श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 631–640

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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मनुष्य वेगसे चक्कर लगाने लगते हैं, तब उन्हें सारी पृथ्वी घूमती हुई जान पड़ती है । वैसे ही वास्तवमें सब कुछ करनेवाला चित्त ही है; परन्तु उस चित्तमें अहंबुद्धि हो जानेके कारण, भ्रमवश उसे आत्मा— अपना ' मैं' समझ लेनेके कारण, जीव अपनेको कर्ता समझने लगता है ॥४१ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण केवल आप दोनोंके ही पुत्र नहीं हैं, वे समस्त प्राणियोंके आत्मा,

पुत्र, पिता -माता और स्वामी भी हैं ॥ ४२ ॥ बाबा! जो कुछ देखा या सुना जाता है - वह चाहे

भूतसे सम्बन्ध रखता हो, वर्तमानसे अथवा भविष्यसे; स्थावर हो या जंगम हो, महान् हो अथवा अल्प हो – ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है जो भगवान् श्रीकृष्णसे पृथक् हो । बाबा! श्रीकृष्णके अतिरिक्त ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे वस्तु कह सकें । वास्तवमें सब वे ही हैं, वे ही परमार्थ सत्य हैं ॥४३ ॥

यथा भ्रमरिकदृष्ट्या भ्राम्यतीव महीयते ।

चित्ते कर्तरि तत्रात्मा कर्तेवाहंधिया स्मृतः ॥४१

युवयोरेव नैवायमात्मजो भगवान् हरिः ।

सर्वेषामात्मजो ह्यात्मा पिता माता स ईश्वरः ॥४२

दृष्टं श्रुतं भूतभवद् भविष्यत् स्थास्नुश्चरिष्णुर्महदल्पकं च । विनाच्युताद् वस्तु तरां न वाच्यं स एव सर्वं परमार्थभूतः ॥४३ एवं निशा सा ब्रुवतोर्व्यतीता नन्दस्य कृष्णानुचरस्य राजन् । गोप्यः समुत्थाय निरूप्य दीपान् वास्तून् समभ्यर्च्य दधीन्यमन्थन् ॥४४ ता दीपदीप्तैर्मणिभिर्विरजू

रज्जूर्विकर्षद्भजकंकणस्रजः ।

चलन्नितम्बस्तनहारकुण्डल- त्विषत्कपोलारुणकुंकुमाननाः ॥ ४५

उद्गायतीनामरविन्दलोचनं व्रजांगनानां दिवमस्पृशद् ध्वनिः । दध्नश्च निर्मन्थनशब्दमिश्रितो निरस्यते येन दिशाममंगलम् ॥४६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 632

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परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके सखा उद्धव और नन्दबाबा इसी प्रकार आपसमें बात करते रहे और वह रात बीत गयी । कुछ रात शेष रहनेपर गोपियाँ उठीं, दीपक जलाकर उन्होंने घरकी देहलियोंपर वास्तुदेवका पूजन किया, अपने घरोंको झाड़ -बुहारकर साफ किया और फिर दही मथने लगीं ॥४४ ॥

गोपियोंकी कलाइयोंमें कंगन शोभायमान हो रहे थे, रस्सी खींचते समय वे बहुत भली मालूम हो रही थीं । उनके नितम्ब, स्तन और गलेके हार हिल रहे थे । कानोंके कुण्डल हिल-हिलकर उनके कुंकुम- मण्डित कपोलोंकी लालिमा बढ़ा रहे थे । उनके आभूषणोंकी मणियाँ दीपककी ज्योतिसे और भी जगमगा रही थीं और इस प्रकार वे अत्यन्त शोभासे सम्पन्न होकर दही मथ रही थीं || ४५ ॥ उस समय गोपियाँ – कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णके मंगलमय चरित्रोंका गान कर रही थीं । उनका वह संगीत दही मथनेकी ध्वनिसे मिलकर और भी अद्भुत हो गया तथा स्वर्गलोकतक जा पहुँचा, जिसकी स्वर लहरी सब ओर फैलकर दिशाओंका अमंगल मिटा देती है ॥४६ ॥

