श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 641–650
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650
पृष्ठ 641
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं सृजे हन्म्यनुपालये ।
आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना ॥३०
आत्मा ज्ञानमयः शुद्धो व्यतिरिक्तोऽगुणान्वयः ।
सुषुप्तिस्वप्नजाग्रद्भिर्मायावृत्तिभिरीयते ॥३१
भगवान् श्रीकृष्णने कहा है - मैं सबका उपादान कारण होनेसे सबका आत्मा हूँ, सबमें अनुगत हूँ; इसलिये मुझसे कभी भी तुम्हारा वियोग नहीं हो सकता । जैसे संसारके सभी भौतिक पदार्थोंमें आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - ये पाँचों भूत व्याप्त हैं, इन्हींसे सब वस्तुएँ बनी हैं, और यही उन वस्तुओंके रूपमें हैं । वैसे ही मैं मन, प्राण, पंचभूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंका आश्रय हूँ । वे मुझमें हैं, मैं उनमें हूँ और सच पूछो तो मैं ही उनके रूपमें प्रकट हो रहा हूँ ॥ २ ९ ॥ मैं ही अपनी मायाके द्वारा भूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें होकर उनका आश्रय बन जाता हूँ तथा स्वयं निमित्त भी बनकर अपने - आपको ही रचता हूँ, पालता हूँ और समेट लेता हूँ ॥ ३० ॥ आत्मा माया और मायाके कार्योंसे पृथक् है । वह
विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, जड प्रकृति, अनेक जीव तथा अपने ही अवान्तर भेदोंसे रहित सर्वथा शुद्ध है । कोई भी गुण उसका स्पर्श नहीं कर पाते । मायाकी तीन वृत्तियाँ हैं— सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत् । इनके द्वारा वही अखण्ड, अनन्त बोधस्वरूप आत्मा कभी प्राज्ञ, तो कभी तैजस और कभी विश्वरूपसे प्रतीत होता है ॥३१ ॥
येनेन्द्रियार्थान् ध्यायेत मृषा स्वप्नवदुत्थितः ।
तन्निरुन्ध्यादिन्द्रियाणि विनिद्रः प्रत्यपद्यत ॥३२
एतदन्तः समाम्नायो योगः सांख्यं मनीषिणाम् ।
त्यागस्तपो दमः सत्यं समुद्रान्ता इवापगाः ॥३३
यत्त्वहं भवतीनां वै दूरे वर्ते प्रियो दृशाम् ।
मनसः सन्निकर्षार्थं मदनुध्यानकाम्यया ॥३४
यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते ।
स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्निकृष्टेऽक्षिगोचरे ॥ ३५
मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं' विमुक्ताशेषवृत्ति यत् ।
अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ ॥३६
या मया क्रीडता रात्र्यां वनेऽस्मिन् व्रज आस्थिताः ।
अलब्धरासाः कल्याण्यो माऽऽपुर्मद्वीर्यचिन्तया ॥३७
पृष्ठ 642
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीशुक उवाच
एवं प्रियतमादिष्टमाकर्ण्य व्रजयोषितः ।
ता ऊचुरुद्धवं प्रीतास्तत्सन्देशागतस्मृतीः ॥३८
मनुष्यको चाहिये कि वह समझे कि स्वप्नमें दीखनेवाले पदार्थोंके समान ही जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियोंके विषय भी प्रतीत हो रहे हैं, वे मिथ्या हैं । इसलिये उन विषयोंका चिन्तन करनेवाले मन और इन्द्रियोंको रोक ले और मानो सोकर उठा हो, इस प्रकार जगत्के स्वाप्निक विषयोंको त्यागकर मेरा साक्षात्कार करे || ३२ || जिस प्रकार सभी नदियाँ घूम- फिरकर समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार मनस्वी पुरुषोंका वेदाभ्यास, योग-साधन, आत्मानात्म-विवेक, त्याग, तपस्या, इन्द्रियसंयम और सत्य आदि समस्त धर्म, मेरी प्राप्तिमें ही समाप्त होते हैं । सबका सच्चा फल है मेरा साक्षात्कार; क्योंकि वे सब मनको निरुद्ध करके मेरे पास पहुँचाते हैं ॥३३ ॥
गोपियो! इसमें सन्देह नहीं कि मैं तुम्हारे नयनोंका ध्रुवतारा हूँ। तुम्हारा जीवन- सर्वस्व हूँ । किन्तु मैं जो तुमसे इतना दूर रहता हूँ, उसका कारण है । वह यही कि तुम निरन्तर मेरा ध्यान कर सको, शरीरसे दूर रहनेपर भी मनसे तुम मेरी सन्निधिका अनुभव करो, अपना मन मेरे पास रखो ॥३४ ॥ क्योंकि स्त्रियों और अन्यान्य प्रेमियोंका चित्त अपने परदेशी प्रियतममें
जितना निश्चल भावसे लगा रहता है, उतना आँखोंके सामने, पास रहनेवाले प्रियतममें नहीं लगता ॥३५ ॥ अशेष वृत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें लगाकर जब तुमलोग मेरा
अनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदाके लिये मुझे प्राप्त हो जाओगी ॥ ३६ ॥ कल्याणियो!
