श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 311–320
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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ऐसा प्रतीत होता है कि त्रिकालदर्शी देवर्षि नारदने अपनी ज्ञानदृष्टिसे यह जान लिया कि इनपर भगवान्का अनुग्रह होनेवाला है । इसीसे उन्हें भगवान्का भावी कृपापात्र समझकर ही उनके साथ छेड़ - छाड़ की । * धनी पुरुषमें तीन दोष होते हैं- धन, धनका अभिमान और धनकी तृष्णा । दरिद्र पुरुषमें पहले दो नहीं होते, केवल तीसरा ही दोष रहता है । इसलिये सत्पुरुषोंके संगसे धनकी तृष्णा मिट जानेपर धनियोंकी अपेक्षा उसका शीघ्र कल्याण हो जाता है । + धन स्वयं एक दोष है । सातवें स्कन्धमें कहा है कि जितनेसे पेट भर जाय, उससे अधिकको अपना माननेवाला चोर है और दण्डका पात्र है- 'स स्तेनो दण्डमर्हति । ' भगवान् भी कहते हैं — जिसपर मैं अनुग्रह करता हूँ, उसका धन छीन लेता हूँ । इसीसे सत्पुरुष प्रायः धनियोंकी उपेक्षा करते हैं । + १. शाप वरदानसे तपस्या क्षीण होती है । नलकूबर- मणिग्रीवको शाप देनेके पश्चात् नर-नारायण - आश्रमकी यात्रा करनेका यह अभिप्राय है कि फिरसे तपःसंचय कर लिया जाय । २. मैंने यक्षोंपर जो अनुग्रह किया है, वह बिना तपस्याके पूर्ण नहीं हो सकता है, इसलिये । ३. अपने आराध्यदेव एवं गुरुदेव नारायणके सम्मुख अपना कृत्य निवेदन करनेके लिये । * भगवान् श्रीकृष्ण अपनी कृपादृष्टिसे उन्हें मुक्त कर सकते थे । परन्तु वृक्षोंके पास जानेका कारण यह है कि देवर्षि नारदने कहा था कि तुम्हें वासुदेवका सान्निध्य प्राप्त होगा । + वृक्षोंके बीचमें जानेका आशय यह है कि भगवान् जिसके अन्तर्देशमें प्रवेश करते हैं, उसके जीवनमें क्लेशका लेश भी नहीं रहता । भीतर प्रवेश किये बिना दोनोंका एक साथ उद्धार भी कैसे होता । + जो भगवान्के गुण ( भक्त-वत्सल्य आदि सद्गुण या रस्सी ) से बँधा हुआ है, वह तिर्यक् गति ( पशु - पक्षी या टेढ़ी चालवाला) ही क्यों न हो- दूसरोंका उद्धार कर सकता है । अपने अनुयायीके द्वारा किया हुआ काम जितना यशस्कर होता है, उतना अपने हाथसे नहीं । मानो यही सोचकर अपने पीछे - पीछे चलनेवाले ऊखलके द्वारा उनका उद्धार करवाया । * सर्वदा मैं मुक्त रहता हूँ और बद्ध जीव मेरी स्तुति करते हैं । आज मैं बद्ध हूँ और मुक्त जीव मेरी स्तुति कर रहे हैं । यह विपरीत दशा देखकर भगवान्को हँसी आ गयी । + यक्षोंने विचार किया कि जबतक यह सगुण ( रस्सी ) में बँधे हुए हैं, तभीतक हमें इनके दर्शन हो रहे हैं । निर्गुणको तो मनमें सोचा भी नहीं जा सकता । इसीसे भगवान्के बँधे रहते ही वे चले गये । स्वस्त्यस्तु उलूखल सर्वदा श्रीकृष्णगुणशाली एव भूयाः । ‘ ऊखल! तुम्हारा कल्याण हो, तुम सदा श्रीकृष्णके गुणोंसे बँधे ही रहो ।'—ऐसा ऊखलको आशीर्वाद देकर यक्ष वहाँसे चले गये । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकादशोऽध्यायः गोकुलसे वृन्दावन जाना तथा वत्सासुर और बकासुरका उद्धार श्रीशुक उवाच
