श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 681–690

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690

पृष्ठ 681

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पृथ्वीके भार बने हुए असुरोंका संहार करनेके लिये प्रार्थना की थी ॥४० ॥ उन्हींकी प्रार्थनासे

मैंने यदुवंशमें वसुदेवजीके यहाँ अवतार ग्रहण किया है । अब मैं वसुदेवजीका पुत्र हूँ, इसलिये लोग मुझे ' वासुदेव ' कहते हैं ॥४१ ॥ अबतक मैं कालनेमि असुरका, जो कंसके रूपमें पैदा

हुआ था, तथा प्रलम्ब आदि अनेकों साधुद्रोही असुरोंका संहार कर चुका हूँ । राजन्! यह कालयवन था, जो मेरी ही प्रेरणासे तुम्हारी तीक्ष्ण दृष्टि पड़ते ही भस्म हो गया ॥ ४२ ॥ वही मैं

तुमपर कृपा करनेके लिये ही इस गुफामें आया हूँ। तुमने पहले मेरी बहुत आराधना की है और मैं हूँ भक्तवत्सल ॥४३ ॥ इसलिये राजर्षे! तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो । मैं

तुम्हारी सारी लालसा, अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा । जो पुरुष मेरी शरणमें आ जाता है उसके लिये फिर ऐसी कोई वस्तु नहीं रह जाती, जिसके लिये वह शोक करे ॥४४ ॥

कालनेमिर्हतः कंसः प्रलम्बाद्याश्च सद्विषः ।

अयं च यवनो दग्धो राजंस्ते तिग्मचक्षुषा ॥४२

सोऽहं तवानुग्रहार्थं गुहामेतामुपागतः ।

प्रार्थितः प्रचुरं पूर्वं त्वयाहं भक्तवत्सलः ॥४३

वरान् वृणीष्व राजर्षे सर्वान् कामान् ददामि ते ।

मां प्रपन्नो जनः कश्चिन्न भूयोऽर्हति शोचितुम् ॥४४

श्रीशुक उवाच

इत्युक्तस्तं प्रणम्याह मुचुकुन्दो मुदान्वितः ।

ज्ञात्वा नारायणं देवं गर्गवाक्यमनुस्मरन् ॥४५

मुचुकुन्द उवाच विमोहितोऽयं जन ईश मायया त्वदीयया त्वां न भजत्यनर्थदृक् । सुखाय दुःखप्रभवेषु सज्जते गृहेषु योषित् पुरुषश्च वंचितः ॥४६ लब्ध्वा जनो दुर्लभमत्र मानुषं

कथंचिदव्यंगमयत्नतोऽनघ ।

पादारविन्दं न भजत्यसन्मति- र्गृहान्धकूपे पतितो यथा पशुः ॥४७

श्रीशुकदेवजी कहते हैं-जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा, तब राजा मुचुकुन्दको वृद्ध गर्गका यह कथन याद आ गया कि यदुवंशमें भगवान् अवतीर्ण होनेवाले हैं । वे जान गये कि ये स्वयं भगवान् नारायण हैं । आनन्दसे भरकर उन्होंने भगवान्के चरणोंमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 682

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प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की ॥४५ ॥

मुचुकुन्दने कहा — ' प्रभो! जगत्के सभी प्राणी आपकी मायासे अत्यन्त मोहित हो रहे हैं । वे आपसे विमुख होकर अनर्थमें ही फँसे रहते हैं और आपका भजन नहीं करते । वे सुखके लिये घर- गृहस्थीके उन झंझटोंमें फँस जाते हैं, जो सारे दुःखोंके मूल स्रोत हैं । इस तरह स्त्री और पुरुष सभी ठगे जा रहे हैं ॥ ४६ ॥ इस पापरूप संसारसे सर्वथा रहित प्रभो!

