श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 301–310

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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परिश्रम भी सहन नहीं करते हैं । वे अपने भक्तको परिश्रमसे मुक्त करनेके लिये स्वयं ही बन्धन स्वीकार कर लेते हैं । ५. भगवान्ने अपने मध्यभागमें बन्धन स्वीकार करके यह सूचित किया कि मुझमें तत्त्वदृष्टिसे बन्धन है ही नहीं; क्योंकि जो वस्तु आगे - पीछे, ऊपर- नीचे नहीं होती, केवल बीचमें भासती है, वह झूठी होती है । इसी प्रकार यह बन्धन भी झूठाहै । ६. भगवान् किसीकी शक्ति, साधन या सामग्रीसे नहीं बँधते । यशोदाजीके हाथों श्यामसुन्दरको न बँधते देखकर पास- पड़ोसकी ग्वालिनें इकट्ठी हो गयीं और कहने लगीं— यशोदाजी! लालाकी कमर तो मुट्ठीभरकी ही है और छोटी- सी किंकिणी इसमें रुन- झुन कर रही है । अब यह इतनी रस्सियोंसे नहीं बँधता तो जान पड़ता है कि विधाताने इसके ललाटमें बन्धन लिखा ही नहीं है । इसलिये अब तुम यह उद्योग छोड़ दो । यशोदा मैयाने कहा —चाहे सन्ध्या हो जाय और गाँवभरकी रस्सी क्यों न इकट्ठी करनी पड़े, पर मैं तो इसे बाँधकर ही छोडूंगी । यशोदाजीका यह हठ देखकर भगवान्ने अपना हठ छोड़ दिया; क्योंकि जहाँ भगवान् और भक्तके हठमें विरोध होता है, वहाँ भक्तका ही हठ पूरा होता है । भगवान् बँधते हैं तब, जब भक्तकी थकान देखकर कृपापरवश हो जाते हैं । भक्तके श्रम और भगवान्की कृपाकी कमी ही दो अंगुलकी कमी है । अथवा जब भक्त अहंकार करता है कि मैं भगवान्‌को बाँध लूँगा, तब वह उनसे एक अंगुल दूर पड़ जाता है और भक्तकी नकल करनेवाले भगवान् भी एक अंगुल दूर हो जाते हैं । जब यशोदा माता थक गयीं, उनका शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया, तब भगवान्की सर्वशक्तिचक्रवर्तिनी परम भास्वती भगवती कृपा- शक्तिने भगवान्‌के हृदयको माखनके समान द्रवित कर दिया और स्वयं प्रकट होकर उसने भगवान्की सत्य - संकल्पितता और विभुताको अन्तर्हित कर दिया। इसीसे भगवान् बँध गये । * यद्यपि भगवान् स्वयं परमेश्वर हैं, तथापि प्रेमपरवश होकर बँध जाना परम चमत्कारकारी होनेके कारण भगवान्का भूषण ही है, दूषण नहीं । आत्माराम होनेपर भी भूख लगना, पूर्णकाम होनेपर भी अतृप्त रहना, शुद्ध सत्त्वस्वरूप होनेपर भी क्रोध करना, स्वाराज्य- लक्ष्मीसे युक्त होनेपर भी चोरी करना, महाकाल यम आदिको भय देनेवाले होनेपर भी डरना और भागना, मनसे भी तीव्र गतिवाले होनेपर भी माताके हाथों पकड़ा जाना, आनन्दमय होनेपर भी दुःखी होना, रोना, सर्वव्यापक होनेपर भी बँध जाना — यह सब भगवान्‌की स्वाभाविक भक्तवश्यता है । जो लोग भगवान्को नहीं जानते हैं, उनके लिये तो इसका कुछ उपयोग नहीं है, परन्तु जो श्रीकृष्णको भगवान्के रूपमें पहचानते हैं, उनके लिये यह अत्यन्त चमत्कारी वस्तु है और यह देखकर- जानकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है, भक्तिप्रेमसे सराबोर हो जाता है । अहो! विश्वेश्वर प्रभु अपने भक्तके हाथों ऊखलमें बँधे हुए हैं । + इस श्लोकमें तीनों नकारोंका अन्वय ' लेभिरे ' क्रियाके साथ करना चाहिये । न पा सके, न पा सके, न पा सके । + ज्ञानी पुरुष भी भक्ति करें तो उन्हें इन सगुण भगवान्‌की प्राप्ति हो सकती है, परन्तु ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 302

