श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 741–750
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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तत्रोपस्पृश्य विशदं पीत्वा वारि महारथौ ।
कृष्णौ ददृशतुः कन्यां चरन्तीं चारुदर्शनाम् ॥१७
तामासाद्य वरारोहां सुद्विजां रुचिराननाम् ।
पप्रच्छ प्रेषितः सख्या फाल्गुनः प्रमदोत्तमाम् ॥१८
का त्वं कस्यासि सुश्रोणि कुतोऽसि किं चिकीर्षसि मन्ये त्वां पतिमिच्छन्तीं सर्वं कथय शोभने ॥१९ कालिन्द्युवाच
अहं देवस्य सवितुर्दुहिता पतिमिच्छती ।
विष्णुं वरेण्यं वरदं तपः परममास्थिता ॥२०
कालिन्दीने कहा —‘ मैं भगवान् सूर्यदेवकी पुत्री हूँ । मैं सर्वश्रेष्ठ वरदानी भगवान् विष्णुको पतिके रूपमें प्राप्त करना चाहती हूँ और इसीलिये यह कठोर तपस्या कर रही हूँ ॥२० ॥ वीर
अर्जुन! मैं लक्ष्मीके परम आश्रय भगवान्को छोड़कर और किसीको अपना पति नहीं बना सकती । अनाथोंके एकमात्र सहारे, प्रेम वितरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥२१ ॥ मेरा नाम है कालिन्दी । यमुनाजलमें मेरे पिता सूर्यने मेरे लिये एक भवन भी बनवा
दिया है । उसीमें मैं रहती हूँ। जबतक भगवान्का दर्शन न होगा, मैं यहीं रहूँगी' ॥२२ ॥
अर्जुनने जाकर भगवान् श्रीकृष्णसे सारी बातें कहीं । वे तो पहलेसे ही यह सब कुछ जानते थे, अब उन्होंने कालिन्दीको अपने रथपर बैठा लिया और धर्मराज युधिष्ठिरके पास ले आये ॥२३ ॥
नान्यं पतिं वृणे वीर तमृते श्रीनिकेतनम् ।
तुष्यतां मे स भगवान् मुकुन्दोऽनाथसंश्रयः ॥२१
कालिन्दीति समाख्याता वसामि यमुनाजले ।
निर्मिते भवने पित्रा यावदच्युतदर्शनम् ॥२२
तथावदद् गुडाकेशो वासुदेवाय सोऽपि ताम् ।
रथमारोप्य तद् विद्वान् धर्मराजमुपागमत् ॥२३
यदैव कृष्णः सन्दिष्टः पार्थानां परमाद्भुतम् ।
कारयामास नगरं विचित्रं विश्वकर्मणा ॥२४
भगवांस्तत्र निवसन् स्वानां प्रियचिकीर्षया । ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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अग्नये खाण्डवं दातुमर्जुनस्यास सारथिः ॥२५
सोऽग्निस्तुष्टो धनुरदाद्धयाञ्छ्वेतान् रथं नृप ।
अर्जुनायाक्षयौ तूणी वर्म चाभेद्यमस्त्रिभिः ॥ २६
मयश्च मोचितो वह्नेः सभां सख्य उपाहरत् ।
यस्मिन् दुर्योधनस्यासीज्जलस्थलदृशिभ्रमः ॥ २७
स तेन समनुज्ञातः सुहृद्भिश्चानुमोदितः ।
आययौ द्वारकां भूयः सात्यकिप्रमुखैर्वृतः ॥ २८
अथोपयेमे कालिन्दीं सुपुण्यर्वृक्ष ऊर्जिते ।
वितन्वन् परमानन्दं स्वानां परममंगलम् ॥२९
इसके बाद पाण्डवोंकी प्रार्थनासे भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके रहनेके लिये एक अत्यन्त अद्भुत और विचित्र नगर विश्वकर्माके द्वारा बनवा दिया ॥२४ ॥ भगवान् इस बार
पाण्डवोंको आनन्द देने और उनका हित करनेके लिये वहाँ बहुत दिनोंतक रहे । इसी बीच अग्निदेवको खाण्डव- वन दिलानेके लिये वे अर्जुनके सारथि भी बने || २५ ॥ खाण्डव- वनका भोजन मिल जानेसे अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने अर्जुनको गाण्डीव धनुष, चार श्वेत घोड़े, एक रथ, दो अटूट बाणोंवाले तरकस और एक ऐसा कवच दिया, जिसे कोई अस्त्र-शस्त्रधारी भेद न सके ॥२६ ॥ खाण्डव -दाहके समय अर्जुनने मय दानवको जलनेसे बचा