यह भूमि अत्यन्त पवित्र कर्मभूमि है, इसमें मनुष्यका जन्म होना अत्यन्त दुर्लभ है । मनुष्य-जीवन इतना पूर्ण है कि उसमें भजनके लिये कोई भी असुविधा नहीं है । अपने परम सौभाग्य और भगवान्‌की अहैतुक कृपासे उसे अनायास ही प्राप्त करके भी जो अपनी मति, गति असत् संसारमें ही लगा देते हैं और तुच्छ विषयसुखके लिये ही सारा प्रयत्न करते हुए घर-गृहस्थीके अँधेरे कूएँमें पड़े रहते हैं - भगवान्के चरणकमलोंकी उपासना नहीं करते, भजन नहीं करते, वे तो ठीक उस पशुके समान हैं, जो तुच्छ तृणके लोभसे अँधेरे कूएँमें गिर जाता है ॥४७ ॥ भगवन्! मैं राजा था, राज्यलक्ष्मीके मदसे मैं मतवाला हो रहा था । इस मरनेवाले

शरीरको ही तो मैं आत्मा - अपना स्वरूप समझ रहा था और राजकुमार, रानी, खजाना तथा पृथ्वीके लोभ- मोहमें ही फँसा हुआ था । उन वस्तुओंकी चिन्ता दिन- रात मेरे गले लगी रहती थी । इस प्रकार मेरे जीवनका यह अमूल्य समय बिलकुल निष्फल - व्यर्थ चला गया ॥४८ ॥

जो शरीर प्रत्यक्ष ही घड़े और भीतके समान मिट्टीका है और दृश्य होनेके कारण उन्हींके समान अपनेसे अलग भी है, उसीको मैंने अपना स्वरूप मान लिया था और फिर अपनेको मान बैठा था ‘ नरदेव'! इस प्रकार मैंने मदान्ध होकर आपको तो कुछ समझा ही नहीं । रथ, हाथी, घोड़े और पैदलकी चतुरंगिणी सेना तथा सेनापतियोंसे घिरकर मैं पृथ्वीमें इधर- उधर घूमता रहता ॥४९ ॥ मुझे यह करना चाहिये और यह नहीं करना चाहिये, इस प्रकार विविध

कर्तव्य और अकर्तव्योंकी चिन्तामें पड़कर मनुष्य अपने एकमात्र कर्तव्य भगवत्प्राप्तिसे विमुख होकर प्रमत्त हो जाता है, असावधान हो जाता है । संसारमें बाँध रखनेवाले विषयोंके लिये उसकी लालसा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जाती है । परन्तु जैसे भूखके कारण जीभ लपलपाता हुआ साँप असावधान चूहेको दबोच लेता है, वैसे ही कालरूपसे सदा- सर्वदा सावधान रहनेवाले आप एकाएक उस प्रमादग्रस्त प्राणीपर टूट पड़ते हैं और उसे ले बीतते हैं ॥ ५० ॥ जो पहले सोनेके रथोंपर अथवा बड़े - बड़े गजराजोंपर चढ़कर चलता था और

नरदेव कहलाता था, वही शरीर आपके अबाध कालका ग्रास बनकर बाहर फेंक देनेपर पक्षियोंकी विष्ठा, धरतीमें गाड़ देनेपर सड़कर कीड़ा और आगमें जला देनेपर राखका ढेर बन जाता है ॥५१ ॥ प्रभो! जिसने सारी दिशाओंपर विजय प्राप्त कर ली है और जिससे

लड़नेवाला संसारमें कोई रह नहीं गया है, जो श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठता है और बड़े- बड़े नरपति, जो पहले उसके समान थे, अब जिसके चरणोंमें सिर झुकाते हैं, वही पुरुष जब विषय- सुख भोगनेके लिये, जो घर-गृहस्थीकी एक विशेष वस्तु है, स्त्रियोंके पास जाता है, तब उनके हाथका खिलौना, उनका पालतू पशु बन जाता है ॥ ५२ ॥ बहुत- से लोग विषय- भोग छोड़कर पुनः राज्यादि भोग मिलनेकी इच्छासे ही दान- पुण्य करते हैं और ' मैं फिर जन्म

लेकर सबसे बड़ा परम स्वतन्त्र सम्राट् होऊँ । ' ऐसी कामना रखकर तपस्यामें भलीभाँति स्थित ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 683

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हो शुभकर्म करते हैं । इस प्रकार जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है, वह कदापि सुखी नहीं हो सकता ॥५३ ॥ अपने स्वरूपमें एकरस स्थित रहनेवाले भगवन्! जीव अनादिकालसे जन्म- मृत्युरूप संसारके चक्कर में भटक रहा है। जब उस चक्करसे छूटनेका समय आता है, तब

