श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 231–240
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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हुआ कि स्वयं परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण मेरे अंदर अवतीर्ण हो रहे हैं, तब वह आनन्दसे भर गया और समस्त सद्गुणोंको धारणकर तथा सुहावना बनकर प्रकट हो गया । दिशा- १. प्राचीन शास्त्रोंमें दिशाओंको देवी माना गया है । उनके एक- एक स्वामी भी होते हैं— जैसे प्राचीके इन्द्र, प्रतीचीके वरुण आदि । कंसके राज्य -कालमें ये देवता पराधीन – कैदी हो गये थे । अब भगवान् श्रीकृष्णके अवतारसे देवताओंकी गणनाके अनुसार ग्यारह - बारह दिनोंमें ही उन्हें छुटकारा मिल जायगा, इसलिये अपने पतियोंके संगम-सौभाग्यका अनुसंधान करके देवियाँ प्रसन्न हो गयीं । जो देव एवं दिशाके परिच्छेदसे रहित हैं, वे ही प्रभु भारत देशके व्रज- प्रदेशमें आ रहे हैं, यह अपूर्व आनन्दोत्सव भी दिशाओंकी प्रसन्नताका हेतु है । २. संस्कृत- साहित्यमें दिशाओंका एक नाम 'आशा' भी है । दिशाओंकी प्रसन्नताका एक अर्थ यह भी है कि अब सत्पुरुषोंकी आशा- अभिलाषा पूर्ण होगी । ३. विराट् पुरुषके अवयव- संस्थानका वर्णन करते समय दिशाओंको उनका कान बताया गया है । श्रीकृष्णके अवतारके अवसरपर दिशाएँ मानो यह सोचकर प्रसन्न हो गयीं कि प्रभु असुर- असाधुओंके उपद्रवसे दुःखी प्राणियोंकी प्रार्थना सुननेके लिये सतत सावधान हैं । पृथ्वी- १. पुराणोंमें भगवान्की दो पत्नियोंका उल्लेख मिलता है-एक श्रीदेवी और दूसरी भूदेवी । ये दोनों चल- सम्पत्ति और अचल सम्पत्तिकी स्वामिनी हैं । इनके पति हैं — भगवान्, जीव नहीं । जिस समय श्रीदेवीके निवासस्थान वैकुण्ठसे उतरकर भगवान् भूदेवीके निवासस्थान पृथ्वीपर आने लगे, तब जैसे परदेशसे पतिके आगमनका समाचार सुनकर पत्नी सज- धजकर अगवानी करनेके लिये निकलती है, वैसे ही पृथ्वीका मंगलमयी होना, मंगलचिह्नोंको धारण करना स्वाभाविक ही है । २. भगवान्के श्रीचरण मेरे वक्षःस्थलपर पड़ेंगे, अपने सौभाग्यका ऐसा अनुसन्धान करके पृथ्वी आनन्दित हो गयी । ३. वामन ब्रह्मचारी थे । परशुरामजीने ब्राह्मणोंको दान दे दिया । श्रीरामचन्द्रने मेरी पुत्री जानकीसे विवाह कर लिया । इसलिये उन अवतारोंमें मैं भगवान्से जो सुख नहीं प्राप्त कर सकी, वही श्रीकृष्णसे प्राप्त करूँगी । यह सोचकर पृथ्वी मंगलमयी हो गयी । ४. अपने पुत्र मंगलको गोदमें लेकर पतिदेवका स्वागत करने चली । जल ( नदियाँ) — १. नदियोंने विचार किया कि रामावतारमें सेतु- बन्धके बहाने हमारे पिता पर्वतोंको हमारी ससुराल समुद्रमें पहुँचाकर इन्होंने हमें मायकेका सुख दिया था । अब इनके शुभागमनके अवसरपर हमें भी प्रसन्न होकर इनका स्वागत करना चाहिये । २. नदियाँ सब गंगाजीसे कहती थीं- ' तुमने हमारे पिता पर्वत देखे हैं, अपने पिता भगवान् विष्णुके दर्शन कराओ । ' गंगाजीने सुनी- अनसुनी कर दी । अब वे इसलिये प्रसन्न हो गयीं कि हम स्वयं देख लेंगी । ३. यद्यपि भगवान् समुद्रमें नित्य निवास करते हैं, फिर भी ससुराल होनेके कारण वे उन्हें