जिस समय मैंने वृन्दावनमें शारदीय पूर्णिमाकी रात्रिमें रास-क्रीडा की थी उस समय जो गोपियाँ स्वजनोंके रोक लेनेसे व्रजमें ही रह गयीं- मेरे साथ रास - विहारमें सम्मिलित न हो सकीं, वे मेरी लीलाओंका स्मरण करनेसे ही मुझे प्राप्त हो गयी थीं । ( तुम्हें भी मैं मिलूँगा अवश्य, निराश होनेकी कोई बात नहीं है ) ॥३७ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अपने प्रियतम श्रीकृष्णका यह संदेशा सुनकर गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ उनके संदेशसे उन्हें श्रीकृष्णके स्वरूप और एक- एक लीलाकी याद आने लगी । प्रेमसे भरकर उन्होंने उद्धवजीसे कहा ॥३८ ॥
गोप्य ऊचुः
दिष्ट्याहितो हतः कंसो यदूनां सानुगोऽघकृत् ।
दिष्ट्याऽऽप्तैर्लब्धसर्वार्थैः कुशल्यास्तेऽच्युतोऽधुना ॥ ३ ९
कच्चिद् गदाग्रजः सौम्य करोति पुरयोषिताम् ।
प्रीतिं नः स्निग्धसव्रीडहासोदारेक्षणार्चितः ॥४०
कथं रतिविशेषज्ञः प्रियश्च वरयोषिताम् ।
नानुबध्येत तद्वाक्यैर्विभ्रमैश्चानुभाजितः ॥४१
पृष्ठ 643
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपि स्मरति नः साधो गोविन्दः प्रस्तुते क्वचित् ।
गोष्ठीमध्ये पुरस्त्रीणां ग्राम्याः स्वैरकथान्तरे ॥४२
ताः किं निशाः स्मरति यासु तदा प्रियाभि- वृन्दावने कुमुदकुन्दशशांकरम्ये ।
रेमे क्वणच्चरणनूपुररासगोष्ठ्या- मस्माभिरीडितमनोज्ञकथः कदाचित् ॥४३
गोपियोंने कहा – उद्धवजी! यह बड़े सौभाग्यकी और आनन्दकी बात है कि यदुवंशियोंको सतानेवाला पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया । यह भी कम आनन्दकी बात नहीं है कि श्रीकृष्णके बन्धु बान्धव और गुरुजनोंके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये तथा अब हमारे प्यारे श्यामसुन्दर उनके साथ सकुशल निवास कर रहे हैं ॥३९ ॥
किन्तु उद्धवजी! एक बात आप हमें बतलाइये । ' जिस प्रकार हम अपनी प्रेमभरी लजीली मुसकान और उन्मुक्त चितवनसे उनकी पूजा करती थीं और वे भी हमसे प्यार करते थे, उसी प्रकार मथुराकी स्त्रियोंसे भी वे प्रेम करते हैं या नहीं? ' ॥४० ॥
तबतक दूसरी गोपी बोल उठी- ' अरी सखी! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी कलाके विशेषज्ञ हैं । सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ उनसे प्यार करती हैं, फिर भला जब नगरकी स्त्रियाँ उनसे मीठी - मीठी बातें करेंगी और हाव- भावसे उनकी ओर देखेंगी तब वे उनपर क्यों न रीझेंगे? ' ॥४१ ॥
दूसरी गोपियाँ बोलीं — 'साधो! आप यह तो बतलाइये कि जब कभी नागरी नारियोंकी मण्डलीमें कोई बात चलती है और हमारे प्यारे स्वच्छन्दरूपसे, बिना किसी संकोचके जब प्रेमकी बातें करने लगते हैं, तब क्या कभी प्रसंगवश हम गँवार ग्वालिनों की भी याद करते हैं? ' ॥४२ ॥
कुछ गोपियोंने कहा— ‘ उद्धवजी! क्या कभी श्रीकृष्ण उन रात्रियोंका स्मरण करते हैं, जब कुमुदिनी तथा कुन्दके पुष्प खिले हुए थे, चारों ओर चाँदनी छिटक रही थी और वृन्दावन अत्यन्त रमणीय हो रहा था! उन रात्रियोंमें ही उन्होंने रास- मण्डल बनाकर हम लोगोंके साथ नृत्य किया था । कितनी सुन्दर थी वह रासलीला! उस समय हमलोगोंके पैरोंके नूपुर रुनझुन-रुनझुन बज रहे थे । हम सब सखियाँ उन्हींकी सुन्दर- सुन्दर लीलाओंका गान कर रही थीं और वे हमारे साथ नाना प्रकारके विहार कर रहे थे ' ॥४३ ॥