उसे सत्संग प्राप्त होता है । यह निश्चय है कि जिस क्षण सत्संग प्राप्त होता है, उसी क्षण संतोंके आश्रय, कार्य- कारणरूप जगत्के एकमात्र स्वामी आपमें जीवकी बुद्धि अत्यन्त दृढ़तासे लग जाती है ॥५४ ॥ भगवन्! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आपने मेरे ऊपर परम

अनुग्रहकी वर्षा की, क्योंकि बिना किसी परिश्रमके - अनायास ही मेरे राज्यका बन्धन टूट गया । साधु- स्वभावके चक्रवर्ती राजा भी जब अपना राज्य छोड़कर एकान्तमें भजन-साधन करनेके उद्देश्यसे वनमें जाना चाहते हैं, तब उसके ममता- बन्धनसे मुक्त होनेके लिये बड़े प्रेमसे आपसे प्रार्थना किया करते हैं ॥ ५५ ॥ अन्तर्यामी प्रभो! आपसे क्या छिपा है? मैं

आपके चरणोंकी सेवाके अतिरिक्त और कोई भी वर नहीं चाहता; क्योंकि जिनके पास किसी प्रकारका संग्रह - परिग्रह नहीं है अथवा जो उसके अभिमानसे रहित हैं, वे लोग भी केवल उसीके लिये प्रार्थना करते रहते हैं । भगवन्! भला, बतलाइये तो सही - मोक्ष देनेवाले आपकी आराधना करके ऐसा कौन श्रेष्ठ पुरुष होगा, जो अपनेको बाँधनेवाले सांसारिक विषयोंका वर माँगे || ५६ || ममैष कालोऽजित निष्फलो गतो

राज्यश्रियोन्नद्धमदस्य भूपतेः ।

मर्त्यात्मबुद्धेः सुतदारकोशभू- ष्वासज्जमानस्य दुरन्तचिन्तया ॥४८

कलेवरेऽस्मिन् घटकुड्यसन्निभे

निरूढमानो नरदेव इत्यहम् ।

वृतो रथेभाश्वपदात्यनीकपै- र्गां पर्यटंस्त्वागणयन् सुदुर्मदः ॥४९

प्रमत्तमुच्चैरितिकृत्यचिन्तया प्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम् । त्वमप्रमत्तः सहसाभिपद्यसे क्षुल्लेलिहानोऽहिरिवाखुमन्तकः ॥ ५० पुरा रथैर्हेमपरिष्कृतैश्चरन् मतंगजैर्वा नरदेवसंज्ञितः स एव कालेन दुरत्ययेन ते कलेवरो विट्कृमिभस्मसंज्ञितः ॥५१ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 684

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निर्जित्य दिक्चक्रमभूतविग्रहो वरासनस्थः समराजवन्दितः । गृहेषु मैथुन्यसुखेषु योषितां क्रीडामृगः पूरुष ईश नीयते ॥५२ करोति कर्माणि तपस्सुनिष्ठितो निवृत्तभोगस्तदपेक्षया ददत् । पुनश्च भूयेयमहं स्वराडिति प्रवृद्धतर्षो न सुखाय कल्पते ॥५३ भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः । सत्संगमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते मतिः ॥ ५४ मन्ये ममानुग्रह ईश ते कृतो राज्यानुबन्धापगमो यदृच्छया । यः प्रार्थ्यते साधुभिरेकचर्यया वनं विविक्षद्भिरखण्ड भूमिपैः ॥ ५५ न कामयेऽन्यं तव पादसेवना- दकिञ्चनप्रार्थ्यतमाद् वरं विभो । आराध्य कस्त्वां ह्यपवर्गदं हरे वृणीत आर्यो वरमात्मबन्धनम् ॥५६ तस्माद् विसृज्याशिष ईश सर्वतो रजस्तमःसत्त्वगुणानुबन्धनाः । निरंजनं निर्गुणमद्वयं परं त्वां ज्ञप्तिमात्रं पुरुषं व्रजाम्यहम् ॥५७ चिरमिह वृजिनार्तस्तप्यमानोऽनुतापै- रवितृषषडमित्रोऽलब्धशान्तिः कथंचित् । इसलिये प्रभो! मैं सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे सम्बन्ध रखनेवाली समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल मायाके लेशमात्र सम्बन्धसे रहित, गुणातीत, एक — अद्वितीय, चित्स्वरूप परमपुरुष आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ५७ ॥ भगवन्! मैं अनादिकालसे अपने