भगवत्युदिते सूर्ये नन्दद्वारि व्रजौकसः ।

दृष्ट्वा रथं शातकौम्भं कस्यायमिति चाब्रुवन् ॥४७

अक्रूर आगतः किं वा यः कंसस्यार्थसाधकः ।

येन नीतो मधुपुरीं कृष्णः कमललोचनः ॥४८

किं साधयिष्यत्यस्माभिर्भर्तुः प्रेतस्य निष्कृतिम् ।

इति स्त्रीणां वदन्तीनामुद्धवोऽगात् कृताह्निकः ॥४९

जब भगवान् भुवनभास्करका उदय हुआ, तब व्रजांगनाओंने देखा कि नन्दबाबाके दरवाजेपर एक सोनेका रथ खड़ा है । वे एक- दूसरेसे पूछने लगीं ' यह किसका रथ है? ' ॥४७ ॥ किसी गोपीने कहा - ' कंसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला अक्रूर ही तो कहीं फिर

नहीं आ गया है? जो कमलनयन प्यारे श्यामसुन्दरको यहाँसे मथुरा ले गया था' ॥४८ ॥

किसी दूसरी गोपीने कहा -' क्या अब वह हमें ले जाकर अपने मरे हुए स्वामी कंसका पिण्डदान करेगा? अब यहाँ उसके आनेका और क्या प्रयोजन हो सकता है?' व्रजवासिनी स्त्रियाँ इसी प्रकार आपसमें बातचीत कर रही थीं कि उसी समय नित्यकर्मसे निवृत्त होकर उद्धवजी आ पहुँचे ॥४९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे नन्दशोकापनयनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४६ ॥

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पृष्ठ 633

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पृष्ठ 634

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अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः उद्धव तथा गोपियोंकी बातचीत और भ्रमरगीत श्रीशुक उवाच तं वीक्ष्य कृष्णानुचरं व्रजस्त्रियः

प्रलम्बबाहुं नवकंजलोचनम् ।

पीताम्बरं पुष्करमालिनं लस- न्मुखारविन्दं मणिमृष्टकुण्डलम् ॥१

शुचिस्मिताः कोऽयमपीच्यदर्शनः

कुतश्च कस्याच्युतवेषभूषणः ।

इति स्म सर्वाः परिवव्रुरुत्सुका- स्तमुत्तमश्लोकपदाम्बुजाश्रयम् ॥२

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! गोपियोंने देखा कि श्रीकृष्णके सेवक उद्धवजीकी आकृति और वेषभूषा श्रीकृष्णसे मिलती- जुलती है । घुटनोंतक लंबी - लंबी भुजाएँ हैं, नूतन कमलदलके समान कोमल नेत्र हैं, शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, गलेमें कमल-पुष्पोंकी माला है, कानोंमें मणिजटित कुण्डल झलक रहे हैं और मुखारविन्द अत्यन्त प्रफुल्लित है ॥१ ॥ पवित्र मुसकानवाली गोपियोंने आपसमें कहा - ' यह पुरुष देखनेमें तो

बहुत सुन्दर है । परन्तु यह है कौन? कहाँसे आया है? किसका दूत है? इसने श्रीकृष्ण - जैसी वेषभूषा क्यों धारण कर रखी है? ' सब- की - सब गोपियाँ उनका परिचय प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो गयीं और उनमें से बहुत- सी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके आश्रित तथा उनके सेवक - सखा उद्धवजीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं ॥२ ॥

तं प्रश्रयेणावनताः सुसत्कृतं सव्रीडहासेक्षणसूनृतादिभिः । रहस्यपृच्छन्नुपविष्टमासने विज्ञाय सन्देशहरं रमापतेः ॥ ३