लिया था । इसलिये उसने अर्जुनसे मित्रता करके उनके लिये एक परम अद्भुत सभा बना दी ।
उसी सभामें दुर्योधनको जलमैं स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो गया था ॥ २७ ॥
कुछ दिनोंके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनकी अनुमति एवं अन्य सम्बन्धियोंका अनुमोदन प्राप्त करके सात्यकि आदिके साथ द्वारका लौट आये || २८ || वहाँ आकर उन्होंने विवाहके योग्य ऋतु और ज्यौतिष - शास्त्रके अनुसार प्रशंसित पवित्र लग्नमें कालिन्दीजीका पाणिग्रहण किया । इससे उनके स्वजन - सम्बन्धियोंको परम मंगल और परमानन्दकी प्राप्ति हुई ॥२९ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दुर्योधनवशानुगौ ।
स्वयंवरे स्वभगिनीं कृष्णे सक्तां न्यषेधताम् ॥३०
राजाधिदेव्यास्तनयां मित्रविन्दां पितृष्वसुः ।
प्रसह्य हृतवान् कृष्णो राजन् राज्ञां प्रपश्यताम् ॥३१
नग्नजिन्नाम कौसल्य आसीद् राजातिधार्मिकः ।
तस्य सत्याभवत् कन्या देवी नाग्नजिती नृप ॥३२
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न तां शेकुर्नृपा वोढुमजित्वा सप्त गोवृषान् ।
तीक्ष्णशृंगान् सुदुर्धर्षान् वीरगन्धासहान् खलान् ॥३३
तां श्रुत्वा वृषजिल्लभ्यां भगवान् सात्वतां पतिः ।
जगाम कौसल्यपुरं सैन्येन महता वृतः ॥ ३४
स कोसलपतिः प्रीतः प्रत्युत्थानासनादिभिः ।
अर्हणेनापि गुरुणा पूजयन् प्रतिनन्दितः ॥३५
वरं विलोक्याभिमतं समागतं नरेन्द्रकन्या चकमे रमापतिम् । भूयादयं मे पतिराशिषोऽमलाः करोतु सत्या यदि मे धृतो व्रतैः ॥३६ यत्पादपंकजरजः शिरसा बिभर्ति श्रीरब्जजः सगिरिशः सहलोकपालैः । लीलातनूः स्वकृत सेतुपरीप्सयेशः काले दधत् स भगवान् मम केन तुष्येत् ॥ ३७ अवन्ती ( उज्जैन) देशके राजा थे विन्द और अनुविन्द। वे दुर्योधनके वशवर्ती तथा अनुयायी थे । उनकी बहिन मित्रविन्दाने स्वयंवरमें भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना पति बनाना चाहा । परन्तु विन्द और अनुविन्दने अपनी बहिनको रोक दिया ॥ ३० ॥ परीक्षित्! मित्रविन्दा
श्रीकृष्णकी फूआ राजाधिदेवीकी कन्या थी । भगवान् श्रीकृष्ण राजाओंकी भरी सभामें उसे बलपूर्वक हर ले गये, सब लोग अपना सा मुँह लिये देखते ही रह गये ॥ ३१ ॥
परीक्षित्! कोसलदेशके राजा थे नग्नजित्। वे अत्यन्त धार्मिक थे । उनकी परमसुन्दरी कन्याका नाम था सत्या; नग्नजित्की पुत्री होनेसे वह नाग्नजिती भी कहलाती थी । परीक्षित्! राजाकी प्रतिज्ञाके अनुसार सात दुर्दान्त बैलोंपर विजय प्राप्त न कर सकनेके कारण कोई राजा उस कन्यासे विवाह न कर सके । क्योंकि उनके सींग बड़े तीखे थे और वे बैल किसी वीर पुरुषकी गन्ध भी नहीं सह सकते थे ॥३२-३३ ॥ जब यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने यह समाचार सुना कि जो पुरुष उन बैलोंको जीत लेगा, उसे ही सत्या प्राप्त होगी; तब वे बहुत बड़ी सेना लेकर कोसलपुरी ( अयोध्या ) पहुँचे ॥ ३४ ॥ कोसलनरेश महाराज नग्नजित्ने
बड़ी प्रसन्नतासे उनकी अगवानी की और आसन आदि देकर बहुत बड़ी पूजा- सामग्रीसे उनका सत्कार किया । भगवान् श्रीकृष्णने भी उनका बहुत-बहुत अभिनन्दन किया ॥३५ ॥
