श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 801–810

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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अनुजानीहि मां कृष्ण यान्तं देवगतिं प्रभो ।

यत्र क्वापि सतश्चेतो भूयान्मे त्वत्पदास्पदम् ॥२८

नमस्ते सर्वभावाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।

कृष्णाय वासुदेवाय योगानां पतये नमः ॥२९

इत्युक्त्वा तं परिक्रम्य पादौ स्पृष्ट्वा स्वमौलिना ।

अनुज्ञातो विमानाग्रयमारुहत् पश्यतां नृणाम् ॥३०

कृष्पः परिजनं प्राह भगवान् देवकीसुतः ।

ब्रह्मण्यदेवो धर्मात्मा राजन्याननुशिक्षयन् ॥३१

दुर्जरं बत ब्रह्मस्वं भुक्तमग्नेर्मनागपि ।

तेजीयसोऽपि किमुत राज्ञामीश्वरमानिनाम् ॥३२

नाहं हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया ।

ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि ॥३३

हिनस्ति विषमत्तारं वह्निरद्भिः प्रशाम्यति ।

कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः ॥३४

ब्रह्मस्वं दुरनुज्ञातं भुक्तं हन्ति त्रिपूरुषम् ।

प्रसह्य तु बलाद् भुक्तं दश पूर्वान् दशापरान् ॥३५

राजा नृगने इस प्रकार कहकर भगवान्‌की परिक्रमा की और अपने मुकुटसे उनके चरणोंका स्पर्श करके प्रणाम किया । फिर उनसे आज्ञा लेकर सबके देखते - देखते ही वे श्रेष्ठ विमानपर सवार हो गये ॥३० ॥

राजा नृगके चले जानेपर ब्राह्मणोंके परम प्रेमी, धर्मके आधार देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने क्षत्रियोंको शिक्षा देनेके लिये वहाँ उपस्थित अपने कुटुम्बके लोगोंसे कहा || ३१ || 'जो लोग अग्निके समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राह्मणोंका थोड़े - से थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते । फिर जो अभिमानवश झूठ- मूठ अपनेको लोगोंका स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं? || ३२ || मैं हलाहल विषको विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राह्मणोंका धन ही परम विष है; उसको पचा लेनेके लिये पृथ्वीमें कोई औषध, कोई उपाय नहीं है ॥ ३३ ॥ हलाहल विष केवल खानेवालेका ही प्राण

लेता है और आग भी जलके द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राह्मणके धनरूप अरणिसे जो आग पैदा होती है, वह सारे कुलको समूल जला डालती है ॥ ३४ ॥ ब्राह्मणका धन यदि

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पृष्ठ 802

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उसकी पूरी- पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय तब तो वह भोगनेवाले, उसके लड़के और पौत्र – इन तीन पीढ़ियोंको ही चौपट करता है । परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषोंकी दस पीढ़ियाँ और आगेकी भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं ॥३५ ॥ जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मीके घमंडसे अंधे होकर ब्राह्मणोंका धन

हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान- बूझकर नरकमें जानेका रास्ता साफ कर रहे हैं । वे देखते नहीं कि उन्हें अधःपतनके कैसे गहरे गड्ढे में गिरना पड़ेगा ॥ ३६ ॥ जिन उदारहृदय

और बहु-कुटुम्बी ब्राह्मणोंकी वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोनेपर उनके आँसूकी बूँदोंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने वर्षोंतक ब्राह्मणके स्वत्वको छीननेवाले उस उच्छृंखल राजा और उसके वंशजोंको कुम्भीपाक नरकमें दुःख भोगना पड़ता है ॥३७-३८ ॥ जो मनुष्य अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणोंकी वृत्ति, उनकी जीविकाके साधन छीन लेते हैं, वे साठ हजार वर्षतक विष्ठाके कीड़े होते हैं ॥ ३ ९ ॥ इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंका धन कभी भूलसे भी मेरे कोषमें न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणोंके धनकी इच्छा भी करते हैं — उसे छीननेकी बात तो अलग रही - वे इस जन्ममें अल्पायु, शत्रुओंसे पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्युके बाद भी वे दूसरोंको कष्ट देनेवाले साँप ही होते हैं ॥४० ॥ इसलिये मेरे आत्मीयो! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो । वह

मार ही क्यों न बैठे या बहुत - सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुमलोग सदा नमस्कार ही करो ॥४१ ॥ जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानीसे तीनों समय ब्राह्मणोंको प्रणाम करता हूँ, वैसे

