श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 421–430

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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अथ द्वाविंशोऽध्यायः चीरहरण श्रीशुक उवाच

हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिकाः ।

चेरुर्हविष्यं भुंजानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम् ॥ १

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब हेमन्त ऋतु आयी । उसके पहले ही महीनेमें अर्थात् मार्गशीर्षमें नन्दबाबाके व्रजकी कुमारियाँ कात्यायनी देवीकी पूजा और व्रत करने लगीं । वे केवल हविष्यान्न ही खाती थीं ॥१ ॥

आप्लुत्याम्भसि कालिन्द्या जलान्ते चोदितेऽरुणे ।

कृत्वा प्रतिकृतिं देवीमानर्चुर्नृप सैकतीम् ॥२

गन्धैर्माल्यैः सुरभिभिर्बलिभिर्धूपदीपकैः ।

उच्चावचैश्चोपहारै: प्रवालफलतण्डुलैः ॥ ३

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।

नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ।

इति मन्त्रं जपन्त्यस्ताः पूजां चक्रुः कुमारिकाः ॥४

एवं मासं व्रतं चेरुः कुमार्यः कृष्णचेतसः ।

भद्रकालीं समानर्चुर्भूयान्नन्दसुतः पतिः ॥५

उषस्युत्थाय गोत्रैः स्वैरन्योन्याबद्धबाहवः ।

कृष्णमुच्चैर्जगुर्यान्त्यः कालिन्द्यां स्नातुमन्वहम् ॥६

नद्यां कदाचिदागत्य तीरे निक्षिप्य पूर्ववत् ।

वासांसि कृष्णं गायन्त्यो विजहुः सलिले मुदा ॥७

भगवांस्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वरः ।

वयस्यैरावृतस्तत्र गतस्तत्कर्मसिद्धये ॥८

तासां वासांस्युपादाय नीपमारुह्य सत्वरः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 422

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हसद्भिः प्रहसन् बालैः परिहासमुवाच ह ॥९

अत्रागत्याबलाः कामं स्वं स्वं वासः प्रगृह्यताम् ।

सत्यं ब्रवाणि नो नर्म यद् यूयं व्रतकर्शिताः ॥ १०

राजन्! वे कुमारी कन्याएँ पूर्व दिशाका क्षितिज लाल होते- होते यमुनाजलमें स्नान कर लेतीं और तटपर ही देवीकी बालुकामयी मूर्ति बनाकर सुगन्धित चन्दन, फूलोंके हार, भाँति-भाँतिके नैवेद्य, धूप - दीप, छोटी - बड़ी भेंटकी सामग्री, पल्लव, फल और चावल आदिसे उनकी पूजा करतीं ॥२३ ॥ साथ ही ' हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे सबकी एकमात्र

स्वामिनी! आप नन्दनन्दन श्रीकृष्णको हमारा पति बना दीजिये । देवि! हम आपके चरणोंमें नमस्कार करती हैं । ' –इस मन्त्रका जप करती हुई वे कुमारियाँ देवीकी आराधना करतीं ॥४ ॥ इस प्रकार उन कुमारियोंने, जिनका मन श्रीकृष्णपर निछावर हो चुका था, इस

संकल्पके साथ एक महीनेतक भद्रकालीकी भलीभाँति पूजा कीं कि ' नन्दनन्दन श्यामसुन्दर ही हमारे पति हों' || ५ || वे प्रतिदिन उषाकालमें ही नाम ले - लेकर एक- दूसरी सखीको पुकार लेतीं और परस्पर हाथ- में- हाथ डालकर ऊँचे स्वरसे भगवान् श्रीकृष्णकी लीला तथा नामोंका गान करती हुई यमुनाजलमें स्नान करनेके लिये जातीं ॥६ ॥

एक दिन सब कुमारियोंने प्रतिदिनकी भाँति यमुनाजीके तटपर जाकर अपने - अपने वस्त्र उतार दिये और भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका गान करती हुई बड़े आनन्दसे जल- क्रीडा करने लगीं ॥७ ॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सनकादि योगियों और शंकर आदि योगेश्वरोंके भी

ईश्वर हैं । उनसे गोपियोंकी अभिलाषा छिपी न रही । वे उनका अभिप्राय जानकर अपने सखा ग्वालबालोंके साथ उन कुमारियोंकी साधना सफल करनेके लिये यमुना तटपर गये ॥८ ॥