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बड़ी कठिनाईसे । ऊखल - वँधे भगवान् सगुण हैं, वे निर्गुण प्रेमीको कैसे मिलेंगे? म स्वयं बँधकर भी बन्धनमें पड़े हुए यक्षोंकी मुक्तिकी चिन्ता करना, सत्पुरुषके सर्वथा योग्य है । जब यशोदा माताकी दृष्टि श्रीकृष्णसे हटकर दूसरेपर पड़ती है, तब वे भी किसी दूसरेको देखने लगते हैं और ऐसा ऊधम मचाते हैं कि सबकी दृष्टि उनकी ओर खिंच आये । देखिये, पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदिका प्रसंग । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 303

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अथ दशमोऽध्यायः यमलार्जुनका उद्धार राजोवाच

कथ्यतां भगवन्नेतत्तयोः शापस्य कारणम् ।

यत्तद् विगर्हितं कर्म येन वा देवर्षेस्तमः ॥ १

श्रीशुक उवाच

रुद्रस्यानुचरौ भूत्वा सुदृप्तौ धनदात्मजौ ।

कैलासोपवने रम्ये मन्दाकिन्यां मदोत्कटौ ॥२

वारुणीं मदिरां पीत्वा मदाघूर्णितलोचनी ।

स्त्रीजनैरनुगायद्भिश्चेरतुः पुष्पिते वने ॥ ३

अन्तः प्रविश्य गंगायामम्भोजवनराजिनि ।

चिक्रीडतुर्युवतिभिर्गजाविव करेणुभिः ॥ ४

राजा परीक्षित्ने पूछा – भगवन्! आप कृपया यह बतलाइये कि नलकूबर और मणिग्रीवको शाप क्यों मिला । उन्होंने ऐसा कौन- सा निन्दित कर्म किया था, जिसके कारण परम शान्त देवर्षि नारदजीको भी क्रोध आ गया? ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! नलकूबर और मणिग्रीव - ये दोनों एक तो धनाध्यक्ष कुबेरके लाड़ले लड़के थे और दूसरे इनकी गिनती हो गयी रुद्रभगवान्के अनुचरोंमें । इससे उनका घमण्ड बढ़ गया । एक दिन वे दोनों मन्दाकिनीके तटपर कैलासके रमणीय उपवनमें वारुणी मदिरा पीकर मदोन्मत्त हो गये थे । नशेके कारण उनकी आँखें घूम रही थीं । बहुत - सी स्त्रियाँ उनके साथ गा- बजा रही थीं और वे पुष्पोंसे लदे हुए वनमें उनके साथ विहार कर रहे थे ॥२-३ ॥ उस समय गंगाजीमें पाँत- के - पाँत कमल खिले हुए थे । वे स्त्रियोंके साथ जलके भीतर घुस गये और जैसे हाथियोंका जोड़ा हथिनियोंके साथ जलक्रीडा कर रहा हो, वैसे ही वे उन युवतियोंके साथ तरह - तरहकी क्रीडा करने लगे ॥४ ॥

यदृच्छया च देवर्षिर्भगवांस्तत्र कौरव ।

अपश्यन्नारदो देवौ क्षीबाणौ समबुध्यत ॥५

तंदृष्ट्वा' व्रीडिता देव्यो विवस्त्राः शापशंकिताः ।

वासांसि पर्यधुः शीघ्रं विवस्त्रौ नैव गुह्यकौ ॥ ६

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पृष्ठ 304

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तौ दृष्ट्वा मदिरामत्तौ श्रीमदान्धौ सुरात्मजौ ।

तयोरनुग्रहार्थाय शापं दास्यन्निदं जगौ ॥७

नारद उवाच नह्यन्यो जुषतो जोष्यान् बुद्धिभ्रंशो रजोगुणः श्रीमदादाभिजात्यादिर्यत्र स्त्री द्यूतमासवः ॥८