गोपा नन्दादयः श्रुत्वा द्रुमयोः पततो रवम् ।
तत्राजग्मुः कुरुश्रेष्ठ निर्घातभयशंकिताः ॥ १
भूम्यां निपतितौ तत्र ददृशुर्यमलार्जुनौ ।
बभ्रमुस्तदविज्ञाय लक्ष्यं पतनकारणम् ॥२
उलूखलं विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं च बालकम् ।
कस्येदं कुत आश्चर्यमुत्पात इति कातराः ॥ ३
बाला ऊचुरनेनेति तिर्यग्गतमुलूखलम् ।
विकर्षता मध्यगेन पुरुषावप्यचक्ष्महि ॥ ४
न ते तदुक्तं जगृहुर्न घटेतेति तस्य तत् ।
बालस्योत्पाटनं तर्वोः केचित् सन्दिग्धचेतसः ॥५
उलूखलं विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं स्वमात्मजम् ।
विलोक्य नन्दः प्रहसद्वदनो विमुमोच ह ॥ ६
गोपीभिः स्तोभितोऽनृत्यद् भगवान् बालवत् क्वचित् ।
उद्गायति क्वचिन्मुग्धस्तद्वशो दारुयन्त्रवत् ॥७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! वृक्षोंके गिरनेसे जो भयंकर शब्द हुआ था, उसे नन्दबाबा आदि गोपोंने भी सुना । उनके मनमें यह शंका हुई कि कहीं बिजली तो नहीं गिरी! सब- के5-- ससब भयभीत होकर वृक्षोंके पास आ गये || १ || वहाँ पहुँचनेपर उन लोगोंने देखा कि दोनों अर्जुनके वृक्ष गिरे हुए हैं । यद्यपि वृक्ष गिरनेका कारण स्पष्ट था— वहीं उनके सामने ही रस्सीमें बँधा हुआ बालक ऊखल खींच रहा था, परन्तु वे समझ न सके । ‘ यह किसका काम है, ऐसी आश्चर्यजनक दुर्घटना कैसे घट गयी? ' – यह सोचकर वे कातर हो गये, उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी ॥२-३ ॥ वहाँ कुछ बालक खेल रहे थे । उन्होंने कहा — ' अरे, इसी कन्हैयाका तो काम है । यह दोनों वृक्षोंके बीचमेंसे होकर निकल रहा था । ऊखल तिरछा हो जानेपर दूसरी ओरसे इसने उसे खींचा और वृक्ष गिर पड़े । हमने तो इनमें से निकलते हुए दो पुरुष भी देखे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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हैं ॥४ ॥ परन्तु गोपोंने बालकोंकी बात नहीं मानी । वे कहने लगे – ' एक नन्हा- सा बच्चा
इतने बड़े वृक्षोंको उखाड़ डाले, यह कभी सम्भव नहीं है । ' किसी - किसीके चित्तमें श्रीकृष्णकी पहलेकी लीलाओंका स्मरण करके सन्देह भी हो आया ॥५ ॥ नन्दबाबाने
देखा, उनका प्राणोंसे प्यारा बच्चा रस्सीसे बँधा हुआ ऊखल घसीटता जा रहा है । वे हँसने लगे और जल्दीसे जाकर उन्होंने रस्सीकी गाँठ खोल दी* ॥ ६ ॥
सर्वशक्तिमान् भगवान् कभी- कभी गोपियोंके फुसलानेसे साधारण बालकोंके समान नाचने लगते । कभी भोले- भाले अनजान बालककी तरह गाने लगते । वे उनके हाथकी कठपुतली— उनके सर्वथा अधीन हो गये ॥७ ॥