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वहाँ देख नहीं पातीं । अब उन्हें पूर्णरूपसे देख सकेंगी, इसलिये वे निर्मल हो गयीं । ४. निर्मल हृदयको भगवान् मिलते हैं, इसलिये वे निर्मल हो गयीं । ५. नदियोंको जो सौभाग्य किसी भी अवतारमें नहीं मिला, वह कृष्णावतारमें मिला । श्रीकृष्णकी चतुर्थ पटरानी हैं - श्रीकालिन्दीजी । अवतार लेते ही यमुनाजीके तटपर जाना, -ग्वालबाल एवं गोपियोंके साथ जलक्रीडा करना, उन्हें अपनी पटरानी बनाना– इन सब बातोंको सोचकर नदियाँ आनन्दसे भर गयीं । ह्रद– कालिय - दमन करके कालिय- दहका शोधन, ग्वालबालों और अक्रूरको ब्रह्म- ह्रदमें ही अपने स्वरूपके दर्शन आदि स्व- सम्बन्धी लीलाओंका अनुसन्धान करके ह्रदोंने कमलके बहाने अपने प्रफुल्लित हृदयको ही श्रीकृष्णके प्रति अर्पित कर दिया । उन्होंने कहा कि ' प्रभो! भले ही हमें लोग जड समझा करें, आप हमें कभी स्वीकार करेंगे, इस भावी सौभाग्यके अनुसन्धानसे हम सहृदय हो रहे हैं । ' अग्नि- १. इस अवतारमें श्रीकृष्णने व्योमासुर, तृणावर्त, कालियके दमनसे आकाश, वायु और जलकी शुद्धि की है । मृदु- भक्षणसे पृथ्वीकी और अग्निपानसे अग्निकी । भगवान् श्रीकृष्णने दो बार अग्निको अपने मुँहमें धारण किया । इस भावी सुखका अनुसन्धान करके ही अग्निदेव शान्त होकर प्रज्वलित होने लगे । २. देवताओंके लिये यज्ञ- भाग आदि बन्द हो जानेके कारण अग्निदेव भी भूखे ही थे । अब श्रीकृष्णावतारसे अपने भोजन मिलनेकी आशासे अग्निदेव प्रसन्न होकर प्रज्वलित हो उठे । वायु- १. उदारशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके जन्मके अवसरपर वायुने सुख लुटाना प्रारम्भ किया; क्योंकि समान शीलसे ही मैत्री होती है । जैसे स्वामीके सामने सेवक, प्रजा अपने गुण प्रकट करके उसे प्रसन्न करती है, वैसे ही वायु भगवान्के सामने अपने गुण प्रकट करने लगे । २. आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके मुखारविन्दपर जब श्रमजनित स्वेदविन्दु आ जायँगे, तब मैं ही शीतल- मन्द -सुगन्ध गतिसे उसे सुखाऊँगा - यह सोचकर पहलेसे ही वायु सेवाका अभ्यास करने लगा । ३. यदि मनुष्यको प्रभु - चरणारविन्दके दर्शनकी लालसा हो तो उसे विश्वकी सेवा ही करनी चाहिये, मानो यह उपदेश करता हुआ वायु सबकी सेवा करने लगा । ४. रामावतारमें मेरे पुत्र हनुमान्ने भगवान्की सेवा की, इससे मैं कृतार्थ ही हूँ; परन्तु इस अवतारमें मुझे स्वयं ही सेवा कर लेनी चाहिये । इस विचारसे वायु लोगोंको सुख पहुँचाने लगा । ५. सम्पूर्ण विश्वके प्राण वायुने सम्पूर्ण विश्वकी ओरसे भगवान्के स्वागत- समारोहमें प्रतिनिधित्व किया । आकाश– १. आकाशकी एकता, आधारता, विशालता और समताकी उपमा तो सदासे ही
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भगवान्के साथ दी जाती रही, परन्तु अब उसकी झूठी नीलिमा भी भगवान्के अंगसे उपमा देनेसे चरितार्थ हो जायगी, इसलिये आकाशने मानो आनन्दोत्सव मनानेके लिये नीले चँदोवेमें हीरोंके समान तारोंकी झालरें लटका ली हैं । २. स्वामीके शुभागमनके अवसरपर जैसे सेवक स्वच्छ वेष- भूषा धारण करते हैं और शान्त हो जाते हैं, इसी प्रकार आकाशके सब नक्षत्र, ग्रह, तारे शान्त एवं निर्मल हो गये । वक्रता, अतिचार और युद्ध छोड़कर श्रीकृष्णका स्वागत करने लगे । नक्षत्र- मैं देवकीके गर्भसे जन्म ले रहा हूँ तो रोहिणीके संतोषके लिये कम - से - कम रोहिणी नक्षत्रमें जन्म तो लेना ही चाहिये । अथवा चन्द्रवंशमें जन्म ले रहा हूँ, तो चन्द्रमाकी सबसे प्यारी पत्नी रोहिणीमें ही जन्म लेना उचित है । यह सोचकर भगवान्ने रोहिणी नक्षत्रमें जन्म लिया । मन- १. योगी मनका निरोध करते हैं, मुमुक्षु निर्विषय करते हैं और जिज्ञासु बाध करते हैं । तत्त्वज्ञोंने तो मनका सत्यानाश ही कर दिया । भगवान्के अवतारका समय जानकर उसने सोचा कि अब तो मैं अपनी पत्नी-इन्द्रियाँ और विषय - बाल-बच्चे सबके साथ ही भगवान्के साथ खेलूँगा । निरोध और बाधसे पिण्ड छूटा । इसीसे मन प्रसन्न हो गया । २. निर्मलको ही भगवान् मिलते हैं, इसलिये मन निर्मल हो गया । ३. वैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धका परित्याग कर देनेपर भगवान् मिलते हैं । अब तो स्वयं भगवान् ही वह सब बनकर आ रहे हैं । लौकिक आनन्द भी प्रभुमें मिलेगा । यह सोचकर मन प्रसन्न हो गया । ४. वसुदेवके मनमें निवास करके ये ही भगवान् प्रकट हो रहे हैं । वह हमारी ही जातिका है, यह सोचकर मन प्रसन्न हो गया । ५. सुमन ( देवता और शुद्ध मन) को सुख देनेके लिये ही भगवान्का अवतार हो रहा है । यह जानकर सुमन प्रसन्न हो गये । ६. संतोंमें, स्वर्गमें और उपवनमें सुमन ( शुद्ध मन, देवता और पुष्प ) आनन्दित हो गये । क्यों न हो, माधव ( विष्णु और वसन्त ) का आगमन जो हो रहा है । भाद्रमास- भद्र अर्थात् कल्याण देनेवाला है । कृष्णपक्ष स्वयं कृष्णसे सम्बद्ध है । अष्टमी तिथि पक्षके बीचोबीच सन्धि - स्थलपर पड़ती है । रात्रि योगीजनोंको प्रिय है । निशीथ यतियोंका सन्ध्याकाल और रात्रिके दो भागोंकी सन्धि है । उस समय श्रीकृष्णके आविर्भावका अर्थ है— अज्ञानके घोर अन्धकारमें दिव्य प्रकाश । निशानाथ चन्द्रके वंशमें जन्म लेना है, तो निशाके मध्यभागमें अवतीर्ण होना उचित भी है । अष्टमीके चन्द्रोदयका समय भी वही है । यदि वसुदेवजी मेरा जातकर्म नहीं कर सकते तो हमारे वंशके आदिपुरुष चन्द्रमा समुद्रस्नान करके अपनेकर-र- किरणोंसे अमृतका वितरण करें । १. गुणाश्रयः । २. दाद्युदायुधम् ।
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* ऋषि, मुनि और देवता जब अपने सुमनकी वर्षा करनेके लिये मथुराकी ओर दौड़े, तब उनका आनन्द भी पीछे छूट गया और उनके पीछे - पीछे दौड़ने लगा । उन्होंने अपने निरोध और बाधसम्बन्धी सारे विचार त्यागकर मनको श्रीकृष्णकी ओर जानेके लिये मुक्त कर दिया, उनपर न्योछावर कर दिया । + १. मेघ समुद्रके पास जाकर मन्द मन्द गर्जना करते हुए कहते - जलनिधे! यह तुम्हारे उपदेश ( पास आने ) का फल है कि हमारे पास जल- ही -जल हो गया । अब ऐसा कुछ उपदेश करो कि जैसे तुम्हारे भीतर भगवान् रहते हैं, वैसे हमारे भीतर भी रहें । २. बादल समुद्रके पास जाते और कहते कि समुद्र! तुम्हारे हृदयमें भगवान् रहते हैं, हमें भी उनका दर्शन- प्यार प्राप्त करवा दो । समुद्र उन्हें थोड़ा- सा जल देकर कह देता– अपनी उत्ताल तरंगोंसे ढकेल देता - जाओ अभी विश्वकी सेवा करके अन्तःकरण शुद्ध करो, तब भगवान्के दर्शन होंगे । स्वयं भगवान् मेघश्याम बनकर समुद्रसे बाहर