उन्होंने अकेले ही उन गोपियोंके सारे वस्त्र उठा लिये और बड़ी फुर्तीसे वे एक कदम्बके वृक्षपर चढ़ गये । साथी ग्वालबाल ठठा- ठठाकर हँसने लगे और स्वयं श्रीकृष्ण भी हँसते हुए गोपियोंसे हँसीकी बात कहने लगे- || ९ || ' अरी कुमारियो! तुम यहाँ आकर इच्छा हो, तो अपने - अपने वस्त्र ले जाओ। मैं तुमलोगोंसे सच- सच कहता हूँ। हँसी बिलकुल नहीं करता । तुमलोग व्रत करते - करते दुबली हो गयी हो ॥१० ॥ ये मेरे सखा ग्वालबाल जानते हैं कि मैंने

कभी कोई झूठी बात नहीं कही है । सुन्दरियो! तुम्हारी इच्छा हो तो अलग - अलग आकर अपने - अपने वस्त्र ले लो, या सब एक साथ ही आओ । मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है' ॥११ ॥

न मयोदितपूर्वं वा अनृतं तदिमे विदुः ।

एकैकशः प्रतीच्छध्वं सहैवोत सुमध्यमाः ॥ ११

तस्य तत् क्ष्वेलितं दृष्ट्वा गोप्यः प्रेमपरिप्लुताः ।

व्रीडिताः प्रेक्ष्य चान्योन्यं जातहासा न निर्ययुः ॥१२

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पृष्ठ 423

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एवं ब्रुवति गोविन्दे नर्मणाऽऽक्षिप्तचेतसः ।

आकण्ठमग्नाः शीतोदे वेपमानास्तमब्रुवन् ॥१३

मानयं भोः कृथास्त्वां तु नन्दगोपसुतं प्रियम् ।

जानीमोऽङ्ग व्रजश्लाघ्यं देहि वासांसि वेपिताः ॥१४

श्यामसुन्दर ते दास्यः करवाम तवोदितम् ।

देहि वासांसि धर्मज्ञ नो चेद् राज्ञे ब्रुवामहे ॥ १५

श्रीभगवानुवाच

भवत्यो यदि मे दास्यो मयोक्तं वा करिष्यथ ।

अत्रागत्य स्ववासांसि प्रतीच्छन्तु शुचिस्मिताः ॥१६

ततो जलाशयात् सर्वा दारिकाः शीतवेपिताः ।

पाणिभ्यां योनिमाच्छाद्य प्रोत्तेरुः शीतकर्शिताः ॥१७

भगवानाहता वीक्ष्य शुद्धभावप्रसादितः ।

स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीतः प्रोवाच सस्मितम् ॥१८

भगवान्की यह हँसी - मसखरी देखकर गोपियोंका हृदय प्रेमसे सराबोर हो गया । वे तनिक

सकुचाकर एक- दूसरीकी ओर देखने और मुसकराने लगीं । जलसे बाहर नहीं निकलीं ॥१२ ॥

जब भगवान्ने हँसी- हँसीमें यह बात कही तब उनके विनोदसे कुमारियोंका चित्त और भी उनकी ओर खिंच गया । वे ठंढे पानीमें कण्ठतक डूबी हुई थीं और उनका शरीर थर- थर काँप रहा था । उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा - || १३ || ' प्यारे श्रीकृष्ण! तुम ऐसी अनीति मत करो । हम जानती हैं कि तुम नन्दबाबाके लाड़ले लाल हो । हमारे प्यारे हो । सारे व्रजवासी तुम्हारी सराहना करते रहते हैं । देखो, हम जाड़ेके मारे ठिठुर रही हैं । तुम हमें हमारे वस्त्र दे दो ॥१४ ॥ प्यारे श्यामसुन्दर! हम तुम्हारी दासी हैं । तुम जो कुछ कहोगे, उसे हम करनेको

तैयार हैं । तुम तो धर्मका मर्म भलीभाँति जानते हो । हमें कष्ट मत दो । हमारे वस्त्र हमें दे दो; नहीं तो हम जाकर नन्दबाबासे कह देंगी ' ॥१५ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - कुमारियो! तुम्हारी मुसकान पवित्रता और प्रेमसे भरी है । देखो, जब तुम अपनेको मेरी दासी स्वीकार करती हो और मेरी आज्ञाका पालन करना चाहती हो तो यहाँ आकर अपने - अपने वस्त्र ले लो ॥१६ ॥ परीक्षित्! वे कुमारियाँ ठंडसे ठिठुर रही