बिभर्ति क्वचिदाज्ञप्तः पीठकोन्मानपादुकम् ।
बाहुक्षेपं च कुरुते स्वानां च प्रीतिमावहन् ॥८
दर्शयंस्तद्विदां लोक आत्मनो भृत्यवश्यताम् ।
व्रजस्योवाह वै हर्षं भगवान् बालचेष्टितैः ॥९
क्रीणीहि भोः फलानीति श्रुत्वा सत्वरमच्युतः ।
फलार्थी धान्यमादाय ययौ सर्वफलप्रदः ॥१०
फलविक्रयिणी तस्य च्युतधान्यं करद्वयम् ।
फलैरपूरयद् रत्नैः फलभाण्डमपूरि च ॥११
सरित्तीरगतं कृष्णं भग्नार्जुनमथाह्वयत् ।
रामं च रोहिणी देवी क्रीडन्तं बालकैर्भृशम् ॥१२
नोपेयातां यदाऽऽहूतौ क्रीडासंगेन पुत्रकौ ।
यशोदां प्रेषयामास रोहिणी पुत्रवत्सलाम् ॥१३
क्रीडन्तं सा सुतं बालैरतिवेलं सहाग्रजम् ।
यशोदाजोहवीत् कृष्णं पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी ॥ १४
कृष्ण कृष्णारविन्दाक्ष तात एहि स्तनं पिब ।
अलं विहारैः क्षुत्क्षान्तः क्रीडाश्रान्तोऽसि पुत्रक ॥१५
हे रामागच्छ ताताशु सानुजः कुलनन्दन ।
प्रातरेव कृताहारस्तद् भवान् भोक्तुमर्हति ॥१६
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वे कभी उनकी आज्ञासे पीढ़ा ले आते, तो कभी दुसेरी आदि तौलनेके बटखरे उठा लाते । कभी खड़ाऊँ ले आते, तो कभी अपने प्रेमी भक्तोंको आनन्दित करनेके लिये पहलवानोंकी भाँति ताल ठोंकने लगते || ८ || इस प्रकार सर्वशक्तिमान् भगवान् अपनी बाल - लीलाओंसे व्रजवासियोंको आनन्दित करते और संसारमें जो लोग उनके रहस्यको जानने - वाले हैं, उनको यह दिखलाते कि मैं अपने सेवकोंके वशमें हूँ ॥ ९ ॥
एक दिन कोई फल बेचनेवाली आकर पुकार उठी- ' फल लो फल! यह सुनते ही समस्त कर्म और उपासनाओंके फल देनेवाले भगवान् अच्युत फल खरीदनेके लिये अपनी छोटी - सी अँजुलीमें अनाज लेकर दौड़ पड़े ॥१० ॥ उनकी अँजुलिमेंसे अनाज
तो रास्तेमें ही बिखर गया, पर फल बेचनेवालीने उनके दोनों हाथ फलसे भर दिये । इधर भगवान्ने भी उसकी फल रखनेवाली टोकरी रत्नोंसे भर दी ॥११ ॥
तदनन्तर एक दिन यमलार्जुन वृक्षको तोड़नेवाले श्रीकृष्ण और बलराम बालकोंके साथ खेलते - खेलते यमुनातटपर चले गये और खेलमें ही रम गये, तब रोहिणीदेवीने उन्हें पुकारा ‘ ओ कृष्ण! ओ बलराम! जल्दी आओ ' ॥१२ ॥ परन्तु रोहिणीके पुकारनेपर भी
वे आये नहीं; क्योंकि उनका मन खेलमें लग गया था । जब बुलानेपर भी वे दोनों बालक नहीं आये, तब रोहिणीजीने वात्सल्यस्नेहमयी यशोदाजीको भेजा ॥१३ ॥ श्रीकृष्ण और
बलराम ग्वालबालकोंके साथ बहुत देरसे खेल रहे थे, यशोदाजीने जाकर उन्हें पुकारा । उस समय पुत्रके प्रति वात्सल्यस्नेहके कारण उनके स्तनोंमेंसे दूध चुचुआ रहा था ॥१४ ॥ वे जोर- जोर से पुकारने लगीं- ' मेरे प्यारे कन्हैया! ओ कृष्ण! कमलनयन!
श्यामसुन्दर! बेटा! आओ, अपनी माका दूध पी लो । खेलते- खेलते थक गये हो बेटा! अब बस करो । देखो तो सही, तुम भूखसे दुबले हो रहे हो ॥१५ ॥ मेरे प्यारे बेटा राम!
