया ॥ ४

सौमंगल्यगिरो विप्राः सूतमागधवन्दिनः ।

गायकाश्च जगुर्नेदुर्भेर्यो दुन्दुभयो मुहुः ॥५

व्रजः सम्मृष्टसंसिक्तद्वाराजिरगृहान्तरः ।

चित्रध्वजपताकास्रक्चैलपल्लवतोरणैः ॥ ६

गावो वृषा वत्सतरा हरिद्रातैलरूषिताः ।

विचित्रधातुबर्हस्रग्वस्त्रकांचनमालिनः ॥७

महार्हवस्त्राभरणकंचुकोष्णीषभूषिताः ।

गोपाः समाययू राजन् नानोपायनपाणयः ॥ ८

गोप्यश्चाकर्ण्य मुदिता यशोदायाः सुतोद्भवम् ।

आत्मानं भूषयांचक्रुर्वस्त्राकल्पांजनादिभिः ॥९

यशोदाजीके पुत्र हुआ है, यह सुनकर गोपियोंको भी बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने सुन्दर- सुन्दर वस्त्र, आभूषण और अंजन आदिसे अपना शृंगार किया ॥९ ॥ गोपियोंके

मुखकमल बड़े ही सुन्दर जान पड़ते थे । उनपर लगी हुई कुंकुम ऐसी लगती मानो कमलकी केशर हो । उनके नितम्ब बड़े - बड़े थे । वे भेंटकी सामग्री ले - लेकर जल्दी - जल्दी यशोदाजीके पास चलीं । उस समय उनके पयोधर हिल रहे थे ॥ १० ॥ गोपियोंके

कानोंमें चमकती हुई मणियोंके कुण्डल झिलमिला रहे थे । गलेमें सोनेके हार ( हैकल या हुमेल) जगमगा रहे थे । वे बड़े सुन्दर- सुन्दर रंग- बिरंगे वस्त्र पहने हुए थीं । मार्गमें उनकी चोटियोंमें गुँथे हुए फूल बरसते जा रहे थे । हाथोंमें जड़ाऊ कंगन अलग ही चमक रहे थे । उनके कानोंके कुण्डल, पयोधर और हार हिलते जाते थे । इस प्रकार नन्दबाबाके घर जाते समय उनकी शोभा बड़ी अनूठी जान पड़ती थी ॥११ ॥ नन्दबाबाके घर जाकर वे

नवजात शिशुको आशीर्वाद देतीं ' यह चिरजीवी हो, भगवन्! इसकी रक्षा करो । ' और लोगोंपर हल्दी - तेलसे मिला हुआ पानी छिड़क देतीं तथा ऊँचे स्वरसे मंगलगान करती थीं ॥१२ ॥

नवकुंकुमकिंजल्कमुखपंकजभूतयः ।

बलिभिस्त्वरितं जग्मुः पृथुश्रोण्यश्चलत्कुचाः ॥ १०

गोप्यः सुमृष्टमणिकुण्डलनिष्ककण्ठ्य- श्चित्राम्बराः पथि शिखाच्युतमाल्यवर्षाः । नन्दालयं सवलया व्रजतीर्विरेजु-

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र्व्यालोलकुण्डलपयोधरहारशोभाः ॥ ११