थीं, काँप रही थीं । भगवान्‌की ऐसी बात सुनकर वे अपने दोनों हाथोंसे गुप्त अंगोंको छिपाकर

यमुनाजीसे बाहर निकलीं । उस समय ठंड उन्हें बहुत ही सता रही थी ॥१७ ॥

उनके इस शुद्ध भावसे भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए । उनको अपने पास आयी देखकर उन्होंने गोपियोंके वस्त्र अपने कंधेपर रख लिये और बड़ी प्रसन्नतासे मुसकराते हुए बोले ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 424

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॥१८ ॥ ‘ अरी गोपियो! तुमने जो व्रत लिया था, उसे अच्छी तरह निभाया है — इसमें

सन्देह नहीं । परन्तु इस अवस्थामें वस्त्रहीन होकर तुमने जलमें स्नान किया है, इससे तो जलके अधिष्ठातृदेवता वरुणका तथा यमुनाजीका अपराध हुआ है । अतः अब इस दोषकी शान्तिके लिये तुम अपने हाथ जोड़कर सिरसे लगाओ और उन्हें झुककर प्रणाम करो, तदनन्तर अपने - अपने वस्त्र ले जाओ || १ ९|| भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर उन व्रजकुमारियोंने ऐसा ही समझा कि वास्तवमें वस्त्रहीन होकर स्नान करनेसे हमारे व्रतमें त्रुटि आ गयी । अतः उसकी निर्विघ्न पूर्तिके लिये उन्होंने समस्त कर्मोंके साक्षी श्रीकृष्णको नमस्कार किया । क्योंकि उन्हें नमस्कार करनेसे ही सारी त्रुटियों और अपराधोंका मार्जन हो जाता है ॥२० ॥ जब यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि सब - की - सब कुमारियाँ मेरी

आज्ञाके अनुसार प्रणाम कर रही हैं, तब वे बहुत ही प्रसन्न हुए । उनके हृदयमें करुणा उमड़ आयी और उन्होंने उनके वस्त्र दे दिये || २१ || प्रिय परीक्षित्! श्रीकृष्णने कुमारियोंसे छलभरी बातें कीं, उनका लज्जा - संकोच छुड़ाया, हँसी की और उन्हें कठपुतलियोंके समान नचाया; यहाँतक कि उनके वस्त्र - तक हर लिये । फिर भी वे उनसे रुष्ट नहीं हुईं, उनकी इन चेष्टाओंको दोष नहीं माना, बल्कि अपने प्रियतमके संगसे वे और भी प्रसन्न हुईं ॥२२ ॥ परीक्षित्!

गोपियोंने अपने - अपने वस्त्र पहन लिये । परन्तु श्रीकृष्णने उनके चित्तको इस प्रकार अपने वशमें कर रखा था कि वे वहाँसे एक पग भी न चल सकीं । अपने प्रियतमके समागमके लिये सजकर वे उन्हींकी ओर लजीली चितवनसे निहारती रहीं ॥ २३ ॥

यूयं विवस्त्रा यदपो धृतव्रता व्यगाहतैतत्तदु देवहेलनम् । बद्ध्वांजलिं मूर्ध्यपनुत्तयेंऽहसः कृत्वा नमोऽधो वसनं प्रगृह्यताम् ॥१९ इत्यच्युतेनाभिहिता व्रजाबला मत्वा विवस्त्राप्लवनं व्रतच्युतिम् । तत्पूर्तिकामास्तदशेषकर्मणां साक्षात्कृतं नेमुरवद्यमृग् यतः ॥२०

तास्तथावनता दृष्ट्वा भगवान् देवकीसुतः ।

वासांसि ताभ्यः प्रायच्छत् करुणस्तेन तोषितः ॥२१

दृढं प्रलब्धास्त्रपया च हापिताः प्रस्तोभिताः क्रीडनवच्च कारिताः । वस्त्राणि चैवापहृतान्यथाप्यमुं ता नाभ्यसूयन् प्रियसंगनिर्वृताः ॥२२ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 425

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परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसंगमसज्जिताः ।

गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिँल्लज्जायितेक्षणाः ॥२३

तासां विज्ञाय भगवान् स्वपादस्पर्शकाम्यया ।

धृतव्रतानां संकल्पमाह दामोदरोऽबलाः ॥२४

भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि उन कुमारियोंने उनके चरणकमलोंके स्पर्शकी कामनासे ही व्रत धारण किया है और उनके जीवनका यही एकमात्र संकल्प है । तब गोपियोंके प्रेमके अधीन होकर ऊखल- तकमें बँध जानेवाले भगवान्ने उनसे कहा- || २४ || ' मेरी परम प्रेयसी कुमारियो! मैं तुम्हारा यह संकल्प जानता हूँ कि तुम मेरी पूजा करना चाहती हो । मैं तुम्हारी इस अभिलाषाका अनुमोदन करता हूँ, तुम्हारा यह संकल्प सत्य होगा । तुम मेरी पूजा कर सकोगी ॥२५ ॥ जिन्होंने अपना मन और प्राण मुझे समर्पित कर रखा है उनकी कामनाएँ

उन्हें सांसारिक भोगोंकी ओर ले जानेमें समर्थ नहीं होतीं । ठीक वैसे ही, जैसे भुने या उबाले हुए बीज फिर अंकुरके रूपमें उगनेके योग्य नहीं रह जाते ॥२६ ॥

संकल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम् ।

मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥२५

न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते ।

भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ २६

याताबला व्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथ क्षपाः ।

यदुद्दिश्य व्रतमिदं चेरुरार्यार्चनं सतीः ॥२७

श्रीशुक उवाच

इत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः ।

ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजं कृच्छ्रान्निर्विविशुर्व्रजम् ॥२८

इसलिये कुमारियो! अब तुम अपने - अपने घर लौट जाओ । तुम्हारी साधना सिद्ध हो गयी है । तुम आनेवाली शरद् ऋतुकी रात्रियोंमें मेरे साथ विहार करोगी । सतियो! इसी उद्देश्यसे तो तुमलोगोंने यह व्रत और कात्यायनी देवीकी पूजा की थी ' * ॥२७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! भगवान्‌की यह आज्ञा पाकर वे कुमारियाँ भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई जानेकी इच्छा न होनेपर भी बड़े कष्टसे व्रजमें गयीं । अब उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं ॥२८ ॥

अथ गोपैः परिवृतो भगवान् देवकीसुतः ।

वृन्दावनाद् गतो दूरं चारयन् गाः सहाग्रजः ॥२९

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पृष्ठ 426

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निदाघार्कातपे तिग्मे छायाभिः स्वाभिरात्मनः ।

आतपत्रायितान् वीक्ष्य द्रुमानाह व्रजौकसः ॥३०

हे स्तोककृष्ण हे अंशो श्रीदामन् सुबलार्जुन ।

विशालर्षभ तेजस्विन् देवप्रस्थ वरूथप ॥३१

पश्यतैतान् महाभागान् परार्थैकान्तजीवितान् ।

वातवर्षातपहिमान् सहन्तो वारयन्ति नः ॥३२

अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम् ।

सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ ३३

पत्रपुष्पफलच्छायामूलवल्कलदारुभिः ।

गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्मैः कामान् वितन्वते ॥३४

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।

प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा ॥ ३५

इति प्रवालस्तबकफलपुष्पदलोत्करैः ।

तरूणां नम्रशाखानां मध्येन यमुनां गतः ॥ ३६

प्रिय परीक्षित्! एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावनसे बहुत दूर निकल गये ॥२९ ॥

ग्रीष्म ऋतु थी । सूर्यकी किरणें बहुत ही प्रखर हो रही थीं । परन्तु घने घने वृक्ष भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर छत्तेका काम कर रहे थे । भगवान् श्रीकृष्णने वृक्षोंको छाया करते देख स्तोककृष्ण, अंशु, श्रीदामा, सुबल, अर्जुन, विशाल, ऋषभ, तेजस्वी, देवप्रस्थ और वरूथप आदि ग्वालबालोंको सम्बोधन करके कहा— ॥३०-३१ ॥ ‘ मेरे प्यारे मित्रो! देखो, ये वृक्ष कितने भाग्यवान् हैं! इनका सारा जीवन केवल दूसरोंकी भलाई करनेके लिये ही है । ये स्वयं तो हवाके झोंके, वर्षा, धूप और पाला - सब कुछ सहते हैं, परन्तु हम लोगोंकी उनसे रक्षा करते हैं ॥३२ ॥

मैं कहता हूँ कि इन्हींका जीवन सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि इनके द्वारा सब प्राणियोंको सहारा मिलता है, उनका जीवन -निर्वाह होता है । जैसे किसी सज्जन पुरुषके घरसे कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता, वैसे ही इन वृक्षोंसे भी सभीको कुछ-न-कुछ मिल ही जाता है ॥३३ ॥