अप्येष्यतीह दाशार्हस्तप्ताः स्वकृतया शुचा ।
संजीवयन् नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदैः ॥४४
कस्मात् कृष्ण इहायाति प्राप्तराज्यो हताहितः ।
नरेन्द्रकन्या उद्वाह्य प्रीतः सर्वसुहृद्वृतः ॥ ४५
पृष्ठ 644
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किमस्माभिर्वनौकोभिरन्याभिर्वा महात्मनः ।
श्रीपतेराप्तकामस्य क्रियेतार्थः कृतात्मनः ॥ ४६
परं सौख्यं हि नैराश्यं स्वैरिण्यप्याह पिंगला ।
तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया ॥४७
क उत्सहेत सन्त्यक्तुमुत्तमश्लोकसंविदम् ।
अनिच्छतोऽपि यस्य श्रीरंगान्न च्यवते क्वचित् ॥४८
कुछ दूसरी गोपियाँ बोल उठीं- ' उद्धवजी! हम सब तो उन्हींके विरहकी आगसे जल रही हैं । देवराज इन्द्र जैसे जल बरसाकर वनको हरा- भरा कर देते हैं, उसी प्रकार क्या कभी श्रीकृष्ण भी अपने कर- स्पर्श आदिसे हमें जीवनदान देनेके लिये यहाँ आवेंगे? ' ॥४४ ॥
तबतक एक गोपीने कहा – ' अरी सखी! अब तो उन्होंने शत्रुओंको मारकर राज्य पा लिया है; जिसे देखो, वही उनका सुहृद् बना फिरता है । अब वे बड़े - बड़े नरपतियोंकी कुमारियोंसे विवाह करेंगे, उनके साथ आनन्दपूर्वक रहेंगे; यहाँ हम गँवारिनोंके पास क्यों आयेंगे? ' ॥४५ ॥
दूसरी गोपीने कहा — ' नहीं सखी! महात्मा श्रीकृष्ण तो स्वयं लक्ष्मीपति हैं । उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण ही हैं, वे कृतकृत्य हैं । हम वनवासिनी ग्वालिनों अथवा दूसरी राजकुमारियोंसे
उनका कोई प्रयोजन नहीं है । हमलोगोंके बिना उनका कौन- सा काम अटक रहा है ॥४६ ॥
देखो वेश्या होनेपर भी पिंगलाने क्या ही ठीक कहा है– संसारमें किसीकी आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है । ' यह बात हम जानती हैं, फिर भी दम भगवान् श्रीकृष्णके लौटनेकी आशा छोड़नेमें असमर्थ हैं । उनके शुभागमनकी आशा ही तो हमारा जीवन है ॥४७ ॥
हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने, जिनकी कीर्तिका गान बड़े- बड़े महात्मा करते रहते हैं, हमसे एकान्तमें जो मीठी - मीठी प्रेमकी बातें की हैं उन्हें छोड़नेका, भुलानेका उत्साह भी हम कैसे कर सकती हैं? देखो तो, उनकी इच्छा न होनेपर भी स्वयं लक्ष्मीजी उनके चरणोंसे लिपटी रहती हैं, एक क्षणके लिये भी उनका अंग - संग छोड़कर कहीं नहीं जातीं ॥४८ ॥
सरिच्छैलवनोद्देशा गावो वेणुरवा इमे ।
संकर्षणसहायेन कृष्णेनाचरिताः प्रभो ॥४९
पुनः पुनः स्मारयन्ति नन्दगोपसुतं बत ।
श्रीनिकेतैस्तत्पदकैर्विस्मर्तुं नैव शक्नुमः ॥५०
गत्या ललितयोदारहासलीलावलोकनैः ।
माध्व्या गिरा हृतधियः कथं तं विस्मरामहे ॥ ५१
पृष्ठ 645
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन ।
मग्नमुद्धर गोविन्द गोकुलं वृजिनार्णवात् ॥५२
श्रीशुक उवाच
ततस्ताः कृष्णसन्देशैर्व्यपेतविरहज्वराः ।
उद्धवं पूजयांचक्रुर्ज्ञात्वाऽऽत्मानमधोक्षजम् ॥५३
