श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 731–740
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740
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शयानमवधील्लोभात्स पापः क्षीणजीवितः ॥५
स्त्रीणां विक्रोशमानानां क्रन्दन्तीनामनाथवत् ।
हत्वा पशून् सौनिकवन्मणिमादाय जग्मिवान् ॥६
सत्यभामा च पितरं हतं वीक्ष्य शुचार्पिता ।
व्यलपत्तात तातेति हा हतास्मीति मुह्यती ॥७
तैलद्रोण्यां मृतं प्रास्य जगाम गजसाह्वयम् ।
कृष्णाय विदितार्थाय तप्ताऽऽचख्यौ पितुर्वधम् ॥८
तदाकर्ष्णेश्वरौ राजन्ननुसृत्य नृलोकताम् ।
अहो नः परमं कष्टमित्यस्राक्षौ विलेपतुः ॥९
आगत्य भगवांस्तस्मात् सभार्यः साग्रजः पुरम् ।
शतधन्वानमारेभे हन्तुं हर्तुं मणिं ततः ॥१०
सोऽपि कृष्णोद्यमं ज्ञात्वा भीतः प्राणपरीप्सया ।
साहाय्ये कृतवर्माणमयाचत स चाब्रवीत् ॥ ११
नाहमीश्वरयोः कुर्यां हेलनं रामकृष्णयोः ।
को नु क्षेमाय कल्पेत तयोर्वृजिनमाचरन् ॥ १२
सत्यभामाजीको यह देखकर कि मेरे पिता मार डाले गये हैं, बड़ा शोक हुआ और वे ' हाय पिताजी! हाय पिताजी! मैं मारी गयी' – इस प्रकार पुकार-पुकारकर विलाप करने लगीं । बीच - बीचमें वे बेहोश हो जातीं और होशमें आनेपर फिर विलाप करने लगतीं || ७ || इसके बाद उन्होंने अपने पिताके शवको तेलके कड़ाहेमें रखवा दिया और आप हस्तिनापुरको गयीं । उन्होंने बड़े दुःखसे भगवान् श्रीकृष्णको अपने पिताकी हत्याका वृत्तान्त सुनाया— यद्यपि इन बातोंको भगवान् श्रीकृष्ण पहलेसे ही जानते थे || ८ || परीक्षित्! सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने सब सुनकर मनुष्योंकी- सी लीला करते हुए अपनी आँखोंमें आँसू भर लिये और विलाप करने लगे कि ' अहो! हम लोगोंपर तो यह बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी! ' ॥९ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामाजी और बलरामजीके साथ
हस्तिनापुरसे द्वारका लौट आये और शतधन्वाको मारने तथा उससे मणि छीननेका उद्योग करने लगे || १० || जब शतधन्वाको यह मालूम हुआ कि भगवान् श्रीकृष्ण मुझे मारनेका उद्योग कर रहे हैं, तब वह बहुत डर गया और अपने प्राण बचानेके लिये उसने कृतवर्मासे सहायता माँगी । तब ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कृतवर्माने कहा— ॥११ || ' भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी सर्व- शक्तिमान् ईश्वर हैं । मैं उनका सामना नहीं कर सकता । भला ऐसा कौन है, जो उनके साथ वैर बाँधकर इस लोक और परलोकमें सकुशल रह सके? || १२ || तुम जानते हो कि कंस उन्हींसे द्वेष करनेके कारण राज्यलक्ष्मीको खो बैठा और अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया । जरासन्ध- जैसे शूरवीरको भी उनके सामने सत्रह बार मैदानमें हारकर बिना रथके ही अपनी राजधानीमें लौट जाना पड़ा था ' ॥१३ ॥ जब कृतवर्माने उसे इस प्रकार टका-सा जवाब दे दिया, तब