ये अपने पत्ते, फूल, फल, छाया, जड़, छाल, लकड़ी, गन्ध, गोंद, राख, कोयला, अंकुर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 427

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और कोंपलोंसे भी लोगोंकी कामना पूर्ण करते हैं ॥३४ ॥

मेरे प्यारे मित्रो! संसारमें प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवनकी सफलता इतनेमें ही है कि जहाँतक हो सके अपने धनसे, विवेक - विचारसे, वाणीसे और प्राणोंसे भी ऐसे ही कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरोंकी भलाई हो ॥ ३५ ॥

परीक्षित्! दोनों ओरके वृक्ष नयी - नयी कोंपलों, गुच्छों, फल- फूलों और पत्तोंसे लद रहे थे । उनकी डालियाँ पृथ्वीतक झुकी हुई थीं । इस प्रकार भाषण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उन्हींके बीचसे यमुना - तटपर निकल आये ॥ ३६ ॥

तत्र गाः पाययित्वापः सुमृष्टाः शीतलाः शिवाः ।

ततो नृप स्वयं गोपाः कामं स्वादु पपुर्जलम् ॥ ३७

तस्या उपवने कामं चारयन्तः पशून् नृप ।

कृष्णरामावुपागम्य क्षुधार्ता इदमब्रुवन् ॥३८

राजन्! यमुनाजीका जल बड़ा ही मधुर, शीतल और स्वच्छ था । उन लोगोंने पहले गौओंको पिलाया और इसके बाद स्वयं भी जी भरकर स्वादु जलका पान किया ॥ ३७ ॥

परीक्षित्! जिस समय वे यमुनाजीके तटपर हरे- भरे उपवनमें बड़ी स्वतन्त्रतासे अपनी गौएँ चरा रहे थे, उसी समय कुछ भूखे ग्वालोंने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके पास आकर यह बात कही- || ३८ || इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे गोपीवस्त्रापहारो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

१. वृन्दावनक्रीडायामेक० । * चीर - हरणके प्रसंगको लेकर कई तरहकी शंकाएँ की जाती हैं, अतएव इस सम्बन्धमें कुछ विचार करना आवश्यक है । वास्तवमें बात यह है कि सच्चिदानन्दघन भगवान्की दिव्य मधुर रसमयी लीलाओंका रहस्य जाननेका सौभाग्य बहुत थोड़े लोगोंको होता है । जिस प्रकार भगवान् चिन्मय हैं, उसी प्रकार उनकी लीला भी चिन्मयी ही होती है । सच्चिदानन्द रसमय-साम्राज्यके जिस परमोन्नत स्तरमें यह लीला हुआ करती है उसकी ऐसी विलक्षणता है कि कई बार तो ज्ञान - विज्ञान- स्वरूप विशुद्ध चेतन परम ब्रह्ममें भी उसका प्राकट्य नहीं होता, और इसीलिये ब्रह्म - साक्षात्कारको प्राप्त महात्मा लोग भी इस लीला - रसका समास्वादन नहीं कर पाते । भगवान्की इस परमोज्जवल दिव्य रस- लीलाका यथार्थ प्रकाश तो भगवान्की स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्ति नित्यनिकुंजेश्वरी श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीराधाजी और तदंगभूता ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 428