हन्यन्ते पशवो यत्र निर्दयैरजितात्मभिः ।

मन्यमानैरिमं देहमजरामृत्यु नश्वरम् ॥९

देवसंज्ञितमप्यन्ते कृमिविड्भस्मसंज्ञितम् ।

भूतध्रुक् तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ॥१०

परीक्षित्! संयोगवश उधरसे परम समर्थ देवर्षि नारदजी आ निकले । उन्होंने उन यक्ष-युवकोंको देखा और समझ लिया कि ये इस समय मतवाले हो रहे हैं || ५ || देवर्षि नारदको देखकर वस्त्रहीन अप्सराएँ लजा गयीं । शापके डरसे उन्होंने तो अपने-अपने कपड़े झटपट पहन लिये, परन्तु इन यक्षोंने कपड़े नहीं पहने ॥६ ॥

जब देवर्षि नारदजीने देखा कि ये देवताओंके पुत्र होकर श्रीमदसे अन्धे और मदिरापान करके उन्मत्त हो रहे हैं, तब उन्होंने उनपर अनुग्रह करनेके लिये शाप देते हुए यह कहा * ॥७॥

नारदजीने कहा — जो लोग अपने प्रिय विषयोंका सेवन करते हैं, उनकी बुद्धिको सबसे बढ़कर नष्ट करनेवाला है श्रीमद - धन- सम्पत्तिका नशा। हिंसा आदि रजोगुणी कर्म और कुलीनता आदिका अभिमान भी उससे बढ़कर बुद्धिभ्रंशक नहीं है; क्योंकि श्रीमदके साथ-साथ तो स्त्री, जूआ और मदिरा भी रहती है || ८ ॥ ऐश्वर्यमद और श्रीमदसे अंधे होकर अपनी इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले क्रूर पुरुष अपने नाशवान् शरीरको तो अजर- अमर मान बैठते हैं और अपने ही जैसे शरीरवाले पशुओंकी हत्या करते हैं ॥९ ॥

जिस शरीरको ‘ भूदेव', ' नरदेव', ' देव' आदि नामोंसे पुकारते हैं - उसकी अन्तमें क्या गति होगी? उसमें कीड़े पड़ जायँगे, पक्षी खाकर उसे विष्ठा बना देंगे या वह जलकर राखका ढेर बन जायगा । उसी शरीरके लिये प्राणियोंसे द्रोह करनेमें मनुष्य अपना कौन-सा स्वार्थ समझता है? ऐसा करनेसे तो उसे नरककी ही प्राप्ति होगी ॥ १० ॥

देहः किमन्नदातुः स्वं निषेक्तुर्मातुरेव च ।

मातुः पितुर्वा बलिनः क्रेतुरग्नेः शुनोऽपि वा ॥ ११

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पृष्ठ 305

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एवं साधारणं देहमव्यक्तप्रभवाप्ययम् ।

को विद्वानात्मसात् कृत्वा हन्ति जन्तूनृतेऽसतः ॥१२

असतः श्रीमदान्धस्य दारिद्रयं परमञ्जनम् ।

आत्मौपम्येन भूतानि दरिद्रः परमीक्षते ॥१३

यथा कण्टकविद्धांगो जन्तोर्नेच्छति तां व्यथाम् ।

जीवसाम्यं गतो लिङ्गैर्न तथाविद्धकण्टकः ॥१४

दरिद्रो निरहंस्तम्भो मुक्तः सर्वमदैरिह ।

कृच्छ्रं यदृच्छयाऽऽप्नोति तद्धि तस्य परं तपः ॥ १५

नित्यं क्षुत्क्षामदेहस्य दरिद्रस्यान्नकांक्षिणः ।

इन्द्रियाण्यनुशुष्यन्ति हिंसापि विनिवर्तते ॥१६

बतलाओ तो सही, यह शरीर किसकी सम्पत्ति है? अन्न देकर पालनेवालेकी है या गर्भाधान करानेवाले पिताकी? यह शरीर उसे नौ महीने पेटमें रखनेवाली माताका है अथवा माताको भी पैदा करनेवाले नानाका? जो बलवान् पुरुष बलपूर्वक इससे काम करा लेता है, उसका है अथवा दाम देकर खरीद लेनेवालेका? चिताकी जिस धधकती आगमें यह जल जायगा, उसका है अथवा जो कुत्ते- स्यार इसको चीथ चीथकर खा जानेकी आशा लगाये बैठे हैं, उनका? ॥११ ॥