तुम तो समूचे कुलको आनन्द देनेवाले हो । अपने छोटे भाईको लेकर जल्दीसे आ जाओ तो! देखो, भाई! आज तुमने बहुत सबेरे कलेऊ किया था। अब तो तुम्हें कुछ खाना चाहिये ॥१६ ॥ बेटा बलराम! व्रजराज भोजन करनेके लिये बैठ गये हैं; परन्तु अभीतक
तुम्हारी बाट देख रहे हैं । आओ, अब हमें आनन्दित करो । बालको! अब तुमलोग भी अपने - अपने घर जाओ ॥१७ ॥ बेटा! देखो तो सही, तुम्हारा एक-एक अंग धूलसे
लथपथ हो रहा है । आओ, जल्दीसे स्नान कर लो । आज तुम्हारा जन्म नक्षत्र है । पवित्र होकर ब्राह्मणोंको गोदान करो ॥१८ ॥ देखो -देखो! तुम्हारे साथियोंको उनकी माताओंने
नहला- धुलाकर, मींज - पोंछकर कैसे सुन्दर- सुन्दर गहने पहना दिये हैं । अब तुम भी नहा- धोकर, खा - पीकर, पहन- ओढ़कर तब खेलना ' ॥ १ ९ ॥ परीक्षित्! माता यशोदाका सम्पूर्ण मन-प्राण प्रेम- बन्धनसे बँधा हुआ था । वे चराचर जगत्के शिरोमणि भगवान्को अपना पुत्र समझतीं और इस प्रकार कहकर एक हाथसे बलराम तथा दूसरे हाथसे श्रीकृष्णको पकड़कर अपने घर ले आयीं। इसके बाद उन्होंने पुत्रके मंगलके लिये जो कुछ करना था, वह बड़े प्रेमसे किया ॥२० ॥
प्रतीक्षते त्वां दाशार्ह भोक्ष्यमाणो व्रजाधिपः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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एह्यावयोः प्रियं धेहि स्वगृहान् यात बालकाः ॥१७
धूलिधूसरितांगस्त्वं पुत्र मज्जनमावह ।
जन्मर्क्षमद्य भवतो विप्रेभ्यो देहि गाः शुचिः ॥ १८
पश्य पश्य वयस्यांस्ते मातृमृष्टान् स्वलंकृतान् ।
त्वं च स्नातः कृताहारो विहरस्व स्वलंकृतः ॥ १ ९
इत्थं यशोदा तमशेषशेखरं मत्वा सुतं स्नेहनिबद्धधीर्नृप । हस्ते गृहीत्वा सहराममच्युतं नीत्वा स्ववाटं कृतवत्यथोदयम् ॥२०
गोपवृद्धा महोत्पाताननुभूय बृहद्वने ।
नन्दादयः समागम्य व्रजकार्यममन्त्रयन् ॥२१
तत्रोपनन्दनामाऽऽह गोपो ज्ञानवयोऽधिकः ।
देशकालार्थतत्त्वज्ञः प्रियकृद् रामकृष्णयोः ॥२२
उत्थातव्यमितोऽस्माभिर्गोकुलस्य हितैषिभिः ।
आयान्त्यत्र महोत्पाता बालानां नाशहेतवः ॥२३
मुक्तः कथंचिद् राक्षस्या बालघ्न्या बालको ह्यसौ ।
हरेरनुग्रहान्नूनमनश्चोपरि नापतत् ॥ २४
जब नन्दबाबा आदि बड़े- बूढ़े गोपोंने देखा कि महावनमें तो बड़े - बड़े उत्पात होने लगे हैं, तब वे लोग इकट्ठे होकर ' अब व्रजवासियोंको क्या करना चाहिये ' –इस विषयपर विचार करने लगे ॥२१ ॥ उनमेंसे एक गोपका नाम था उपनन्द । वे अवस्थामें
तो बड़े थे ही, ज्ञानमें भी बड़े थे । उन्हें इस बातका पता था कि किस समय किस स्थानपर किस वस्तुसे कैसा व्यवहार करना चाहिये । साथ ही वे यह भी चाहते थे कि
राम और श्याम सुखी रहें, उनपर कोई विपत्ति न आवे । उन्होंने कहा— ॥२२ ॥
‘ भाइयो! अब यहाँ ऐसे बड़े - बड़े उत्पात होने लगे हैं, जो बच्चोंके लिये तो बहुत ही अनिष्टकारी हैं । इसलिये यदि हमलोग गोकुल और गोकुलवासियोंका भला चाहते हैं, तो हमें यहाँसे अपना डेरा डंडा उठाकर कूच कर देना चाहिये ॥ २३ ॥ देखो, यह सामने