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प्रेममयी गोपियोंके ही हृदयमें होता है और वे ही निरावरण होकर भगवान्‌की इस परम अन्तरंग रसमयी लीलाका समास्वादन करती हैं । यों तो भगवान्के जन्म- कर्मकी सभी लीलाएँ दिव्य होती हैं, परन्तु व्रजकी लीला, व्रजमें निकुंजलीला और निकुंजमें भी केवल रसमयी गोपियोंके साथ होनेवाली मधुर लीला तो दिव्यातिदिव्य और सर्वगुह्यतम है । यह लीला सर्वसाधारणके सम्मुख प्रकट नहीं है, अन्तरंग लीला है और इसमें प्रवेशका अधिकार केवल श्रीगोपीजनोंको ही है । अस्तु, दशम स्कन्धके इक्कीसवें अध्यायमें ऐसा वर्णन आया है कि भगवान्की रूप-माधुरी, वंशीध्वनि और प्रेममयी लीलाएँ देख- सुनकर गोपियाँ मुग्ध हो गयीं । बाईसवें अध्यायमें उसी प्रेमकी पूर्णता प्राप्त करनेके लिये वे साधनमें लग गयी हैं । इसी अध्यायमें भगवान्‌ने आकर उनकी साधना पूर्ण की है । यही चीर- हरणका प्रसंग है । गोपियाँ क्या चाहती थीं, यह बात उनकी साधनासे स्पष्ट है । वे चाहती थीं— श्रीकृष्णके प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, श्रीकृष्णके साथ इस प्रकार घुल-मिल जाना कि उनका रोम- रोम, मन-प्राण, सम्पूर्ण आत्मा केवल श्रीकृष्णमय हो जाय । शरत्-कालमें उन्होंने श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिकी चर्चा आपसमें की थी, हेमन्तके पहले ही महीनेमें अर्थात् भगवान्के विभूतिस्वरूप मार्गशीर्षमें उनकी साधना प्रारम्भ हो गयी । विलम्ब उनके लिये असह्य था । जाड़ेके दिनमें वे प्रातःकाल ही यमुना- स्नानके लिये जातीं, उन्हें शरीरकी परवा नहीं थी । बहुत- सी कुमारी ग्वालिनें एक साथ ही जातीं, उनमें ईर्ष्या -द्वेष नहीं था । वे ऊँचे स्वरसे श्रीकृष्णका नामकीर्तन करती हुई जातीं, उन्हें गाँव और जातिवालोंका भय नहीं था । वे घरमें भी हविष्यान्नका ही भोजन करतीं, वे श्रीकृष्णके लिये इतनी व्याकुल हो गयी थीं कि उन्हें माता--पिता तकका संकोच नहीं था । वे विधिपूर्वक देवीकी बालुकामयी मूर्ति बनाकर पूजा और मन्त्र-जप करती थीं । अपने इस कार्यको सर्वथा उचित और प्रशस्त मानती थीं । एक वाक्यमें — उन्होंने अपना कुल, परिवार, धर्म, संकोच और व्यक्तित्व भगवान्के चरणोंमें सर्वथा समर्पण कर दिया था । वे यही जपती रहती थीं कि एकमात्र नन्दनन्दन ही हमारे प्राणोंके स्वामी हों । श्रीकृष्ण तो वस्तुतः उनके स्वामी थे ही । परन्तु लीलाकी दृष्टिसे उनके समर्पणमें थोड़ी कमी थी । वे निरावरणरूपसे श्रीकृष्णके सामने नहीं जा रही थीं, उनमें थोड़ी झिझक थी; उनकी यही झिझक दूर करनेके लिये – उनकी साधना, उनका समर्पण पूर्ण करनेके लिये उनका आवरण भंग कर देनेकी आवश्यकता थी, उनका यह आवरणरूप चीर हर लेना जरूरी था और यही काम भगवान् श्रीकृष्णने किया । इसीके लिये वे योगेश्वरोंके ईश्वर भगवान् अपने मित्र ग्वालबालोंके साथ यमुनातटपर पधारे थे । साधक अपनी शक्तिसे, अपने बल और संकल्पसे केवल अपने निश्चयसे पूर्ण समर्पण नहीं कर सकता । समर्पण भी एक क्रिया है और उसका करनेवाला असमर्पित ही रह जाता है । ऐसी स्थितिमें अन्तरात्माका पूर्ण समर्पण तब होता है जब भगवान् स्वयं आकर वह संकल्प स्वीकार करते हैं और संकल्प करनेवालेको भी स्वीकार करते हैं । यहीं जाकर समर्पण पूर्ण होता है । साधकका कर्तव्य है— पूर्ण समर्पणकी तैयारी । उसे पूर्ण तो भगवान् ही करते ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 429