शतधन्वाने सहायताके लिये अक्रूरजीसे प्रार्थना की । उन्होंने कहा – ' भाई! ऐसा कौन है, जो सर्वशक्तिमान् भगवान्का बल- पौरुष जानकर भी उनसे वैर - विरोध ठाने । जो भगवान् खेल- खेलमें ही इस विश्वकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं तथा जो कब क्या करना चाहते हैं-इस बातको मायासे मोहित ब्रह्मा आदि विश्वविधाता भी नहीं समझ पाते; जिन्होंने सात वर्षकी अवस्थामें— जब वे निरे बालक थे, एक हाथसे ही गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और जैसे नन्हे - नन्हे बच्चे बरसाती छत्तेको उखाड़कर हाथमें रख लेते हैं, वैसे ही खेल- खेलमें सात दिनोंतक उसे उठाये रखा; मैं तो उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ । उनके कर्म अद्भुत हैं । वे अनन्त, अनादि, एकरस और आत्मस्वरूप हैं । मैं उन्हें नमस्कार करता ॥१४-१७ ॥ जब इस प्रकार अक्रूरजीने भी उसे कोरा जवाब दे दिया, तब शतधन्वाने स्यमन्तक- मणि उन्हींके पास रख दी और आप चार सौ कोस लगातार चलनेवाले घोड़ेपर सवार होकर वहाँसे बड़ी फुर्तीसे भागा ॥१८ ॥
कंसः सहानुगोऽपीतो यद्द्द्वेषात्त्याजितः श्रिया ।
जरासन्धः सप्तदश संयुगान् विरथो गतः ॥१३
प्रत्याख्यातः स चाक्रूरं पार्ष्णिग्राहमयाचत ।
सोऽप्याह को विरुध्येत विद्वानीश्वरयोर्बलम् ॥१४
य इदं लीलया विश्वं सृजत्यवति हन्ति च ।
चेष्टां विश्वसृजो यस्य न विदुर्मोहिताजया ॥१५
यः सप्तहायनः शैलमुत्पाट्यैकेन पाणिना ।
दधार लीलया बाल उच्छिलीन्ध्रमिवार्भकः ॥१६
नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाद्भुतकर्मणे ।
अनन्तायादिभूताय कूटस्थायात्मने नमः ॥१७
प्रत्याख्यातः स तेनापि शतधन्वा महामणिम् ।
तस्मिन् न्यस्याश्वमारुह्य शतयोजनगं ययौ ॥१८
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गरुडध्वजमारुह्य रथं रामजनार्दनौ ।
अन्वयातां महावेगैरश्वै राजन् गुरुद्रुहम् ॥१९
मिथिलायामुपवने विसृज्य पतितं हयम् ।
पद्भयामधावत् सन्त्रस्तः कृष्णोऽप्यन्वद्रवद् रुषा ॥२०
पदातेर्भगवांस्तस्य पदातिस्तिग्मनेमिना चक्रेण शिर उत्कृत्य वाससो व्यचिनोन्मणिम् ॥२१ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई अपने उस रथपर सवार हुए, जिसपर गरुड़चिह्नसे चिह्नित ध्वजा फहरा रही थी और बड़े वेगवाले घोड़े जुते हुए थे । अब उन्होंने अपने श्वशुर सत्राजित्को मारनेवाले शतधन्वाका पीछा किया ॥ १ ९ ॥ मिथिलापुरीके निकट एक उपवनमें शतधन्वाका घोड़ा गिर पड़ा, अब वह उसे छोड़कर पैदल ही भागा । वह अत्यन्त भयभीत हो गया था । भगवान् श्रीकृष्ण भी क्रोध करके उसके पीछे दौड़े ॥२० ॥ शतधन्वा
पैदल ही भाग रहा था, इसलिये भगवान्ने भी पैदल ही दौड़कर अपने तीक्ष्ण धारवाले चक्रसे उसका सिर उतार लिया और उसके वस्त्रोंमें स्यमन्तकमणिको ढूँढ़ा ॥ २१ ॥ परन्तु जब मणि
मिली नहीं तब भगवान् श्रीकृष्णने बड़े भाई बलरामजीके पास आकर कहा – ' हमने
शतधन्वाको व्यर्थ ही मारा । क्योंकि उसके पास स्यमन्तकमणि तो है ही नहीं ' ॥२२ ॥
बलरामजीने कहा — ‘ इसमें सन्देह नहीं कि शतधन्वाने स्यमन्तकमणिको किसी-न-किसीके पास रख दिया है । अब तुम द्वारका जाओ और उसका पता लगाओ ॥२३ ॥ मैं विदेहराजसे
