श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 431–440
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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क्या तुम मेरे लिये इतना भी नहीं कर सकती हो? ' गोपियोंने मानो कहा - ' श्रीकृष्ण! हम अपनेको कैसे भूलें? हमारी जन्म -जन्मकी धारणाएँ भूलने दें, तब न । हम संसारके अगाध जलमें आकण्ठमग्न हैं। जाड़ेका कष्ट भी है । हम आना चाहनेपर भी नहीं आ पाती हैं । श्यामसुन्दर! प्राणोंके प्राण! हमारा हृदय तुम्हारे सामने उन्मुक्त है। हम तुम्हारी दासी हैं । तुम्हारी आज्ञाओंका पालन करेंगी । परन्तु हमें निरावरण करके अपने सामने मत बुलाओ । ' साधककी यह दशा — भगवान्को चाहना और साथ ही संसारको भी न छोड़ना, संस्कारोंमें ही उलझे रहना - मायाके परदेको बनाये रखना, बड़ी द्विविधाकी दशा है । भगवान् यही सिखाते हैं कि ' संस्कारशून्य होकर, निरावरण होकर, मायाका परदा हटाकर आओ; मेरे पास आओ । अरे, तुम्हारा यह मोहका परदा तो मैंने ही छीन लिया है; तुम अब इस परदेके मोहमें क्यों पड़ी हो? यह परदा ही तो परमात्मा और जीवके बीचमें बड़ा व्यवधान है; यह हट गया, बड़ा कल्याण हुआ । अब तुम मेरे पास आओ, तभी तुम्हारी चिरसंचित आकांक्षाएँ पूरी हो सकेंगी । ' परमात्मा श्रीकृष्णका यह आह्वान, आत्माके आत्मा परम प्रियतमके मिलनका यह मधुर आमन्त्रण भगवत्कृपासे जिसके अन्तर्देशमें प्रकट हो जाता है, वह प्रेममें निमग्न होकर सब कुछ छोड़कर, छोड़ना भी भूलकर प्रियतम श्रीकृष्णके चरणोंमें दौड़ आता है । फिर न उसे अपने वस्त्रोंकी सुधि रहती है और न लोगोंका ध्यान! न वह जगत्को देखता है न अपनेको । यह भगवत्प्रेमका रहस्य है । विशुद्ध और अनन्य भगवत्प्रेममें ऐसा होता ही है । गोपियाँ आयीं, श्रीकृष्णके चरणोंके पास मूकभावसे खड़ी हो गयीं । उनका मुख लज्जावनत था । यत्किञ्चत् संस्कारशेष श्रीकृष्णके पूर्ण आभिमुख्यमें प्रतिबन्ध हो रहा था । श्रीकृष्ण मुसकराये । उन्होंने इशारेसे कहा - ' इतने बड़े त्यागमें यह संकोच कलंक है । तुम तो सदा निष्कलंका हो; तुम्हें इसका भी त्याग, त्यागके भावका भी त्याग — त्यागकी स्मृतिका भी त्याग करना होगा। ' गोपियोंकी दृष्टि श्रीकृष्णके मुखकमलपर पड़ी । दोनों हाथ अपने - आप जुड़ गये और सूर्यमण्डलमें विराजमान अपने प्रियतम श्रीकृष्णसे ही उन्होंने प्रेमकी भिक्षा माँगी । गोपियोंके इसी सर्वस्व त्यागने, इसी पूर्ण समर्पणने, इसी उच्चतम आत्मविस्मृतिने उन्हें भगवान् श्रीकृष्णके प्रेमसे भर दिया । वे दिव्य रसके अलौकिक अप्राकृत मधुकै अनन्त समुद्रमें डूबने - उतराने लगीं । वे सब कुछ भूल गयीं, भूलनेवालेको भी भूल गयीं, उनकी दृष्टिमें अब श्यामसुन्दर थे । बस, केवल श्यामसुन्दर थे । जब प्रेमी भक्त आत्मविस्मृत हो जाता है तब उसका दायित्व प्रियतम भगवान्पर होता है । अब मर्यादारक्षाके लिये गोपियोंको तो वस्त्रकी आवश्यकता नहीं थी । क्योंकि उन्हें जिस वस्तुकी आवश्यकता थी, वह मिल चुकी थी । परन्तु श्रीकृष्ण अपने प्रेमीको मर्यादाच्युत नहीं होने देते । वे स्वयं वस्त्र देते हैं और अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा उन्हें विस्मृतिसे जगाकर फिर जगत्में लाते हैं । श्रीकृष्णने कहा – ' गोपियो! तुम