राजा नग्नजित्की कन्या सत्याने देखा कि मेरे चिर- अभिलषित रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं; तब उसने मन -ही- मन यह अभिलाषा की कि ' यदि मैंने व्रत- नियम आदिका पालन करके इन्हींका चिन्तन किया है तो ये ही मेरे पति हों और मेरी विशुद्ध लालसाको पूर्ण ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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करें ' ॥३६ ॥ नाग्नजिती सत्या मन ही मन सोचने लगी- ' भगवती लक्ष्मी, ब्रह्मा, शंकर और
बड़े -बड़े लोकपाल जिनके पदपंकजका पराग अपने सिरपर धारण करते हैं और जिन प्रभुने अपनी बनायी हुई मर्यादाका पालन करनेके लिये ही समय- समयपर अनेकों लीलावतार ग्रहण किये हैं, वे प्रभु मेरे किस धर्म, व्रत अथवा नियमसे प्रसन्न होंगे? वे तो केवल अपनी कृपासे ही प्रसन्न हो सकते हैं ' ॥ ३७ ॥ परीक्षित्! राजा नग्नजित्ने भगवान् श्रीकृष्णकी विधि- पूर्वक
अर्चा- पूजा करके यह प्रार्थना की-' जगत्के एकमात्र स्वामी नारायण! आप अपने स्वरूपभूत आनन्दसे ही परिपूर्ण हैं और मैं हूँ एक तुच्छ मनुष्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ' ॥३८ ॥
अर्चितं पुनरित्याह नारायण जगत्पते ।
आत्मानन्देन पूर्णस्य करवाणि किमल्पकः ॥ ३८
श्रीशुक उवाच
तमाह भगवान् हृष्टः१ कृतासनपरिग्रहः ।
मेघगम्भीरया वाचा सस्मितं कुरुनन्दन ॥३९
श्रीभगवानुवाच नरेन्द्र याच्ञा कविभिर्विगर्हिता राजन्यबन्धोर्निजधर्मवर्तिनः । तथापि याचे तव सौहृदेच्छया कन्यां त्वदीयां न हि शुल्कदा वयम् ॥४० राजोवाच
कोऽन्यस्तेऽभ्यधिको नाथ कन्यावर इहेप्सितः ।
गुणैकधाम्नो यस्यांगे श्रीर्वसत्यनपायिनी ॥४१
किं त्वस्माभिः कृतः पूर्वं समयः सात्वतर्षभ ।
पुंसां वीर्यपरीक्षार्थं कन्यावरपरीप्सया ॥४२
सप्तैते गोवृषा वीर दुर्दान्ता दुरवग्रहाः ।
एतैर्भग्नाः सुबहवो भिन्नगात्रा नृपात्मजाः ॥४३
यदिमे निगृहीताः स्युस्त्वयैव यदुनन्दन ।
वरो भवानभिमतो दुहितुर्मे श्रियः २ पते ॥४४
एवं समयमाकर्ण्य बद्ध्वा परिकरं प्रभुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आत्मानं सप्तधा कृत्वा न्यगृह्णाल्लीलयैव तान् ॥४५ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! राजा नग्नजित्का दिया हुआ आसन, पूजा आदि स्वीकार करके भगवान् श्रीकृष्ण बहुत सन्तुष्ट हुए । उन्होंने मुसकराते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीसे कहा || ३ ९ || भगवान् श्रीकृष्णने कहा- राजन्! जो क्षत्रिय अपने धर्ममें स्थित है, उसका कुछ भी माँगना उचित नहीं । धर्मज्ञ विद्वानोंने उसके इस कर्मकी निन्दा की है । फिर भी मैं आपसे सौहार्दका– प्रेमका सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये आपकी कन्या चाहता हूँ। हमारे यहाँ इसके बदलेमें कुछ शुल्क देनेकी प्रथा नहीं है ॥४० ॥
राजा नग्नजित्ने कहा – ' प्रभो! आप समस्त गुणोंके धाम हैं, एकमात्र आश्रय हैं । आपके वक्षःस्थलपर भगवती लक्ष्मी नित्य- निरन्तर निवास करती हैं । आपसे बढ़कर कन्याके लिये अभीष्ट वर भला और कौन हो सकता है? ॥४१ ॥ परन्तु यदुवंशशिरोमणे! हमने पहले
ही इस विषयमें एक प्रण कर लिया है । कन्याके लिये कौन- सा वर उपयुक्त है, उसका बल-पौरुष कैसा है — इत्यादि बातें जाननेके लिये ही ऐसा किया गया है ॥४२ ॥ वीरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण!