मिलना चाहता हूँ; क्योंकि वे मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हैं। ' परीक्षित्! यह कहकर यदुवंशशिरोमणि बलरामजी मिथिला नगरीमें चले गये ॥२४ ॥ जब मिथिलानरेशने देखा कि
पूजनीय बलरामजी महाराज पधारे हैं, तब उनका हृदय आनन्दसे भर गया । उन्होंने झटपट अपने आसनसे उठकर अनेक सामग्रियोंसे उनकी पूजा की || २५ || इसके बाद भगवान् बलरामजी कई वर्षोंतक मिथिलापुरीमें ही रहे । महात्मा जनकने बड़े प्रेम और सम्मानसे उन्हें रखा । इसके बाद समयपर धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधनने बलरामजीसे गदायुद्धकी शिक्षा ग्रहण की ॥२६ ॥ अपनी प्रिया सत्यभामाका प्रिय कार्य करके भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका लौट आये
और उनको यह समाचार सुना दिया कि शतधन्वाको मार डाला गया, परन्तु स्यमन्तकमणि उसके पास न मिली ॥ २७ ॥ इसके बाद उन्होंने भाई-बन्धुओंके साथ अपने श्वशुर
सत्राजित्की वे सब और्ध्वदैहिक क्रियाएँ करवायीं, जिनसे मृतक प्राणीका परलोक सुधरता है ॥२८ ॥
अलब्धमणिरागत्य कृष्ण आहाग्रजान्तिकम् ।
वृथा हतः शतधनुर्मणिस्तत्र न विद्यते ॥२२
तत आह बलो नूनं स मणिः शतधन्वना । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कस्मिंश्चित् पुरुषे न्यस्तस्तमन्वेष पुरं व्रज ॥२३
अहं विदेहमिच्छामि द्रष्टुं प्रियतमं मम ।
इत्युक्त्वा मिथिलां राजन् विवेश यदुनन्दनः ॥२४
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय मैथिलः प्रीतमानसः ।
अर्हयामास विधिवदर्हणीयं समर्हणैः ॥२५
उवास तस्यां कतिचिन्मिथिलायां समा विभुः ।
मानितः प्रीतियुक्तेन जनकेन महात्मना ।
ततोऽशिक्षद् गदां काले धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ॥ २६
केशवो द्वारकामेत्य निधनं शतधन्वनः ।
अप्राप्तिं च मणेः प्राह प्रियायाः प्रियकृद् विभुः ॥२७
ततः स कारयामास क्रिया बन्धोर्हतस्य वै ।
साकं सुहृद्भिर्भगवान् या याः स्युः साम्परायिकाः ॥२८
अक्रूरः कृतवर्मा च श्रुत्वा शतधनोर्वधम् ।
व्यूषतुर्भयवित्रस्तौ द्वारकायाः प्रयोजकौ ॥२९
अक्रूरे प्रोषितेऽरिष्टान्यासन् वै द्वारकौकसाम् ।
शारीरा मानसास्तापा मुहुर्दैविकभौतिकाः ॥३०
इत्यंगोपदिशन्त्येके विस्मृत्य प्रागुदाहृतम् ।
मुनिवासनिवासे किं घटेतारिष्टदर्शनम् ॥३१
अक्रूर और कृतवर्माने शतधन्वाको सत्राजित्के वधके लिये उत्तेजित किया था । इसलिये जब उन्होंने सुना कि भगवान् श्रीकृष्णने शतधन्वाको मार डाला है, तब वे अत्यन्त भयभीत होकर द्वारकासे भाग खड़े हुए ॥ २९ ॥ परीक्षित्! कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि अक्रूरके