यह शरीर एक साधारण- सी वस्तु है । प्रकृतिसे पैदा होता है और उसीमें समा जाता है । ऐसी स्थितिमें मूर्ख पशुओंके सिवा और ऐसा कौन बुद्धिमान् है जो इसको अपना आत्मा मानकर दूसरोंको कष्ट पहुँचायेगा, उनके प्राण लेगा ॥१२ ॥

जो दुष्ट श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं, उनकी आँखोंमें ज्योति डालनेके लिये दरिद्रता ही सबसे बड़ा अंजन है; क्योंकि दरिद्र यह देख सकता है कि दूसरे प्राणी भी मेरे ही जैसे हैं ॥१३ ॥

जिसके शरीरमें एक बार काँटा गड़ जाता है, वह नहीं चाहता कि किसी भी प्राणीको काँटा गड़नेकी पीड़ा सहनी पड़े; क्योंकि उस पीड़ा और उसके द्वारा होनेवाले विकारोंसे वह समझता है कि दूसरेको भी वैसी ही पीड़ा होती है । परन्तु जिसे कभी काँटा गड़ा ही नहीं, वह उसकी पीड़ाका अनुमान नहीं कर सकता ॥१४ ॥

दरिद्रमें घमंड और हेकड़ी नहीं होती; वह सब तरहके मदोंसे बचा रहता है । बल्कि दैववश उसे जो कष्ट उठाना पड़ता है, वह उसके लिये एक बहुत बड़ी तपस्या भी है ॥१५ ॥

जिसे प्रतिदिन भोजनके लिये अन्न जुटाना पड़ता है, भूखसे जिसका शरीर दुबला - पतला हो गया है, उस दरिद्रकी इन्द्रियाँ भी अधिक विषय नहीं भोगना चाहतीं, सूख जाती हैं और फिर वह अपने भोगोंके लिये दूसरे प्राणियोंको सताता नहीं— उनकी हिंसा नहीं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 306

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करता ॥१६ ॥

दरिद्रस्यैव युज्यन्ते साधवः समदर्शिनः ।

सद्भिः क्षिणोति तं तर्षं तत आराद् विशुद्धयति ॥१७

साधूनां समचित्तानां मुकुन्दचरणैषिणाम् ।

उपेक्ष्यैः किं धनस्तम्भैरसद्भिरसदाश्रयैः ॥१८

तदहं मत्तयोर्माध्व्या वारुण्या श्रीमदान्धयोः ।

तमोमदं हरिष्यामि स्त्रैणयोरजितात्मनोः ॥१९

यदिमौ लोकपालस्य पुत्रौ भूत्वा तमः प्लुतौ ।

न विवाससमात्मानं विजानीतः सुदुर्मदौ ॥२०

अतोऽर्हतः स्थावरतां स्यातां नैवं यथा पुनः ।

स्मृतिः स्यान्मत्प्रसादेन तत्रापि मदनुग्रहात् ॥२१

वासुदेवस्य सान्निध्यं लब्ध्वा दिव्यशरच्छते ।

वृत्ते स्वर्लोकतां भूयो लब्धभक्ती भविष्यतः ॥२२

श्रीशुक उवाच

एवमुक्त्वा स देवर्षिर्गतो नारायणाश्रमम् ।

नलकूबरमणिग्रीवावासतुर्यमलार्जुनौ ॥२३

यद्यपि साधु पुरुष समदर्शी होते हैं, फिर भी उनका समागम दरिद्रके लिये ही सुलभ है; -तृष्णाक्योंकि उसके भोग तो पहलेसे ही छूटे हुए हैं । अब संतोंके संगसे उसकी लालसा त भी मिट जाती है और शीघ्र ही उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है * ॥१७ ॥ जिन महात्माओंके

चित्तमें सबके लिये समता है, जो केवल भगवान्के चरणारविन्दोंका मकरन्द -रस पीनेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं, उन्हें दुर्गुणोंके खजाने अथवा दुराचारियोंकी जीविका चलानेवाले और धनके मदसे मतवाले दुष्टोंकी क्या आवश्यकता है? वे तो उनकी उपेक्षाके ही पात्र हैं ॥।१८ ॥ ये दोनों यक्ष वारुणी मदिराका पान करके मतवाले और श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं । अपनी इन्द्रियोंके अधीन रहनेवाले इन स्त्री- लम्पट यक्षोंका अज्ञानजनित मद मैं चूर-चूर कर दूँगा ॥१९ ॥ देखो तो सही, कितना अनर्थ है कि ये लोकपाल कुबेरके पुत्र होनेपर भी