कर्मफलोंको भोगते - भोगते अत्यन्त आर्त हो रहा था, उनकी दुःखद ज्वाला रात - दिन मुझे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 685

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जलाती रहती थी । मेरे छ: शत्रु ( पाँच इन्द्रिय और एक मन) कभी शान्त न होते थे, उनकी विषयोंकी प्यास बढ़ती ही जा रही थी । कभी किसी प्रकार एक क्षणके लिये भी मुझे शान्ति न मिली । शरणदाता! अब मैं आपके भय, मृत्यु और शोकसे रहित चरणकमलोंकी शरणमें आया हूँ। सारे जगत्के एकमात्र स्वामी! परमात्मन्! आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये ॥५८ ॥

शरणद समुपेतस्त्वत्पदाब्जं परात्म- न्नभयमृतमशोकं पाहि माऽऽपन्नमीश ॥५८ श्रीभगवानुवाच

सार्वभौम महाराज मतिस्ते विमलोर्जिता ।

वरैः प्रलोभितस्यापि न कामैर्विहता यतः ॥५९

प्रलोभितो वरैर्यत्त्वमप्रमादाय विद्धि तत् ।

न धीर्मय्येकभक्तानामाशीर्भिर्भिद्यते क्वचित् ॥ ६०

युंजानानामभक्तानां प्राणायामादिभिर्मनः ।

अक्षीणवासनं राजन् दृश्यते पुनरुत्थितम् ॥६१

विचरस्व महीं कामं मय्यावेशितमानसः ।

अस्त्वेव नित्यदा तुभ्यं भक्तिर्मय्यनपायिनी ॥ ६२

क्षात्रधर्मस्थितो जन्तून् न्यवधीर्मृगयादिभिः ।

समाहितस्तत्तपसा जह्यघं मदुपाश्रितः ॥ ६३

जन्मन्यनन्तरे राजन् सर्वभूतसुहृत्तमः ।

भूत्वा द्विजवरस्त्वं वै मामुपैष्यसि केवलम् ॥६४

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - ' सार्वभौम महाराज! तुम्हारी मति, तुम्हारा निश्चय बड़ा ही पवित्र और ऊँची कोटिका है । यद्यपि मैंने तुम्हें बार- बार वर देनेका प्रलोभन दिया, फिर भी तुम्हारी बुद्धि कामनाओंके अधीन न हुई ॥ ५ ९ ॥ मैंने तुम्हें जो वर देनेका प्रलोभन दिया, वह केवल तुम्हारी सावधानीकी परीक्षाके लिये । मेरे जो अनन्य भक्त होते हैं, उनकी बुद्धि कभी कामनाओंसे इधर- उधर नहीं भटकती ॥ ६० ॥ जो लोग मेरे भक्त नहीं होते, वे चाहे प्राणायाम

आदिके द्वारा अपने मनको वशमें करनेका कितना ही प्रयत्न क्यों न करें, उनकी वासनाएँ क्षीण नहीं होतीं और राजन्! उनका मन फिरसे विषयोंके लिये मचल पड़ता है ॥६१ ॥ तुम

अपने मन और सारे मनोभावोंको मुझे समर्पित कर दो, मुझमें लगा दो और फिर स्वच्छन्दरूपसे पृथ्वीपर विचरण करो । मुझमें तुम्हारी विषय- वासनाशून्य निर्मल भक्ति सदा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 686

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बनी रहेगी ॥६२ ॥ तुमने क्षत्रियधर्मका आचरण करते समय शिकार आदिके अवसरोंपर

बहुत -से पशुओंका वध किया है । अब एकाग्रचित्तसे मेरी उपासना करते हुए तपस्याके द्वारा उस पापको धो डालो ॥ ६३ ॥ राजन्! अगले जन्ममें तुम ब्राह्मण बनोगे और समस्त