जानीमस्त्वां यदुपतेः पार्षदं समुपागतम् ।

भर्त्रेह प्रेषितः पित्रोर्भवान् प्रियचिकीर्षया ॥४

अन्यथा गोव्रजे तस्य स्मरणीयं न चक्ष्महे ।

स्नेहानुबन्धो बन्धूनां मुनेरपि सुदुस्त्यजः ॥ ५

अन्येष्वर्थकृता मैत्री यावदर्थविडम्बनम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 635

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पुम्भिः स्त्रीषु कृता यद्वत् सुमनस्स्विव षट्पदैः ॥ ६

निस्स्वं त्यजन्ति गणिका अकल्पं नृपतिं प्रजाः ।

अधीतविद्या आचार्यमृत्विजो दत्तदक्षिणम् ॥७

खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चातिथयो गृहम् ।

दग्धं मृगास्तथारण्यं जारो भुक्त्वा रतां स्त्रियम् ॥८

इति गोप्यो हि गोविन्दे गतवाक्कायमानसाः ।

कृष्णदूते व्रजं याते उद्धवे त्यक्तलौकिकाः ॥९

जब उन्हें मालूम हुआ कि ये तो रमारमण भगवान् श्रीकृष्णका सन्देश लेकर आये हैं, तब उन्होंने विनयसे झुककर सलज्ज हास्य, चितवन और मधुर वाणी आदिसे उद्धवजीका अत्यन्त सत्कार किया तथा एकान्तमें आसनपर बैठाकर वे उनसे इस प्रकार कहने लगीं I ॥३ ॥ ‘ उद्धवजी! हम जानती हैं कि आप यदुनाथके पार्षद हैं । उन्हींका संदेश लेकर यहाँ

पधारे हैं । आपके स्वामीने अपने माता- पिताको सुख देनेके लिये आपको यहाँ भेजा है ॥४ ॥

अन्यथा हमें तो अब इस नन्दगाँवमें – गौओंके रहनेकी जगहमें उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु दिखायी नहीं पड़ती; माता- पिता आदि सगे- सम्बन्धियोंका स्नेह- बन्धन तो बड़े - बड़े ऋषि-मुनि भी बड़ी कठिनाईसे छोड़ पाते हैं || ५|| दूसरोंके साथ जो प्रेम- सम्बन्धका स्वाँग किया जाता है, वह तो किसी - न -किसी स्वार्थके लिये ही होता है । भौंरोंका पुष्पोंसे और पुरुषोंका स्त्रियोंसे ऐसा ही स्वार्थका प्रेम- सम्बन्ध होता है || ६ || जब वेश्या समझती है कि अब मेरे यहाँ आनेवालेके पास धन नहीं है, तब उसे वह धता बता देती है । जब प्रजा देखती है कि यह राजा हमारी रक्षा नहीं कर सकता, तब वह उसका साथ छोड़ देती है । अध्ययन समाप्त हो जानेपर कितने शिष्य अपने आचार्योंकी सेवा करते हैं? यज्ञकी दक्षिणा मिली कि ऋत्विजलोग चलते बने ॥७ ॥ जब वृक्षपर फल नहीं रहते, तब पक्षीगण वहाँसे बिना कुछ

सोचे - विचारे उड़ जाते हैं । भोजन कर लेनेके बाद अतिथिलोग ही गृहस्थकी ओर कब देखते हैं? वनमें आग लगी कि पशु भाग खड़े हुए । चाहे स्त्रीके हृदयमें कितना भी अनुराग हो, जार पुरुष अपना काम बना लेनेके बाद उलटकर भी तो नहीं देखता' ॥८ ॥

परीक्षित्! गोपियोंके मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्णमें ही तल्लीन थे । जब भगवान् श्रीकृष्णके दूत बनकर उद्धवजी व्रजमें आये, तब वे उनसे इस प्रकार कहते - कहते यह भूल ही गयीं कि कौन- सी बात किस तरह किसके सामने कहनी चाहिये । भगवान् श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर किशोर अवस्थातक जितनी भी लीलाएँ की थीं, उन सबकी याद कर-करके गोपियाँ उनका गान करने लगीं । वे आत्मविस्मृत होकर स्त्री- सुलभ लज्जाको भी भूल गयीं और फूट - फूटकर रोने लगीं ॥९-१० ॥ गायन्त्यः प्रियकर्माणि रुदत्यश्च गतह्रियः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 636