मदोन्मत्त होकर अचेत हो रहे हैं और इनको इस बातका भी पता नहीं है कि हम बिलकुल नंग- धड़ंग हैं ॥२० ॥ इसलिये ये दोनों अब वृक्षयोनिमें जानेके योग्य हैं । ऐसा होनेसे इन्हें फिर

इस प्रकारका अभिमान न होगा । वृक्षयोनिमें जानेपर भी मेरी कृपासे इन्हें भगवान्की स्मृति ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 307

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बनी रहेगी और मेरे अनुग्रहसे देवताओंके सौ वर्ष बीतनेपर इन्हें भगवान् श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त होगा; और फिर भगवान्‌के चरणोंमें परम प्रेम प्राप्त करके ये अपने लोकमें चले आयेंगे ॥२१-२२ ॥ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - देवर्षि नारद इस प्रकार कहकर भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये + । नलकूबर और मणिग्रीव- ये दोनों एक ही साथ अर्जुन वृक्ष होकर यमलार्जुन नामसे प्रसिद्ध हुए || २३ || भगवान् श्रीकृष्णने अपने परम प्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीकी बात सत्य करनेके लिये धीरे- धीरे ऊखल घसीटते हुए उस ओर प्रस्थान किया, जिधर यमलार्जुन वृक्ष थे ॥ २४ ॥ भगवान्ने सोचा कि ' देवर्षि नारद मेरे अत्यन्त प्यारे हैं और

ये दोनों भी मेरे भक्त कुबेरके लड़के हैं । इसलिये महात्मा नारदने जो कुछ कहा है, उसे मैं ठीक उसी रूपमें पूरा करूंगा' * || २५ || यह विचार करके भगवान् श्रीकृष्ण दोनों वृक्षोंके बीचमें घुस गये ॥ वे तो दूसरी ओर निकल गये, परन्तु ऊखल टेढ़ा होकर अटक गया ॥२६ ॥

दामोदरभगवान् श्रीकृष्णकी कमरमें रस्सी कसी हुई थी। उन्होंने अपने पीछे लुढ़कते हुए ऊखलको ज्यों ही तनिक जोरसे खींचा, त्यों ही पेड़ोंकी सारी जड़ें उखड़ गयी+ | समस्त बल-विक्रमके केन्द्र भगवान्‌का तनिक-सा जोर लगते ही पेड़ोंके तने, शाखाएँ, छोटी-छोटी डालियाँ और एक-एक पत्ते काँप उठे और वे दोनों बड़े जोरसे तड़तड़ाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥२७ ॥ उन दोनों वृक्षोंमेंसे अग्निके समान तेजस्वी दो सिद्ध पुरुष निकले । उनके

चमचमाते हुए सौन्दर्यसे दिशाएँ दमक उठीं । उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर उनके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर शुद्ध हृदयसे वे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥२८ ॥

ऋषेर्भागवतमुख्यस्य सत्यं कर्तुं वचो हरिः ।

जगाम शनकैस्तत्र यत्रास्तां यमलार्जुनौ ॥२४

देवर्षिर्मे प्रियतमो यदिमौ धनदात्मजौ ।

तत्तथा साधयिष्यामि यद् गीतं तन्महात्मना ॥२५

इत्यन्तरेणार्जुनयोः कृष्णस्तु यमयोर्ययौ ।

आत्मनिर्वेशमात्रेण तिर्यग्गतमुलूखलम् ॥२६

बालेन निष्कर्षयतान्वगुलूखलं तद्

दामोदरेण तरसोत्कलिताङ्घ्रिबन्धौ ।

निष्पेततुः परमविक्रमितातिवेप- स्कन्धप्रवालविटपौ कृतचण्डशब्दौ ॥२७

तत्र श्रिया परमया ककुभः स्फुरन्तौ ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 308

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सिद्धावुपेत्य कुजयोरिव जातवेदाः । कृष्णं प्रणम्य शिरसाखिललोकनाथं बद्धांजली विरजसाविदमूचतुः स्म ॥ २८