सती साध्वी हो । तुम्हारा प्रेम और तुम्हारी साधना मुझसे छिपी नहीं है । तुम्हारा संकल्प सत्य होगा । तुम्हारा यह संकल्प– तुम्हारी यह कामना तुम्हें उस पदपर स्थित करती है, जो निस्संकल्पता और निष्कामताका है । तुम्हारा उद्देश्य पूर्ण, तुम्हारा समर्पण पूर्ण और आगे आनेवाली शारदीय रात्रियोंमें हमारा रमण पूर्ण होगा । भगवान्ने साधना सफल होनेकी अवधि निर्धारित कर दी । इससे भी स्पष्ट है कि ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भगवान् श्रीकृष्णमें किसी भी कामविकारकी कल्पना नहीं थी । कामी पुरुषका चित्त वस्त्रहीन स्त्रियोंको देखकर एक क्षणके लिये भी कब वशमें रह सकता है! एक बात बड़ी - विलक्षण है। भगवान्के सम्मुख जानेके पहले जो वस्त्र समर्पणकी पूर्णतामें बाधक हो रहे थे विक्षेपका काम कर रहे थे - वही भगवान्की कृपा, प्रेम, सान्निध्य और वरदान प्राप्त होनेके पश्चात् ' प्रसाद ' -स्वरूप हो गये । इसका कारण क्या है? इसका कारण है भगवान्का सम्बन्ध । भगवान्ने अपने हाथसे उन वस्त्रोंको उठाया था और फिर उन्हें अपने उत्तम अंग कंधेपर रख लिया था । नीचेके शरीरमें पहननेकी साड़ियाँ भगवान्के कंधेपर चढ़कर — उनका संस्पर्श पाकर कितनी अप्राकृत रसात्मक हो गयीं, कितनी पवित्र— कृष्णमय हो गयीं, इसका अनुमान कौन लगा सकता है । असल में यह संसार तभीतक बाधक और विक्षेपजनक है, जबतक यह भगवान् से सम्बन्ध और भगवान्का प्रसाद नहीं हो जाता । उनके द्वारा प्राप्त होनेपर तो यह बन्धन ही मुक्तिस्वरूप हो जाता है । उनके सम्पर्कमें जाकर माया शुद्ध विद्या बन जाती है । संसार और उसके समस्त कर्म अमृतमय आनन्दरससे परिपूर्ण हो जाते हैं । तब बन्धनका भय नहीं रहता । कोई भी आवरण भगवान्के दर्शनसे वञ्चित नहीं रख सकता । नरक नरक नहीं रहता, भगवान्का दर्शन होते रहनेके कारण वह वैकुण्ठ बन जाता है । इसी स्थितिमें पहुँचकर बड़े - बड़े साधक प्राकृत पुरुषके समान आचरण करते हुए-से दीखते हैं । भगवान् श्रीकृष्णकी अपनी होकर गोपियाँ पुनः वे ही वस्त्र धारण करती हैं अथवा श्रीकृष्ण वे ही वस्त्र धारण कराते हैं; परन्तु गोपियोंकी दृष्टिमें अब ये वस्त्र वे वस्त्र नहीं हैं; वस्तुतः वे हैं भी नहीं - अब तो ये दूसरी वस्तु हो गये हैं । अब तो ये भगवान्के पावन प्रसाद हैं, पल - पलपर भगवान्का स्मरण करानेवाले भगवान्के परम सुन्दर प्रतीक हैं । इसीसे उन्होंने स्वीकार भी किया । उनकी प्रेममयी स्थिति मर्यादाके ऊपर थी, फिर भी उन्होंने भगवान्की इच्छासे मर्यादा स्वीकार की । इस दृष्टिसे विचार करनेपर ऐसा जान पड़ता है कि भगवान्की यह चीरहरण- लीला भी अन्य लीलाओंकी भाँति उच्चतम मर्यादासे परिपूर्ण है । भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंके सम्बन्धमें केवल वे ही प्राचीन आर्षग्रन्थ प्रमाण हैं जिनमें उनकी लीलाका वर्णन हुआ है । उनमेंसे एक भी ऐसा ग्रन्थ नहीं है, जिसमें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका वर्णन न हो। श्रीकृष्ण ' स्वयं भगवान् हैं ' यही बात सर्वत्र मिलती है । जो श्रीकृष्णको भगवान् नहीं मानते, यह स्पष्ट है कि वे उन ग्रन्थोंको भी नहीं मानते । और जो उन ग्रन्थोंको ही प्रमाण नहीं मानते, वे उनमें वर्णित लीलाओंके आधारपर श्रीकृष्ण