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तस्य संस्मृत्य संस्मृत्य यानि कैशोरबाल्ययोः ॥१०

काचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायन्ती कृष्णसंगमम् ।

प्रियप्रस्थापितं दूतं कल्पयित्वेदमब्रवीत् ॥ ११

गोप्युवाच मधुप कितवबन्धो मा स्पृशाङ्घ्रि सपत्न्याः कुचविलुलितमालाकुङकुमश्मश्रुभिर्नः । वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं यदुसदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक् ॥१२ सकृदधरसुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वा सुमनस इव सद्यस्तत्यजेऽस्मान् भवादृक् । परिचरति कथं तत्पादपद्मं तु पद्मा ह्यपि बत हृतचेता उत्तमश्लोकजल्पैः ॥ १३ एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका । उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है । उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो । वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी ॥११ ॥

गोपीने कहा — रे मधुप! तू कपटीका सखा है; इसलिये तू भी कपटी है । तू हमारे पैरोंको मत छू । झूठे प्रणाम करके हमसे अनुनय -विनय मत कर। हम देख रही हैं कि श्रीकृष्णकी जो वनमाला हमारी सौतोंके वक्षःस्थलके स्पर्शसे मसली हुई है, उसका पीला - पीला कुंकुम तेरी मूछोंपर भी लगा हुआ है । तू स्वयं भी तो किसी कुसुमसे प्रेम नहीं करता, यहाँ- से - वहाँ उड़ा करता है । जैसे तेरे स्वामी, वैसा ही तू! मधुपति श्रीकृष्ण मथुराकी मानिनी नायिकाओंको मनाया करें, उनका वह कुंकुमरूप कृपा प्रसाद, जो युदवंशियोंकी सभामें उपहास करनेयोग्य है, अपने ही पास रखें । उसे तेरे द्वारा यहाँ भेजनेकी क्या आवश्यकता है? ॥१२ ॥

जैसा तू काला है, वैसे ही वे भी हैं । तू भी पुष्पोंका रस लेकर उड़ जाता है, वैसे ही वे भी निकले । उन्होंने हमें केवल एक बार- हाँ, ऐसा ही लगता है - केवल एक बार अपनी तनिक-सी मोहिनी और परम मादक अधरसुधा पिलायी थी और फिर हम भोली- भाली गोपियोंको छोड़कर वे यहाँसे चले गये । पता नहीं; सुकुमारी लक्ष्मी उनके चरण- कमलोंकी सेवा कैसे करती रहती हैं! अवश्य ही वे छैल-छबीले श्रीकृष्णकी चिकनी -चुपड़ी बातोंमें आ गयी होंगी । चितचोरने उनका भी चित्त चुरा लिया होगा ॥१३ ॥

किमिह बहु षडङ्घ्र गायसि त्वं यदूना- मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 637