प्राणियोंके सच्चे हितैषी, परम सुहृद् होओगे तथा फिर मुझ विशुद्ध विज्ञानघन परमात्माको प्राप्त करोगे ' ॥६४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे मुचुकुन्दस्तुतिर्नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

१. मात्मजेनैव । २. नाशनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 687

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अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः द्वारकागमन, श्रीबलरामजीका विवाह तथा श्रीकृष्णके पास रुक्मिणीजीका सन्देशा लेकर ब्राह्मणका आना श्रीशुक उवाच

इत्थं सोऽनुगृहीतोऽङ्ग कृष्णेनेक्ष्वाकुनन्दनः ।

तं परिक्रम्य सन्नम्य निश्चक्राम गुहामुखात् ॥१

स वीक्ष्य क्षुल्लकान् मर्त्यान् पशून् वीरुद्वनस्पतीन् ।

मत्वा कलियुगं प्राप्तं जगाम दिशमुत्तराम् ॥२

तपःश्रद्धायुतो धीरो निःसंगो मुक्तसंशयः ।

समाधाय मनः कृष्णे प्राविशद् गन्धमादनम् ॥३

बदर्याश्रममासाद्य नरनारायणालयम् ।

सर्वद्वन्द्वसहः शान्तस्तपसाऽऽराधयद्धरिम् ॥४

भगवान् पुनराव्रज्य पुरीं यवनवेष्टिताम् ।

हत्वा म्लेच्छबलं निन्ये तदीयं द्वारकां धनम् ॥५

नीयमाने धने गोभिर्नृभिश्चाच्युतचोदितैः ।

आजगाम जरासन्धस्त्रयोविंशत्यनीकपः ॥ ६

विलोक्य वेगरभसं रिपुसैन्यस्य माधवी ।

मनुष्यचेष्टामापन्नौ राजन् दुद्रुवतुर्द्रुतम् ॥७

विहाय वित्तं प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत् ।

पद्भयां पद्मपलाशाभ्यां चेरतुर्बहुयोजनम् ॥८

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्यारे परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार इक्ष्वाकुनन्दन राजा मुचुकुन्दपर अनुग्रह किया । अब उन्होंने भगवान्‌की परिक्रमा की, उन्हें नमस्कार किया और गुफासे बाहर निकले ॥१ ॥ उन्होंने बाहर आकर देखा कि सब- के - सब मनुष्य, पशु, लता

और वृक्ष - वनस्पति पहलेकी अपेक्षा बहुत छोटे- छोटे आकारके हो गये हैं । इससे यह जानकर कि कलियुग आ गया, वे उत्तर दिशाकी ओर चल दिये || २ || महाराज मुचुकुन्द तपस्या, श्रद्धा, धैर्य तथा अनासक्तिसे युक्त एवं संशय- सन्देहसे मुक्त थे । वे अपना चित्त भगवान् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 688

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श्रीकृष्णमें लगाकर गन्ध- मादन पर्वतपर जा पहुँचे ॥३ ॥ भगवान् नर- नारायणके नित्य

निवासस्थान बदरिकाश्रममें जाकर बड़े शान्त- भावसे गर्मी सर्दी आदि द्वन्द्व सहते हुए वे तपस्याके द्वारा भगवान्की आराधना करने लगे ॥४ ॥

इधर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरापुरीमें लौट आये । अबतक कालयवनकी सेनाने उसे घेर रखा था । अब उन्होंने म्लेच्छोंकी सेनाका संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारकाको ले चले ॥५ ॥ जिस समय भगवान् श्रीकृष्णके आज्ञानुसार मनुष्यों और बैलोंपर वह धन ले

जाया जाने लगा, उसी समय मगधराज जरासन्ध फिर ( अठारहवीं बार ) तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर आ धमका ॥६ ॥ परीक्षित्! शत्रु - सेनाका प्रबल वेग देखकर भगवान् श्रीकृष्ण

और बलराम मनुष्योंकी-सी लीला करते हुए उसके सामनेसे बड़ी फुर्तीके साथ भाग निकले ॥७ ॥ उनके मनमें तनिक भी भय न था । फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गये हों

