श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 671–680
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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चहल - पहल थी । सारा नगर छोटी- छोटी झंडियों और बड़ी - बड़ी विजय - पताकाओंसे सजा दिया गया था । ब्राह्मणोंकी वेदध्वनि गूँज रही थी और सब ओर आनन्दोत्सवके सूचक बंदनवार बाँध दिये गये थे ॥ ३ ९ ॥ जिस समय श्रीकृष्ण नगरमें प्रवेश कर रहे थे, उस समय नगरकी नारियाँ प्रेम और उत्कण्ठासे भरे हुए नेत्रोंसे उन्हें स्नेहपूर्वक निहार रही थीं और फूलोंके हार, दही, अक्षत और जौ आदिके अंकुरोंकी उनके ऊपर वर्षा कर रही थीं ॥४० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण रणभूमिसे अपार धन और वीरोंके आभूषण ले आये थे । वह सब उन्होंने यदुवंशियोंके राजा उग्रसेनके पास भेज दिया ॥४१ ॥
शंखदुन्दुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः ।
वीणावेणुमृदंगानि पुरं प्रविशति प्रभौ ॥ ३८
सिक्तमार्गां हृष्टजनां पताकाभिरलंकृताम् ।
निर्घुष्टां ब्रह्मघोषेण कौतुकाबद्धतोरणाम् ॥३९
निचीयमानो' नारीभिर्माल्यदध्यक्षतांकुरैः ।
निरीक्ष्यमाणः सस्नेहं प्रीत्युत्कलितलोचनैः ॥४०
आयोधनगतं वित्तमनन्तं वीरभूषणम् ।
यदुराजाय तत् सर्वमाहृतं प्रादिशत्प्रभुः ॥४१
एवं सप्तदशकृत्वस्तावत्यक्षौहिणीबलः २ ।
युयुधे मागधो राजा यदुभिः कृष्णपालितैः ॥४२
अक्षिण्वंस्तद्बलं सर्वं वृष्णयः कृष्णतेजसा ।
हतेषु स्वेष्वनीकेषु त्यक्तोऽयादरिभिर्नृपः ॥ ४३
अष्टादशमसंग्रामे आगामिनि तदन्तरा ।
नारदप्रेषितो वीरो यवनः प्रत्यदृश्यत ॥४४
रुरोध मथुरामेत्य तिसृभिर्लेच्छकोटिभिः ।
नृलोके चाप्रतिद्वन्द्वो वृष्णीञ्छ्रुत्वाऽऽत्मसम्मितान् ॥४५
तं दृष्ट्वाचिन्तयत् कृष्णः संकर्षणसहायवान् ।
अहो यदूनां वृजिनं प्राप्तं ह्युभयतो महत् ॥४६
परीक्षित्! इस प्रकार सत्रह बार तेईस - तेईस अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके मगधराज ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जरासन्धने भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित यदुवंशियोंसे युद्ध किया ॥ ४२ ॥ किन्तु यादवोंने
भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिसे हर बार उसकी सारी सेना नष्ट कर दी । जब सारी सेना नष्ट हो जाती, तब यदुवंशियोंके उपेक्षापूर्वक छोड़ देनेपर जरासन्ध अपनी राजधानीमें लौट जाता ॥४३ ॥
जिस समय अठारहवाँ संग्राम छिड़नेहीवाला था, उसी समय नारदजीका भेजा हुआ वीर कालयवन दिखायी पड़ा ॥ ४४ ॥ युद्धमें कालयवनके सामने खड़ा होनेवाला वीर संसारमें
दूसरा कोई न था । उसने जब यह सुना कि यदुवंशी हमारे ही जैसे बलवान् हैं और हमारा सामना कर सकते हैं, तब तीन करोड़ म्लेच्छोंकी सेना लेकर उसने मथुराको घेर लिया ॥४५ ॥
कालयवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ मिलकर विचार किया — ' अहो! इस समय तो यदुवंशियोंपर जरासन्ध और कालयवन –ये दो -दो विपत्तियाँ एक साथ ही मँडरा रही हैं ॥ ४६ ॥ आज इस परम बलशाली यवनने हमें आकर घेर
लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसोंमें आ ही जायेगा ॥४७ ॥ यदि हम दोनों भाई