हमारे ये सातों बैल किसीके वशमें न आनेवाले और बिना सधाये हुए हैं । इन्होंने बहुत - से राजकुमारोंके अंगोंको खण्डित करके उनका उत्साह तोड़ दिया है ॥४३ ॥ श्रीकृष्ण! यदि
इन्हें आप ही नाथ लें, अपने वशमें कर लें, तो लक्ष्मीपते! आप ही हमारी कन्याके लिये अभीष्ट वर होंगे ’ ॥४४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने राजा नग्नजित्का ऐसा प्रण सुनकर कमरमें फेंट
कस ली और अपने सात रूप बनाकर खेल- खेलमें ही उन बैलोंको नाथ लिया ॥ ४५ ॥ इससे
बैलोंका घमंड चूर हो गया और उनका बल-- पौरुष भी जाता रहा । अब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें रस्सीसे बाँधकर इस प्रकार खींचने लगे, जैसे खेलते समय नन्हा सा बालक काठके बैलोंको घसीटता है ॥४६ ॥ राजा नग्नजित्को बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने प्रसन्न होकर भगवान्
श्रीकृष्णको अपनी कन्याका दान कर दिया और सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने अनुरूप पत्नी सत्याका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥ ४७ ॥ रानियोंने देखा कि हमारी
कन्याको उसके अत्यन्त प्यारे भगवान् श्रीकृष्ण ही पतिके रूपमें प्राप्त हो गये हैं । उन्हें बड़ा आनन्द हुआ और चारों ओर बड़ा भारी उत्सव मनाया जाने लगा ॥ ४८ ॥ शंख, ढोल, नगारे
बजने लगे । सब ओर गाना- बजाना होने लगा । ब्राह्मण आशीर्वाद देने लगे । सुन्दर वस्त्र, पुष्पोंके हार और गहनोंसे सज- धजकर नगरके नर- नारी आनन्द मनाने लगे ॥ ४९ ॥ राजा
नग्नजित्ने दस हजार गौएँ और तीन हजार ऐसी नवयुवती दासियाँ जो सुन्दर वस्त्र तथा गलेमें स्वर्णहार पहने हुए थीं, दहेजमें दीं । इनके साथ ही नौ हजार हाथी, नौ लाख रथ, नौ करोड़ घोड़े और नौ अरब सेवक भी दहेज में दिये ॥ ५०-५१ ॥ कोसलनरेश राजा नग्नजित्ने कन्या और दामादको रथपर चढ़ाकर एक बड़ी सेनाके साथ विदा किया। उस समय उनका हृदय वात्सल्य - स्नेहके उद्रेकसे द्रवित हो रहा था ॥५२ ॥
बद्ध्वा तान् दामभिः शौरिर्भग्नदर्पान् हतौजसः ।
व्यकर्षल्लीलया बद्धान् बालो दारुमयान् यथा ॥४६
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ततः प्रीतः सुतां राजा ददौ कृष्णाय विस्मितः ।
तां प्रत्यगृह्णाद् भगवान् विधिवत् सदृशीं प्रभुः ॥४७
राजपत्न्यश्च दुहितुः कृष्णं लब्ध्वा प्रियं पतिम् ।
लेभिरे परमानन्दं जातश्च परमोत्सवः ॥४८
शंखभेर्यानका नेदुर्गीतवाद्यद्विजाशिषः ।
नरा नार्यः प्रमुदिताः सुवासःस्रगलंकृताः ॥४९
दशधेनुसहस्राणि पारिबर्हमदाद् विभुः ।
युवतीनां त्रिसाहस्रं निष्कग्रीवसुवाससाम् ॥५०
नवनागसहस्राणि नागाच्छतगुणान् रथान् ।
रथाच्छतगुणानश्वानश्वाच्छतगुणान् नरान् ॥५१
दम्पती रथमारोप्य महत्या सेनया वृतौ ।
स्नेहप्रक्लिन्नहृदयो यापयामास कोसलः ॥ ५२
श्रुत्वैतद् रुरुधुर्भूपा नयन्तं पथि कन्यकाम् ।
भग्नवीर्याः सुदुर्मर्षा यदुभिर्गोवृषैः पुरा ॥५३
तानस्यतः शरव्रातान् बन्धुप्रियकृदर्जुनः ।
गाण्डीवी कालयामास सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ५४