ही तुमलोग भी किया करो । जो मेरी इस आज्ञाका उल्लंघन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा ॥४२ ॥ यदि ब्राह्मणके धनका अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण

करनेवालेको — अनजानमें उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी- अधःपतनके गड्ढेमें डाल देता है । जैसे ब्राह्मणकी गायने अनजानमें उसे लेनेवाले राजा नृगको नरकमें डाल दिया था ॥४३ ॥ परीक्षित्! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकावासियोंको

इस प्रकार उपदेश देकर अपने महलमें चले गये ॥ ४४ ॥

राजानो राजलक्ष्म्यान्धा नात्मपातं विचक्षते ।

निरयं येऽभिमन्यन्ते ब्रह्मस्वं साधु बालिशाः ॥ ३६

गृह्णन्ति यावतः पांसून् क्रन्दतामश्रुबिन्दवः ।

विप्राणां हृतवृत्तीनां वदान्यानां कुटुम्बिनाम् ॥३७

राजानो राजकुल्याश्च तावतोऽब्दान्निरंकुशाः ।

कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते ब्रह्मदायापहारिणः ॥३८

स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेच्च यः ।

षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ॥ ३ ९

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पृष्ठ 803

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न मे ब्रह्मधनं भूयाद् यद् गृद्ध्वाल्पायुषो नराः ।

पराजिताश्च्युता राज्याद् भवन्त्युद्वेजिनोऽहयः २ ॥४०

विप्रं कृतागसमपि नैव द्रुह्यत मामकाः ।

घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः ॥४१

यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहितः ।

तथा नमत यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डभाक् ॥४२

ब्राह्मणार्थो ह्यपहृतो हर्तारं पातयत्यधः ।

अजानन्तमपि ह्येनं नृगं ब्राह्मणगौरिव ॥४३

एवं विश्राव्य भगवान् मुकुन्दो द्वारकौकसः ।

पावनः सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम् ॥४४

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे नृगोपाख् चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥६४ ॥

१. न्धे बाणासुरसंग्रामे कृष्णविजयः । २. णोपपन्नः । १. ऽहं मानवे वरुणात्मजः । १. नृपाः । २. हि ये । ३. द्वारकाप्रजाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 804

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अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः श्रीबलरामजीका व्रजगमन श्रीशुक उवाच

बलभद्रः कुरुश्रेष्ठ भगवान् रथमास्थितः ।

सुहृद्दिदृक्षुरुत्कण्ठः प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ १

परिष्वक्तश्चिरोत्कण्ठैर्गोपैर्गोपीभिरेव च ।

रामोऽभिवाद्य पितरावाशीर्भिरभिनन्दितः ॥२

चिरं नः पाहि दाशार्ह सानुजो जगदीश्वरः ।

इत्यारोप्यांकमालिङ्ग्य नेत्रैः सिषिचतुर्जलैः ॥ ३

गोपवृद्धांश्च विधिवद् यविष्ठैरभिवन्दितः ।

यथावयो यथासख्यं यथासम्बन्धमात्मनः ॥४

समुपेत्याथ गोपालान् हास्यहस्तग्रहादिभिः ।

विश्रान्तं सुखमासीनं पप्रच्छुः पर्युपागताः ॥ ५

पृष्टाश्चानामयं स्वेषु प्रेमगद्गदया गिरा ।

कृष्णे कमलपत्राक्षे संन्यस्ताखिलराधसः ॥६

कच्चिन्नो बान्धवा राम सर्वे कुशलमासते ।

कच्चित् स्मरथ नो राम यूयं दारसुतान्विताः ॥७

दिष्ट्या कंसो हतः पापो दिष्ट्या मुक्ताः सुहृज्जनाः ।

निहत्य निर्जित्य रिपून् दिष्ट्या दुर्गं समाश्रिताः ॥८

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् बलरामजीके मनमें व्रजके नन्दबाबा आदि स्वजन सम्बन्धियोंसे मिलनेकी बड़ी इच्छा और उत्कण्ठा थी । अब वे रथपर सवार होकर द्वारकासे नन्दबाबाके व्रजमें आये ॥१ ॥ इधर उनके लिये व्रजवासी गोप और गोपियाँ भी

बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित थीं । उन्हें अपने बीचमें पाकर सबने बड़े प्रेमसे गले लगाया । बलरामजीने माता यशोदा और नन्दबाबाको प्रणाम किया । उन लोगोंने भी आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया ॥२ ॥ यह कहकर कि ' बलरामजी! तुम जगदीश्वर हो, अपने छोटे

भाई श्रीकृष्णके साथ सर्वदा हमारी रक्षा करते रहो, उनको गोदमें ले लिया और अपने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 805

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प्रेमाश्रुओंसे उन्हें भिगो दिया ॥३ ॥ इसके बाद बड़े - बड़े गोपोंको बलरामजीने और छोटे - छोटे

गोपोंने बलरामजीको नमस्कार किया । वे अपनी आयु, मेल- जोल और सम्बन्धके अनुसार सबसे मिले - जुले ॥४ ॥ ग्वालबालोंके पास जाकर किसीसे हाथ मिलाया, किसीसे मीठी - मीठी

बातें कीं, किसीको खूब हँस- हँसकर गले लगाया । इसके बाद जब बलरामजीकी थकावट दूर हो गयी, वे आरामसे बैठ गये, तब सब ग्वाल उनके पास आये । इन ग्वालोंने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णके लिये समस्त भोग, स्वर्ग और मोक्षतक त्याग रखा था । बलरामजीने जब उनके और उनके घरवालोंके सम्बन्धमें कुशलप्रश्न किया, तब उन्होंने प्रेम- गद्गद वाणीसे उनसे प्रश्न किया ॥५-६ ॥ ' बलरामजी! वसुदेवजी आदि हमारे सब भाई - बन्धु सकुशल हैं न? अब आपलोग स्त्री- पुत्र आदिके साथ रहते हैं, बाल- बच्चेदार हो गये हैं; क्या कभी आप-लोगोंको हमारी याद भी आती है? || ७ || यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि पापी कंसको आपलोगोंने मार डाला और अपने सुहृद्- सम्बन्धियोंको बड़े कष्टसे बचा लिया । यह भी कम आनन्दकी बात नहीं है कि आपलोगोंने और भी बहुत- से शत्रुओंको मार डाला या जीत लिया और अब अत्यन्त सुरक्षित दुर्ग ( किले ) में आपलोग निवास करते हैं ' ॥८ ॥

गोप्यो हसन्त्यः पप्रच्छू रामसन्दर्शनादृताः ।

कच्चिदास्ते सुखं कृष्णः पुरस्त्रीजनवल्लभः ॥९

कच्चित् स्मरति वा बन्धून् पितरं मातरं च सः ।

अप्यसी मातरं द्रष्टुं सकृदप्यागमिष्यति ।

अपि वा स्मरतेऽस्माकमनुसेवां महाभुजः ॥१०

मातरं पितरं भ्रातॄन् पतीन् पुत्रान् स्वसृरपि ।

यदर्थे जहिम दाशार्ह दुस्त्यजान् स्वजनान् प्रभो ॥११

ता नः सद्यः परित्यज्य गतः संछिन्नसौहृदः ।

कथं नु तादृशं स्त्रीभिर्न श्रद्धीयेत भाषितम् ॥१२

कथं नु गृह्णन्त्यनवस्थितात्मनो

वचः कृतघ्नस्य बुधाः पुरस्त्रियः ।

गृह्णन्ति वै चित्रकथस्य सुन्दर- स्मितावलोकोच्छ्वसितस्मरातुराः ॥ १३

किं नस्तत्कथया गोप्यः कथाः कथयतापराः ।

यात्यस्माभिर्विना कालो यदि तस्य तथैव नः ॥१४

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पृष्ठ 806

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हति प्रहसितं शौरेर्जल्पितं चारु वीक्षितम् ।

गतिं प्रेमपरिष्वङ्गं स्मरन्त्यो रुरुदुः स्त्रियः ॥ १५

परीक्षित्! भगवान् बलरामजीके दर्शनसे, उनकी प्रेमभरी चितवनसे गोपियाँ निहाल हो गयीं । उन्होंने हँसकर पूछा- ' क्यों बलरामजी! नगर- नारियोंके प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण अब सकुशल तो हैं न? ॥९ ॥ क्या कभी उन्हें अपने भाई- बन्धु और पिता- माताकी भी याद आती

