श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 791–800
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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भक्तानुकम्प्युपव्रज्य चक्रायुधमभाषत ॥३३ श्रीरुद्र उवाच
त्वं हि ब्रह्म परं ज्योतिर्गूढं ब्रह्मणि वाङ्मये ।
यं पश्यन्त्यमलात्मान आकाशमिव केवलम् ॥३४
नाभिर्नभोऽग्निर्मुखमम्बु रेतो द्यौः शीर्षमाशा श्रुतिरङ्घ्रिरुर्वी । चन्द्रो मनो यस्य दृगर्क आत्मा अहं समुद्रो जठरं भुजेन्द्रः ॥ ३५ भगवान् श्रीकृष्णने कहा - ' त्रिशिरा! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ । अब तुम मेरे ज्वरसे निर्भय हो जाओ । संसारमें जो कोई हम दोनोंके संवादका स्मरण करेगा, उसे तुमसे कोई भय न रहेगा' ॥२९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार कहनेपर माहेश्वर ज्वर उन्हें प्रणाम करके चला
गया । तबतक बाणासुर रथपर सवार होकर भगवान् श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये फिर आ पहुँचा ॥३० ॥ परीक्षित्! बाणासुरने अपने हजार हाथोंमें तरह - तरहके हथियार ले रखे थे ।
अब वह अत्यन्त क्रोधमें भरकर चक्रपाणि भगवान्पर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ३१ ॥ जब
भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि बाणासुरने तो बाणोंकी झड़ी लगा दी है, तब वे छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे उसकी भुजाएँ काटने लगे, मानो कोई किसी वृक्षकी छोटी- छोटी डालियाँ काट रहा हो ॥ ३२ ॥ जब भक्तवत्सल भगवान् शंकरने देखा कि बाणासुरकी भुजाएँ
कट रही हैं, तब वे चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णके पास आये और स्तुति करने लगे ॥३३ ॥
भगवान् शंकरने कहा - प्रभो! आप वेदमन्त्रोंमें तात्पर्यरूपसे छिपे हुए परमज्योतिः-स्वरूप परब्रह्म हैं । शुद्धहृदय महात्मागण आपके आकाशके समान सर्वव्यापक और निर्विकार ( निर्लेप ) स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं ॥३४ ॥ आकाश आपकी नाभि है, अग्नि
मुख है और जल वीर्य । स्वर्ग सिर, दिशाएँ कान और पृथ्वी चरण है । चन्द्रमा मन, सूर्य नेत्र और मैं शिव आपका अहंकार हूँ । समुद्र आपका पेट है और इन्द्र भुजा ॥३५ ॥ धान्यादि
ओषधियाँ रोम हैं, मेघ केश हैं और ब्रह्मा बुद्धि । प्रजापति लिंग हैं और धर्म हृदय । इस प्रकार समस्त लोक और लोकान्तरोंके साथ जिसके शरीरकी तुलना की जाती है, वे परमपुरुष आप ही हैं ॥३६ ॥ अखण्ड ज्योतिःस्वरूप परमात्मन्! आपका यह अवतार धर्मकी रक्षा और
संसारके अभ्युदय — अभिवृद्धिके लिये हुआ है । हम सब भी आपके प्रभावसे ही प्रभावान्वित होकर सातों भुवनोंका पालन करते हैं ॥ ३७ ॥ आप सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदसे
रहित हैं — एक और अद्वितीय आदिपुरुष हैं । मायाकृत जाग्रत, स्वप्न और सुबुप्ति — इन तीन अवस्थाओंमें अनुगत और उनसे अतीत तुरीयतत्त्व भी आप ही हैं । आप किसी दूसरी वस्तुके द्वारा प्रकाशित नहीं होते, स्वयंप्रकाश हैं । आप सबके कारण हैं, परन्तु आपका न तो कोई कारण है और न तो आपमें कारणपना ही है । भगवन्! ऐसा होनेपर भी आप तीनों गुणोंकी विभिन्न विषमताओंको प्रकाशित करनेके लिये अपनी मायासे देवता, पशु - पक्षी, मनुष्य आदि ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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शरीरोंके अनुसार भिन्न- भिन्न रूपोंमें प्रतीत होते हैं ॥ ३८ ॥ प्रभो! जैसे सूर्य अपनी छाया
बादलोंसे ही ढक जाता है और उन बादलों तथा विभिन्न रूपोंको प्रकाशित करता है उसी प्रकार आप तो स्वयंप्रकाश हैं, परन्तु गुणोंके द्वारा मानो ढक- से जाते हैं और समस्त गुणों
तथा गुणाभिमानी जीवोंको प्रकाशित करते हैं । वास्तवमें आप अनन्त हैं ॥ ३ ९ ॥
रोमाणि यस्यौषधयोऽम्बुवाहाः केशा विरिञ्चो धिषणा विसर्गः । प्रजापतिर्हृदयं यस्य धर्मः स वै भवान् पुरुषो लोककल्पः ॥३६ तवावतारोऽयमकुण्ठधामन् धर्मस्य गुप्त्यै जगतो भवाय । वयं च सर्वे भवतानुभाविता विभावयामो भुवनानि सप्त ॥३७ त्वमेक आद्यः पुरुषोऽद्वितीय- स्तुर्यः स्वदृग्घेतुरहेतुरीशः । प्रतीयसेऽथापि यथाविकारं स्वमायया सर्वगुणप्रसिद्धयै ॥३८ यथैव सूर्यः पिहितश्छायया स्वया
छायां च रूपाणि च संचकास्ति ।
एवं गुणेनापिहितो गुणांस्त्व- मात्मप्रदीपो गुणिनश्च भूमन् ॥३९
यन्मायामोहितधियः पुत्रदारगृहादिषु ।
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे ॥ ४०
देवदत्तमिमं लब्ध्वा नृलोकमजितेन्द्रियः ।
यो नाद्रियेत त्वत्पादौ स शोच्यो ह्यात्मवंचकः ॥४१
यस्त्वां विसृजते मर्त्य आत्मानं प्रियमीश्वरम् ।
विपर्ययेन्द्रियार्थार्थं विषमत्त्यमृतं त्यजन् ॥४२
भगवन्! आपकी मायासे मोहित होकर लोग स्त्री -पुत्र, देह- गेह आदिमें आसक्त हो जाते हैं और फिर दुःखके अपार सागरमें डूबने - उतराने लगते हैं ॥ ४० ॥ संसारके मानवोंको यह
मनुष्य - शरीर आपने अत्यन्त कृपा करके दिया है । जो पुरुष इसे पाकर भी अपनी इन्द्रियोंको ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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वशमें नहीं करता और आपके चरणकमलोंका आश्रय नहीं लेता— उनका सेवन नहीं करता, उसका जीवन अत्यन्त शोचनीय है और वह स्वयं अपने - आपको धोखा दे रहा है ॥४१ ॥
प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मा, प्रियतम और ईश्वर हैं । जो मृत्युका ग्रास मनुष्य आपको छोड़ देता है और अनात्म, दुःखरूप एवं तुच्छ विषयोंमें सुखबुद्धि करके उनके पीछे भटकता है, वह इतना मूर्ख है कि अमृतको छोड़कर विष पी रहा है ॥ ४२ । मैं, ब्रह्मा, सारे देवता और विशुद्ध हृदयवाले ऋषि - मुनि सब प्रकारसे और सर्वात्मभावसे आपके शरणागत हैं; क्योंकि आप ही हमलोगोंके आत्मा, प्रियतम और ईश्वर हैं ॥४३ ॥ आप जगत्की उत्पत्ति, स्थिति
और प्रलयके कारण हैं । आप सबमें सम, परम शान्त, सबके सुहृद्, आत्मा और इष्टदेव हैं । आप एक, अद्वितीय और जगत्के आधार तथा अधिष्ठान हैं । हे प्रभो! हम सब संसारसे मुक्त होनेके लिये आपका भजन करते हैं ॥४४ ॥
अहं ब्रह्माथ विबुधा मुनयश्चामलाशयाः ।