परीक्षित्! यदुवंशियोंने और राजा नग्नजित्के बैलोंने पहले बहुत- से राजाओंका बल-पौरुष धूलमें मिला दिया था । जब उन राजाओंने यह समाचार सुना, तब उनसे भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजय सहन न हुई । उन लोगोंने नाग्नजिती सत्याको लेकर जाते समय मार्गमें भगवान् श्रीकृष्णको घेर लिया ॥ ५३ ॥ और वे बड़े वेगसे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ।
उस समय पाण्डववीर अर्जुनने अपने मित्र भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये गाण्डीव धनुष धारण करके — जैसे सिंह छोटे - मोटे पशुओंको खदेड़ दे, वैसे ही उन नरपतियोंको मार-पीटकर भगा दिया ॥५४ ॥ तदनन्तर यदुवंशशिरोमणि देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण उस
दहेज और सत्याके साथ द्वारकामें आये और वहाँ रहकर गृहस्थोचित विहार करने लगे ॥५५ ||
पारिबर्हमुपागृह्य द्वारकामेत्य सत्यया ।
रेमे यदूनामृषभो भगवान् देवकीसुतः ॥ ५५
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श्रुतकीर्तेः सुतां भद्रामुपयेमे पितृष्वसुः ।
कैकेयीं भ्रातृभिर्दत्तां कृष्णः सन्तर्दनादिभिः ॥ ५६
सुतां च मद्राधिपतेर्लक्ष्मणां लक्षणैर्युताम् ।
स्वयंवरे जहारैकः स सुपर्णः सुधामिव ॥५७
अन्याश्चैवंविधा भार्याः कृष्णस्यासन् सहस्रशः ।
भौमं हत्वा तन्निरोधादाहृताश्चारुदर्शनाः ॥ ५८
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णकी फूआ श्रुतकीर्ति केकय-देशमें ब्याही गयी थीं । उनकी कन्याका नाम था भद्रा । उसके भाई सन्तर्दन आदिने उसे स्वयं ही भगवान् श्रीकृष्णको दे दिया और उन्होंने उसका पाणिग्रहण किया || ५६ ॥ मद्रप्रदेशके राजाकी एक कन्या थी लक्ष्मणा । वह अत्यन्त सुलक्षणा थी । जैसे गरुड़ने स्वर्गसे अमृतका हरण किया था, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णने स्वयंवरमें अकेले ही उसे हर लिया ॥५७ ॥
परीक्षित्! इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी और भी सहस्रों स्त्रियाँ थीं । उन परम सुन्दरियोंको वे भौमासुरको मारकर उसके बंदीगृहसे छुड़ा लाये थे ॥ ५८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे अष्टमहिष्युद्वाहो नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
१. कृष्णः । २. प्रियः पतिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः भौमासुरका उद्धार और सोलह हजार एक सौ राज- कन्याओंके साथ भगवान्का विवाह राजोवाच
यथा हतो भगवता भौमो येन च ताः स्त्रियः ।
निरुद्धा एतदाचक्ष्व विक्रमं शार्ङ्गधन्वनः ॥१
श्रीशुक उवाच इन्द्रेण हृतछत्रेण हृतकुण्डलबन्धुना ।
हृतामराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम् ।
सभार्यो गरुडारूढः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ ॥२
राजा परीक्षित्ने पूछा – भगवन्! भगवान् श्रीकृष्णने भौमासुरको, जिसने उन स्त्रियोंको बंदीगृहमें डाल रखा था, क्यों और कैसे मारा? आप कृपा करके शाङ्गे- धनुषधारी भगवान् श्रीकृष्णका वह विचित्र चरित्र सुनाइये ॥१ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा - परीक्षित्! भौमासुरने वरुणका छत्र, माता अदितिके कुण्डल और मेरु पर्वतपर स्थित देवताओंका मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया था । इसपर सबके राजा इन्द्र द्वारकामें आये और उसकी एक-एक करतूत उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको सुनायी । अब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामाके साथ गरुड़पर सवार हुए और भौमासुरकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुरमें गये || २ || प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रवेश करना बहुत कठिन था । पहले तो उसके चारों ओर पहाड़ोंकी किलेबंदी थी, उसके बाद शस्त्रोंका घेरा लगाया हुआ था । फिर जलसे भरी खाईं थी, उसके बाद आग या बिजलीकी चहारदीवारी थी और उसके भीतर वायु ( गैस ) बंद करके रखा गया था । इससे भी भीतर मुर दैत्यने नगरके चारों ओर अपने दस हजार घोर एवं सुदृढ फंदे (जाल ) बिछा रखे थे ॥३ ॥ भगवान्
श्रीकृष्णने अपनी गदाकी चोटसे पहाड़ोंको तोड़- फोड़ डाला और शस्त्रोंकी मोरचे- बंदीको बाणोंसे छिन्न - भिन्न कर दिया । चक्रके द्वारा अग्नि, जल और वायुकी चहारदीवारियोंको तहस-नहस कर दिया और मुर दैत्यके फंदोंको तलवारसे काट- कूटकर अलग रख दिया ॥४ ॥ जो
बड़े - बड़े यन्त्र — मशीनें वहाँ लगी हुई थीं, उनको तथा वीरपुरुषोंके हृदयको शंखनादसे विदीर्ण कर दिया और नगरके परकोटेको गदाधर भगवान्ने अपनी भारी गदासे ध्वंस कर डाला ॥५ ॥
गिरिदुर्गैः शस्त्रदुर्गैर्जलाग्न्यनिलदुर्गमम् ।
मुरपाशायुतैर्घोरैर्दृढैः सर्वत आवृतम् ॥३
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गदया निर्बिभेदाद्रीन् शस्त्रदुर्गाणि सायकैः ।
चक्रेणाग्निं जलं वायुं मुरपाशांस्तथासिना ॥४
शंखनादेन यन्त्राणि हृदयानि मनस्विनाम् ।
प्राकारं गदया गुर्व्या निर्बिभेद गदाधरः ॥५
पांचजन्यध्वनिं श्रुत्वा युगान्ताशनिभीषणम् ।
मुरः शयान उत्तस्थौ दैत्यः पंचशिरा जलात् ॥६
त्रिशूलमुद्यम्य सुदुर्निरीक्षणो
युगान्तसूर्यानलरोचिरुल्बणः ।
ग्रसंस्त्रिलोकीमिव पंचभिर्मुखै- रभ्यद्रवत्तार्क्ष्यसुतं यथोरगः ॥७
आविध्य शूलं तरसा गरुत्मते
निरस्य वक्त्रैर्व्यनदत् स पंचभिः ।
स रोदसी सर्वदिशोऽन्तरं महा- नापूरयन्नण्डकटाहमावृणोत् ॥८
तदापतद् वै त्रिशिखं गरुत्मते हरिः शराभ्यामभिनत्त्रिधौजसा । भगवान्के पांचजन्य शंखकी ध्वनि प्रलयकालीन बिजलीकी कड़कके समान महाभयंकर थी । उसे सुनकर मुर दैत्यकी नींद टूटी और वह बाहर निकल आया । उसके पाँच सिर थे और अबतक वह जलके भीतर सो रहा था ॥ ६ ॥ वह दैत्य प्रलयकालीन सूर्य और अग्निके समान
प्रचण्ड तेजस्वी था । वह इतना भयंकर था कि उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी आसान काम नहीं था । उसने त्रिशूल उठाया और इस प्रकार भगवान्की ओर दौड़ा, जैसे साँप गरुड़जीपर टूट पड़े । उस समय ऐसा मालूम होता था मानो वह अपने पाँचों मुखोंसे त्रिलोकीको निगल जायगा ॥७ ॥ उसने अपने त्रिशूलको बड़े वेगसे घुमाकर गरुड़जीपर
चलाया और फिर अपने पाँचों मुखोंसे घोर सिंहनाद करने लगा । उसके सिंहनादका महान् शब्द पृथ्वी, आकाश, पाताल और दसों दिशाओंमें फैलकर सारे ब्रह्माण्डमें भर गया ॥८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मुर दैत्यका त्रिशूल गरुड़की ओर बड़े वेगसे आ रहा है । तब अपना हस्तकौशल दिखाकर फुर्तीसे उन्होंने दो बाण मारे, जिनसे वह त्रिशूल कटकर तीन टूक हो गया । इसके साथ ही मुर दैत्यके मुखोंमें भी भगवान्ने बहुत - से बाण मारे । इससे वह दैत्य अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और उसने भगवान्पर अपनी गदा चलायी ॥९ ॥ परन्तु भगवान्