है! क्या वे अपनी माताके दर्शनके लिये एक बार भी यहाँ आ सकेंगे! क्या महाबाहु श्रीकृष्ण कभी हमलोगोंकी सेवाका भी कुछ स्मरण करते हैं || १० || आप जानते हैं कि स्वजन-सम्बन्धियोंको छोड़ना बहुत ही कठिन है। फिर भी हमने उनके लिये माँ- बाप, भाई-बन्धु, पति-ते- पुत्र और बहिन - बेटियोंको भी छोड़ दिया । परन्तु प्रभो! वे बात- की- बातमें हमारे सौहार्द और प्रेमका बन्धन काटकर, हमसे नाता तोड़कर परदेश चले गये; हमलोगोंको बिलकुल ही छोड़ दिया । हम चाहतीं तो उन्हें रोक लेतीं; परन्तु जब वे कहते कि हम तुम्हारे ऋणी हैं— तुम्हारे उपकारका बदला कभी नहीं चुका सकते, तब ऐसी कौन- सी स्त्री है, जो उनकी मीठी-मीठी बातोंपर विश्वास न कर लेती ' ॥११-१२ ॥ एक गोपीने कहा – ' बलरामजी! हम तो गाँवकी गँवार ग्वालिनें ठहरी, उनकी बातोंमें आ गयीं । परन्तु नगरकी स्त्रियाँ तो बड़ी चतुर होती हैं । भला, वे चंचल और कृतघ्न श्रीकृष्णकी बातोंमें क्यों फँसने लगीं; उन्हें तो वे नहीं छका पाते होंगे! ' दूसरी गोपीने कहा - ' नहीं सखी, श्रीकृष्ण बातें बनानेमें तो एक ही हैं। ऐसी रंग - बिरंगी मीठी - मीठी बातें गढ़ते हैं कि क्या कहना! उनकी सुन्दर मुसकराहट और प्रेमभरी चितवनसे नगर- नारियाँ भी प्रेमावेशसे व्याकुल हो जाती होंगी और वे अवश्य उनकी बातोंमें आकर अपनेको निछावर कर देती होंगी' ॥ १३ ॥ तीसरी गोपीने कहा- ' अरी गोपियो!

हमलोगोंको उसकी बातसे क्या मतलब है? यदि समय ही काटना है तो कोई दूसरी बात करो । यदि उस निष्ठुरका समय हमारे बिना बीत जाता है तो हमारा भी उसीकी तरह, भले ही दुःखसे क्यों न हो, कट ही जायगा || १४ || अब गोपियोंके भाव - नेत्रोंके सामने भगवान् श्रीकृष्णकी हँसी, प्रेमभरी बातें, चारु चितवन, अनूठी चाल और प्रेमालिंगन आदि मूर्तिमान् होकर नाचने लगे । वे उन बातोंकी मधुर स्मृतिमें तन्मय होकर रोने लगीं ॥१५ ॥

संकर्षणस्ताः कृष्णस्य सन्देशैर्हृदयंगमैः ।

सान्त्वयामास भगवान् नानानुनयकोविदः ॥१६

द्वौ मासौ तत्र चावात्सीन्मधुं माधवमेव च ।

रामः क्षपासु भगवान् गोपीनां रतिमावहन् ॥१७

पूर्णचन्द्रकलामृष्टे कौमुदीगन्धवायुना ।

यमुनोपवने रेमे सेविते स्त्रीगणैर्वृतः ॥१८

वरुणप्रेषिता देवी वारुणी वृक्षकोटरात् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 807

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पतन्ती तद् वनं सर्वं स्वगन्धेनाध्यवासयत् ॥१९

तं गन्धं मधुधाराया वायुनोपहृतं बलः ।

आघ्रायोपगतस्तत्र ललनाभिः समं पपौ ॥२०

उपगीयमानचरितो वनिताभिर्हलायुधः ।

वनेषु व्यचरत् क्षीबो मदविह्वललोचनः ॥ २१

स्रग्व्येककुण्डलो मत्तो वैजयन्त्या च मालया ।

बिभ्रत् स्मितमुखाम्भोजं स्वेदप्रालेयभूषितम् ॥२२

स आजुहाव यमुनां जलक्रीडार्थमीश्वरः ।

निजं वाक्यमनादृत्य मत्त इत्यापगां बलः ।

अनागतां हलाग्रेण कुपितो विचकर्ष ह ॥२३

पापे त्वं मामवज्ञाय यन्नायासि मयाऽऽहुता ।

नेष्ये त्वां लांगलाग्रेण शतधा कामचारिणीम् ॥२४

परीक्षित्! भगवान् बलरामजी नाना प्रकारसे अनुनयविनय करनेमें बड़े निपुण थे । उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके हृदयस्पर्शी और लुभावने सन्देश सुना- सुनाकर गोपियोंको सान्त्वना दी ॥१६ ॥ और वसन्तके दो महीने – चैत्र और वैशाख वहीं बिताये । वे रात्रिके समय