ता आशिषः प्रयुंजानाश्चिरं पाहीति” बालके ।

हरिद्राचूर्णतैलाद्भिः सिंचन्त्योऽजनमुज्जगुः ॥१२

अवाद्यन्त विचित्राणि वादित्राणि महोत्सवे ।

कृष्णे विश्वेश्वरेऽनन्ते नन्दस्य व्रजमागते ॥१३

गोपाः परस्परं हृष्टा दधिक्षीरघृताम्बुभिः ।

आसिञ्चन्तो विलिम्पन्तो नवनीतैश्च चिक्षिपुः ॥१४

नन्दो महामनास्तेभ्यो वासोऽलंकारगोधनम् ।

सूतमागधवन्दिभ्यो येऽन्ये विद्योपजीविनः ॥१५

तैस्तैः कामैरदीनात्मा यथोचितमपूजयत् ।

विष्णोराराधनार्थाय स्वपुत्रस्योदयाय च ॥१६

भगवान् श्रीकृष्ण समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं । उनके ऐश्वर्य, माधुर्य, वात्सल्य – सभी अनन्त हैं । वे जब नन्दबाबाके व्रजमें प्रकट हुए, उस समय उनके जन्मका महान् उत्सव मनाया गया । उसमें बड़े - बड़े विचित्र और मंगलमय बाजे बजाये जाने लगे ॥१३ ॥ आनन्दसे मतवाले होकर गोपगण एक- दूसरेपर दही, दूध, घी और पानी

उड़ेलने लगे । एक- दूसरेके मुँहपर मक्खन मलने लगे और मक्खन फेंक- फेंककर आनन्दोत्सव मनाने लगे ॥१४ ॥ नन्दबाबा स्वभावसे ही परम उदार और मनस्वी थे ।

उन्होंने गोपोंको बहुत- से वस्त्र, आभूषण और गौएँ दीं । सूत - मागध- वंदीजनों, नृत्य, वाद्य आदि विद्याओंसे अपना जीवन- निर्वाह करनेवालों तथा दूसरे गुणीजनोंको भी नन्दबाबाने प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ देकर उनका यथोचित सत्कार किया । यह सब करनेमें उनका उद्देश्य यही था कि इन कर्मोंसे भगवान् विष्णु प्रसन्न हों और मेरे इस नवजात शिशुका मंगल हो ॥१५ - १६ ॥ नन्दबाबाके अभिनन्दन करनेपर परम सौभाग्यवती रोहिणीजी दिव्य वस्त्र, माला और गलेके भाँति- भाँतिके गहनोंसे सुसज्जित होकर गृहस्वामिनीकी भाँति आने -जानेवाली स्त्रियोंका सत्कार करती हुई विचर रही थीं ॥१७ ॥ परीक्षित्! उसी दिनसे नन्दबाबाके व्रजमें सब प्रकारकी ऋद्धि- सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं और भगवान् श्रीकृष्णके निवास तथा अपने

स्वाभाविक गुणोंके कारण वह लक्ष्मीजीका क्रीडास्थल बन गया ॥१८ ॥

रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता ।

व्यचरद् दिव्यवासःस्रक्कण्ठाभरणभूषिता ॥१७

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तत आरभ्य नन्दस्य व्रजः सर्वसमृद्धिमान् ।

हरेर्निवासात्मगुणै रमाक्रीडमभून्नृप ॥१८

गोपान् गोकुलरक्षायां निरूप्य मथुरां गतः ।

नन्दः कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरूद्वह ॥१९

वसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरं नन्दमागतम् ।

ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ञे ययौ तदवमोचनम् ॥२०

तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय देहः प्राणमिवागतम् ।

प्रीतः प्रियतमं दोर्भ्यां सस्वजे प्रेमविह्वलः ॥२१

पूजितः सुखमासीनः पृष्ट्वानामयमादृतः ।

प्रसक्तधीः स्वात्मजयोरिदमाह विशाम्पते ॥२२

दिष्ट्या भ्रातः प्रवयस इदानीमप्रजस्य ते ।

प्रजाशाया निवृत्तस्य प्रजा यत् समपद्यत ॥ २३

दिष्ट्या संसारचक्रेऽस्मिन् वर्तमानः पुनर्भवः ।

उपलब्धो भवानद्य दुर्लभं प्रियदर्शनम् ॥२४

नैकत्र प्रियसंवासः सुहृदां चित्रकर्मणाम् ।

ओघेन व्यूह्यमानानां प्लवानां स्रोतसो यथा ॥२५

परीक्षित्! कुछ दिनोंके बाद नन्दबाबाने गोकुलकी रक्षाका भार तो दूसरे गोपोंको सौंप दिया और वे स्वयं कंसका वार्षिक कर चुकानेके लिये मथुरा चले गये ॥१९ ॥ जब