व्रजमें आ रहे हैं । हम धूपमें उनपर छाया करेंगे, अपनी फुइयाँ बरसाकर जीवन न्योछावर करेंगे और उनकी बाँसुरीके स्वरपर ताल देंगे । अपने इस सौभाग्यका अनुसन्धान करके बादल समुद्रके पास पहुँचे और मन्द-मन्द गर्जना करने लगे । मन्द मन्द इसलिये कि यह ध्वनि प्यारे श्रीकृष्णके कानोंतक न पहुँच जाय । १ - भगवान् श्रीकृष्णने विचार किया कि मैंने इनको वर तो यह दे दिया कि मेरे सदृश पुत्र होगा, परन्तु इसको मैं पूरा नहीं कर सकता । क्योंकि वैसा कोई है ही नहीं। किसीको कोई वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा करके पूरी न कर सके तो उसके समान तिगुनी वस्तु देनी चाहिये । मेरे सदृश पदार्थके समान मैं ही हूँ। अतएव मैं अपनेको तीन बार इनका पुत्र बनाऊँगा । २ -जिनके नाम- श्रवणमात्रसे असंख्य जन्मार्जित प्रारब्ध -बन्धन ध्वस्त हो जाते हैं, वे ही प्रभु जिसकी गोदमें आ गये, उसकी हथकड़ी - बेड़ी खुल जाय, इसमें क्या आश्चर्य है? * बलरामजीने विचार किया कि मैं बड़ा भाई बना तो क्या, सेवा ही मेरा मुख्य धर्म है । इसलिये वे अपने शेषरूपसे श्रीकृष्णके छत्र बनकर जलका निवारण करते हुए चले । उन्होंने सोचा कि यदि मेरे रहते मेरे स्वामीको वर्षासे कष्ट पहुँचा तो मुझे धिक्कार है । इसलिये उन्होंने अपना सिर आगे कर दिया । अथवा उन्होंने यह सोचा कि ये विष्णुपद ( आकाश) वासी मेघ परोपकारके लिये अध:पतित होना स्वीकार कर लेते हैं, इसलिये बलिके समान सिरसे वन्दनीय हैं । + १. श्रीकृष्ण शिशुको अपनी ओर आते देखकर यमुनाजीने विचार किया — अहा! जिनके चरणोंकी धूलि सत्पुरुषोंके मानस- ध्यानका विषय है, वे ही आज मेरे तटपर आ रहे हैं। वे आनन्द और प्रेमसे भर गयीं, आँखोंसे इतने आँसू निकले कि बाढ़ आ गयी । २. मुझे यमराजकी बहिन समझकर श्रीकृष्ण अपनी आँख न फेर लें, इसलिये वे अपने विशाल जीवनका प्रदर्शन करने लगीं । ३. ये गोपालनके लिये गोकुलमें जा रहे हैं, ये सहस्र- सहस्र लहरियाँ गौएँ ही तो हैं । ये उन्हींके समान इनका भी पालन करें । ४. एक कालियनाग तो मुझमें पहलेसे ही है, यह दूसरे शेषनाग आ रहे हैं । अब मेरी क्या
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गति होगी— यह सोचकर यमुनाजी अपने थपेड़ोंसे उनका निवारण करनेके लिये बढ़ गयीं । + १. एकाएक यमुनाजीके मनमें विचार आया कि मेरे अगाध जलको देखकर कहीं श्रीकृष्ण यह न सोच लें कि मैं इसमें खेलूँगा कैसे, इसलिये वे तुरंत कहीं कण्ठभर, कहीं नाभिभर और कहीं घुटनोंतक जलवाली हो गयीं । २. जैसे दुःखी मनुष्य दयालु पुरुषके सामने अपना मन खोलकर रख देता है, वैसे ही कालियनागसे त्रस्त अपने हृदयका दुःख निवेदन कर देनेके लिये यमुनाजीने भी अपना दिल खोलकर श्रीकृष्णके सामने रख दिया । ३. मेरी नीरसता देखकर श्रीकृष्ण कहीं जलक्रीडा करना और पटरानी बनाना अस्वीकार न कर दें, इसलिये वे उच्छृंखलता छोड़कर बड़ी विनयसे अपने हृदयकी संकोचपूर्ण रसरीति प्रकट करने लगीं । ४. जब इन्होंने सूर्यवंशमें रामावतार ग्रहण किया, तब मार्ग न देनेपर चन्द्रमाके पिता समुद्रको बाँध दिया था । अब ये चन्द्रवंशमें प्रकट हुए हैं और मैं सूर्यकी पुत्री हूँ। यदि मैं इन्हें मार्ग न दूँगी तो ये मुझे भी बाँध देंगे । इस डरसे मानो यमुनाजी दो भागोंमें बँट गयीं । ५. सत्पुरुष कहते हैं कि हृदयमें भगवान्के आ जानेपर अलौकिक सुख होता है । मानो उसीका उपभोग करनेके लिये यमुनाजीने भगवान्को अपने भीतर ले लिया । ६. मेरा नाम कृष्णा, मेरा जल कृष्ण, मेरे बाहर श्रीकृष्ण हैं । फिर मेरे हृदयमें ही उनकी स्फूर्ति क्यों न हो? ऐसा सोचकर मार्ग देनेके बहाने यमुनाजीने श्रीकृष्णको अपने हृदयमें ले लिया ।