गोपियोंमें रहकर उनके प्रेमकी अभिवृद्धि करते । क्यों न हो, भगवान् राम ही जो ठहरे! ॥१७ ॥

उस समय कुमुदिनीकी सुगन्ध लेकर भीनी- भीनी वायु चलती रहती, पूर्ण चन्द्रमाकी चाँदनी छिटककर यमुनाजीके तटवर्ती उपवनको उज्ज्वल कर देती और भगवान् बलराम गोपियोंके साथ वहीं विहार करते ॥ १८ ॥ वरुणदेवने अपनी पुत्री वारुणीदेवीको वहाँ भेज

दिया था । वह एक वृक्षके खोड़रसे बह निकली । उसने अपनी सुगन्धसे सारे वनको सुगन्धित कर दिया ॥१९ ॥ मधुधाराकी वह सुगन्ध वायुने बलरामजीके पास पहुँचायी, मानो उसने

उन्हें उपहार दिया हो! उसकी महकसे आकृष्ट होकर बलरामजी गोपियोंको लेकर वहाँ पहुँच गये और उनके साथ उसका पान किया ॥ २० ॥ उस समय गोपियाँ बलरामजीके चारों ओर

उनके चरित्रका गान कर रही थीं, और वे मतवाले - से होकर वनमें विचर रहे थे । उनके नेत्र आनन्दमदसे विह्वल हो रहे थे ॥२१ ॥ गलेमें पुष्पोंका हार शोभा पा रहा था । वैजयन्तीकी

माला पहने हुए आनन्दोन्मत्त हो रहे थे । उनके एक कानमें कुण्डल झलक रहा था । मुखारविन्दपर मुसकराहटकी शोभा निराली ही थी । उसपर पसीनेकी बूँदें हिमकणके समान जान पड़ती थीं ॥२२ ॥ सर्वशक्तिमान् बलरामजीने जलक्रीडा करनेके लिये यमुनाजीको

पुकारा । परन्तु यमुनाजीने यह समझकर कि ये तो मतवाले हो रहे हैं, उनकी आज्ञाका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 808

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उल्लंघन कर दिया; वे नहीं आयीं । तब बलरामजीने क्रोधपूर्वक अपने हलकी नोकसे उन्हें खींचा ॥२३ ॥ और कहा ' पापिनी यमुने! मेरे बुलानेपर भी तू मेरी आज्ञाका उल्लंघन करके

यहाँ नहीं आ रही है, मेरा तिरस्कार कर रही है! देख, अब मैं तुझे तेरे स्वेच्छाचारका फल चखाता हूँ । अभी - अभी तुझे हलकी नोकसे सौ- सौ टुकड़े किये देता हूँ' ॥२४ ॥ जब

बलरामजीने यमुनाजीको इस प्रकार डाँटा-फटकारा, तब वे चकित और भयभीत होकर बलरामजीके चरणोंपर गिर पड़ीं और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगीं– ॥ २५ ॥

‘ लोकाभिराम बलरामजी! महाबाहो! मैं आपका पराक्रम भूल गयी थी । जगत्पते! अब मैं जान गयी कि आपके अंशमात्र शेषजी इस सारे जगत्‌को धारण करते हैं || २६ || भगवन्! आप परम ऐश्वर्यशाली हैं । आपके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण ही मुझसे यह अपराध बन गया है । सर्वस्वरूप भक्तवत्सल! मैं आपकी शरणमें हूँ । आप मेरी भूल - चूक क्षमा कीजिये, मुझे छोड़ दीजिये ' ॥२७ ॥