वसुदेवजीको यह मालूम हुआ कि हमारे भाई नन्दजी मथुरामें आये हैं और राजा कंसको उसका कर भी दे चुके हैं, तब वे जहाँ नन्दबाबा ठहरे हुए थे, वहाँ गये ॥२० ॥

वसुदेवजीको देखते ही नन्दजी सहसा उठकर खड़े हो गये मानो मृतक शरीरमें प्राण आ गया हो । उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने प्रियतम वसुदेवजीको दोनों हाथोंसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया । नन्दबाबा उस समय प्रेमसे विह्वल हो रहे थे ॥ २१ ॥ परीक्षित्! नन्दबाबाने

वसुदेवजीका बड़ा स्वागत- सत्कार किया । वे आदरपूर्वक आरामसे बैठ गये । उस समय उनका चित्त अपने पुत्रोंमें लग रहा था । वे नन्दबाबासे कुशलमंगल पूछकर कहने लगे ॥२२ ॥

[ वसुदेवजीने कहा- ] ' भाई! तुम्हारी अवस्था ढल चली थी और अबतक तुम्हें कोई सन्तान नहीं हुई थी । यहाँतक कि अब तुम्हें सन्तानकी कोई आशा भी न थी । यह

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बड़े सौभाग्यकी बात है कि अब तुम्हें सन्तान प्राप्त हो गयी || २३ || यह भी बड़े आनन्दका विषय है कि आज हमलोगोंका मिलना हो गया । अपने प्रेमियोंका मिलना भी बड़ा दुर्लभ है । इस संसारका चक्र ही ऐसा है । इसे तो एक प्रकारका पुनर्जन्म ही समझना चाहिये ॥२४ ॥ जैसे नदीके प्रबल प्रवाहमें बहते हुए बेड़े और तिनके सदा एक

साथ नहीं रह सकते, वैसे ही सगे- सम्बन्धी और प्रेमियोंका भी एक स्थानपर रहना सम्भव नहीं है— यद्यपि वह सबको प्रिय लगता है । क्योंकि सबके प्रारब्धकर्म अलग- अलग होते हैं ॥२५ ॥

कच्चित् पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरुधम् ।

बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद्वृतः ॥२६

भ्रातर्मम सुतः कच्चिन्मात्रा सह भवद्वजे ।

तातं भवन्तं मन्वानो भवद्भ्यामुपलालितः ॥ २७

पुंसस्त्रिवर्गो विहितः सुहृदो ह्यनुभावितः ।

न तेषु क्लिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्थाय कल्पते ॥२८

नन्द उवाच

अहो ते देवकीपुत्राः कंसेन बहवो हताः ।

एकावशिष्टावरजा कन्या सापि दिवं गता ॥२९

नूनं ह्यदृष्टनिष्ठोऽयमदृष्टपरमो जनः ।

अदृष्टमात्मनस्तत्त्वं यो वेद न स मुह्यति ॥ ३०

वसुदेव उवाच

करो वै वार्षिको दत्तो राज्ञे दृष्टा वयं च वः ।

नेह स्थेयं बहुतिथं सन्त्युत्पाताश्च गोकुले ॥३१

श्रीशुक उवाच

इति नन्दादयो गोपाः प्रोक्तास्ते शौरिणा ययुः ।

अनोभिरनडुद्युक्तैस्तमनुज्ञाप्य गोकुलम् ॥ ३२

आजकल तुम जिस महावनमें अपने भाई-बन्धु और स्वजनोंके साथ रहते हो, उसमें जल, घास और लता- पत्रादि तो भरे- पूरे हैं न? वह वन पशुओंके लिये अनुकूल और सब प्रकारके रोगोंसे तो बचा है? || २६ || भाई! मेरा लड़का अपनी मा ( रोहिणी ) के साथ तुम्हारे व्रजमें रहता है । उसका लालन-पालन तुम और यशोदा करते हो, इसलिये वह तो तुम्हींको अपने पिता-माता मानता होगा । वह अच्छी तरह है