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विजयसखसखीनां गीयतां तत्प्रसंगः क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टाः ॥१४ दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तद्दुरापाः कपटरुचिरहासभ्रूविजृम्भस्य याः स्युः । चरणरज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं का अपि च कृपणपक्षे ह्युत्तमश्लोक शब्दः ॥ १५ विसृज शिरसि पादं वेद्भ्यहं चाटुकारै- रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात् । स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन् ॥१६ अरे भ्रमर! हम वनवासिनी हैं । हमारे तो घर-द्वार भी नहीं है । तू हमलोगोंके सामने यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णका बहुत- सा गुणगान क्यों कर रहा है? यह सब भला हमलोगोंको मनानेके लिये ही तो? परन्तु नहीं- नहीं, वे हमारे लिये कोई नये नहीं हैं । हमारे लिये तो जाने-पहचाने, बिलकुल पुराने हैं । तेरी चापलूसी हमारे पास नहीं चलेगी । तू जा, यहाँसे चला जा और जिनके साथ सदा विजय रहती है, उन श्रीकृष्णकी मधुपुरवासिनी सखियोंके सामने जाकर उनका गुणगान कर । वे नयी हैं, उनकी लीलाएँ कम जानती हैं और इस समय वे उनकी प्यारी हैं; उनके हृदयकी पीड़ा उन्होंने मिटा दी है । वे तेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगी, तेरी चापलूसीसे प्रसन्न होकर तुझे मुँहमाँगी वस्तु देंगी || १४ || भौरे! वे हमारे लिये छटपटा रहे हैं, ऐसा तू क्यों कहता है? उनकी कपटभरी मनोहर मुसकान और भौंहोंके इशारेसे जो वशमें न हो जायँ, उनके पास दौड़ी न आवें- ऐसी कौन- सी स्त्रियाँ हैं? अरे अनजान! स्वर्गमें, पातालमें और पृथ्वीमें ऐसी एक भी स्त्री नहीं है । औरोंकी तो बात ही क्या, स्वयं लक्ष्मीजी भी उनके चरणरजकी सेवा किया करती हैं । फिर हम श्रीकृष्णके लिये किस गिनतीमें हैं? परन्तु तू उनके पास जाकर कहना कि ' तुम्हारा नाम तो ' उत्तमश्लोक' है, अच्छे - अच्छे लोग तुम्हारी कीर्तिका गान करते हैं; परन्तु इसकी सार्थकता तो इसीमें है कि तुम दीनोंपर दया करो । नहीं तो श्रीकृष्ण! तुम्हारा ‘ उत्तमश्लोक' नाम झूठा पड़ जाता है ॥१५ ॥ अरे मधुकर! देख, तू मेरे

पैरपर सिर मत टेक । मैं जानती हूँ कि तू अनुनय- विनय करनेमें, क्षमा- याचना करनेमें बड़ा निपुण है । मालूम होता है तू श्रीकृष्णसे ही यही सीखकर आया है कि रूठे हुएको मनानेके लिये दूतको— सन्देश- वाहकको कितनी चाटुकारिता करनी चाहिये । परन्तु तू समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेकी । देख, हमने श्रीकृष्णके लिये ही अपने पति, पुत्र और दूसरे लोगोंको छोड़ दिया । परन्तु उनमें तनिक भी कृतज्ञता नहीं । वे ऐसे निर्मोही निकले कि हमें छोड़कर चलते बने! अब तू ही बता, ऐसे अकृतज्ञके साथ हम क्या सन्धि करें? क्या तू अब भी कहता है कि उनपर विश्वास करना चाहिये? ॥१६ ॥

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पृष्ठ 638

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मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम् । बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वांक्षवद् य- स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥१७ यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्- सकृददनविधूतद्वन्द्वधर्मा विनष्टाः । सपदि गृहकुदुम्बं दीनमुत्सृज्य दीना बहव इह विहंगा भिक्षुचर्यां चरन्ति ॥१८ वयमृतमिव जिह्मव्याहृतं श्रद्दधानाः