इसके साथ लड़नेमें लग गये और उसी समय जरासन्ध भी आ पहुँचा, तो वह हमारे बन्धुओंको मार डालेगा या तो कैद करके अपने नगरमें ले जायगा; क्योंकि वह बहुत बलवान् है ॥४८ ॥ इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग- ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी
मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा । अपने स्वजन सम्बन्धियोंको उसी किलेमें पहुँचाकर फिर इस यवनका वध करायेंगे ' ॥ ४९ ॥ बलरामजी से इस प्रकार सलाह करके
भगवान् श्रीकृष्णने समुद्रके भीतर एक ऐसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अद्भुत थीं और उस नगरकी लम्बाई- चौड़ाई अड़तालीस कोसकी थी ॥ ५० ॥ उस नगरकी एक-एक
वस्तुमें विश्वकर्माका विज्ञान ( वास्तु -विज्ञान) और शिल्पकलाकी निपुणता प्रकट होती थी । उसमें वास्तुशास्त्रके अनुसार बड़ी- बड़ी सड़कों, चौराहों और गलियोंका यथास्थान ठीक-ठीक विभाजन किया गया था ॥ ५१ ॥ वह नगर ऐसे सुन्दर- सुन्दर उद्यानों और विचित्र - विचित्र
उपवनोंसे युक्त था, जिनमें देवताओंके वृक्ष और लताएँ लहलहाती रहती थीं । सोनेके इतने ऊँचे - ऊँचे शिखर थे, जो आकाशसे बातें करते थे । स्फटिकमणिकी अटारियाँ और ऊँचे - ऊँचे दरवाजे बड़े ही सुन्दर लगते थे ॥ ५२ ॥ अन्न रखनेके लिये चाँदी और पीतलके बहुत- से कोठे
ब हुए थे । वहाँके महल सोनेके बने हुए थे और उनपर कामदार सोनेके कलश सजे हुए थे । उनके शिखर रत्नोंके थे तथा गच पन्नेकी बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी ॥ ५३ ॥ इसके
अतिरिक्त उस नगरमें वास्तुदेवताके मन्दिर और छज्जे भी बहुत सुन्दर- सुन्दर बने हुए थे । उसमें चारों वर्णके लोग निवास करते थे । और सबके बीचमें यदुवंशियोंके प्रधान उग्रसेनजी, वसुदेवजी, बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्णके महल जगमगा रहे थे ॥५४ ॥
यवनोऽयं निरुन्धेऽस्मानद्य तावन्महाबलः ।
मागधोऽप्यद्य वा श्वो वा परश्वो वाऽऽगमिष्यति ॥४७
आवयोर्युध्यतोरस्य यद्यागन्ता जरासुतः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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बन्धून् वधिष्यत्यथवा नेष्यते स्वपुरं बली ॥४८
तस्मादद्य विधास्यामो दुर्गं द्विपददुर्गमम् ।
तत्र ज्ञातीन् समाधाय यवनं घातयामहे ॥४९
इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम् ।
अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत् ॥५०
दृश्यते यत्र हि त्वाष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनैपुणम् ।
रथ्याचत्वरवीथीभिर्यथावास्तु विनिर्मितम् ॥५१
सुरद्रुमलतोद्यानविचित्रोपवनान्वितम् ।
हेमशृङ्गैर्दिविस्मृग्भिः स्फाटिकाट्टालगोपुरैः ॥५२
राजतारकुटैः कोष्ठैर्हेमकुम्भैरलंकृतैः ।
रत्नकूटैर्गृहैर्हेमैर्महामरकतस्थलैः ॥५३
वास्तोष्पतीनां च गृहैर्वलभीभिश्च निर्मितम् ।
चातुर्वर्ण्यजनाकीर्णं यदुदेवगृहोल्लसत् ॥५४
सुधर्मां पारिजातं च महेन्द्रः प्राहिणोद्धरेः ।
यत्र चावस्थितो मर्त्यो मर्त्यधर्मैर्न युज्यते ॥ ५५
श्यामैककर्णान् वरुणो हयाञ्छुक्लान् मनोजवान् ।