सर्वात्मना प्रपन्नास्त्वामात्मानं प्रेष्ठमीश्वरम् ॥४३
तं त्वा जगत्स्थित्युदयान्तहेतुं समं प्रशान्तं सुहृदात्मदैवम् । अनन्यमेकं जगदात्मकेतं भवापवर्गाय भजाम देवम् ॥४४ अयं ममेष्टो दयितोऽनुवर्ती मयाभयं दत्तममुष्य देव । सम्पाद्यतां तद् भवतः प्रसादो यथा हि ते दैत्यपतौ प्रसादः ॥४५ श्रीभगवानुवाच
यदात्थ भगवंस्त्वन्नः करवाम प्रियं तव ।
भवतो यद् व्यवसितं तन्मे साध्वनुमोदितम् ॥४६
अवध्योऽयं ममाप्येष वैरोचनिसुतोऽसुरः ।
प्रह्रादाय वरो दत्तो न वध्यो मे तवान्वयः ॥४७
दर्पोपशमनायास्य प्रवृक्णा बाहवो मया ।
सूदितं च बलं भूरि यच्च भारायितं भुवः ॥४८
चत्वारोऽस्य भुजाः शिष्टा भविष्यन्त्यजरामराः ।
पार्षदमुख्यो भवतो नकुतश्चिद्भयोऽसुरः ॥४९
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इति लब्ध्वाभयं कृष्णं प्रणम्य शिरसासुरः ।
प्राद्युम्निं रथमारोप्य सवध्वा समुपानयत् ॥५०
अक्षौहिण्या परिवृतं सुवासःसमलंकृतम् ।
सपत्नीकं पुरस्कृत्य ययौ रुद्रानुमोदितः ॥५१
देव! यह बाणासुर मेरा परमप्रिय, कृपापात्र और सेवक है । मैंने इसे अभयदान दिया है । प्रभो! जिस प्रकार इसके परदादा दैत्यराज प्रह्लादपर आपका कृपाप्रसाद है, वैसा ही कृपाप्रसाद आप इसपर भी करें ॥ ४५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - भगवन्! आपकी बात मानकर - जैसा आप चाहते हैं, मैं इसे निर्भय किये देता हूँ । आपने पहले इसके सम्बन्धमें जैसा निश्चय किया था— मैंने इसकी भुजाएँ काटकर उसीका अनुमोदन किया है || ४६|| मैं जानता हूँ कि बाणासुर दैत्यराज पुत्र है । इसलिये मैं भी इसका वध नहीं कर सकता; क्योंकि मैंने प्रह्लादको वर दे दिया है कि मैं तुम्हारे वंशमें पैदा होनेवाले किसी भी दैत्यका वध नहीं करूँगा ॥४७ ॥ इसका घमंड
चूर करनेके लिये ही मैंने इसकी भुजाएँ काट दी हैं । इसकी बहुत बड़ी सेना पृथ्वीके लिये भार हो रही थी, इसीलिये मैंने उसका संहार कर दिया है ॥४८ ॥ अब इसकी चार भुजाएँ बच रही
हैं । ये अजर, अमर बनी रहेंगी। यह बाणासुर आपके पार्षदोंमें मुख्य होगा । अब इसको किसीसे किसी प्रकारका भय नहीं है ॥४९ ॥
श्रीकृष्णसे इस प्रकार अभयदान प्राप्त करके बाणासुरने उनके पास आकर धरतीमें माथा टेका, प्रणाम किया और अनिरुद्धजीको अपनी पुत्री ऊषाके साथ रथपर बैठाकर भगवान्के पास ले आया ॥ ५० ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने महादेवजीकी सम्मतिसे
वस्त्रालंकारविभूषित ऊषा और अनिरुद्धजीको एक अक्षौहिणी सेनाके साथ आगे करके द्वारकाके लिये प्रस्थान किया ॥ ५१ ॥ इधर द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण आदिके शुभागमनका
समाचार सुनकर झंडियों और तोरणोंसे नगरका कोना- कोना सजा दिया गया। बड़ी - बड़ी सड़कों और चौराहोंको चन्दन- मिश्रित जलसे सींच दिया गया । नगरके नागरिकों, बन्धु-बान्धवों और ब्राह्मणोंने आगे आकर खूब धूमधामसे भगवान्का स्वागत किया । उस समय शंख, नगारों और ढोलोंकी तुमुल ध्वनि हो रही थी । इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अपनी राजधानीमें प्रवेश किया ॥५२ ॥