द्वारकासे चले जानेपर द्वारकावासियोंको बहुत प्रकारके अनिष्टों और अरिष्टोंका सामना करना पड़ा । दैविक और भौतिक निमित्तोंसे बार- बार वहाँके नागरिकोंको शारीरिक और मानसिक कष्ट सहना पड़ा । परन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं, वे पहले कही हुई बातोंको भूल जाते हैं । भला, यह भी कभी सम्भव है कि जिन भगवान् श्रीकृष्णमें समस्त ऋषि - मुनि निवास करते हैं, उनके निवासस्थान द्वारकामें उनके रहते कोई उपद्रव खड़ा हो जाय ॥ ३०-३१ ॥ उस समय नगरके बड़े - बूढ़े लोगोंने कहा - ' एक बार काशी नरेशके राज्यमें वर्षा नहीं हो रही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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थी, सूखा पड़ गया था । तब उन्होंने अपने राज्यमें आये हुए अक्रूरके पिता श्वफल्कको अपनी पुत्री गान्दिनी ब्याह दी । तब उस प्रदेशमें वर्षा हुई। अक्रूर भीश्वफल्कके ही पुत्र हैं और इनका प्रभाव भी वैसा ही है । इसलिये जहाँ -जहाँ अक्रूर रहते हैं, वहाँ - वहाँ खूब वर्षा होती है तथा किसी प्रकारका कष्ट और महामारी आदि उपद्रव नहीं होते । ' परीक्षित्! उन लोगोंकी बात सुनकर भगवान्ने सोचा कि ' इस उपद्रवका यही कारण नहीं है ' यह जानकर भी भगवान्ने दूत भेजकर अक्रूरजीको ढुँढ़वाया और आनेपर उनसे बातचीत की ॥३२-३४ ॥ भगवान्ने उनका खूब स्वागत- सत्कार किया और मीठी- मीठी प्रेमकी बातें कहकर उनसे सम्भाषण किया । परीक्षित्! भगवान् सबके चित्तका एक- एक संकल्प देखते रहते हैं । इसलिये उन्होंने मुसकराते हुए अक्रूरसे कहा - || ३५ || ' चाचाजी! आप दान- धर्मके पालक हैं । हमें यह बात पहलेसे ही मालूम है कि शतधन्वा आपके पास वह स्यमन्तकमणि छोड़ गया है, जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देनेवाली है ॥ ३६ ॥ आप जानते ही हैं कि सत्राजित्के कोई पुत्र नहीं है ।
इसलिये उनकी लड़कीके लड़के — उनके नाती ही उन्हें तिलांजलि और पिण्डदान करेंगे, उनका ऋण चुकायेंगे और जो कुछ बच रहेगा, उसके उत्तराधिकारी होंगे ॥ ३७ ॥ इस प्रकार
शास्त्रीय दृष्टिसे यद्यपि स्यमन्तकमणि हमारे पुत्रोंको ही मिलनी चाहिये, तथापि वह मणि आपके ही पास रहे । क्योंकि आप बड़े व्रतनिष्ठ और पवित्रात्मा हैं तथा दूसरोंके लिये उस मणिको रखना अत्यन्त कठिन भी है । परन्तु हमारे सामने एक बहुत बड़ी कठिनाई यह आ गयी है कि हमारे बड़े भाई बलरामजी मणिके सम्बन्धमें मेरी बातका पूरा विश्वास नहीं करते ॥३८ ॥ इसलिये महाभाग्यवान् अक्रूरजी! आप वह मणि दिखाकर हमारे इष्ट - मित्र-बलरामजी, सत्यभामा और जाम्बवतीका सन्देह दूर कर दीजिये और उनके हृदयमें शान्तिका
संचार कीजिये । हमें पता है कि उसी मणिके प्रतापसे आजकल आप लगातार ही ऐसे यज्ञ करते रहते हैं, जिनमें सोनेकी वेदियाँ बनती हैं ' ॥ ३ ९ ॥ परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सान्त्वना देकर उन्हें समझाया बुझाया तब अक्रूरजीने वस्त्रमें लपेटी हुई सूर्यके समान प्रकाशमान वह मणि निकाली और भगवान् श्रीकृष्णको दे दी ॥४० ॥ भगवान्
श्रीकृष्णने वह स्यमन्तकमणि अपने जाति- भाइयोंको दिखाकर अपना कलंक दूर किया और उसे अपने पास रखनेमें समर्थ होनेपर भी पुनः अक्रूरजीको लौटा दिया ॥४१ ॥
देवेऽवर्षति काशीशः श्वफल्कायागताय वै ।
स्वसुतां गान्दिनीं प्रादात् ततोऽवर्षत् स्म काशिषु ॥ ३२