उद्धवजी! यह वही नदी है, जिसमें वे विहार करते थे । यह वही पर्वत है, जिसके शिखरपर चढ़कर वे बाँसुरी बजाते थे । ये वे ही वन हैं, जिनमें वे रात्रिके समय रासलीला करते थे, और ये वे ही गौएँ हैं, जिनको चरानेके लिये वे सुबह- शाम हमलोगोंको देखते हुए जाते-आते थे । और यह ठीक वैसी ही वंशीकी तान हमारे कानोंमें गूँजती रहती है, जैसी वे अपने अधरोंके संयोगसे छेड़ा करते थे । बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने इन सभीका सेवन किया है ॥४९ ॥
यहाँका एक- एक प्रदेश, एक-एक धूलिकण उनके परम सुन्दर चरणकमलोंसे चिह्नित है । इन्हें जब-जब हम देखती हैं, सुनती हैं - दिनभर यही तो करती रहती हैं - तब- तब वे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर नन्दनन्दनको हमारे नेत्रोंके सामने लाकर रख देते हैं । उद्धवजी! हम किसी भी प्रकार मरकर भी उन्हें भूल नहीं सकतीं ॥५० ॥
उनकी वह हंसकी- सी सुन्दर चाल, उन्मुक्त हास्य, विलासपूर्ण चितवन और मधुमयी वाणी! आह! उन सबने हमारा चित्त चुरा लिया है, हमारा मन हमारे वशमें नहीं है; अब हम उन्हें भूलें तो किस तरह? ॥५१ ॥
हमारे प्यारे श्रीकृष्ण! तुम्हीं हमारे जीवनके स्वामी हो, सर्वस्व हो । प्यारे! तुम लक्ष्मीनाथ हो तो क्या हुआ? हमारे लिये तो व्रजनाथ ही हो । हम व्रजगोपियोंके एकमात्र तुम्हीं सच्चे स्वामी हो । श्यामसुन्दर! तुमने बार- बार हमारी व्यथा मिटायी है, हमारे संकट काटे हैं । गोविन्द! तुम गौओंसे बहुत प्रेम करते हो । क्या हम गौएँ नहीं हैं? तुम्हारा यह सारा गोकुल जिसमें ग्वालबाल, माता-पिता, गौएँ और हम गोपियाँ सब कोई हैं – दुःखके अपार सागरमें डूब रहा है । तुम इसे बचाओ, आओ, हमारी रक्षा करो ॥५२ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं -प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय सन्देश सुनकर गोपियोंके विरहकी व्यथा शान्त हो गयी थी । वे इन्द्रियातीत भगवान् श्रीकृष्णको अपने आत्माके रूपमें सर्वत्र स्थित समझ चुकी थीं । अब वे बड़े प्रेम और आदरसे उद्धवजीका सत्कार करने लगीं ॥५३ ॥
उवास कतिचिन्मासान् गोपीनां विनुदञ्छुचः ।
कृष्णलीलाकथां गायन् रमयामास गोकुलम् ॥५४
यावन्त्यहानि नन्दस्य व्रजेऽवात्सीत् स उद्धवः ।
व्रजौकसां क्षणप्रायाण्यासन् कृष्णस्य वार्तया ॥५५
पृष्ठ 646
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सरिद्वनगिरिद्रोणीर्वीक्षन् कुसुमितान् द्रुमान् ।
कृष्णं संस्मारयन् रेमे हरिदासो व्रजौकसाम् ॥ ५६
दृष्ट्वैवमादि गोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लवम् ।
उद्धवः परमप्रीतस्ता नमस्यन्निदं जगौ ॥५७
एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः । वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य ॥५८ उद्धवजी गोपियोंकी विरह- व्यथा मिटानेके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे । वे भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों लीलाएँ और बातें सुना- सुनाकर व्रज-वासियोंको आनन्दित करते रहते ॥५४ ॥
नन्दबाबाके व्रजमें जितने दिनोंतक उद्धवजी रहे, उतने दिनोंतक भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकी चर्चा होते रहनेके कारण व्रजवासियोंको ऐसा जान पड़ा, मानो अभी एक ही क्षण हुआ हो ॥५५ ॥