स्वराजधानीं समलंकृतां ध्वजैः
सतोरणैरुक्षितमार्गचत्वराम् ।
विवेश शंखानकदुन्दुभिस्वनै- रभ्युद्यतः पौरसुहृद्विजातिभिः ॥ ५२
य एवं कृष्णविजयं शंकरेण च संयुगम् ।
संस्मरेत् प्रातरुत्थाय न तस्य स्यात् पराजयः ॥५३
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परीक्षित्! जो पुरुष श्रीशंकरजीके साथ भगवान् श्रीकृष्णका युद्ध और उनकी विजयकी कथाका प्रातःकाल उठकर स्मरण करता है, उसकी पराजय नहीं होती ॥ ५३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे ' उत्तरार्धे ऽनिरुद्धानयनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥६३ ॥
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अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः नृग राजाकी कथा श्रीशुक उवाच
एकदोपवनं राजन् जग्मुर्यदुकुमारकाः ।
विहर्तुं साम्बप्रद्युम्नचारुभानुगदादयः ॥१
क्रीडित्वा सुचिरं तत्र विचिन्वन्तः पिपासिताः ।
जलं निरुदके कूपे ददृशुः सत्त्वमद्भुतम् ॥२
कृकलासं गिरिनिभं वीक्ष्य विस्मितमानसाः ।
तस्य चोद्धरणे यत्नं चक्रुस्ते कृपयान्विताः ॥ ३
चर्मजैस्तान्तवैः पाशैर्बद्ध्वा पतितमर्भकाः ।
नाशक्नुवन् समुद्धर्तुं कृष्णायाचख्युरुत्सुकाः ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्रिय परीक्षित्! एक दिन साम्ब, प्रद्युम्न, चारुभानु और गद आदि यदुवंशी राजकुमार घूमनेके लिये उपवनमें गये || १ || वहाँ बहुत देरतक खेल खेलते हुए उन्हें प्यास लग आयी । अब वे इधर- उधर जलकी खोज करने लगे । वे एक कूएँके पास गये; उसमें जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा || २ || वह जीव पर्वतके समान आकारका एक गिरगिट था । उसे देखकर उनके आश्चर्यकी सीमा न रही । उनका हृदय करुणासे भर आया और वे उसे बाहर निकालनेका प्रयत्न करने लगे || ३ || परन्तु जब वे राजकुमार उस गिरे हुए गिरगिटको चमड़े और सूतकी रस्सियोंसे बाँधकर बाहर न निकाल सके, तब कुतूहलवश उन्होंने यह आश्चर्यमय वृत्तान्त भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर निवेदन किया ॥४ ॥ जगत्के जीवनदाता कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण उस कूएँपर आये । उसे
देखकर उन्होंने बायें हाथसे खेल- खेलमें— अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया ॥५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके करकमलोंका स्पर्श होते ही उसका गिरगिट रूप जाता रहा और वह एक स्वर्गीय देवताके रूपमें परिणत हो गया । अब उसके शरीरका रंग तपाये हुए सोनेके समान चमक रहा था । और उसके शरीरपर अद्भुत वस्त्र, आभूषण और पुष्पोंके हार शोभा पा रहे थे ॥६ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण जानते थे कि इस दिव्य पुरुषको गिरगिट - योनि क्यों मिली
थी, फिर भी वह कारण सर्वसाधारणको मालूम हो जाय, इसलिये उन्होंने उस दिव्य पुरुषसे पूछा — ' महाभाग! तुम्हारा रूप तो बहुत ही सुन्दर है । तुम हो कौन? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि तुम अवश्य ही कोई श्रेष्ठ देवता हो ॥७ ॥ कल्याणमूर्ते! किस कर्मके फलसे तुम्हें इस