तत्सुतस्तत्प्रभावोऽसावक्रूरो यत्र यत्र ह ।
देवोऽभिवर्षते तत्र नोपतापा न मारिकाः ॥३३
इति वृद्धवचः श्रुत्वा नैतावदिह कारणम् ।
इति मत्वा समानाय्य प्राहाक्रूरं जनार्दनः ॥३४
पूजयित्वाभिभाष्यैनं कथयित्वा प्रियाः कथाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विज्ञाताखिलचित्तज्ञः स्मयमान उवाच ह ॥३५
ननु दानपते न्यस्तस्त्वय्यास्ते शतधन्वना ।
स्यमन्तको मणिः श्रीमान् विदितः पूर्वमेव नः ॥३६
सत्राजितोऽनपत्यत्वाद् गृह्णीयुर्दुहितुः सुताः ।
दायं निनीयापः पिण्डान् विमुच्यर्णं च शेषितम् ॥३७
तथापि दुर्धरस्त्वन्यैस्त्वय्यास्तां सुव्रते मणिः ।
किन्तु मामग्रजः सम्यङ् न प्रत्येति मणिं प्रति ॥३८
दर्शयस्व महाभाग बन्धूनां शान्तिमावह ।
अव्युच्छिन्ना मखास्तेऽद्य वर्तन्ते रुक्मवेदयः ॥३९
एवं सामभिरालब्धः श्वफल्कतनयो मणिम् ।
आदाय वाससाच्छन्नं ददौ सूर्यसमप्रभम् ॥४०
स्यमन्तकं दर्शयित्वा ज्ञातिभ्यो रज आत्मनः ।
विमृज्य मणिना भूयस्तस्मै प्रत्यर्पयत् प्रभुः ॥४१
यस्त्वेतद् भगवत ईश्वरस्य विष्णो- र्वीर्याढ्यं वृजिनहरं सुमंगलं च । आख्यानं पठति शृणोत्यनुस्मरेद् वा दुष्कीर्तिं दुरितमपोह्य याति शान्तिम् ॥४२ सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापक भगवान् श्रीकृष्णके पराक्रमोंसे परिपूर्ण यह आख्यान समस्त पापों, अपराधों और कलंकोंका मार्जन करनेवाला तथा परम मंगलमय है । जो इसे पढ़ता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह सब प्रकारकी अपकीर्ति और पापोंसे छूटकर शान्तिका अनुभव करता है ॥४२ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे स्यमन्तकोपाख्याने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५७ ॥
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अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णके अन्यान्य विवाहोंकी कथा श्रीशुक उवाच
एकदा पाण्डवान् द्रष्टुं प्रतीतान् पुरुषोत्तमः ।
इन्द्रप्रस्थं गतः श्रीमान् युयुधानादिभिर्वृतः ॥ १
दृष्ट्वा तमागतं पार्था मुकुन्दमखिलेश्वरम् ।
उत्तस्थुर्युगपद् वीराः प्राणा मुख्यमिवागतम् ॥२
परिष्वज्याच्युतं वीरा अंगसंगहतैनसः ।
सानुरागस्मितं वक्त्रं वीक्ष्य तस्य मुदं ययुः ॥ ३
युधिष्ठिरस्य भीमस्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् ।
फाल्गुनं परिरभ्याथ यमाभ्यां चाभिवन्दितः ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब पाण्डवोंका पता चल गया था कि वे लाक्षाभवनमें जले नहीं हैं । एक बार भगवान् श्रीकृष्ण उनसे मिलनेके लिये इन्द्रप्रस्थ पधारे । उनके साथ सात्यकि आदि बहुत-से यदुवंशी भी थे || १ || जब वीर पाण्डवोंने देखा कि सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण पधारे हैं तो जैसे प्राणका संचार होनेपर सभी इन्द्रियाँ सचेत हो जाती हैं, वैसे ही वे सब- के - सब एक साथ उठ खड़े हुए || २ || वीर पाण्डवोंने भगवान् श्रीकृष्णका आलिंगन किया, उनके अंग- संगसे इनके सारे पाप ताप धुल गये । भगवान्की प्रेमभरी मुसकराहटसे सुशोभित मुख- सुषमा देखकर वे आनन्दमें मग्न हो गये ॥३ ॥ भगवान्