बैठा हुआ नन्दरायका लाड़ला सबसे पहले तो बच्चोंके लिये कालस्वरूपिणी हत्यारी पूतनाके चंगुलसे किसी प्रकार छूटा । इसके बाद भगवान्की दूसरी कृपा यह हुई कि ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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इसके ऊपर उतना बड़ा छकड़ा गिरते गिरते बचा ॥२४ ॥ बवंडररूपधारी दैत्यने तो इसे
आकाशमें ले जाकर बड़ी भारी विपत्ति ( मृत्युके मुख ) में ही डाल दिया था, परन्तु वहाँसे जब वह चट्टानपर गिरा, तब भी हमारे कुलके देवेश्वरोंने ही इस बालककी रक्षा की ॥२५ ॥ यमलार्जुन वृक्षोंके गिरनेके समय उनके बीचमें आकर भी यह या और कोई
बालक न मरा । इससे भी यही समझना चाहिये कि भगवान्ने हमारी रक्षा की ॥२६ ॥
इसलिये जबतक कोई बहुत बड़ा अनिष्टकारी अरिष्ट हमें और हमारे व्रजको नष्ट न कर दे, तबतक ही हमलोग अपने बच्चोंको लेकर अनुचरोंके साथ यहाँसे अन्यत्र चले चलें ॥२७ ॥ ‘ वृन्दावन ' नामका एक वन है । उसमें छोटे - छोटे और भी बहुत - से नये - नये
हरे- भरे वन हैं । वहाँ बड़ा ही पवित्र पर्वत, घास और हरी- भरी लता- वनस्पतियाँ हैं । हमारे पशुओंके लिये तो वह बहुत ही हितकारी है । गोप, गोपी और गायोंके लिये वह केवल सुविधाका ही नहीं, सेवन करनेयोग्य स्थान है ॥२८ ॥ सो यदि तुम सब लोगोंको
यह बात जँचती हो तो आज ही हमलोग वहँके लिये कूच कर दें । देर न करें, गाड़ी- छकड़े जोतें और पहले गायोंको, जो हमारी एकमात्र सम्पत्ति हैं, वहाँ भेज दें ' ॥२९ ॥
चक्रवातेन नीतोऽयं दैत्येन विपदं वियत् ।
शिलायां पतितस्तत्र परित्रातः सुरेश्वरैः ॥ २५
यन्न म्रियेत द्रुमयोरन्तरं प्राप्य बालकः ।
असावन्यतमो वापि तदप्यच्युतरक्षणम् ॥२६
यावदौत्पातिकोऽरिष्टो व्रजं नाभिभवेदितः ।
तावद् बालानुपादाय यास्यामोऽन्यत्र सानुगाः ॥ २७
वनं वृन्दावनं नाम पशव्यं नवकाननम् ।
गोपगोपीगवां सेव्यं पुण्याद्रितृणवीरुधम् ॥२८
तत्तत्राद्यैव यास्यामः शकटान् युङ्क्त मा चिरम् ।
गोधनान्यग्रतो यान्तु भवतां यदि रोचते ॥२९
तच्छ्रुत्वैकधियो गोपाः साधु साध्विति वादिनः ।
व्रजान् स्वान् स्वान् समायुज्य ययू रूढपरिच्छदाः ॥३०
वृद्धान् बालान् स्त्रियो राजन् सर्वोपकरणानि च ।
अनस्स्वारोप्य गोपाला यत्ता आत्तशरासनाः ॥३१
गोधनानि पुरस्कृत्य शृंगाण्यापूर्य सर्वतः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तूर्यघोषेण महता ययुः सहपुरोहिताः ॥ ३२
गोप्यो रूढरथा नूत्नकुचकुंकुमकान्तयः ।
कृष्णलीला जगुः प्रीता निष्ककण्ठ्यः सुवाससः ॥३३
उपनन्दकी बात सुनकर सभी गोपोंने एक स्वरसे कहा - ' बहुत ठीक, बहुत ठीक। ' इस विषयमें किसीका भी मतभेद न था । सब लोगोंने अपनी झुंड की झुंड गायें इकट्ठी कीं और छकड़ोंपर घरकी सब सामग्री लादकर वृन्दावनकी यात्रा की । ३० ॥ परीक्षित्! ग्वालोंने बूढ़ों, बच्चों, स्त्रियों और सब सामग्रियोंको छकड़ोंपर चढ़ा दिया और स्वयं उनके पीछे - पीछे धनुष- बाण लेकर बड़ी सावधानीसे चलने लगे ॥ ३१ ॥ उन्होंने गौ और