कुलिकरुतमिवाज्ञाः कृष्णवध्वो हरिण्यः ।

ददृशुरसकृदेतत्तन्नखस्पर्शतीव्र- स्मररुज उपमन्त्रिन् भण्यतामन्यवार्ता ॥१९

ऐ रे मधुप! जब वे राम बने थे, तब उन्होंने कपिराज बालिको व्याधके समान छिपकर बड़ी निर्दयतासे मारा था । बेचारी शूर्पणखा कामवश उनके पास आयी थी, परन्तु उन्होंने अपनी स्त्रीके वश होकर उस बेचारीके नाक- कान काट लिये और इस प्रकार उसे कुरूप कर दिया । ब्राह्मणके घर वामनके रूपमें जन्म लेकर उन्होंने क्या किया? बलिने तो उनकी पूजा की, उनकी मुँहमाँगी वस्तु दी और उन्होंने उसकी पूजा ग्रहण करके भी उसे वरुणपाशसे बाँधकर पातालमें डाल दिया । ठीक वैसे ही, जैसे कौआ बलि खाकर भी बलि देनेवालेको अपने अन्य साथियोंके साथ मिलकर घेर लेता है और परेशान करता है । अच्छा, तो अब जाने दे; हमें श्रीकृष्णसे क्या, किसी भी काली वस्तुके साथ मित्रतासे कोई प्रयोजन नहीं है । परन्तु यदि तू यह कहे कि ' जब ऐसा है तब तुमलोग उनकी चर्चा क्यों करती हो? ' तो भ्रमर! हम सच कहती हैं, एक बार जिसे उसका चसका लग जाता है, वह उसे छोड़ नहीं सकता । ऐसी दशामें हम चाहनेपर भी उनकी चर्चा छोड़ नहीं सकतीं ॥१७ ॥ श्रीकृष्णकी लीलारूप

कर्णामृतके एक कणका भी जो रसास्वादन कर लेता है, उसके राग- द्वेष, सुख- दुःख आदि सारे द्वन्द्व छूट जाते हैं । यहाँतक कि बहुत- से लोग तो अपनी दुःखमय - दुःखसे सनी हुई घर-गृहस्थी छोड़कर अकिंचन हो जाते हैं, अपने पास कुछ भी संग्रह- परिग्रह नहीं रखते और पक्षियोंकी तरह चुन- चुनकर- भीख माँगकर अपना पेट भरते हैं, दीन- दुनियासे जाते रहते हैं । फिर भी श्रीकृष्णकी लीलाकथा छोड़ नहीं पाते । वास्तवमें उसका रस, उसका चसका ऐसा ही है । यही दशा हमारी हो रही है ॥ १८ ॥ जैसे कृष्णसार मृगकी पत्नी भोली- भाली हरिनियाँ

व्याधके सुमधुर गानका विश्वास कर लेती हैं और उसके जालमें फँसकर मारी जाती हैं, वैसे ही हम भोली- भाली गोपियाँ भी उस छलिया कृष्णकी कपटभरी मीठी- मीठी बातोंमें आकर उन्हें सत्यके समान मान बैठीं और उनके नखस्पर्शसे होनेवाली कामव्याधिका बार- बार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 639

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अनुभव करती रहीं । इसलिये श्रीकृष्णके दूत भौंरे! अब इस विषयमें तू और कुछ मत कह ।

तुझे कहना ही हो तो कोई दूसरी बात कह ॥ १ ९ ॥

प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग । नयसि कथमिहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्वं सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते ॥२० अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनाऽऽस्ते स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान् । क्वचिदपि स कथा नः किंकरीणां गृणीते भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध्यधास्यत् कदा नु ॥२१ श्रीशुक उवाच

अथोद्धवो निशम्यैवं कृष्णदर्शनलालसाः ।

सान्त्वयन् प्रियसन्देशैर्गोपीरिदमभाषत ॥२२

उद्धव उवाच

अहो यूयं स्म पूर्णार्था भवत्यो लोकपूजिताः ।

वासुदेवे भगवति यासामित्यर्पितं मनः ॥२३

दानव्रततपोहोमजपस्वाध्यायसंयमैः ।

श्रेयोभिर्विविधैश्चान्यैः कृष्णे भक्तिर्हि साध्यते ॥ २४

हमारे प्रियतमके प्यारे सखा! जान पड़ता है तुम एक बार उधर जाकर फिर लौट आये हो। अवश्य ही हमारे प्रियतमने मनानेके लिये तुम्हें भेजा होगा। प्रिय भ्रमर! तुम सब प्रकारसे हमारे माननीय हो। कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है? हमसे जो चाहो सो माँग लो। अच्छा, तुम सच बताओ, क्या हमें वहाँ ले चलना चाहते हो? अजी, उनके पास जाकर लौटना बड़ा कठिन है । हम तो उनके पास जा चुकी हैं । परन्तु तुम हमें वहाँ ले जाकर करोगे क्या? प्यारे भ्रमर! उनके साथ—उनके वक्षःस्थलपर तो उनकी प्यारी पत्नी लक्ष्मीजी सदा रहती हैं न? तब वहाँ हमारा निर्वाह कैसे होगा ॥२० ॥ अच्छा, हमारे प्रियतमके प्यारे दूत मधुकर! हमें यह