अष्टौ निधिपतिः कोशान् लोकपालो निजोदयान् ॥५६
यद् यद् भगवता दत्तमाधिपत्यं स्वसिद्धये ।
सर्वं प्रत्यर्पयामासुर्हरौ भूमिगते नृप ॥५७
तत्र योगप्रभावेण नीत्वा सर्वजनं हरिः ।
प्रजापालेन रामेण कृष्णः समनुमन्त्रितः ।
निर्जगाम पुरद्वारात् पद्ममाली निरायुधः ॥५८
परीक्षित्! उस समय देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णके लिये पारिजातवृक्ष और सुधर्मा-सभाको भेज दिया । वह सभा ऐसी दिव्य थी कि उसमें बैठे हुए मनुष्यको भूख- प्यास आदि मर्त्यलोकके धर्म नहीं छू पाते थे ॥५५ ॥ वरुणजीने ऐसे बहुत - से श्वेत घोड़े भेज दिये, जिनका
एक - एक कान श्यामवर्णका था और जिनकी चाल मनके समान तेज थी । धनपति कुबेरजीने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अपनी आठों निधियाँ भेज दीं और दूसरे लोकपालोंने भी अपनी- अपनी विभूतियाँ भगवान्के पास भेज दीं ॥५६ ॥ परीक्षित्! सभी लोकपालोंको भगवान् श्रीकृष्णने ही उनके अधिकारके
निर्वाहके लिये शक्तियाँ और सिद्धियाँ दी हैं । जब भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर लीला करने लगे, तब सभी सिद्धियाँ उन्होंने भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दीं ॥ ५७ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने अपने समस्त स्वजन सम्बन्धियोंको अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके द्वारा द्वारकामें पहुँचा दिया । शेष प्रजाकी रक्षाके लिये बलरामजीको मथुरापुरीमें रख दिया और उनसे सलाह लेकर गलेमें कमलोंकी माला पहने, बिना कोई अस्त्र- शस्त्र लिये स्वयं नगरके बड़े दरवाजेसे बाहर निकल आये ॥५८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे दुर्गनिवेशनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५० ॥
१. विकीर्यमाणो । २. णीर्नृपः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कालयवनका भस्म होना, मुचुकुन्दकी कथा श्रीशुक उवाच
तं विलोक्य विनिष्क्रान्तमुज्जिहानमिवोडुपम् ।
दर्शनीयतमं श्यामं पीतकौशेयवाससम् ॥१
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ।
पृथुदीर्घचतुर्बाहुं नवकञ्जारुणेक्षणम् ॥२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्रिय परीक्षित्! जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण मथुरा नगरके मुख्य द्वारसे निकले, उस समय ऐसा मालूम पड़ा मानो पूर्व दिशासे चन्द्रोदय हो रहा हो । उनका श्यामल शरीर अत्यन्त ही दर्शनीय था, उसपर रेशमी पीताम्बरकी छटा निराली ही थी; वक्षःस्थलपर स्वर्णरखाके रूपमें श्रीवत्सचिह्न शोभा पा रहा था और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी। चार भुजाएँ थीं, जो लम्बी -लम्बी और कुछ मोटी- मोटी थीं। हालके खिले हुए कमलके समान कोमल और रतनारे नेत्र थे । मुखकमलपर राशि राशि आनन्द खेल रहा था । कपोलोंकी छटा निराली ही थी । मन्द मन्द मुसकान देखनेवालोंका मन चुराये लेती थी । कानोंमें मकराकृत कुण्डल झिलमिल झिलमिल झलक रहे थे । उन्हें देखकर कालयवनने निश्चय किया कि ' यही पुरुष वासुदेव है । क्योंकि नारदजीने जो- जो लक्षण बतलाये थे— वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, चार भुजाएँ, कमलके से नेत्र, गलेमें वनमाला और सुन्दरताकी सीमा; वे सब इसमें मिल रहे हैं । इसलिये यह कोई दूसरा नहीं हो सकता । इस समय यह बिना किसी अस्त्र- शस्त्रके पैदल ही इस ओर चला आ रहा है, इसलिये मैं भी इसके साथ बिना अस्त्र- शस्त्रके ही लडूंगा' ॥१-५ ॥