चरित्रकी समीक्षा करनेका अधिकार भी नहीं रखते । भगवान्की लीलाओंको मानवीय चरित्रके समकक्ष रखना शास्त्र- दृष्टिसे एक महान् अपराध है और उसके अनुकरणका तो सर्वथा ही निषेध है । मानवबुद्धि - जो स्थूलताओंसे ही परिवेष्टित है - केवल जडके सम्बन्धमें ही सोच सकती है, भगवान्की दिव्य चिन्मयी लीलाके सम्बन्धमें कोई कल्पना ही नहीं कर सकती । वह बुद्धि स्वयं ही अपना उपहास करती है, जो समस्त बुद्धियोंके प्रेरक और बुद्धियोंसे अत्यन्त परे रहनेवाले परमात्माकी दिव्य लीलाको अपनी कसौटीपर कसती है । हृदय और बुद्धिके सर्वथा विपरीत होनेपर भी यदि थोड़ी देरके लिये मान लें कि श्रीकृष्ण भगवान् नहीं थे या उनकी यह लीला मानवी थी तो भी तर्क और युक्तिके सामने ऐसी कोई ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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बात नहीं टिक पाती जो श्रीकृष्णके चरित्रमें लाञ्छन हो । श्रीमद्भागवतका पारायण करनेवाले जानते हैं कि व्रजमें श्रीकृष्णने केवल ग्यारह वर्षकी अवस्थातक ही निवास किया था । यदि रासलीलाका समय दसवाँ वर्ष मानें तो नवें वर्षमें ही चीरहरण लीला हुई थी । इस बातकी कल्पना भी नहीं हो सकती कि आठ -नौ वर्षके बालकमें कामोत्तेजना हो सकती है । गाँवकी गँवारिन ग्वालिनें, जहाँ वर्तमानकालकी नागरिक मनोवृत्ति नहीं पहुँच पायी है, एक आठ - नौ वर्षके बालकसे अवैध सम्बन्ध करना चाहें और उसके लिये साधना करें — यह कदापि सम्भव नहीं दीखता। उन कुमारी गोपियोंके मनमें कलुषित वृत्ति थी, यह वर्तमान कलुषित मनोवृत्तिकी उट्टङ्कना है । आजकल जैसे गाँवकी छोटी- छोटी लड़कियाँ ' राम' - सा वर और ‘ लक्ष्मण’ - सा देवर पानेके लिये देवी - देवताओंकी पूजा करती हैं, वैसे ही उन कुमारियोंने भी परम सुन्दर, परम मधुर श्रीकृष्णको पानेके लिये देवी - पूजन और व्रत किये थे । इसमें दोषकी कौन - सी बात है? आजकी बात निराली है । भोगप्रधान देशोंमें तो नग्नसम्प्रदाय और नग्नस्नानके क्लब भी बने हुए हैं! उनकी दृष्टि इन्द्रिय- तृप्तितक ही सीमित है। भारतीय मनोवृत्ति इस उत्तेजक एवं मलिन व्यापारके विरुद्ध है । नग्नस्नान एक दोष है, जो कि पशुत्वको बढ़ानेवाला है । शास्त्रोंमें इसका निषेध है, ‘ न नग्नः स्नायात्' –यह शास्त्रकी आज्ञा है । श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे कि गोपियाँ शास्त्रके विरुद्ध आचरण करें। केवल लौकिक अनर्थ ही नहीं — भारतीय ऋषियोंका वह सिद्धान्त, जो प्रत्येक वस्तुमें पृथक् - पृथक् देवताओंका अस्तित्व मानता है, इस नग्नस्नानको देवताओंके विपरीत बतलाता है । श्रीकृष्ण जानते थे कि इससे वरुण देवताका अपमान होता है । गोपियाँ अपनी अभीष्ट सिद्धिके लिये जो तपस्या कर रही थीं, उसमें उनका नग्नस्नान अनिष्ट फल देनेवाला था और इस प्रथाके प्रभातमें ही यदि इसका विरोध न कर दिया जाय तो आगे चलकर इसका विस्तार हो सकता है; इसलिये श्रीकृष्णने अलौकिक ढंगसे निषेध कर दिया । गाँवोंकी ग्वालिनोंको इस प्रथाकी बुराई किस प्रकार समझायी जाय, इसके लिये भी श्रीकृष्णने एक मौलिक उपाय सोचा । यदि वे गोपियोंके पास जाकर उन्हें देवतावादकी फिलासफी समझाते तो वे सरलतासे नहीं समझ सकती थीं । उन्हें तो इस प्रथाके कारण होनेवाली