श्रीकृष्णने युधिष्ठिर और भीमसेनके चरणोंमें प्रणाम किया और अर्जुनको हृदयसे लगाया । नकुल और सहदेवने भगवान्के चरणोंकी वन्दना की || ४|| जब भगवान् श्रीकृष्ण श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हो गये; तब परमसुन्दरी श्यामवर्णा द्रौपदी, जो नवविवाहिता होनेके कारण तनिक लजा रही थी, धीरे- धीरे भगवान् श्रीकृष्णके पास आयी और उन्हें प्रणाम किया ॥५ ॥ पाण्डवोंने भगवान् श्रीकृष्णके समान ही वीर सात्यकिका भी स्वागत- सत्कार
और अभिनन्दन - वन्दन किया। वे एक आसनपर बैठ गये। दूसरे यदुवंशियोंका भी यथायोग्य सत्कार किया गया तथा वे भी श्रीकृष्णके चारों ओर आसनोंपर बैठ गये || ६ || इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अपनी फूआ कुन्तीके पास गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया । कुन्तीजीने अत्यन्त स्नेहवश उन्हें अपने हृदयसे लगा लिया । उस समय उनके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये । कुन्तीजीने श्रीकृष्णसे अपने भाई- बन्धुओंकी कुशल- क्षेम पूछी और भगवान्ने भी उनका यथोचित उत्तर देकर उनसे उनकी पुत्रवधू द्रौपदी और स्वयं उनका कुशल - मंगल पूछा ॥७ ॥ उस समय प्रेमकी विह्वलतासे कुन्तीजीका गला रुँध गया था, नेत्रोंसे
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आँसू बह रहे थे । भगवान्के पूछनेपर उन्हें अपने पहलेके क्लेश- पर- क्लेश याद आने लगे और वे अपनेको बहुत सँभालकर, जिनका दर्शन समस्त क्लेशोंका अन्त करनेके लिये ही हुआ करता है, उन भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगीं— ॥ ८ ॥
परमासन आसीनं कृष्णा कृष्णमनिन्दिता ।
नवोढा व्रीडिता किंचिच्छनैरेत्याभ्यवन्दत ॥ ५
तथैव सात्यकिः पार्थैः पूजितश्चाभिवन्दितः ।
निषसादासनेऽन्ये च पूजिताः पर्युपासत ॥६
पृथां समागत्य कृताभिवादन- स्तयातिहार्दार्द्रदृशाभिरम्भितः । आपृष्टवांस्तां कुशलं सहस्नुषां पितृष्वसारं परिपृष्टबान्धवः ॥७
तमाह प्रेमवैक्लव्यरुद्धकण्ठाश्रुलोचना ।
स्मरन्ती तान् बहून् क्लेशान् क्लेशापायात्मदर्शनम् ॥८
तदैव कुशलं नोऽभूत् सनाथास्ते कृता वयम् ।
ज्ञातीन् नः स्मरता कृष्ण भ्राता मे प्रेषितस्त्वया ॥९
न तेऽस्ति स्वपरभ्रान्तिर्विश्वस्य सुहृदात्मनः ।
तथापि स्मरतां शश्वत् क्लेशान् हंसि हृदि स्थितः ॥१०
युधिष्ठिर उवाच
किं न आचरितं श्रेयो न वेदाहमधीश्वर ।
योगेश्वराणां दुर्दर्शो यन्नो दृष्टः कुमेधसाम् ॥११
‘ श्रीकृष्ण! जिस समय तुमने हमलोगोंको अपना कुटुम्बी, सम्बन्धी समझकर स्मरण किया और हमारा कुशल-मंगल जाननेके लिये भाई अक्रूरको भेजा, उसी समय हमारा कल्याण हो गया, हम अनाथोंको तुमने सनाथ कर दिया || ९ || मैं जानती हूँ कि तुम सम्पूर्ण जगत्के परम हितैषी सुहृद् और आत्मा हो । यह अपना है और यह पराया, इस प्रकारकी भ्रान्ति तुम्हारे अंदर नहीं है । ऐसा होनेपर भी, श्रीकृष्ण! जो सदा तुम्हें स्मरण करते हैं, उनके हृदयमें आकर तुम बैठ जाते हो और उनकी क्लेश- परम्पराको सदाके लिये मिटा देते हो' ॥१० ॥