नित्यप्रमुदितं श्रीमत्सुकपोलं शुचिस्मितम् ।
मुखारविन्दं बिभ्राणं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥३
वासुदेवो ह्ययमिति पुमाञ्छ्रीवत्सलाञ्छनः ।
चतुर्भुजोऽरविन्दाक्षो वनमाल्यतिसुन्दरः ॥४
लक्षणैर्नारदप्रोक्तैर्नान्यो भवितुमर्हति ।
निरायुधश्चलन् पद्भयां योत्स्येऽनेन निरायुधः ॥५
इति निश्चित्य यवनः प्राद्रवन्तं पराङ्मुखम् ।
अन्वधावज्जिघृक्षुस्तं दुरापमपि योगिनाम् ॥६
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हस्तप्राप्तमिवात्मानं हरिणा स पदे पदे ।
नीतो दर्शयता दूरं यवनेशोऽद्रिकन्दरम् ॥७
पलायनं यदुकुले जातस्य तव नोचितम् ।
इति क्षिपन्ननुगतो नैनं प्रापाहताशुभः ॥८
एवं क्षिप्तोऽपि भगवान् प्राविशद् गिरिकन्दरम् ।
सोऽपि प्रविष्टस्तत्रान्यं शयानं ददृशे नरम् ॥९
नन्वसौ दूरमानीय शेते मामिह साधुवत् ।
इति मत्वाच्युतं मूढस्तं पदा समताडयत् ॥१०
स उत्थाय चिरं सुप्तः शनैरुन्मील्य लोचने ।
दिशो विलोकयन् पार्श्वे तमद्राक्षीदवस्थितम् ॥११
ऐसा निश्चय करके जब कालयवन भगवान् श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा, तब वे दूसरी ओर मुँह करके रणभूमिसे भाग चले और उन योगिदुर्लभ प्रभुको पकड़नेके लिये कालयवन उनके पीछे - पीछे दौड़ने लगा ॥६ ॥ रणछोड़ भगवान् लीला करते हुए भाग रहे थे; कालयवन पग-पगपर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा । इस प्रकार भगवान् उसे बहुत दूर एक
पहाड़की गुफामें ले गये ॥७ ॥ कालयवन पीछेसे बार- बार आक्षेप करता कि ' अरे भाई! तुम
परम यशस्वी यदुवंशमें पैदा हुए हो, तुम्हारा इस प्रकार युद्ध छोड़कर भागना उचित नहीं है । ' परन्तु अभी उसके अशुभ निःशेष नहीं हुए थे, इसलिये वह भगवान्को पानेमें समर्थ न हो सका ॥८ ॥ उसके आक्षेप करते रहनेपर भी भगवान् उस पर्वतकी गुफामें घुस गये । उनके
पीछे कालयवन भी घुसा । वहाँ उसने एक दूसरे ही मनुष्यको सोते हुए देखा ॥९ ॥ उसे
देखकर कालयवनने सोचा ' देखो तो सही, यह मुझे इस प्रकार इतनी दूर ले आया और अब इस तरह— मानो इसे कुछ पता ही न हो- साधुबाबा बनकर सो रहा है । ' यह सोचकर उस मूढ़ने उसे कसकर एक लात मारी ॥ १० ॥ वह पुरुष वहाँ बहुत दिनोंसे सोया हुआ था । पैकी
ठोकर लगनेसे वह उठ पड़ा और धीरे- धीरे उसने अपनी आँखें खोलीं । इधर- उधर देखनेपर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखायी दिया ॥ ११ ॥ परीक्षित्! वह पुरुष इस प्रकार ठोकर
मारकर जगाये जानेसे कुछ रुष्ट हो गया था । उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवनके शरीरमें आग पैदा हो गयी और वह क्षणभरमें जलकर राखका ढेर हो गया ॥१२ ॥
स तावत्तस्य रुष्टस्य दृष्टिपातेन भारत ।
देहजेनाग्निना दग्धो भस्मसादभवत् क्षणात् ॥१२
राजोवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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को नाम स पुमान् ब्रह्मन् कस्य किंवीर्य एव च ।
कस्माद् गुहां गतः शिश्ये किन्तेजो यवनार्दनः ॥ १३
श्रीशुक उवाच
स इक्ष्वाकुकुले जातो मान्धातृतनयो महान् ।
मुचुकुन्द इति ख्यातो ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः ॥१४
स याचितः सुरगणैरिन्द्राद्यैरात्मरक्षणे ।
असुरेभ्यः परित्रस्तैस्तद्रक्षां सोऽकरोच्चिरम् ॥१५
लब्ध्वा गुहं ते स्वःपालं मुचुकुन्दमथाब्रुवन् ।
राजन् विरमतां कृच्छ्राद् भवान् नः परिपालनात् ॥१६
नरलोके परित्यज्य राज्यं निहतकण्टकम् ।
अस्मान् पालयतो वीर कामास्ते सर्व उज्झिताः ॥१७
सुता महिष्यो भवतो ज्ञातयोऽमात्यमन्त्रिणः ।
प्रजाश्च तुल्यकालीया नाधुना सन्ति कालिताः ॥ १८
कालो बलीयान् बलिनां भगवानीश्वरोऽव्ययः ।
प्रजाः कालयते क्रीडन् पशुपालो यथा पशून् ॥१९
वरं वृणीष्व भद्रं ते ऋते कैवल्यमद्य नः ।
एक एवेश्वरस्तस्य भगवान् विष्णुरव्ययः ॥२०
राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! जिसके दृष्टिपातमात्रसे कालयवन जलकर भस्म हो गया, वह पुरुष कौन था? किस वंशका था? उसमें कैसी शक्ति थी और वह किसका पुत्र था? आप कृपा करके यह भी बतलाइये कि वह पर्वतकी गुफामें जाकर क्यों सो रहा था? ॥१३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! वे इक्ष्वाकुवंशी महाराजा मान्धाताके पुत्र राजा मुचुकुन्द थे । वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, सत्यप्रतिज्ञ, संग्रामविजयी और महापुरुष थे || १४ || एक बार इन्द्रादि देवता असुरोंसे अत्यन्त भयभीत हो गये थे । उन्होंने अपनी रक्षाके लिये राजा मुचुकुन्दसे प्रार्थना की और उन्होंने बहुत दिनोंतक उनकी रक्षा की ॥ १५ ॥ जब बहुत दिनोंके
बाद देवताओंको सेनापतिके रूपमें स्वामि- कार्तिकेय मिल गये, तब उन लोगोंने राजा मुचुकुन्दसे कहा — ‘ राजन्! आपने हमलोगोंकी रक्षाके लिये बहुत श्रम और कष्ट उठाया है । अब आप विश्राम कीजिये ॥१६ ॥ वीरशिरोमणे! आपने हमारी रक्षाके लिये मनुष्यलोकका
अपना अकण्टक राज्य छोड़ दिया और जीवनकी अभिलाषाएँ तथा भोगोंका भी परित्याग ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कर दिया ॥१७ ॥ अब आपके पुत्र, रानियाँ, बन्धु - बान्धव और अमात्य- मन्त्री तथा आपके
समयकी प्रजामेंसे कोई नहीं रहा है । सब- के - सब कालके गालमें चले गये ॥ १८ ॥ काल
समस्त बलवानोंसे भी बलवान् है । वह स्वयं परम समर्थ अविनाशी और भगवत्स्वरूप है । जैसे ग्वाले पशुओंको अपने वशमें रखते हैं, वैसे ही वह खेल- खेलमें सारी प्रजाको अपने अधीन रखता है ॥१९ ॥ राजन्! आपका कल्याण हो । आपकी जो इच्छा हो हमसे माँग
लीजिये । हम कैवल्य- मोक्षके अतिरिक्त आपको सब कुछ दे सकते हैं । क्योंकि कैवल्य- मोक्ष देनेकी सामर्थ्य तो केवल अविनाशी भगवान् विष्णुमें ही है ॥ २० ॥ परम यशस्वी राजा
मुचुकुन्दने देवताओंके इस प्रकार कहनेपर उनकी वन्दना की और बहुत थके होनेके कारण निद्राका ही वर माँगा तथा उनसे वर पाकर वे नींदसे भरकर पर्वतकी गुफामें जा सोये || २१ || उस समय देवताओंने कह दिया था कि ' राजन्! सोते समय यदि आपको कोई मूर्ख बीचमें ही जगा देगा तो वह आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जायगा' ॥ २२ ॥