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न? ॥२७ ॥

मनुष्यके लिये वे ही धर्म, अर्थ और काम शास्त्रविहित हैं, जिनसे उसके स्वजनोंको सुख मिले । जिनसे केवल अपनेको ही सुख मिलता है; किन्तु अपने स्वजनोंको दुःख मिलता है, वे धर्म, अर्थ और काम हितकारी नहीं हैं ' ॥२८ ॥

नन्दबाबाने कहा — भाई वसुदेव! कंसने देवकीके गर्भसे उत्पन्न तुम्हारे कई पुत्र मार डाले । अन्तमें एक सबसे छोटी कन्या बच रही थी, वह भी स्वर्ग सिधार गयी ॥२९ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि प्राणियोंका सुख-दुःख भाग्यपर ही अवलम्बित है । भाग्य ही प्राणीका एकमात्र आश्रय है । जो जान लेता है कि जीवनके सुख-दुःखका कारण भाग्य ही है, वह उनके प्राप्त होनेपर मोहित नहीं होता ॥ ३० ॥

वसुदेवजीने कहा – भाई! तुमने राजा कंसको उसका सालाना कर चुका दिया । हम दोनों मिल भी चुके । अब तुम्हें यहाँ अधिक दिन नहीं ठहरना चाहिये; क्योंकि आजकल गोकुलमें बड़े - बड़े उत्पात हो रहे हैं ॥३१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब वसुदेवजीने इस प्रकार कहा, तब नन्द आदि गोपोंने उनसे अनुमति ले, बैलोंसे जुते हुए छकड़ोंपर सवार होकर गोकुलकी यात्रा की ॥३२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे नन्दवसुदेवसंगमो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

१. देवाश्च । २. हितां । १. धिना पितृ ० । २. षाः सवत्साश्च हरि० । * पौराणिक । + वंशका वर्णन करनेवाले । + समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट । जैसा कि कहा है– 'सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधावंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः ॥ ' १. जीवेति । २. नन्दव्रजमुपेयुषि । ३. धनैः ।

पृष्ठ 250

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अथ षष्ठोऽध्यायः पूतना -उद्धार श्रीशुक उवाच

नन्दः पथि वचः शौरेर्न मृषेति विचिन्तयन् ।

हरिं जगाम शरणमुत्पातागमशंकितः ॥ १

कंसेन प्रहिता घोरा पूतना'बालघातिनी ।

शिशूंश्चचार निघ्नन्ती पुरग्रामव्रजादिषु ॥ २

न यत्र श्रवणादीनि रक्षोघ्नानि स्वकर्मसु ।

कुर्वन्ति सात्वतां भर्तुर्यातुधान्यश्च तत्र हि ॥ ३

सा खेचर्येकदोपेत्य पूतना नन्दगोकुलम् ।

योषित्वा माययाऽऽत्मानं प्राविशत् कामचारिणी ॥४

तां केशबन्धव्यतिषक्तमल्लिकां

बृहन्नितम्बस्तनकृच्छ्रमध्यमाम् ।

सुवाससं कम्पितकर्णभूषण- त्विषोल्लसत्कुन्तलमण्डिताननाम् ॥५

वल्गुस्मितापांगविसर्गवीक्षितै- मनोहरन्तीं वनितां व्रजौकसाम् । अमंसताम्भोजकरेण रूपिणीं गोप्यः श्रियं द्रष्टुमिवागतां पतिम् ॥६ बालग्रहस्तत्र विचिन्वती शिशून् यदृच्छया नन्दगृहेऽसदन्तकम् । बालं प्रतिच्छन्ननिजोरुतेजसं ददर्श तल्पेऽग्निमिवाहितं भसि ॥७ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! नन्दबाबा जब मथुरासे चले, तब रास्तेमें विचार करने लगे कि वसुदेवजीका कथन झूठा नहीं हो सकता । इससे उनके मनमें उत्पात होनेकी आशंका हो गयी । तब उन्होंने मन-ही- मन ' भगवान् ही शरण हैं, वे ही रक्षा करेंगे ' ऐसा निश्चय किया || १ || पूतना नामकी एक बड़ी क्रूर राक्षसी थी । उसका