कृष्ण कृष्ण महायोगिंस्त्वमाद्यः पुरुषः परः ।

व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥२९

उन्होंने कहा— सच्चिदानन्दस्वरूप! सबको अपनी ओर आकर्षित करनेवाले परम योगेश्वर श्रीकृष्ण! आप प्रकृतिसे अतीत स्वयं पुरुषोत्तम हैं । वेदज्ञ ब्राह्मण यह बात जानते हैं कि यह व्यक्त और अव्यक्त सम्पूर्ण जगत् आपका ही रूप है ॥२९ ॥ आप ही समस्त

प्राणियोंके शरीर, प्राण, अन्तःकरण और इन्द्रियोंके स्वामी हैं । तथा आप ही सर्वशक्तिमान् काल, सर्वव्यापक एवं अविनाशी ईश्वर हैं || ३० || आप ही महत्तत्त्व और वह प्रकृति हैं, जो अत्यन्त सूक्ष्म एवं सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणरूपा है । आप ही समस्त स्थूल और सूक्ष्म शरीरोंके कर्म, भाव, धर्म और सत्ताको जाननेवाले सबके साक्षी परमात्मा हैं ॥ ३१ ॥

वृत्तियोंसे ग्रहण किये जानेवाले प्रकृतिके गुणों और विकारोंके द्वारा आप पकड़में नहीं आ सकते । स्थूल और सूक्ष्म शरीरके आवरणसे ढका हुआ ऐसा कौन-सा पुरुष है, जो आपको जान सके? क्योंकि आप तो उन शरीरोंके पहले भी एकरस विद्यमान थे || ३२ || समस्त प्रपंचके विधाता भगवान् वासुदेवको हम नमस्कार करते हैं । प्रभो! आपके द्वारा प्रकाशित होनेवाले गुणोंसे ही आपने अपनी महिमा छिपा रखी है । परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करते हैं ॥३३ ॥ आप प्राकृत शरीरसे रहित हैं । फिर भी जब आप ऐसे पराक्रम

प्रकट करते हैं, जो साधारण शरीरधारियोंके लिये शक्य नहीं है और जिनसे बढ़कर तो क्या जिनके समान भी कोई नहीं कर सकता, तब उनके द्वारा उन शरीरोंमें आपके अवतारोंका पता चल जाता है ॥३४ ॥ प्रभो! आप ही समस्त लोकोंके अभ्युदय और निःश्रेयसके लिये

इस समय अपनी सम्पूर्ण शक्तियोंसे अवतीर्ण हुए हैं । आप समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ ३५ ॥ परम कल्याण (साध्य) स्वरूप! आपको नमस्कार है । परम मंगल

( साधन ) स्वरूप! आपको नमस्कार है । परम शान्त, सबके हृदयमें विहार करनेवाले यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णको नमस्कार है ॥ ३६ ॥ अनन्त! हम आपके दासानुदास हैं । आप

यह स्वीकार कीजिये । देवर्षि भगवान् नारदके परम अनुग्रहसे ही हम अपराधियोंको आपका दर्शन प्राप्त हुआ है ॥३७॥ प्रभो! हमारी वाणी आपके मंगलमय गुणोंका वर्णन करती रहे ।

हमारे कान आपकी रसमयी कथामें लगे रहें । हमारे हाथ आपकी सेवामें और मन आपके चरण- कमलोंकी स्मृतिमें रम जायँ । यह सम्पूर्ण जगत् आपका निवास- स्थान है । हमारा मस्तक सबके सामने झुका रहे । संत आपके प्रत्यक्ष शरीर हैं । हमारी आँखें उनके दर्शन करती रहें ॥३८ ॥

त्वमेकः सर्वभूतानां देहास्वात्मेन्द्रियेश्वरः ।

त्वमेव कालो भगवान् विष्णुरव्यय ईश्वरः ॥३०

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पृष्ठ 309

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त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजःसत्त्वतमोमयी ।