बछड़ोंको तो सबसे आगे कर लिया और उनके पीछे - पीछे सिंगी और तुरही जोर - जोरसे बजाते हुए चले । उनके साथ ही साथ पुरोहितलोग भी चल रहे थे ॥३२ ॥ गोपियाँ
अपने -अपने वक्षःस्थलपर नयी केसर लगाकर, सुन्दर- सुन्दर वस्त्र पहनकर, गलेमें सोनेके हार धारण किये हुए रथोंपर सवार थीं और बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंके गीत गाती जाती थीं ॥ ३३ ॥ यशोदारानी और रोहिणीजी भी वैसे ही सज- धजकर अपने - अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण तथा बलरामके साथ एक छकड़ेपर
शोभायमान हो रही थीं । वे अपने दोनों बालकोंकी तोतली बोली सुन-सुनकर भी अघाती न थीं, और - और सुनना चाहती थीं ॥ ३४ ॥ वृन्दावन बड़ा ही सुन्दर वन है । चाहे
कोई भी ऋतु हो, वहाँ सुख ही सुख है । उसमें प्रवेश करके ग्वालोंने अपने छकड़ोंको अर्द्धचन्द्राकार मण्डल बाँधकर खड़ा कर दिया और अपने गोधनके रहनेयोग्य स्थान बना लिया ॥३५ ॥ परीक्षित्! वृन्दावनका हरा- भरा वन, अत्यन्त मनोहर गोवर्धन पर्वत
और यमुना नदीके सुन्दर- सुन्दर पुलिनोंको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके हृदयमें उत्तम प्रीतिका उदय हुआ ॥३६ ॥
तथा यशोदारोहिण्यावेकं शकटमास्थिते ।
रेजतुः कृष्णरामाभ्यां तत्कथाश्रवणोत्सुके ॥३४
वृन्दावनं संप्रविश्य सर्वकालसुखावहम् ।
तत्र चक्रुर्व्रजावासं शकटैरर्धचन्द्रवत् ॥३५
वृन्दावनं गोवर्धनं यमुनापुलिनानि च ।
वीक्ष्यासीदुत्तमा प्रीती राममाधवयोर्नृप ॥३६
एवं व्रजौकसां प्रीतिं यच्छन्तौ बालचेष्टितैः ।
कलवाक्यैः स्वकालेन वत्सपालौ बभूवतुः ॥ ३७
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अविदूरे व्रजभुवः सह गोपालदारकैः ।
चारयामासतुर्वत्सान् नानाक्रीडापरिच्छदौ ॥३८
क्वचिद् वादयतो वेणुं क्षेपणौः क्षिपतः क्वचित् ।
क्वचित् पादैः किंकिणीभिः क्वचित् कृत्रिमगोवृषैः ॥ ३ ९
वृषायमाणी नर्दन्तौ युयुधाते परस्परम् ।
अनुकृत्य रुतैर्जन्तूंश्चेरतुः प्राकृतौ यथा ॥४०
कदाचिद् यमुनातीरे वत्सांश्चारयतोः स्वकैः ।
वयस्यैः कृष्णबलयोर्जिघांसुर्दैत्य आगमत् ॥४१
राम और श्याम दोनों ही अपनी तोतली बोली और अत्यन्त मधुर बालोचित लीलाओंसे गोकुलकी ही तरह वृन्दावनमें भी व्रजवासियोंको आनन्द देते रहे । थोड़े ही दिनोंमें समय आनेपर वे बछड़े चराने लगे ॥३७ ॥ दूसरे ग्वालबालोंके साथ खेलनेके
लिये बहुत - सी सामग्री लेकर वे घरसे निकल पड़ते और गोष्ठ ( गायोंके रहनेके स्थान ) के पास ही अपने बछड़ोंको चराते ॥ ३८ ॥ श्याम और राम कहीं बाँसुरी बजा रहे हैं, तो
कहीं गुलेल या ढेलवाँससे ढेले या गोलियाँ फेंक रहे हैं । किसी समय अपने पैरोंके घुँघरूपर तान छेड़ रहे हैं तो कहीं बनावटी गाय और बैल बनकर खेल रहे हैं ॥३९ ॥
एक ओर देखिये तो साँड़ बन बनकर हँकड़ते हुए आपसमें लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर मोर, कोयल, बंदर आदि पशु -पक्षियोंकी बोलियाँ निकाल रहे हैं । परीक्षित्! इस प्रकार सर्वशक्तिमान् भगवान् साधारण बालकोंके समान खेलते रहते ॥४० ॥