बतलाओ कि आर्यपुत्र भगवान् श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर मधुपुरीमें अब सुखसे तो हैं न? क्या वे कभी नन्दबाबा, यशोदारानी, यहाँके घर, सगे -सम्बन्धी और ग्वालबालोंकी भी याद करते हैं? और क्या हम दासियोंकी भी कोई बात कभी चलाते हैं? प्यारे भ्रमर! हमें यह भी बतलाओ कि कभी वे अपनी अगरके समान दिव्य सुगन्धसे युक्त भुजा हमारे सिरोंपर रखेंगे? क्या हमारे जीवनमें कभी ऐसा शुभ अवसर भी आयेगा? ॥२१ ॥

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पृष्ठ 640

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श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्सुक — लालायित हो रही थीं, उनके लिये तड़प रही थीं । उनकी बातें सुनकर उद्धवजीने उन्हें उनके प्रियतमका सन्देश सुनाकर सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा— ॥२२ ॥

उद्धवजीने कहा — अहो गोपियो! तुम कृतकृत्य हो । तुम्हारा जीवन सफल है । देवियो! तुम सारे संसारके लिये पूजनीय हो; क्योंकि तुमलोगोंने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको अपना हृदय, अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है || २३ || दान, व्रत, तप, होम, जप, वेदाध्ययन, ध्यान, धारणा, समाधि और कल्याणके अन्य विविध साधनोंके द्वारा भगवान्की भक्ति प्राप्त हो, यही प्रयत्न किया जाता है || २४ || यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमलोगोंने पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके प्रति वही सर्वोत्तम प्रेमभक्ति प्राप्त की है और उसीका आदर्श स्थापित किया है, जो बड़े -बड़े ऋषि-मुनियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है ॥२५ ॥ सचमुच यह कितने सौभाग्यकी बात है कि तुमने अपने पुत्र, पति, देह, स्वजन और

घरोंको छोड़कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णको, जो सबके परम पति हैं, पतिके रूपमें वरण किया है ॥२६ ॥ महाभाग्यवती गोपियो! भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे तुमने उन इन्द्रियातीत

परमात्माके प्रति वह भाव प्राप्त कर लिया है, जो सभी वस्तुओंके रूपमें उनका दर्शन कराता है । तुमलोगोंका वह भाव मेरे सामने भी प्रकट हुआ, यह मेरे ऊपर तुम देवियोंकी बड़ी ही दया है ॥२७ ॥ मैं अपने स्वामीका गुप्त काम करनेवाला दूत हूँ। तुम्हारे प्रियतम भगवान्

श्रीकृष्णने तुमलोगोंको परम सुख देनेके लिये यह प्रिय सन्देश भेजा है । कल्याणियो! वही लेकर मैं तुमलोगोंके पास आया हूँ, अब उसे सुनो ॥ २८ ॥

भगवत्युत्तमश्लोके भवतीभिरनुत्तमा ।

भक्तिः प्रवर्तिता दिष्ट्या मुनीनामपि दुर्लभा ॥ २५

दिष्ट्या पुत्रान् पतीन् देहान् स्वजनान् भवनानि च ।

हित्वावृणीत यूयं यत् कृष्णाख्यं पुरुषं परम् ॥ २६

सर्वात्मभावोऽधिकृतो भवतीनामधोक्षजे ।

विरहेण महाभागा महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ २७

श्रूयतां प्रियसन्देशो भवतीनां सुखावहः ।

यमादायागतो भद्रा अहं भर्तृ रहस्करः ॥२८

श्रीभगवानुवाच भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्वचित् ।

यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्निर्जलं मही ।

तथाहं च मनःप्राणभूतेन्द्रियगुणाश्रयः ॥२९

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