विपत्तिका प्रत्यक्ष अनुभव करा देना था । और विपत्तिका अनुभव करानेके पश्चात् उन्होंने देवताओंके अपमानकी बात भी बता दी तथा अंजलि बाँधकर क्षमा- प्रार्थनारूप प्रायश्चित्त भी करवाया । महापुरुषोंमें उनकी बाल्यावस्थामें भी ऐसी प्रतिभा देखी जाती है । श्रीकृष्ण आठ- नौ वर्षके थे, उनमें कामोत्तेजना नहीं हो सकती और नग्नस्नानकी कुप्रथाको नष्ट करनेके लिये उन्होंने चीरहरण किया- यह उत्तर सम्भव होनेपर भी मूलमें आये हुए ‘ काम ' और ' रमण ' शब्दोंसे कई लोग भड़क उठते हैं । यह केवल शब्दकी पकड़ है, जिसपर महात्मालोग ध्यान नहीं देते । श्रुतियोंमें और गीतामें भी अनेकों बार ' काम ' ' रमण ' और ‘ रति' आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है; परन्तु वहाँ उनका अश्लील अर्थ नहीं होता । गीतामें तो ‘ धर्माविरुद्ध काम' को परमात्माका स्वरूप बतलाया गया है । महापुरुषोंका आत्मरमण, आत्ममिथुन और आत्मरति प्रसिद्ध ही है । ऐसी स्थितिमें केवल कुछ शब्दोंको देखकर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भड़कना विचारशील पुरुषोंका काम नहीं है । जो श्रीकृष्णको केवल मनुष्य समझते हैं उन्हें रमण और रति शब्दका अर्थ केवल क्रीडा अथवा खिलवाड़ समझना चाहिये, जैसा कि व्याकरणके अनुसार ठीक है— ' रमु क्रीडायाम्' । दृष्टिभेदसे श्रीकृष्णकी लीला भिन्न- भिन्न रूपमें दीख पड़ती है । अध्यात्मवादी श्रीकृष्णको आत्माके रूपमें देखते हैं और गोपियोंको वृत्तियोंके रूपमें । वृत्तियोंका आवरण नष्ट हो जाना ही ‘ चीरहरण- लीला ' है और उनका आत्मामें रम जाना ही ' रास ' है । इस दृष्टिसे भी समस्त लीलाओंकी संगति बैठ जाती है । भक्तोंकी दृष्टिसे गोलोकाधिपति पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका यह सब नित्यलीला- विलास है और अनादिकालसे अनन्तकालतक यह नित्य चलता रहता है । कभी-कभी भक्तोंपर कृपा करके वे अपने नित्य धाम और नित्य सखा-सहचरियोंके साथ लीला- धाममें प्रकट होकर लीला करते हैं और भक्तोंके स्मरण - चिन्तन तथा आनन्दमंगलकी सामग्री प्रकट करके पुनः अन्तर्धान हो जाते हैं । साधकोंके लिये किस प्रकार कृपा करके भगवान् अन्तर्मलको और अनादिकाल से सञ्चित संस्कारपटको विशुद्ध कर देते यह बात भी इस चीरहरण लीलासे प्रकट होती है । भगवान्की लीला रहस्यमयी है, उसका तत्त्व केवल भगवान् ही जानते हैं और उनकी कृपासे उनकी लीलामें प्रविष्ट भाग्यवान् भक्त कुछ - कुछ जानते हैं । यहाँ तो शास्त्रों और संतोंकी वाणीके आधारपर कुछ लिखनेकी धृष्टता की गयी है । - हनुमानप्रसाद पोद्दार १. स्थिभोगैः । २. सामग्रयं । ३. श्रेयआचरणं सदा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः यज्ञपत्नियोंपर कृपा गोपा ऊचुः
राम राम महावीर्य कृष्ण दृष्टनिवर्हण ।
एषा वै बाधते क्षुन्नस्तच्छान्तिं कर्तुमर्हथः ॥ १
श्रीशुक उवाच
इति विज्ञापितो गोपैर्भगवान् देवकीसुतः ।
भक्ताया विप्रभार्यायाः प्रसीदन्निदमब्रवीत् ॥२
प्रयात देवयजनं ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ।
सत्रमांगिरसं नाम ह्यासते स्वर्गकाम्यया ॥३
तत्र गत्वौदनं गोपा याचतास्मद्विसर्जिताः ।
कीर्तयन्तो भगवत आर्यस्य मम चाभिधाम् ॥४
इत्यादिष्टा भगवता गत्वायाचन्त ते तथा ।
कृतांजलिपुटा विप्रान् दण्डवत् पतिता भुवि ॥५