एक दिनकी बात है, श्याम और बलराम अपने प्रेमी सखा ग्वालबालोंके साथ यमुनातटपर बछड़े चरा रहे थे । उसी समय उन्हें मारनेकी नीयतसे एक दैत्य आया ॥४१ ॥
तं वत्सरूपिणं वीक्ष्य वत्सयूथगतं हरिः ।
दर्शयन् बलदेवाय शनैर्मुग्ध इवासदत् ॥४२
गृहीत्वापरपादाभ्यां सहलाङ्गूलमच्युतः ।
भ्रामयित्वा कपित्थाग्रे प्राहिणोद् गतजीवितम् ।
स कपित्थैर्महाकायः पात्यमानैः पपात ह ॥४३
तं वीक्ष्य विस्मिता बालाः शशंसुः साधु साध्विति ।
देवाश्च परिसन्तुष्टा बभूवुः पुष्पवर्षिणः ॥ ४४
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तौ वत्सपालकौ भूत्वा सर्वलोकैकपालकौ ।
सप्रातराशौ गोवत्सांश्चारयन्तौ विचेरतुः ॥४५
स्वं स्वं वत्सकुलं सर्वे पाययिष्यन्त एकदा ।
गत्वा जलाशयाभ्याशं पाययित्वा पपुर्जलम् ॥४६
ते तत्र ददृशुर्बाला महासत्त्वमवस्थितम् ।
तत्रसुर्वज्रनिर्भिन्नं गिरेः शृंगमिव च्युतम् ॥ ४७
स वै बको नाम महानसुरो बकरूपधृक् ।
आगत्य सहसा कृष्णं तीक्ष्णतुण्डोऽग्रसद्बली ॥४८
कृष्णं महाबकग्रस्तं दृष्ट्वा रामादयोऽर्भकाः ।
बभूबुरिन्द्रियाणीव विना प्राणं विचेतसः ॥४९
तं तालुमूलं प्रदहन्तमग्निवद्
गोपालसूनुं पितरं जगद्गुरोः ।
चच्छर्द सद्योऽतिरुषाक्षतं बक- स्तुण्डेन हन्तुं पुनरभ्यपद्यत ॥५०
भगवान्ने देखा कि वह बनावटी बछड़ेका रूप धारणकर बछड़ोंके झुंडमें मिल गया है । वे आँखोंके इशारेसे बलरामजीको दिखाते हुए धीरे- धीरे उसके पास पहुँच गये । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे दैत्यको तो पहचानते नहीं और उस हट्टे - कट्टे सुन्दर बछड़ेपर मुग्ध हो गये हैं ॥ ४२ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने पूँछके साथ उसके दोनों पिछले पैर
पकड़कर आकाशमें घुमाया और मर जानेपर कैथके वृक्षपर पटक दिया । उसका लम्बा- तगड़ा दैत्यशरीर बहुत - से कैथके वृक्षोंको गिराकर स्वयं भी गिर पड़ा ॥४३ ॥ यह
देखकर ग्वालबालोंके आश्चर्यकी सीमा न रही । वे ' वाह- वाह ' करके प्यारे कन्हैयाकी प्रशंसा करने लगे । देवता भी बड़े आनन्दसे फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥४४ ॥
परीक्षित्! जो सारे लोकोंके एकमात्र रक्षक हैं, वे ही श्याम और बलराम अब वत्सपाल ( बछड़ोंके चरवाहे) बने हुए हैं। वे तड़के ही उठकर कलेवेकी सामग्री ले लेते और बछड़ोंको चराते हुए एक वनसे दूसरे वनमें घूमा करते ॥ ४५ ॥ एक दिनकी बात है,
सब ग्वालबाल अपने झुंड के झुंड बछड़ोंको पानी पिलानेके लिये जलाशयके तटपर ले गये । उन्होंने पहले बछड़ोंको जल पिलाया और फिर स्वयं भी पिया ॥४६ ॥
ग्वालबालोंने देखा कि वहाँ एक बहुत बड़ा जीव बैठा हुआ है । वह ऐसा मालूम पड़ता था, मानो इन्द्रके वज्रसे कटकर कोई पहाड़का टुकड़ा गिरा हुआ है ॥ ४७ ॥ ग्वालबाल
उसे देखकर डर गये । वह ' बक' नामका एक बड़ा भारी असुर था, जो बगुलेका रूप ****** ebook converter DEMO Watermarks *******