—इस प्रकारका नाट्य करते हुए, वह सब का सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनोंतक वे अपने कमलदलके समान सुकोमल चरणोंसे ही - पैदल भागते चले गये ॥८ ॥ जब महाबली

मगधराज जरासन्धने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम तो भाग रहे हैं, तब वह हँसने लगा और अपनी रथ- सेनाके साथ उनका पीछा करने लगा । उसे भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके ऐश्वर्य, प्रभाव आदिका ज्ञान न था ॥ ९ ॥ बहुत दूरतक दौड़नेके कारण दोनों भाई कुछ थक-से गये । अब वे बहुत ऊँचे प्रवर्षण पर्वतपर चढ़ गये । उस पर्वतका 'प्रवर्षण' नाम इसलिये

पड़ा था कि वहाँ सदा ही मेघ वर्षा किया करते थे ॥१० ॥ परीक्षित्! जब जरासन्धने देखा

कि वे दोनों पहाड़में छिप गये और बहुत ढूँढ़नेपर भी पता न चला, तब उसने ईंधनसे भरे हुए प्रवर्षण पर्वतके चारों ओर आग लगवाकर उसे जला दिया || ११ || जब भगवान्ने देखा कि पर्वतके छोर जलने लगे हैं, तब दोनों भाई जरासन्धकी सेनाके घेरेको लाँघते हुए बड़े वेगसे उस ग्यारह योजन ( चौवालीस कोस) ऊँचे पर्वतसे एकदम नीचे धरती पर कूद आये ॥१२ ॥

राजन्! उन्हें जरासन्धने अथवा उसके किसी सैनिकने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहाँसे चलकर फिर अपनी समुद्रसे घिरी हुई द्वारकापुरीमें चले आये || १३ || जरासन्धने झूठमूठ ऐसा मान लिया कि श्रीकृष्ण और बलराम तो जल गये और फिर वह अपनी बहुत बड़ी सेना लौटाकर मगधदेशको चला गया ॥१४ ॥

पलायमानौ तौ दृष्ट्वा मागधः प्रहसन् बली ।

अन्वधावद् रथानीकैरीशयोरप्रमाणवित् ॥९

प्रद्रुत्य दूरं संश्रान्तौ तुंगमारुहतां गिरिम् ।

प्रवर्षणाख्यं भगवान् नित्यदा यत्र वर्षति ॥ १०

गिरौ निलीनावाज्ञाय नाधिगम्य पदं नृप ।

ददाह गिरिमेधोभिः समन्तादग्निमुत्सृजन् ॥११

तत उत्पत्य तरसा दह्यमानतटादुभौ । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 689

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दशैकयोजनोत्तुंगान्निपेततुरधो भुवि ॥ १२

अलक्ष्यमाणी रिपुणा सानुगेन यदूत्तमौ ।

स्वपुरं पुनरायातौ समुद्रपरिखां नृप ॥ १३

सोऽपि दग्धाविति मृषा मन्वानो बलकेशवौ ।

बलमाकृष्य सुमहन्मगधान् मागधो ययौ ॥१४

आनर्ताधिपतिः श्रीमान् रैवतो रेवतीं सुताम् ।

ब्रह्मणा चोदितः प्रादाद् बलायेति पुरोदितम् ॥१५

भगवानपि गोविन्द उपयेमे कुरूद्वह ।

वैदर्भी भीष्मकसुतां श्रियो मात्रां स्वयंवरे ॥१६

प्रमथ्य तरसा राज्ञः शाल्वादींश्चैद्यपक्षगान् ।

पश्यतां सर्वलोकानां तार्क्ष्यपुत्रः सुधामिव ॥१७

राजोवाच

भगवान् भीष्मकसुतां रुक्मिणीं रुचिराननाम् ।

राक्षसेन विधानेन उपयेम इति श्रुतम् ॥१८

यह बात मैं तुमसे पहले ही ( नवम स्कन्धमें कह चुका हूँ कि आनर्तदेशके राजा श्रीमान् रैवतजीने अपनी रेवती नामकी कन्या ब्रह्माजीकी प्रेरणासे बल- रामजीके साथ ब्याह दी ॥१५ ॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण भी स्वयंवरमें आये हुए शिशुपाल और उसके