श्रीकृष्णने अपनी गदाके प्रहारसे मुर दैत्यकी गदाको अपने पास पहुँचनेके पहले ही चूर- चूर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कर दिया । अब वह अस्त्रहीन हो जानेके कारण अपनी भुजाएँ फैलाकर श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा और उन्होंने खेल- खेलमें ही चक्रसे उसके पाँचों सिर उतार लिये ॥१० ॥ सिर कटते ही
मुर दैत्यके प्राण- पखेरू उड़ गये और वह ठीक वैसे ही जलमें गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे शिखर कट जानेपर कोई पर्वत समुद्रमें गिर पड़ा हो । मुर दैत्यके सात पुत्र थे - ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान और अरुण । ये अपने पिताकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और फिर बदला लेनेके लिये क्रोधसे भरकर शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित हो गये तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर भौमासुरके आदेशसे श्रीकृष्णपर चढ़ आये ॥११-१२ ॥ वे वहाँ आकर बड़े क्रोधसे भगवान् श्रीकृष्णपर बाण, खड्ग, गदा, शक्ति, ऋष्टि और त्रिशूल आदि प्रचण्ड शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे । परीक्षित्! भगवान्की शक्ति अमोघ और अनन्त है । उन्होंने अपने बाणोंसे उनके कोटि- कोटि शस्त्रास्त्र तिल- तिल करके काट गिराये ॥१३ ॥ भगवान्के शस्त्रप्रहारसे सेनापति पीठ और उसके साथी दैत्योंके सिर, जाँघें,
भुजा, पैर और कवच कट गये और उन सभीको भगवान्ने यमराजके घर पहुँचा दिया । जब पृथ्वीके पुत्र नरकासुर ( भौमासुर) ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्णके चक्र और बाणोंसे हमारी सैना और सेनापतियोंका संहार हो गया, तब उसे असह्य क्रोध हुआ । वह समुद्रतटपर पैदा हुए बहुत - से मदवाले हाथियोंकी सेना लेकर नगरसे बाहर निकला । उसने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्नीके साथ आकाशमें गरुड़पर स्थित हैं, जैसे सूर्यके ऊपर बिजलीके साथ वर्षाकालीन श्याममेघ शोभायमान हो । भौमासुरने स्वयं भगवान्के ऊपर शतघ्नी नामकी शक्ति चलायी और उसके सब सैनिकोंने भी एक ही साथ उनपर अपने - अपने अस्त्र- शस्त्र छोड़े ॥१४-१५ ॥ अब भगवान् श्रीकृष्ण भी चित्र - विचित्र पंखवाले तीखे तीखे बाण चलाने लगे । इससे उसी समय भौमासुरके सैनिकोंकी भुजाएँ, जाँघें, गर्दन और धड़ कट- कटकर गिरने लगे; हाथी और घोड़े भी मरने लगे ॥१६ ॥
मुखेषु तं चापि शरैरताडयत् तस्मै गदां सोऽपि रुषा व्यमुञ्चत ॥९ तामापतन्तीं गदया गदां मृधे गदाग्रजो निर्बिभिदे सहस्रधा । उद्यम्य बाहूनभिधावतोऽजितः शिरांसि चक्रेण जहार लीलया ॥१० व्यसुः पपाताम्भसि कृत्तशीर्षो निकृत्तशृंगोऽद्रिरिवेन्द्रतेजसा । तस्यात्मजाः सप्त पितुर्वधातुराः प्रतिक्रियामर्षजुषः समुद्यताः ॥११ ताम्रोऽन्तरिक्षः श्रवणो विभावसु- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******