ग्वालबालोंने कहा – नयनाभिराम बलराम! तुम बड़े पराक्रमी हो । हमारे चित्तचोर श्यामसुन्दर! तुमने बड़े - बड़े दुष्टोंका संहार किया है । उन्हीं दुष्टोंके समान यह भूख भी हमें सता रही है । अतः तुम दोनों इसे भी बुझानेका कोई उपाय करो ॥१ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! जब ग्वालबालोंने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थना की तब उन्होंने मथुराकी अपनी भक्त ब्राह्मणपत्नियोंपर अनुग्रह करनेके लिये यह बात कही - ॥ २ ॥
' मेरे प्यारे मित्रो! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर वेदवादी ब्राह्मण स्वर्गकी कामनासे आंगिरस नामका यज्ञ कर रहे हैं । तुम उनकी यज्ञशालामें जाओ ॥३ ॥ ग्वालबालो! मेरे
लेकरभेजनेसे वहाँ जाकर-सा भाततुमलोग- मेरे बड़े भाई भगवान् श्रीबलरामजीका और मेरा नाम - - ' कुछ थोड़ा स भोजनकी सामग्री माँग लाओ ॥४ ॥ जब भगवान्ने ऐसी आज्ञा दी, तब ग्वालबाल उन ब्राह्मणोंकी यज्ञशालामें गये और उनसे भगवान्की
आज्ञाके अनुसार ही अन्न माँगा। पहले उन्होंने पृथ्वीपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर कहा— ॥ ५ ॥
भूमिदेवाः शृणुत कृष्णस्यादेशकारिणः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्राप्ताञ्जानीत भद्रं वो गोपान् नो रामचोदितान् ॥६ गाश्चारयन्तावविदूर ओदनं रामाच्युतौ वो लषतो बुभुक्षितौ । तयोर्द्विजा ओदनमर्थिनोर्यदि श्रद्धा च वो यच्छत धर्मवित्तमाः ॥७
दीक्षायाः पशुसंस्थायाः सौत्रामण्याश्च सत्तमाः ।
अन्यत्र दीक्षितस्यापि नान्नमश्नन् हि दुष्यति ॥ ८
इति ते भगवद्याच्ञां शृण्वन्तोऽपि न शुश्रुवुः ।
क्षुद्राशा भूरिकर्माणो बालिशा वृद्धमानिनः ॥ ९
देशः कालः पृथग् द्रव्यं मन्त्रतन्त्रर्त्विजोऽग्नयः ।
देवता यजमानश्च क्रतुर्धर्मश्च यन्मयः ॥ १०
तं ब्रह्म परमं साक्षाद् भगवन्तमधोक्षजम् ।
मनुष्यदृष्ट्या दुष्प्रज्ञा मर्त्यात्मानो न मेनिरे ॥११
न ते यदोमिति प्रोचुर्न नेति च परंतप ।
गोपा निराशाः प्रत्येत्य तथोचुः कृष्णरामयोः ॥ १२
तदुपाकर्ण्य भगवान् प्रहस्य जगदीश्वरः ।
व्याजहार पुनर्गोपान् दर्शयँल्लौकिकीं गतिम् ॥१३
‘ पृथ्वीके मूर्तिमान् देवता ब्राह्मणो! आपका कल्याण हो! आपसे निवेदन है कि हम व्रजके ग्वाले हैं । भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी आज्ञासे हम आपके पास आये हैं । आप हमारी बात सुनें ॥ ६ ॥ भगवान् बलराम और श्रीकृष्ण गौएँ चराते हुए यहाँसे थोड़े
ही दूरपर आये हुए हैं। उन्हें इस समय भूख लगी है और वे चाहते हैं कि आपलोग उन्हें थोड़ा - सा भात दे दें । ब्राह्मणो! आप धर्मका मर्म जानते हैं । यदि आपकी श्रद्धा हो, तो उन भोजनार्थियोंके लिये कुछ भात दे दीजिये ॥७॥ सज्जनो! जिस यज्ञदीक्षामें
पशुबलि होती है, उसमें और सौत्रामणी यज्ञमें दीक्षित पुरुषका अन्न नहीं खाना चाहिये । इनके अतिरिक्त और किसी भी समय किसी भी यज्ञमें दीक्षित पुरुषका भी अन्न खानेमें कोई दोष नहीं है ॥८ ॥ परीक्षित्! इस प्रकार भगवान्के अन्न माँगनेकी बात सुनकर भी
उन ब्राह्मणोंने उसपर कोई ध्यान नहीं दिया । वे चाहते थे स्वर्गादि तुच्छ फल और उनके लिये बड़े - बड़े कर्मोंमें उलझे हुए थे । सच पूछो तो वे ब्राह्मण ज्ञानकी दृष्टिसे थे बालक ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ही, परन्तु अपनेको बड़ा ज्ञानवृद्ध मानते थे ॥९ ॥ परीक्षित्! देश, काल अनेक