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अथ चतुर्थोऽध्यायः कंसके हाथसे छूटकर योगमायाका आकाशमें जाकर भविष्यवाणी करना श्रीशुक उवाच
बहिरन्तःपुरद्वारः सर्वाः पूर्ववदावृताः ।
ततो बालध्वनिं श्रुत्वा गृहपालाः समुत्थिताः ॥ १
ते तु तूर्णमुपव्रज्य देवक्या गर्भजन्म तत् ।
आचख्युर्भोजराजाय यदुद्विग्नः प्रतीक्षते ॥२
स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वलः ।
सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धजः ॥३
तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती ।
स्नुषेयं तव कल्याण स्त्रियं मा हन्तुमर्हसि ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! जब वसुदेवजी लौट आये, तब नगरके बाहरी और भीतरी सब दरवाजे अपने - आप ही पहलेकी तरह बंद हो गये । इसके बाद नवजात शिशुके रोनेकी ध्वनि सुनकर द्वारपालोंकी नींद टूटी || १ || वे तुरन्त भोजराज कंसके पास गये और देवकीको सन्तान होनेकी बात कही । कंस तो बड़ी आकुलता और घबराहटके साथ इसी बातकी प्रतीक्षा कर रहा था ॥२ ॥ द्वारपालोंकी बात सुनते ही वह झटपट पलँगसे उठ खड़ा
हुआ और बड़ी शीघ्रतासे सूतिकागृहकी ओर झपटा। इस बार तो मेरे कालका ही जन्म हुआ है, यह सोचकर वह विह्वल हो रहा था और यही कारण है कि उसे इस बातका भी ध्यान न रहा कि उसके बाल बिखरे हुए हैं । रास्तेमें कई जगह वह लड़खड़ाकर गिरते - गिरते बचा ॥३ ॥ बंदीगृहमें पहुँचनेपर सती देवकीने बड़े दुःख और करुणाके साथ अपने भाई
कंससे कहा — ‘ मेरे हितैषी भाई! यह कन्या तो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है । स्त्रीजातिकी है; तुम्हें स्त्रीकी हत्या कदापि नहीं करनी चाहिये ॥४ ॥
बहवो हिंसिता भ्रातः शिशवः पावकोपमाः ।
त्वया दैवनिसृष्टेन पुत्रिकैका प्रदीयताम् ॥५
नन्वहं ते ह्यवरजा दीना हतसुता प्रभो ।
दातुमर्हसि मन्दाया अंगेमां चरमां प्रजाम् ॥६
श्रीशुक उवाच उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत् ।
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याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः ॥७
तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम् ।
अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः ॥ ८
सा तद्धस्तात् समुत्पत्य सद्यो देव्यम्बरं गता ।
अदृश्यतानुजा विष्णोः सायुधाष्टमहाभुजा ॥९
दिव्यस्रगम्बरालेपरत्नाभरणभूषिता ।
धनुः शूलेषुचर्मासिशंखचक्रगदाधरा ॥ १०
सिद्धचारणगन्धर्वैरप्सरःकिन्नरोरगैः ।
उपाहृतोरुबलिभिः स्तूयमानेदमब्रवीत् ॥ ११
किं मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत् ।
यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा ॥ १२
इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि ।