पक्षपाती शाल्व आदि नरपतियोंको बलपूर्वक हराकर सबके देखते -देखते, जैसे गरुड़ने सुधाका हरण किया था, वैसे ही विदर्भदेशकी राजकुमारी रुक्मिणीको हर लाये और उनसे विवाह कर लिया । रुक्मिणीजी राजा भीष्मककी कन्या और स्वयं भगवती लक्ष्मीजीका अवतार थीं ॥१६-१७ ॥ राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! हमने सुना है कि भगवान् श्रीकृष्णने भीष्मकनन्दिनी परमसुन्दरी रुक्मिणीदेवीको बलपूर्वक हरण करके राक्षसविधिसे उनके साथ विवाह किया था ॥१८ ॥ महाराज! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि परम तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने

जरासन्ध, शाल्व आदि नरपतियोंको जीतकर किस प्रकार रुक्मिणीका हरण किया? ॥१९ ॥

ब्रह्मर्षे! भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंके सम्बन्धमें क्या कहना है? वे स्वयं तो पवित्र हैं ही, सारे जगत्का मल धो- बहाकर उसे भी पवित्र कर देनेवाली हैं । उनमें ऐसी लोकोत्तर माधुरी है, जिसे दिन - रात सेवन करते रहनेपर भी नित्य नया - नया रस मिलता रहता है । भला ऐसा कौन रसिक, कौन मर्मज्ञ है, जो उन्हें सुनकर तृप्त न हो जाय ॥२० ॥

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पृष्ठ 690

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भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि कृष्णस्यामिततेजसः ।

यथा मागधशाल्वादीन् जित्वा कन्यामुपाहरत् ॥१९

ब्रह्मन् कृष्णकथाः पुण्या माध्वीर्लोकमलापहाः ।

को नु तृप्येत शृण्वानः श्रुतज्ञो नित्यनूतनाः ॥२०

श्रीशुक उवाच

राजाऽऽसीद भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान् ।

तस्य पंचाभवन् पुत्राः कन्यैका च वरानना ॥२१

रुक्म्यग्रजो रुक्मरथो रुक्मबाहुरनन्तरः ।

रुक्मकेशो रुक्ममाली रुक्मिण्येषां स्वसा सती ॥२२

सोपश्रुत्य मुकुन्दस्य रूपवीर्यगुणश्रियः ।

गृहागतैर्गीयमानास्तं मेने सदृशं पतिम् ॥२३

तां बुद्धिलक्षणौदार्यरूपशीलगुणाश्रयाम् ।

कृष्णश्च सदृशीं भार्यां समुद्वोढुं मनो दधे ॥२४

बन्धूनामिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप ।

ततो निवार्य कृष्णद्विड् रुक्मी चैद्यममन्यत ॥२५

तदवेत्यासितापांगी वैदर्भी दुर्मना भृशम् ।

विचिन्त्याप्तं द्विजं कंचित् कृष्णाय प्राहिणोद् द्रुतम् ॥२६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! महाराज भीष्मक विदर्भदेशके अधिपति थे । उनके पाँच पुत्र और एक सुन्दरी कन्या थी || २१ || सबसे बड़े पुत्रका नाम था रुक्मी और चार छोटे थे — जिनके नाम थे क्रमशः रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली । इनकी बहिन थी सती रुक्मिणी ॥२२ ॥ जब उसने भगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्य, पराक्रम, गुण और वैभवकी

प्रशंसा सुनी – जो उसके महलमें आनेवाले अतिथि प्रायः गाया ही करते थे- तब उसने यही निश्चय किया कि भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरे अनुरूप पति हैं || २३ || भगवान् श्रीकृष्ण भी समझते थे कि ‘रुक्मिणीमें बड़े सुन्दर- सुन्दर लक्षण हैं, वह परम बुद्धिमती है; उदारता, सौन्दर्य, शीलस्वभाव और गुणोंमें भी अद्वितीय है । इसलिये रुक्मिणी ही मेरे अनुरूप पत्नी है । अतः भगवान्ने रुक्मिणीजीसे विवाह करनेका निश्चय किया || २४ || रुक्मिणीजीके भाई- बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहिनका विवाह श्रीकृष्णसे ही हो । परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और शिशुपालको ही अपनी बहिनके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******