प्रकारकी सामग्रियाँ, भिन्न- भिन्न कर्मोंमें विनियुक्त मच, अनुष्ठानकी पद्धति, ऋत्विज्- - ब्रह्मा आदि यज्ञ करानेवाले, अग्नि, देवता, यजमान, यज्ञ और धर्म–इन सब रूपोंमें एकामत्र भगवान् ही प्रकट हो रहे हैं ॥१० ॥ वे ही इन्द्रियातीत परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण
स्वयं ग्वालबालोंके द्वारा भात माँग रहे हैं । परन्तु इन मूर्खोने, जो अपनेको शरीर ही माने बैठे हैं, भगवान्को भी एक साधारण मनुष्य ही माना और उनका सम्मान नहीं किया ॥११ ॥ परीक्षित्! जब उन ब्राह्मणोंने ' हाँ' या 'ना' –कुछ नहीं कहा, तब
ग्वालबालोंकी आशा टूट गयी; वे लौट आये और वहाँकी सब बात उन्होंने श्रीकृष्ण तथा बलरामसे कह दी ॥१२ ॥ उनकी बात सुनकर सारे जगत्के स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण
हँसने लगे । उन्होंने ग्वालबालोंको समझाया कि ' संसारमें असफलता तो बार - बार होती ही है, उससे निराश नहीं होना चाहिये; बार- बार प्रयत्न करते रहनेसे सफलता मिल ही जाती है । ' फिर उनसे कहा— ॥१३ ॥
मां ज्ञापयत पत्नीभ्यः ससंकर्षणमागतम् ।
दास्यन्ति काममन्नं वः स्निग्धा मय्युषिता धिया ॥१४
गत्वाथ पत्नीशालायां दृष्ट्वाऽऽसीनाः स्वलंकृताः ।
नत्वा द्विजसतीर्गोपाः प्रश्रिता इदमब्रुवन् ॥१५
नमो वो विप्रपत्नीभ्यो निबोधत वचांसि नः ।
इतोऽविदूरे चरता कृष्णेनेहेषिता वयम् ॥१६
गाश्चारयन् सगोपालैः सरामो दूरमागतः ।
बुभुक्षितस्य तस्यान्नं सानुगस्य प्रदीयताम् ॥१७
श्रुत्वाच्युतमुपायातं नित्यं तद्दर्शनोत्सुकाः ।
तत्कथाक्षिप्तमनसो बभूवुर्जातसम्भ्रमाः ॥१८
चतुर्विधं बहुगुणमन्नमादाय भाजनैः ।
अभिसस्रुः प्रियं सर्वाः समुद्रमिव निम्नगाः ॥ १ ९
निषिध्यमानाः पतिभिर्भ्रातृभिर्बन्धुभिः सुतैः ।
भगवत्युत्तमश्लोके दीर्घश्रुतधृताशयाः ॥ २०
यमुनोपवनेऽशोकनवपल्लवमण्डिते । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विचरन्तं वृतं गोपैः साग्रजं ददृशुः स्त्रियः ॥२१ ‘ मेरे प्यारे ग्वालबालो! इस बार तुमलोग उनकी पत्नियोंके पास जाओ और उनसे
कहो कि राम और श्याम यहाँ आये हैं । तुम जितना चाहोगे उतना भोजन वे तुम्हें देंगी ।
वे मुझसे बड़ा प्रेम करती हैं । उनका मन सदा- सर्वदा मुझमें लगा रहता है ' ॥१४ ॥
अबकी बार ग्वालबाल पत्नीशालामें गये । वहाँ जाकर देखा तो ब्राह्मणोंकी पत्नियाँ सुन्दर- सुन्दर वस्त्र और गहनोंसे सज- धजकर बैठी हैं । उन्होंने द्विजपत्नियोंको प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यह बात कही- ॥१५ ॥ ' आप विप्रपत्नियोंको हम नमस्कार
करते हैं । आप कृपा करके हमारी बात सुनें । भगवान् श्रीकृष्ण यहाँसे थोड़ी ही दूरपर आये हुए हैं और उन्होंने ही हमें आपके पास भेजा है ॥१६ ॥ वे ग्वालबाल और
बलरामजीके साथ गौएँ चराते हुए इधर बहुत दूर आ गये हैं । इस समय उन्हें और उनके
साथियोंको भूख लगी है । आप उनके लिये कुछ भोजन दे दें ' ॥१७ ॥