बहुनामनिकेतेषु बहुनामा बभूव ह ॥१३
तयाभिहितमाकर्ण्य कंसः परमविस्मितः ।
देवकीं वसुदेवं च विमुच्य प्रश्रितोऽब्रवीत् ॥१४
भैया! तुमने दैववश मेरे बहुत- से अग्निके समान तेजस्वी बालक मार डाले । अब केवल यही एक कन्या बची है, इसे तो मुझे दे दो || ५ || अवश्य ही मैं तुम्हारी छोटी बहिन हूँ । मेरे बहुत-से बच्चे मर गये हैं, इसलिये मैं अत्यन्त दीन हूँ। मेरे प्यारे और समर्थ भाई! तुम मुझ मन्दभागिनीको यह अन्तिम सन्तान अवश्य दे दो ' ॥ ६ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते - रोते याचना की । परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था । उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली ॥७ ॥ अपनी उस नन्हीं सी नवजात भानजीके
पैर पकड़कर कंसने उसे बड़े जोरसे एक चट्टानपर दे मारा । स्वार्थने उसके हृदयसे सौहार्दको समूल उखाड़ फेंका था || ८ || परन्तु श्रीकृष्णकी वह छोटी बहिन साधारण कन्या तो थी नहीं, देवी थी; उसके हाथसे छूटकर तुरन्त आकाशमें चली गयी और अपने बड़े - बड़े आठ हाथोंमें आयुध लिये हुए दीख पड़ी || ९ || वह दिव्य माला, वस्त्र, चन्दन और मणिमय आभूषणोंसे विभूषित थी । उसके हाथोंमें धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा — ये आठ आयुध थे ॥१० ॥ सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, किन्नर और नागगण बहुत - सी भेंटकी
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सामग्री समर्पित करके उसकी स्तुति कर रहे थे । उस समय देवीने कंससे यह कहा— ॥११ ॥
‘ रे मूर्ख! मुझे मारनेसे तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्मका शत्रु तुझे मारनेके लिये किसी स्थानपर पैदा हो चुका है । अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकोंकी हत्या न किया कर' ॥१२ ॥ कंससे
इस प्रकार कहकर भगवती योगमाया वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं और पृथ्वीके अनेक स्थानोंमें विभिन्न नामोंसे प्रसिद्ध हुईं ॥१३ ॥
देवीकी यह बात सुनकर कंसको असीम आश्चर्य हुआ । उसने उसी समय देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और बड़ी नम्रतासे उनसे कहा- || १४ || ' मेरी प्यारी बहिन और बहनोईजी! हाय- हाय, मैं बड़ा पापी हूँ। राक्षस जैसे अपने ही बच्चोंको मार डालता है, वैसे ही मैंने तुम्हारे बहुत - से लड़के मार डाले । इस बातका मुझे बड़ा खेद है * ॥१५ ॥ मैं इतना दुष्ट हूँ
कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई- बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया । पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा । वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ ॥ १६ ॥ केवल मनुष्य ही झूठ नहीं बोलते, विधाता भी झूठ
बोलते हैं । उसीपर विश्वास करके मैंने अपनी बहिनके बच्चे मार डाले । ओह! मैं कितना पापी हूँ ॥१७ ॥ तुम दोनों महात्मा हो । अपने पुत्रोंके लिये शोक मत करो । उन्हें तो अपने कर्मका
ही फल मिला है । सभी प्राणी प्रारब्धके अधीन हैं । इसीसे वे सदा- सर्वदा एक साथ नहीं रह सकते ॥१८ ॥ जैसे मिट्टीके बने हुए पदार्थ बनते और बिगड़ते रहते हैं, परन्तु मिट्टीमें कोई