एवं निर्भर्त्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम् ।

उवाच चकिता वाचं पतिता पादयोर्नृप ॥२५

राम राम महाबाहो न जाने तव विक्रमम् ।

यस्यैकांशेन विधृता जगती जगतः पते ॥२६

परं भावं भगवतो भगवन् मामजानतीम् ।

मोक्तुमर्हसि विश्वात्मन् प्रपन्नां भक्तवत्सल ॥२७

ततो व्यमुंचद् यमुनां याचितो भगवान् बलः ।

विजगाह जलं स्त्रीभिः करेणुभिरिवेभराट् ॥२८

कामं विहृत्य सलिलादुत्तीर्णायासिताम्बरे ।

भूषणानि महार्हाणि ददौ कान्तिः शुभां स्रजम् ॥२९

वसित्वा वाससी नीले मालामामुच्य कांचनीम् ।

रेजे स्वलंकृतो लिप्तो माहेन्द्र इव वारणः ॥३०

अद्यापि दृश्यते राजन् यमुनाऽऽकृष्टवर्त्मना ।

बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्यं सूचयतीव हि ॥३१

एवं सर्वा निशा याता एकेव रमतो व्रजे ।

रामस्याक्षिप्तचित्तस्य माधुर्यैर्व्रजयोषिताम् ॥३२

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पृष्ठ 809

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अब यमुनाजीकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् बलरामजीने उन्हें क्षमा कर दिया और फिर जैसे गजराज हथिनियोंके साथ क्रीडा करता है, वैसे ही वे गोपियोंके साथ जलक्रीडा करने लगे ॥२८ ॥ जब वे यथेष्ट जल - विहार करके यमुनाजीसे बाहर निकले, तब लक्ष्मीजीने

उन्हें नीलाम्बर, बहुमूल्य आभूषण और सोनेका सुन्दर हार दिया ॥ २ ९ ॥ बलरामजीने नीले वस्त्र पहन लिये और सोनेकी माला गलेमें डाल ली । वे अंगराग लगाकर, सुन्दर भूषणोंसे विभूषित होकर इस प्रकार शोभायमान हुए मानो इन्द्रका श्वेतवर्ण ऐरावत हाथी हो ॥ ३० ॥

परीक्षित्! यमुनाजी अब भी बलरामजीके खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो अनन्तशक्ति भगवान् बलरामजीका यश-गान कर रही हों ॥३१ ॥ बलरामजीका

चित्त व्रजवासिनी गोपियोंके माधुर्यसे इस प्रकार मुग्ध हो गया कि उन्हें समयका कुछ ध्यान ही न रहा, बहुत - सी रात्रियाँ एक रातके समान व्यतीत हो गयीं । इस प्रकार बलरामजी व्रजमें विहार करते रहे ॥३२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे बलदेवविजये यमुनाकर्षणं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥

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पृष्ठ 810

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अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः पौण्ड्रक और काशिराजका उद्धार श्रीशुक उवाच

नन्दव्रजं गते रामे करूषाधिपतिर्नृप ।

वासुदेवोऽहमित्यज्ञो दूतं कृष्णाय प्राहिणोत् ॥१

त्वं वासुदेवो भगवानवतीर्णो जगत्पतिः ।

इति प्रस्तोभितो बालैर्मेन आत्मानमच्युतम् ॥२

दूतं च प्राहिणोन्मन्दः कृष्णायाव्यक्तवर्त्मने ।

द्वारकायां यथा बालो नृपो बालकृतोऽबुधः ॥ ३

दूतस्तु द्वारकामेत्य सभायामास्थितं प्रभुम् ।

कृष्णं कमलपत्राक्षं राजसन्देशमब्रवीत् ॥४

वासुदेवोऽवतीर्णोऽहमेक एव न चापरः ।

भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज ॥५

यानि त्वमस्मच्चिह्नानि मौढ्याद् बिभर्षि सात्वत ।

त्यक्त्वैहि मां त्वं शरणं नो चेद् देहि ममाहवम् ॥६

श्रीशुक उवाच

कत्थनं तदुपाकर्ण्य पौण्ड्रकस्याल्पमेधसः ।

उग्रसेनादयः सभ्या उच्चकैर्जहसुस्तदा ॥७

उवाच दूतं भगवान् परिहासकथामनु ।

उत्स्रक्ष्ये मूढ चिह्नानि यैस्त्वमेवं विकत्थसे ॥८

मुखं तदपिधायाज्ञ कंकगृध्रवटैर्वृतः ।

शयिष्यसे हतस्तत्र भविता शरणं शुनाम् ॥९

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब भगवान् बलरामजी नन्दबाबाके व्रजमें गये हुए थे, तब पीछेसे करूष देशके अज्ञानी राजा पौण्ड्रकने भगवान् श्रीकृष्णके पास एक दूत भेजकर यह कहलाया कि ' भगवान् वासुदेव मैं हूँ' ॥१ ॥ मूर्खलोग उसे बहकाया करते थे कि

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