परीक्षित्! वे ब्राह्मणियाँ बहुत दिनोंसे भगवान्की मनोहर लीलाएँ सुनती थीं । उनका मन उनमें लग चुका था । वे सदा - सर्वदा इस बात के लिये उत्सुक रहतीं कि किसी प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन हो जायँ। श्रीकृष्णके आनेकी बात सुनते ही वे उतावली हो गयीं ॥१८ ॥ उन्होंने बर्तनोंमें अत्यन्त स्वादिष्ट और हितकर भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और
चोष्य — चारों प्रकारकी भोजन-सामग्री ले ली तथा भाई- बन्धु, पति- पुत्रोंके रोकते रहनेपर भी अपने प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णके पास जानेके लिये घरसे निकल पड़ीं— ठीक वैसे ही, जैसे नदियाँ समुद्रके लिये । क्यों न हो; न जाने कितने दिनोंसे पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके गुण, लीला, सौन्दर्य और माधुर्य आदिका वर्णन सुन- सुनकर उन्होंने उनके चरणोंपर अपना हृदय निछावर कर दिया था ॥ १ ९ -२० ॥ ब्राह्मणपत्नियोंने जाकर देखा कि यमुनाके तटपर नये- नये कोंपलोंसे शोभायमान अशोक-वनमें ग्वालबालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ श्रीकृष्ण इधर- उधर घूम रहे हैं ॥२१ ॥
श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह- धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे । विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम् ॥ २२ प्रायः श्रुतप्रियतमोदयकर्णपूरै- र्यस्मिन् निमग्नमनसस्तमथाक्षिरन्धैः । अन्तः प्रवेश्य सुचिरं परिरभ्य तापं प्राज्ञं यथाभिमतयो विजहुर्नरेन्द्र ॥ २३ तास्तथा त्यक्तसर्वाशाः प्राप्ता आत्मदिदृक्षया । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विज्ञायाखिलदृग्द्रष्टा प्राह प्रहसिताननः ॥२४
स्वागतं” वो महाभागा आस्यतां करवाम किम् ।
यन्नो दिदृक्षया प्राप्ता उपपन्नमिदं हि वः ॥२५
उनके साँवले शरीरपर सुनहला पीताम्बर झिलमिला रहा है। गलेमें वनमाला लटक रही है । मस्तकपर मोरपंखका मुकुट है । अंग- अंग में रंगीन धातुओंसे चित्रकारी कर रखी है । नये - नये कोंपलोंके गुच्छे शरीरमें लगाकर नटका-सा वेष बना रखा है । एक हाथ अपने सखा ग्वाल - बालके कंधेपर रखे हुए हैं और दूसरे हाथसे कमलका फूल नचा रहे हैं । कानोंमें कमलके कुण्डल हैं, कपोलोंपर घुँघराली अलकें लटक रही हैं और मुखकमल मन्द -मन्द मुसकानकी रेखासे प्रफुल्लित हो रहा है ॥२२ ॥ परीक्षित्!
अबतक अपने प्रियतम श्यामसुन्दरके गुण और लीलाएँ अपने कानोंसे सुन- सुनकर उन्होंने अपने मनको उन्हींके प्रेमके रंगमें रँग डाला था, उसीमें सराबोर कर दिया था । अब नेत्रोंके मार्गसे उन्हें भीतर ले जाकर बहुत देरतक वे मन-ही - मन उनका आलिंगन करती रहीं और इस प्रकार उन्होंने अपने हृदयकी जलन शान्त की—ठीक वैसे ही, जैसे जाग्रत् और स्वप्न - अवस्थाओंकी वृत्तियाँ ' यह मैं, यह मेरा' इस भावसे जलती रहती हैं, परन्तु सुषुप्ति - अवस्थामें उसके अभिमानी प्राज्ञको पाकर उसीमें लीन हो जाती हैं और उनकी सारी जलन मिट जाती है ॥२३ ॥
प्रिय परीक्षित्! भगवान् सबके हृदयकी बात जानते हैं, सबकी बुद्धियोंके साक्षी हैं । उन्होंने जब देखा कि ये ब्राह्मणपत्नियाँ अपने भाई- बन्धु और पति- पुत्रोंके रोकनेपर भी सब सगे - सम्बन्धियों और विषयोंकी आशा छोड़कर केवल मेरे दर्शनकी लालसासे ही मेरे पास आयी हैं, तब उन्होंने उनसे कहा । उस समय उनके मुखारविन्दपर हास्यकी तरंगें अठखेलियाँ कर रही थीं ॥ २४ ॥ भगवान्ने कहा– ' महाभाग्यवती देवियो!