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 429 का मूल पृष्ठ
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भगवान् श्रीकृष्ण यों तो लीलापुरुषोत्तम हैं; फिर भी जब अपनी लीला प्रकट करते हैं, तब मर्यादाका उल्लघंन नहीं करते, स्थापना ही करते हैं । विधिका अतिक्रमण करके कोई साधनाके मार्गमें अग्रसर नहीं हो सकता । परन्तु हृदयकी निष्कपटता, सचाई और सच्चा प्रेम विधिके अतिक्रमणको भी शिथिल कर देता है । गोपियाँ श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके लिये जो साधना कर रही थीं, उसमें एक त्रुटि थी । वे शास्त्र - मर्यादा और परम्परागत सनातन मर्यादाका उल्लंघन करके नग्न- स्नान करती थीं । यद्यपि उनकी यह क्रिया अज्ञानपूर्वक ही थी, तथापि भगवान्के द्वारा इसका मार्जन होना आवश्यक था। भगवान्ने गोपियोंसे इसका प्रायश्चित्त भी करवाया । जो लोग भगवान्‌के प्रेमके नामपर विधिका उल्लंघन करते हैं, उन्हें यह प्रसंग ध्यानसे पढ़ना चाहिये और भगवान् शास्त्रविधिका कितना आदर करते हैं, यह देखना चाहिये । वैधी भक्तिका पर्यवसान रागात्मिका भक्तिमें है और रागात्मिका भक्ति पूर्ण समर्पणके रूपमें परिणत हो जाती है । गोपियोंने वैधी भक्तिका अनुष्ठान किया, उनका हृदय तो रागात्मिकाभक्तिसे भरा हुआ था ही । अब पूर्ण समर्पण होना चाहिये । चीर- हरणके द्वारा वही कार्य सम्पन्न होता है । गोपियोंने जिनके लिये लोक - परलोक, स्वार्थ- परमार्थ, जाति- कुल, पुरजन- परिजन और गुरुजनोंकी परवा नहीं की, जिनकी प्राप्तिके लिये ही उनका यह महान अनुष्ठान है, जिनके चरणोंमें उन्होंने अपना सर्वस्व निछावर कर रखा है, जिनसे निरावरण मिलनकी ही एकमात्र अभिलाषा है, उन्हीं निरावरण रसमय भगवान् श्रीकृष्णके सामने वे निरावरण भावसे न जा सकें — क्या यह उनकी साधनाकी अपूर्णता नहीं है? है, अवश्य है। और यह समझकर ही गोपियाँ निरावरणरूपसे उनके सामने गयीं । श्रीकृष्ण चराचर प्रकृतिके एकमात्र अधीश्वर हैं; समस्त क्रियाओंके कर्ता, भोक्ता और साक्षी भी वही हैं । ऐसा एक भी व्यक्त या अव्यक्त पदार्थ नहीं है जो बिना किसी परदेके उनके सामने न हो । वही सर्वव्यापक, अन्तर्यामी हैं । गोपियोंके, गोपोंके और निखिल विश्वके वही आत्मा हैं । उन्हें स्वामी, गुरु, पिता, माता, सखा, पति आदिके रूपमें मानकर लोग उन्हींकी उपासना करते हैं । गोपियाँ उन्हीं भगवान्‌को जान- बूझकर कि यही भगवान् हैं - यही योगेश्वरेश्वर, क्षराक्षरातीत पुरुषोत्तम हैं- पतिके रूपमें प्राप्त करना चाहती थीं । श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धका श्रद्धाभावसे पाठ कर जानेपर यह बात बहुत ही स्पष्ट हो जाती है कि गोपियाँ श्रीकृष्णके वास्तविक स्वरूपको जानती थीं, पहचानती थीं । वेणुगीत, गोपीगीत, युगलगीत और श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर गोपियोंके अन्वेषणमें यह बात कोई भी देख- सुन - समझ सकता है। जो लोग भगवान्‌को भगवान् मानते हैं, उनसे सम्बन्ध रखते हैं, स्वामी - सुहृद् आदिके रूपमें उन्हें मानते हैं, उनके हृदयमें गोपियोंके इस लोकोत्तर माधुर्यसम्बन्ध और उसकी साधनाके प्रति शंका ही कैसे हो सकती है । गोपियोंकी इस दिव्य लीलाका जीवन उच्च श्रेणीके साधकके लिये आदर्श जीवन है । श्रीकृष्ण जीवके एकमात्र प्राप्तव्य साक्षात् परमात्मा हैं । हमारी बुद्धि हमारी दृष्टि देहतक ही सीमित है। इसलिये हम श्रीकृष्ण और गोपियोंके प्रेमको भी केवल दैहिक तथा कामनाकलुषित समझ बैठते हैं । उस अपार्थिव और अप्राकृत लीलाको इस प्रकृतिके राज्यमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 430