भगवान्के परमप्रेमी भक्त उद्धवजी कभी नदीतटपर जाते, कभी वनोंमें विहरते और कभी गिरिराजकी घाटियोंमें विचरते । कभी रंग- बिरंगे फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंमें ही रम जाते और यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने कौन- सी लीला की है, यह पूछ- पूछकर व्रजवासियोंको भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाके स्मरणमें तन्मय कर देते ॥५६ ॥
उद्धवजीने व्रजमें रहकर गोपियोंकी इस प्रकारकी प्रेम-विकलता तथा और भी बहुत - सी प्रेम- चेष्टाएँ देखीं । उनकी इस प्रकार श्रीकृष्णमें तन्मयता देखकर वे प्रेम और आनन्दसे भर गये । अब वे गोपियोंको नमस्कार करते हुए इस प्रकार गान करने लगे - ॥५७ ॥
' इस पृथ्वीपर केवल इन गोपियोंका ही शरीर धारण करना श्रेष्ठ एवं सफल है; क्योंकि ये सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णके परम प्रेममय दिव्य महाभावमें स्थित हो गयी हैं । प्रेमकी यह ऊँची - से - ऊँची स्थिति संसारके भयसे भीत मुमुक्षुजनोंके लिये ही नहीं, अपितु बड़े - बड़े मुनियों -मुक्त पुरुषों तथा हम भक्तजनोंके लिये भी अभी वाञ्छनीय ही है । हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी । सत्य है, जिन्हें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला - कथाके रसका चसका लग गया है, उन्हें कुलीनताकी, द्विजातिसमुचित संस्कारकी और बड़े - बड़े यज्ञ- यागोंमें दीक्षित होनेकी क्या आवश्यकता है? अथवा यदि भगवान्की कथाका रस नहीं मिला, उसमें रुचि नहीं हुई, तो अनेक महाकल्पोंतक बार- बार ब्रह्मा होनेसे ही क्या लाभ? ॥ ५८ ॥
क्वेमाः स्त्रियो वनचरीर्व्यभिचारदुष्टाः कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभावः । नवीश्वरोऽनुभजतोऽविदुषोऽपि साक्षा-
पृष्ठ 647
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
च्छ्रेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्तः ॥ ५ ९ नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः ।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजबल्लवीनाम् ॥६०
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम् । या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम् ॥६१ या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै- योगेश्वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम् । कृष्णस्य तद् भगवतश्चरणारविन्दं न्यस्तं स्तनेषु विजहुः परिरभ्य तापम् ॥६२ कहाँ ये वनचरी आचार, ज्ञान और जातिसे हीन गाँवकी गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्णमें यह अनन्य परम प्रेम! अहो, धन्य है! धन्य है! इससे सिद्ध होता है कि कोई भगवान्के स्वरूप और रहस्यको न जानकर भी उनसे प्रेम करे, उनका भजन करे, तो वे स्वयं अपनी शक्तिसे अपनी कृपासे उसका परम कल्याण कर देते हैं; ठीक वैसे ही, जैसे कोई अनजानमें भी अमृत पी ले तो वह अपनी वस्तु- शक्तिसे ही पीनेवालेको अमर बना देता है ॥५९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने रासोत्सवके समय इन व्रजांगनाओंके गलेमें