तुम्हारा स्वागत है । आओ, बैठो । कहो, हम तुम्हारा क्या स्वागत करें? तुमलोग हमारे दर्शनकी इच्छासे यहाँ आयी हो, यह तुम्हारे जैसे प्रेमपूर्ण हृदयवालोंके योग्य ही है ॥२५ ॥
नन्वद्धा मयि कुर्वन्ति कुशलाः स्वार्थदर्शनाः ।
अहैतुक्यव्यवहितां भक्तिमात्मप्रिये यथा ॥२६
प्राणबुद्धिमनःस्वात्मदारापत्यधनादयः ।
यत्सम्पर्कात् प्रिया आसंस्ततः को न्वपरः प्रियः ॥२७
तद् यात देवयजनं पतयो वो द्विजातयः ।
स्वसत्रं पारयिष्यन्ति युष्माभिर्गृहमेधिनः ॥२८
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पत्न्य ऊचुः मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं सत्यं कुरुष्व निगमं तव पादमूलम् । प्राप्ता वयं तुलसिदाम पदावसृष्टं केशैर्निवोढुमतिलंघ्य' समस्तबन्धून् ॥२९ गृह्णन्ति नो न पतयः पितरौ सुता वा न भ्रातृबन्धुसुहृदः कुत एव चान्ये । तस्माद् भवत्प्रपदयोः पतितात्मनां नो नान्या भवेद् गतिररिन्दम तद् विधेहि ॥३० श्रीभगवानुवाच
पतयो नाभ्यसूयेरन् पितृभ्रातृसुतादयः ।
लोकाश्च वो मयोपेता देवा अप्यनुमन्वते ॥३१
इसमें सन्देह नहीं कि संसारमें अपनी सच्ची भलाईको समझनेवाले जितने भी बुद्धिमान् पुरुष हैं, वे अपने प्रियतमके समान ही मुझसे प्रेम करते हैं और ऐसा प्रेम करते हैं जिसमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती - जिसमें किसी प्रकारका व्यवधान, संकोच, छिपाव, दुविधा या द्वैत नहीं होता || २६ || प्राण, बुद्धि, मन, शरीर, स्वजन, स्त्री, पुत्र और धन आदि संसारकी सभी वस्तुएँ जिसके लिये और जिसकी सन्निधिसे प्रिय लगती हैं — उस आत्मासे, परमात्मासे, मुझ श्रीकृष्णसे बढ़कर और कौन प्यारा हो सकता है ॥२७ ॥ इसलिये तुम्हारा आना उचित ही है । मैं तुम्हारे प्रेमका अभिनन्दन
करता हूँ । परन्तु अब तुमलोग मेरा दर्शन कर चुकीं । अब अपनी यज्ञशालामें लौट जाओ । तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्थ हैं । वे तुम्हारे साथ मिलकर ही अपना यज्ञ पूर्ण कर सकेंगे ' ॥२८ ॥
ब्राह्मणपत्नियोंने कहा - अन्तर्यामी श्यामसुन्दर! आपकी यह बात निष्ठुरतासे पूर्ण है । आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । श्रुतियाँ कहती हैं कि जो एक बार भगवान्को प्राप्त हो जाता है, उसे फिर संसारमें नहीं लौटना पड़ता । आप अपनी यह वेदवाणी सत्य कीजिये । हम अपने समस्त सगे - सम्बन्धियोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके आपके चरणोंमें इसलिये आयी हैं कि आपके चरणोंसे गिरी हुई तुलसीकी माला अपने केशोंमें धारण करें ॥२९ ॥ स्वामी! अब हमारे पति-पुत्र, माता- पिता, भाई- बन्धु और
स्वजन- सम्बन्धी हमें स्वीकार नहीं करेंगे; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है ।
वीरशिरोमणे! अब हम आपके चरणोंमें आ पड़ी हैं । हमें और किसीका सहारा नहीं है ।
इसलिये अब हमें दूसरोंकी शरणमें न जाना पड़े, ऐसी व्यवस्था कीजिये ॥३० ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- देवियो! तुम्हारे पति- पुत्र, माता- पिता, भाई- बन्धु– ****** ebook converter DEMO Watermarks *******