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 430 का मूल पृष्ठ
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घसीट लाना हमारी स्थूल वासनाओंका हानिकर परिणाम है । जीवका मन भोगाभिमुख वासनाओंसे और तमोगुणी प्रवृत्तियोंसे अभिभूत रहता है । वह विषयोंमें ही इधरसे - उधर भटकता रहता है और अनेकों प्रकारके रोग- शोकसे आक्रान्त रहता है । जब कभी पुण्यकर्मोंके फल उदय होनेपर भगवान्की अचिन्त्य अहैतुकी कृपासे विचारका उदय होता है, तब जीव दुःखज्वालासे त्राण पानेके लिये और अपने प्राणोंको शान्तिमय धाममें पहुँचानेके लिये उत्सुक हो उठता है । वह भगवान्‌के लीलाधामोंकी यात्रा करता है, सत्संग प्राप्त करता है और उसके हृदयकी छटपटी उस आकांक्षाको लेकर, जो अबतक सुप्त थी, जगकर बड़े वेगसे परमात्माकी ओर चल पड़ती है । चिरकालसे विषयोंका ही अभ्यास होनेके कारण बीच- बीचमें विषयोंके संस्कार उसे सताते हैं और बार-बार विक्षेपोंका सामना करना पड़ता है । परन्तु भगवान्की प्रार्थना, कीर्तन - स्मरण, चिन्तन करते - करते चित्त सरस होने लगता है और धीरे- धीरे उसे भगवान्की सन्निधिका अनुभव भी होने लगता है । थोड़ा- सा रसका अनुभव होते ही चित्त बड़े वेगसे अन्तर्देशमें प्रवेश कर जाता है और भगवान् मार्गदर्शकके रूपमें संसार-सागरसे पार ले जानेवाली नावपर केवटके रूपमें अथवा यों कहें कि साक्षात् चित्स्वरूप गुरुदेवके रूपमें प्रकट हो जाते हैं । ठीक उसी क्षण अभाव, अपूर्णता और सीमाका बन्धन नष्ट हो जाता है, विशुद्ध आनन्द - विशुद्ध ज्ञानकी अनुभूति होने लगती है । गोपियाँ, जो अभी - अभी साधनसिद्ध होकर भगवान्‌की अन्तरंग लीलामें प्रविष्ट होनेवाली हैं, चिरकालसे श्रीकृष्णके प्राणोंमें अपने प्राण मिला देनेके लिये उत्कण्ठित हैं, सिद्धिलाभके समीप पहुँच चुकी हैं । अथवा जो नित्यसिद्धा होनेपर भी भगवान्‌की इच्छाके अनुसार उनकी दिव्य लीलामें सहयोग प्रदान कर रही हैं, उनके हृदयके समस्त भावोंके एकान्त ज्ञाता श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाकर उन्हें आकृष्ट करते हैं और जो कुछ उनके हृदयमें बचे- खुचे पुराने संस्कार हैं, मानो उन्हें धो डालनेके लिये साधनामें लगाते हैं । उनकी कितनी दया है, वे अपने प्रेमियोंसे कितना प्रेम करते हैं— यह सोचकर चित्त मुग्ध हो जाता है, गद्गद हो जाता है । श्रीकृष्ण गोपियोंके वस्त्रोंके रूपमें उनके समस्त संस्कारोंके आवरण अपने हाथमें लेकर पास ही कदम्बके वृक्षपर चढ़कर बैठ गये । गोपियाँ जलमें थीं, वे जलमें सर्वव्यापक सर्वदर्शी भगवान् श्रीकृष्णसे मानो अपनेको गुप्त समझ रही थीं- वे मानो इस तत्त्वको भूल गयी थीं कि श्रीकृष्ण जलमें ही नहीं हैं, स्वयं जलस्वरूप भी वही हैं । उनके पुराने संस्कार श्रीकृष्णके सम्मुख जानेमें बाधक हो रहे थे; वे श्रीकृष्णके लिये सब कुछ भूल गयी थीं, परन्तु अबतक अपनेको नहीं भूली थीं । वे चाहती थीं केवल श्रीकृष्णको, परन्तु उनके संस्कार बीचमें एक परदा रखना चाहते थे । प्रेम प्रेमी और प्रियतमके बीचमें एक पुष्पका भी परदा नहीं रखना चाहता । प्रेमकी प्रकृति है सर्वथा व्यवधानरहित, अबाध और अनन्त मिलन। जहाँतक अपना सर्वस्व — इसका विस्तार चाहे जितना हो - प्रेमकी ज्वालामें भस्म नहीं कर दिया जाता, वहाँतक प्रेम और समर्पण दोनों ही अपूर्ण रहते हैं । इसी अपूर्णताको दूर करते हुए, ' शुद्ध भावसे प्रसन्न हुए' ( शुद्धभावप्रसादितः ) श्रीकृष्णने कहा कि ' मुझसे अनन्य प्रेम करनेवाली गोपियो! एक बार, केवल एक बार अपने सर्वस्वको और अपनेको भी भूलकर मेरे पास आओ तो सही । तुम्हारे हृदयमें जो अव्यक्त त्याग है, उसे एक क्षणके लिये व्यक्त तो करो । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******