अदल-बदल नहीं होती - वैसे ही शरीरका तो बनना - बिगड़ना होता ही रहता है; परन्तु आत्मापर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता ॥१९ ॥
अहो भगिन्यहो भाम मया वां बत पाप्मना ।
पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिताः सुताः ॥१५
स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः ।
काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्वसन् ॥१६
दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम् ।
यद्विश्रम्भादहं पापः स्वसुर्निहतवाञ्छिशून् ॥१७
मा शोचतं महाभागावात्मजान् स्वकृतम्भुजः ।
जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनास्तदासते ॥१८
भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च ।
नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥१९
यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः देहयोगवियोगी च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २०
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तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि ।
मानुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥२१
यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक् ।
तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात् ॥२२
जो लोग इस तत्त्वको नहीं जानते, वे इस अनात्मा शरीरको ही आत्मा मान बैठते हैं । यही उलटी बुद्धि अथवा अज्ञान है। इसीके कारण जन्म और मृत्यु होते हैं । और जबतक यह अज्ञान नहीं मिटता, तबतक सुख- दुःखरूप संसारसे छुटकारा नहीं मिलता ॥२० ॥ मेरी प्यारी
बहिन! यद्यपि मैंने तुम्हारे पुत्रोंको मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो । क्योंकि सभी प्राणियोंको विवश होकर अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है || २१ || अपने स्वरूपको न जाननेके कारण जीव जबतक यह मानता रहता है कि ' मैं मारनेवाला हूँ या मारा जाता हूँ', तबतक शरीरके जन्म और मृत्युका अभिमान करनेवाला वह अज्ञानी बाध्य और बाधक- भावको प्राप्त होता है। अर्थात् वह दूसरोंको दुःख देता है और स्वयं दुःख भोगता है ॥२२ ॥ मेरी यह दुष्टता तुम दोनों क्षमा करो; क्योंकि तुम बड़े ही साधुस्वभाव और दीनोंके
रक्षक हो । ' ऐसा कहकर कंसने अपनी बहिन देवकी और वसुदेवजीके चरण पकड़ लिये । उसकी आँखोंसे आँसू बह- बहकर मुँहतक आ रहे थे ॥ २३ ॥ इसके बाद उसने योगमायाके
वचनोंपर विश्वास करके देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और वह तरह - तरहसे उनके प्रति अपना प्रेम प्रकट करने लगा ॥२४ ॥ जब देवकीजीने देखा कि भाई कंसको पश्चात्ताप
हो रहा है, तब उन्होंने उसे क्षमा कर दिया । वे उसके पहले अपराधोंको भूल गयीं और वसुदेवजीने हँसकर कंससे कहा- ॥ २५ ॥ ' मनस्वी कंस! आप जो कहते हैं, वह ठीक वैसा
ही है । जीव अज्ञानके कारण ही शरीर आदिको ' मैं ' मान बैठते हैं । इसीसे अपने परायेका भेद हो जाता है ॥२६ ॥ और यह भेददृष्टि हो जानेपर तो वे शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और