बाँह डाल- डालकर इनके मनोरथ पूर्ण किये । इन्हें भगवान्ने जिस कृपा प्रसादका वितरण किया, इन्हें जैसा प्रेमदान किया, वैसा भगवान्की परमप्रेमवती नित्यसंगिनी वक्षःस्थलपर विराजमान लक्ष्मीजीको भी नहीं प्राप्त हुआ । कमलकी- सी सुगन्ध और कान्तिसे युक्त देवांगनाओंको भी नहीं मिला । फिर दूसरी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या करें? ॥ ६० ॥ मेरे लिये
तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावनधाममें कोई झाड़ी, लता अथवा ओषधि —जड़ी- बूटी ही बन जाऊँ! अहा! यदि मैं ऐसा बन जाऊँगा, तो मुझे इन व्रजांगनाओंकी चरणधूलि निरन्तर सेवन करनेके लिये मिलती रहेगी । इनकी चरण - रजमें स्नान करके मैं धन्य हो जाऊँगा। धन्य हैं ये गोपियाँ । देखो तो सही, जिनको छोड़ना अत्यन्त कठिन है, उन स्वजन - सम्बन्धियों तथा लोक- वेदकी आर्य-मर्यादाका परित्याग करके इन्होंने भगवान्की पदवी, उनके साथ तन्मयता, उनका परम प्रेम प्राप्त कर लिया है- औरोंकी तो बात ही क्या – भगवद्वाणी, उनकी निःश्वासरूप समस्त श्रुतियाँ, उपनिषदें भी अबतक भगवान्के परम प्रेममय स्वरूपको ढूँढ़ती ही रहती हैं, प्राप्त नहीं कर पातीं ॥६१ ॥
स्वयं भगवती लक्ष्मीजी जिनकी पूजा करती रहती हैं; ब्रह्मा, शंकर आदि परम समर्थ
पृष्ठ 648
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
देवता, पूर्णकाम आत्माराम और बड़े - बड़े योगेश्वर अपने हृदयमें जिनका चिन्तन करते रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्णके उन्हीं चरणारविन्दोंको रास लीलाके समय गोपियोंने अपने वक्षःस्थलपर रखा और उनका आलिंगन करके अपने हृदयकी जलन, विरह- व्यथा शान्त की ॥६२ ॥ नन्दबाबाके व्रजमें रहनेवाली गोपांगनाओंकी चरण- धूलिको मैं बारंबार प्रणाम
करता हूँ — उसे सिरपर चढ़ाता हूँ। अहा! इन गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकथाके सम्बन्धमें जो कुछ गान किया है, वह तीनों लोकोंको पवित्र कर रहा है और सदा - सर्वदा पवित्र करता रहेगा ' ॥६३ ॥
वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः ।
यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥ ६३
श्रीशुक उवाच
अथ गोपीरनुज्ञाप्य यशोदां नन्दमेव च ।
गोपानामन्त्र्य दाशार्हो यास्यन्नारुरुहे रथम् ॥६४
तं निर्गतं समासाद्य नानोपायनपाणयः ।
नन्दादयोऽनुरागेण प्रावोचन्नश्रुलोचनाः ॥६५
मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः ।
वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु ॥ ६६
कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया ।
मंगलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्वरे ॥६७
एवं सभाजितो गोपैः कृष्णभक्त्या नराधिप ।
उद्धवः पुनरागच्छन्मथुरां कृष्णपालिताम् ॥६८
कृष्णाय प्रणिपत्याह भक्त्युद्रेकं व्रजौकसाम् ।
वसुदेवाय रामाय राज्ञे चोपायनान्यदात् ॥६९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार कई महीनोंतक व्रजमें रहकर उद्धवजीने अब मथुरा जानेके लिये गोपियोंसे, नन्दबाबा और यशोदा मैयासे आज्ञा प्राप्त की । ग्वालबालोंसे विदा लेकर वहाँसे यात्रा करनेके लिये वे रथपर सवार हुए ॥ ६४ ॥ जब उनका