एवमुक्तः स वै देवानभिवन्द्य महायशाः ।
अशयिष्ट गुहाविष्टो निद्रया देवदत्तया ॥२१
स्वापं यातं यस्तु मध्ये बोधयेत्त्वामचेतनः ।
स त्वया दृष्टमात्रस्तु भस्मीभवतु तत्क्षणात् ॥२२
यवने भस्मसान्नीते भगवान् सात्वतर्षभः ।
आत्मानं दर्शयामास मुचुकुन्दाय धीमते ॥२३
तमालोक्य घनश्यामं पीतकौशेयवाससम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभेन विराजितम् ॥२४
चतुर्भुजं रोचमानं वैजयन्त्या च मालया ।
चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥२५
प्रेक्षणीयं नृलोकस्य सानुरागस्मितेक्षणम् ।
अपीच्यवयसं मत्तमृगेन्द्रोदारविक्रमम् ॥२६
पर्यपृच्छन्महाबुद्धिस्तेजसा तस्य धर्षितः ।
शंकितः शनकै राजा दुर्धर्षमिव तेजसा ॥२७
मुचुकुन्द उवाच
को भवानिह सम्प्राप्तो विपिने गिरिगह्वरे ।
पद्भ्यां पद्मपलाशाभ्यां विचरस्युरुकण्टके ॥२८
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किंस्वित्तेजस्विनां तेजो भगवान् वा विभावसुः ।
सूर्यः सोमो महेन्द्रो वा लोकपालोऽपरोऽपि वा ॥२९
मन्ये त्वां देवदेवानां त्रयाणां पुरुषर्षभम् ।
यद् बाधसे गुहाध्वान्तं प्रदीपः प्रभया यथा ॥ ३०
परीक्षित्! जब कालयवन भस्म हो गया, तब यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने परम बुद्धिमान् राजा मुचुकुन्दको अपना दर्शन दिया । भगवान् श्रीकृष्णका श्रीविग्रह वर्षाकालीन मेघके समान साँवला था । रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे । वक्षःस्थलपर श्रीवत्स और गलेमें कौस्तुभमणि अपनी दिव्य ज्योति बिखेर रहे थे । चार भुजाएँ थीं । वैजयन्तीमाला अलग ही घुटनोंतक लटक रही थी । मुखकमल अत्यन्त सुन्दर और प्रसन्नतासे खिला हुआ था । कानोंमें मकराकृति कुण्डल जगमगा रहे थे । होठोंपर प्रेमभरी मुसकराहट थी और नेत्रोंकी चितवन अनुरागकी वर्षा कर रही थी । अत्यन्त दर्शनीय तरुण अवस्था और मतवाले सिंहके समान निर्भीक चाल! राजा मुचुकुन्द यद्यपि बड़े बुद्धिमान् और धीर पुरुष थे, फिर भी भगवान्की यह दिव्य ज्योतिर्मयी मूर्ति देखकर कुछ चकित हो गये– उनके तेजसे हतप्रतिभ हो सकपका गये । भगवान् अपने तेजसे दुर्द्धर्ष जान पड़ते थे; राजाने तनिक शंकित होकर पूछा ॥२३-२७ ॥ राजा मुचुकुन्दने कहा— ' आप कौन हैं? इस काँटोंसे भरे हुए घोर जंगलमें आप कमलके समान कोमल चरणोंसे क्यों विचर रहे हैं? और इस पर्वतकी गुफामें ही पधारनेका क्या प्रयोजन था? ॥२८ ॥ क्या आप समस्त तेजस्वियोंके मूर्तिमान् तेज अथवा भगवान्
अग्निदेव तो नहीं हैं? क्या आप सूर्य, चन्द्रमा, देवराज इन्द्र या कोई दूसरे लोकपाल हैं? ॥२९ ॥ मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आप देवताओंके आराध्यदेव ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर
-इन तीनोंमेंसे पुरुषोत्तम भगवान् नारायण ही हैं । क्योंकि जैसे श्रेष्ठ दीपक अँधेरेको दूर कर देता है, वैसे ही आप अपनी अंगकान्तिसे इस गुफाका अँधेरा भगा रहे हैं || ३० ॥ पुरुषश्रेष्ठ! यदि आपको रुचे तो हमें अपना जन्म, कर्म और गोत्र बतलाइये; क्योंकि हम सच्चे हृदयसे उसे सुननेके इच्छुक हैं || ३१ || और पुरुषोत्तम! यदि आप हमारे बारेमें पूछें तो हम इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय हैं, मेरा नाम है मुचुकुन्द| और प्रभु! मैं युवनाश्वनन्दन महाराज मान्धाताका पुत्र हूँ ॥३२ ॥ बहुत दिनोंतक जागते रहनेके कारण मैं थक गया था । निद्राने मेरी
समस्त इन्द्रियोंकी शक्ति छीन ली थी, उन्हें बेकाम कर दिया था, इसीसे मैं इस निर्जन स्थानमें निर्द्वन्द्व सो रहा था । अभी- अभी किसीने मुझे जगा दिया || ३३ || अवश्य उसके पापोंने ही उसे जलाकर भस्म कर दिया है । इसके बाद शत्रुओंके नाश करनेवाले परम सुन्दर आपने मुझे दर्शन दिया ॥ ३४ ॥ महाभाग! आप समस्त प्राणियोंके माननीय हैं । आपके परम दिव्य और
असह्य तेजसे मेरी शक्ति खो गयी है । मैं आपको बहुत देरतक देख भी नहीं सकता ॥३५ ॥
जब राजा मुचुकुन्दने इस प्रकार कहा, तब समस्त प्राणियोंके जीवनदाता भगवान् श्रीकृष्णने हँसते हुए मेघध्वनिके समान गम्भीर वाणीसे कहा— ॥३६ ॥
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शुश्रूषतामव्यलीकमस्माकं नरपुंगव ।
स्वजन्म कर्म गोत्रं वा कथ्यतां यदि रोचते ॥३१
वयं तु पुरुषव्याघ्र ऐक्ष्वाकाः क्षत्रबन्धवः ।
मुचुकुन्द इति प्रोक्तो यौवनाश्वात्मजः प्रभो ॥ ३२
चिरप्रजागरश्रान्तो निद्रयोपहतेन्द्रियः ।
शयेऽस्मिन् विजने कामं केनाप्युत्थापितोऽधुना ॥ ३३
सोऽपि भस्मीकृतो नूनमात्मीयेनैव पाप्मना ।
अनन्तरं भवाञ्छ्रीमान् लक्षितोऽमित्रशातनः ॥३४
तेजसा तेऽविषह्येण भूरि द्रष्टुं न शक्नुमः ।
हतौजसो महाभाग माननीयोऽसि देहिनाम् ॥३५
एवं सम्भाषितो राज्ञा भगवान् भूतभावनः ।
प्रत्याह प्रहसन् वाण्या मेघनादगभीरया ॥ ३६
श्रीभगवानुवाच
जन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेऽङ्ग सहस्रशः ।
न शक्यन्तेऽनुसंख्यातुमनन्तत्वान्मयापि हि ॥ ३७
क्वचिद् रजांसि विममे पार्थिवान्युरुजन्मभिः ।
गुणकर्माभिधानानि न मे जन्मानि कर्हिचित् ॥३८
कालत्रयोपपन्नानि जन्मकर्माणि मे नृप ।
अनुक्रमन्तो नैवान्तं गच्छन्ति परमर्षयः ॥३९
तथाप्यद्यतनान्यंग शृणुष्व गदतो मम ।
विज्ञापितो विरिञ्चेन पुराहं धर्मगुप्तये ।
भूमेर्भारायमाणानामसुराणां क्षयाय च ॥४०
अवतीर्णो यदुकुले गृह आनकदुन्दुभेः ।
वदन्ति वासुदेवेति वसुदेवसुतं हि माम् ॥४१
भगवान् श्रीकृष्णने कहा– प्रिय मुचुकुन्द! मेरे हजारों जन्म, कर्म और नाम हैं। वे अनन्त हैं, इसलिये मैं भी उनकी गिनती करके नहीं बतला सकता || ३७ || यह सम्भव है कि कोई पुरुष अपने अनेक जन्मोंमें पृथ्वीके छोटे - छोटे धूल- कणोंकी गिनती कर डाले; परन्तु मेरे जन्म, गुण, कर्म और नामोंको कोई कभी किसी प्रकार नहीं गिन सकता ॥३८ ॥ राजन्!
सनक-सनन्दन आदि परमर्षिगण मेरे त्रिकालसिद्ध जन्म और कर्मोंका वर्णन करते रहते हैं, परन्तु कभी उनका पार नहीं पाते || ३ ९ || प्रिय मुचुकुन्द! ऐसा होनेपर भी मैं अपने वर्तमान जन्म, कर्म और नामोंका वर्णन करता हूँ, सुनो । पहले ब्रह्माजीने मुझसे धर्मकी रक्षा और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******