मदसे अन्धे हो जाते हैं । फिर तो उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि सबके प्रेरक भगवान् ही एक भावसे दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा रहे हैं ' ॥२७ ॥
क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीनवत्सलाः१ ।
इत्युक्त्वाश्रुमुखः पादौ श्यालः स्वस्रोरथाग्रहीत् ॥२३
मोचयामास निगडाद् विश्रब्धः कन्यकागिरा ।
देवकीं वसुदेवं च दर्शयन्नात्मसौहृदम् ॥२४
भ्रातुः समनुतप्तस्य क्षान्त्वा रोषं च देवकी ।
व्यसृजद् वसुदेवश्च प्रहस्य तमुवाच ह ॥२५
एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम् ।
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अज्ञानप्रभवाहंधीः स्वपरेति भिदा यतः ॥२६
शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।
मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्दृशः ॥२७
श्रीशुक उवाच
कंस एवं प्रसन्नाभ्यां विशुद्धं प्रतिभाषितः ।
देवकीवसुदेवाभ्यामनुज्ञातोऽविशद् गृहम् ॥ २८
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां कंस आहूय मन्त्रिणः ।
तेभ्य आचष्ट तत् सर्वं यदुक्तं योगनिद्रया ॥२९
आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रवः ।
देवान् प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदाः ॥ ३०
एवं चेत्तर्हि भोजेन्द्र पुरग्रामव्रजादिषु ।
अनिर्दशान् निर्दशांश्च हनिष्यामोऽद्य वै शिशून् ॥३१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब वसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रसन्न होकर निष्कपटभावसे कंसके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर वह अपने महलमें चला गया ॥२८ ॥ वह रात्रि बीत जानेपर कंसने अपने मन्त्रियोंको बुलाया और योगमायाने जो
कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया || २ ९ || कंसके मन्त्री पूर्णतया नीतिनिपुण नहीं थे । दैत्य होनेके कारण स्वभावसे ही वे देवताओंके प्रति शत्रुताका भाव रखते थे । अपने स्वामी कंसकी बात सुनकर वे देवताओंपर और भी चिढ़ गये और कंससे कहने लगे - ॥ ३० ॥
‘ भोजराज! यदि ऐसी बात है तो हम आज ही बड़े - बड़े नगरोंमें, छोटे - छोटे गाँवोंमें, अहीरोंकी बस्तियोंमें और दूसरे स्थानोंमें जितने बच्चे हुए हैं, वे चाहे दस दिनसे अधिकके हों या कमके, सबको आज ही मार डालेंगे ॥३१ ॥ समरभीरु देवगण युद्धोद्योग करके ही क्या करेंगे? वे तो
आपके धनुषकी टंकार सुनकर ही सदा- सर्वदा घबराये रहते हैं || ३२ || जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट पर चोट करने लगते हैं, बाण- वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन- परायण होकर इधर- उधर भाग जाते हैं ॥३३ ॥ कुछ देवता तो अपने अस्त्र- शस्त्र जमीनपर डाल देते हैं और हाथ जोड़कर आपके
सामने अपनी दीनता प्रकट करने लगते हैं । कोई- कोई अपनी चोटीके बाल तथा कच्छ खोलकर आपकी शरणमें आकर कहते हैं कि-' हम भयभीत हैं, हमारी रक्षा कीजिये' ॥३४ ॥ आप उन शत्रुओंको नहीं मारते जो अस्त्र- शस्त्र भूल गये हों, जिनका रथ टूट
गया हो, जो डर गये हों, जो लोग युद्ध छोड़कर अन्यमनस्क हो गये हों, जिनका धनुष टूट गया हो या जिन्होंने युद्धसे अपना मुख मोड़ लिया हो - उन्हें भी आप नहीं मारते || ३५ ||