युधिष्ठिरजीने कहा — ‘ सर्वेश्वर श्रीकृष्ण! हमें इस बातका पता नहीं है कि हमने अपने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पूर्वजन्मोंमें या इस जन्म में कौन-सा कल्याण-साधन किया है? आपका दर्शन बड़े -बड़े योगेश्वर भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त कर पाते हैं और हम कुबुद्धियोंको घर बैठे ही आपके दर्शन कुछ 'हो रहे हैं ॥११ ॥ राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार भगवान्का खूब सम्मान किया और दिनवहीं रहनेकी प्रार्थना की । इसपर भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थके नर- नारियोंको अपनी
रूपमाधुरीसे नयनानन्दका दान करते हुए बरसातके चार महीनोंतक सुखपूर्वक वहीं रहे ॥१२ ॥ परीक्षित्! एक बार वीरशिरोमणि अर्जुनने गाण्डीव धनुष और अक्षय बाणवाले दो
तरकस लिये तथा भगवान् श्रीकृष्णके साथ कवच पहनकर अपने उस रथपर सवार हुए, जिसपरवानर-र- चिह्नसे चिह्नित ध्वजा लगी हुई थी । इसके बाद विपक्षी वीरोंका नाश करनेवाले अर्जुन उस गहन वनमें शिकार खेलने गये, जो बहुत - से सिंह, बाघ आदि भयंकर जानवरोंसे भरा हुआ था ॥१३-१४ ॥ वहाँ उन्होंने बहुत- से बाघ, सूअर, भैंसे, काले हरिन, शरभ, गवय ( नीलापन लिये हुए भूरे रंगका एक बड़ा हिरन), गैंडे, हरिन, खरगोश और शल्लक ( साही ) आदि पशुओंपर अपने बाणोंका निशाना लगाया ॥१५ ॥ उनमेंसे जो यज्ञके योग्य थे, उन्हें
सेवकगण पर्वका समय जानकर राजा युधिष्ठिरके पास ले गये । अर्जुन शिकार खेलते - खेलते थक गये थे । अब वे प्यास लगनेपर यमुनाजीके किनारे गये ॥ १६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण और
अर्जुन दोनों महारथियोंने यमुनाजीमें हाथ- पैर धोकर उनका निर्मल जल पिया और देखा कि एक परमसुन्दरी कन्या वहाँ तपस्या कर रही है ॥१७ ॥ उस श्रेष्ठ सुन्दरीकी जंघा, दाँत और
मुख अत्यन्त सुन्दर थे । अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्णके भेजनेपर अर्जुनने उसके पास जाकर पूछा— ॥१८ ॥ ‘ सुन्द्री! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? कहाँसे आयी हो? और क्या
करना चाहती हो? मैं ऐसा समझता हूँ कि तुम अपने योग्य पति चाह रही हो । हे कल्याणि! तुम अपनी सारी बात बतलाओ ’ ॥१९ ॥
इति वै वार्षिकान् मासान् राज्ञा सोऽभ्यर्थितः सुखम् ।
जनयन् नयनानन्दमिन्द्रप्रस्थौकसां विभुः ॥१२
एकदा रथमारुह्य विजयो वानरध्वजम् ।
गाण्डीवं धनुरादाय तूणौ चाक्षयसायकौ ॥१३
साकं कृष्णेन सन्नद्धो विहर्तुं विपिनं वनम् ।
बहुव्यालमृगाकीर्णं प्राविशत् परवीरहा ॥१४
तत्राविध्यच्छरैर्व्याघ्रान् सूकरान् महिषान् रुरून् ।
शरभान् गवयान् खड्गान् हरिणाञ्छशशल्लकान् ॥१५
तान् निन्युः किंकरा राज्ञे मेध्यान् पर्वण्युपागते ।
तृट्परीतः परिश्रान्तो बीभत्सुर्यमुनामगात् ॥ १६
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