रथ व्रजसे बाहर निकला, तब नन्दबाबा आदि गोपगण बहुत -सी भेंटकी सामग्री लेकर उनके पास आये और आँखोंमें आँसू भरकर उन्होंने बड़े प्रेमसे कहा - || ६५ ॥ ' उद्धवजी! अब हम यही चाहते हैं कि हमारे मनकी एक- एक वृत्ति, एक-एक संकल्प श्रीकृष्णके चरणकमलोंके
पृष्ठ 649
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ही आश्रित रहे । उन्हींकी सेवाके लिये उठे और उन्हींमें लगी भी रहे । हमारी वाणी नित्य-निरन्तर उन्हींके नामोंका उच्चारण करती रहे और शरीर उन्हींको प्रणाम करने, उन्हींकी आज्ञा - पालन और सेवामें लगा रहे ॥ ६६ ॥ उद्धवजी! हम सच कहते हैं, हमें मोक्षकी इच्छा
बिलकुल नहीं है । हम भगवान्की इच्छासे अपने कर्मोंके अनुसार चाहे जिस योनिमें जन्म लें —वहाँ शुभ आचरण करें, दान करें और उसका फल यही पावें कि हमारे अपने ईश्वर श्रीकृष्णमें हमारी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे ' ॥ ६७ ॥ प्रिय परीक्षित्! नन्दबाबा आदि गोपोंने
इस प्रकार श्रीकृष्ण- भक्तिके द्वारा उद्धवजीका सम्मान किया । अब वे भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित मथुरापुरीमें लौट आये ॥ ६८ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको
प्रणाम किया और उन्हें व्रजवासियोंकी प्रेममयी भक्तिका उद्रेक, जैसा उन्होंने देखा था, कह सुनाया। इसके बाद नन्दबाबाने भेंटकी जो- जो सामग्री दी थी वह उनको, वसुदेवजी, बलरामजी और राजा उग्रसेनको दे दी ॥ ६९ ॥
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे उद्धवप्रतियाने सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७ ॥
१. कृष्णे ।
पृष्ठ 650
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः भगवान्का कुब्जा और अक्रूरजीके घर जाना श्रीशुक उवाच
अथ विज्ञाय भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः ।
सैरन्ध्रयाः कामतप्तायाः प्रियमिच्छन् गृहं ययौ ॥१
महार्होपस्करैराढ्यं कामोपायोपबृंहितम् ।
मुक्तादामपताकाभिर्वितानशयनासनैः ।
धूपैः सुरभिभिर्दीपैः स्रग्गन्धैरपि मण्डितम् ॥२
गृहं तमायान्तमवेक्ष्य साऽऽसनात् सद्यः समुत्थाय हि जातसम्भ्रमा । यथोपसंगम्य सखीभिरच्युतं सभाजयामास सदासनादिभिः ॥३ तथोद्धवः साधु तयाभिपूजितो न्यषीददुर्व्यामभिमृश्य चासनम् । कृष्णोऽपि तूर्णं शयनं महाधनं विवेश लोकाचरितान्यनुव्रतः ॥ ४ सा मज्जनालेपदुकूलभूषण- स्रग्गन्धताम्बूलसुधासवादिभिः । प्रसाधितात्मोपससार माधवं सव्रीडलीलोत्स्मितविभ्रमेक्षितैः ॥५ आहूय कान्तां नवसंगमहिया विशंकितां कंकणभूषिते करे । प्रगृह्य शय्यामधिवेश्य रामया रेमेऽनुलेपार्पणपुण्यलेशया ॥६ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! तदनन्तर सबके आत्मा तथा सब कुछ देखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनेसे मिलनकी आकांक्षा रखकर व्याकुल हुई कुब्जाका प्रिय करने — उसे सुख देनेकी इच्छासे उसके घर गये || १ || कुब्जाका घर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सम्पन्न था । उसमें शृंगार- रसका उद्दीपन करनेवाली बहुत-सी साधन- सामग्री भी भरी हुई थी । मोतीकी