त्वमेव पुरुषोऽध्यक्षः सर्वक्षेत्रविकारवित् ॥३१

गृह्यमाणैस्त्वमग्राह्यो विकारै: प्राकृतैर्गुणैः ।

को न्विहार्हति विज्ञातुं प्राक्सिद्धं गुणसंवृतः ॥ ३२

तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।

आत्मद्योतगुणैश्छन्नमहिम्ने ब्रह्मणे नमः ॥३३

यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिणः ।

तैस्तैरतुल्यातिशयैर्वीर्यैर्देहिष्वसंगतैः ॥३४

स भवान् सर्वलोकस्य भवाय विभवाय च ।

अवतीर्णोऽशभागेन साम्प्रतं पतिराशिषाम् ॥३५

नमः परमकल्याण नमः परममंगल ।

वासुदेवाय शान्ताय यदूनां पतये नमः ॥३६

अनुजानीहि नौ भूमंस्तवानुचरकिंकरौ ।

दर्शनं नौ भगवत ऋषेरासीदनुग्रहात् ॥३७

वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्नः । स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम् ॥३८ श्रीशुक उवाच

इत्थं संकीर्तितस्ताभ्यां भगवान् गोकुलेश्वरः ।

दाम्ना चोलूखले बद्धः प्रहसन्नाह गुह्यकौ ॥३९

श्रीभगवानुवाच

ज्ञातं मम पुरैवैतदृषिणा करुणात्मना ।

यच्छ्रीमदान्धयोर्वाग्भिर्विभ्रंशोऽनुग्रहः कृतः ॥४०

साधूनां समचित्तानां सुतरां मत्कृतात्मनाम् ।

दर्शनान्नो भवेद् बन्धः पुंसोऽक्ष्णोः सवितुर्यथा ॥ ४१

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पृष्ठ 310

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तद् गच्छतं मत्परमौ नलकूबर सादनम् ।

संजातो मयि भावो वामीप्सितः परमोऽभवः ॥४२

श्रीशुक उवाच इत्युक्तौ तौ परिक्रम्य प्रणम्य च पुनः पुनः बद्धोलूखलमामन्त्र्य जग्मतुर्दिशमुत्तराम् ॥ ४३ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - सौन्दर्य- माधुर्यनिधि गोकुलेश्वर श्रीकृष्णने नलकूबर और मणिग्रीवके इस प्रकार स्तुति करनेपर रस्सीसे ऊखलमें बँधे बँधे ही हँसते हुए * उनसे कहा I · ॥३९ ॥

श्रीभगवान् ने कहा – तुमलोग श्रीमदसे अंधे हो रहे थे । मैं पहलेसे ही यह बात जानता था कि परम कारुणिक देवर्षि नारदने शाप देकर तुम्हारा ऐश्वर्य नष्ट कर दिया तथा इस प्रकार तुम्हारे ऊपर कृपा की ॥४० ॥

जिनकी बुद्धि समदर्शिनी है और हृदय पूर्ण रूपसे मेरे प्रति समर्पित है, उन साधु पुरुषोंके दर्शनसे बन्धन होना ठीक वैसे ही सम्भव नहीं है, जैसे सूर्योदय होनेपर मनुष्यके नेत्रोंके सामने अन्धकारका होना ॥४१ ॥

इसलिये नलकूबर और मणिग्रीव! तुमलोग मेरे परायण होकर अपने- अपने घर जाओ । तुमलोगोंको संसारचक्रसे छुड़ानेवाले अनन्य भक्तिभावकी, जो तुम्हें अभीष्ट है, प्राप्ति हो गयी है ॥४२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं -जब भगवान्ने इस प्रकार कहा, तब उन दोनोंने उनकी परिक्रमा की और बार- बार प्रणाम किया । इसके बाद ऊखलमें बँधे हुए सर्वेश्वरकी आज्ञा प्राप्त करके उन लोगोंने उत्तर दिशाकी यात्रा की ॥।४३ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे नारदशापो नाम दशमोऽध्यायः ॥१० ॥

* ये अपने भक्त कुबेरके पुत्र हैं, इसलिये इनका अर्जुन नाम है । ये देवर्षि नारदके द्वारा दृष्टिपूत किये जा चुके हैं, इसलिये भगवान्ने उनकी ओर देखा । जिसे पहले भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, उसपर कृपा करनेके लिये स्वयं बँधकर भी भगवान् जाते हैं । * देवर्षि नारदके शाप देनेमें दो हेतु थे - एक तो अनुग्रह – उनके मदका नाश करना और दूसरा अर्थ— श्रीकृष्ण -प्राप्ति । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******