योनिमैं आना पड़ा था? वास्तवमें तुम इसके योग्य नहीं हो । हमलोग तुम्हारा वृत्तान्त जानना चाहते हैं । यदि तुम हमलोगोंको वह बतलाना उचित समझो तो अपना परिचय अवश्य ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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दो ' || ८ ||
तत्रागत्यारविन्दाक्षो भगवान् विश्वभावनः ।
वीक्ष्योज्जहार वामेन तं करेण स लीलया ॥५
स उत्तमश्लोककराभिमृष्टो विहाय सद्यः कृकलासरूपम् । सन्तप्तचामीकरचारुवर्णः स्वर्ग्यद्भुतालंकरणाम्बरस्रक् ॥६ पप्रच्छ विद्वानपि तन्निदानं जनेषु विख्यापयितुं मुकुन्दः । कस्त्वं महाभाग वरेण्यरूपो देवोत्तमं त्वां गणयामि नूनम् ॥७ दशामिमां वा कतमेन कर्मणा सम्प्रापितोऽस्यतदर्हः सुभद्र । आत्मानमाख्याहि विवित्सतां नो यन्मन्यसे नः क्षममत्र वक्तुम् ॥८ श्रीशुक उवाच
इति स्म राजा सम्पृष्टः कृष्णेनानन्तमूर्तिना ।
माधवं प्रणिपत्याह किरीटेनार्कवर्चसा ॥९
नृग उवाच
नृगो नाम नरेन्द्रोऽहमिक्ष्वाकुतनयः प्रभो ।
दानिष्वाख्यायमानेषु यदि ते कर्णमस्पृशम् ॥१०
किं नु तेऽविदितं नाथ सर्वभूतात्मसाक्षिणः ।
कालेनाव्याहतदृशो वक्ष्येऽथापि तवाज्ञया ॥ ११
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब अनन्तमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णने राजा नृगसे [ क्योंकि वे ही इस रूपमें प्रकट हुए थे] इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने अपना सूर्यके समान जाज्वल्यमान मुकुट झुकाकर भगवान्को प्रणाम किया और वे इस प्रकार कहने लगे ॥९ ॥
राजा नृगने कहा – प्रभो! मैं महाराज इक्ष्वाकुका पुत्र राजा नृग हूँ । जब कभी किसीने आपके सामने दानियोंकी गिनती की होगी, तब उसमें मेरा नाम भी अवश्य ही आपके कानोंमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पड़ा होगा ॥१० ॥ प्रभो! आप समस्त प्राणियोंकी एक-एक वृत्तिके साक्षी हैं । भूत और
भविष्यका व्यवधान भी आपके अखण्ड ज्ञानमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं डाल सकता । अतः आपसे छिपा ही क्या है? फिर भी मौं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये कहता ॥११ ॥ भगवन्! पृथ्वीमें जितने धूलिकण हैं, आकाशमें जितने तारे हैं और वर्षामें जितनी
जलकी धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं ॥ १२ ॥ वे सभी गौएँ दुधार,
नौजवान, सीधी, सुन्दर, सुलक्षणा और कपिला थीं । उन्हें मैंने न्यायके धनसे प्राप्त किया था । सबके साथ बछड़े थे । उनके सींगोंमें सोना मढ़ दिया गया था और खुरोंमें चाँदी । उन्हें वस्त्र, हार और गहनोंसे सजा दिया जाता था । ऐसी गौएँ मैंने दी थीं ॥१३ ॥ भगवन्! मैं युवावस्थासे
सम्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मणकुमारोंको -जो सद्गुणी, शीलसम्पन्न, कष्टमें पड़े हुए कुटुम्बवाले, दम्भरहित तपस्वी, वेदपाठी, शिष्योंको विद्यादान करनेवाले तथा सच्चरित्र होते— वस्त्राभूषणसे अलंकृत करता और उन गौओंका दान करता ॥१४ ॥ इस प्रकार मैंने बहुत -सी
गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड़े, हाथी, दासियोंके सहित कन्याएँ, तिलोंके पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न, गृह -सामग्री और रथ आदि दान किये । अनेकों यज्ञ किये और बहुत - से कूएँ, बावली आदि बनवाये ॥१५ ॥
यावत्यः सिकता भूमेर्यावत्यो दिवि तारकाः ।
यावत्यो वर्षधाराश्च तावतीरददां स्म गाः ॥१२
पयस्विनीस्तरुणीः शीलरूप- गुणोपपन्नाः कपिला हेमशृंगीः । न्यायार्जिता रूप्यखुराः सवत्सा दुकूलमालाभरणा ददावहम् ॥१३ स्वलंकृतेभ्यो गुणशीलवद्भ्यः सीदत्कुटुम्बेभ्य ऋतव्रतेभ्यः । तपःश्रुतब्रह्मवदान्यसद्भ्यः प्रादां युवभ्यो द्विजपुंगवेभ्यः ॥१४ गोभूहिरण्यायतनाश्वहस्तिनः कन्याः सदासीस्तिलरूप्यशय्याः वासांसि रत्नानि परिच्छदान् रथा- निष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तम् ॥१५
कस्यचिद् द्विजमुख्यस्य भ्रष्टा गौर्मम गोधने ।
सम्पृक्ताविदुषा सा च मया दत्ता द्विजातये ॥१६
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तां नीयमानां तत्स्वामी दृष्ट्वोवाच ममेति तम् ।
ममेति प्रतिग्राह्याह नृगो मे दत्तवानिति ॥१७
विप्रौ विवदमानौ मामूचतुः स्वार्थसाधकौ ।
भवान् दातापहर्तेति तच्छ्रुत्वा मेऽभवद् भ्रमः ॥१८
अनुनीतावुभौ विप्री धर्मकृच्छ्रगतेन वै ।
गवां लक्षं प्रकृष्टानां दास्याम्येषा प्रदीयताम् ॥१९
एक दिन किसी अप्रतिग्रही ( दान न लेनेवाले), तपस्वी ब्राह्मणकी एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओंमें आ मिली । मुझे इस बातका बिलकुल पता न चला । इसलिये मैंने अनजानमें उसे किसी दूसरे ब्राह्मणको दान कर दिया ॥१६ ॥ जब उस गायको वे ब्राह्मण ले चले, तब उस
गायके असली स्वामीने कहा-' यह गौ मेरी है। ' दान ले जानेवाले ब्राह्मणने कहा — ‘ यह तो मेरी है, क्योंकि राजा नृगने मुझे इसका दान किया है' ॥१७ ॥ वे दोनों ब्राह्मण आपसमें
झगड़ते हुए अपनी- अपनी बात कायम करनेके लिये मेरे पास आये । एकने कहा — ‘ यह गाय अभी- अभी आपने मुझे दी है ' और दूसरेने कहा कि ' यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है । ' भगवन्! उन दोनों ब्राह्मणोंकी बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया ॥ १८ ॥ मैंने धर्मसंकटमें पड़कर
उन दोनोंसे बड़ी अनुनय- विनय की और कहा कि ' मैं बदलेमें एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा । आपलोग मुझे यह गाय दे दीजिये ॥ १ ९ ॥ मैं आपलोगोंका सेवक हूँ । मुझसे अनजानमें यह अपराध बन गया है । मुझपर आपलोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्टसे तथा घोर नरकमें गिरनेसे बचा लीजिये ' ॥२० ॥ ‘ राजन्! मैं इसके बदलेमें कुछ नहीं लूँगा । ' यह कहकर
गायका स्वामी चला गया । ' तुम इसके बदलेमें एक लाख ही नहीं, दस हजार गौएँ और दो तो भी मैं लेनेका नहीं । ' इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया ॥ २१ ॥ देवाधिदेव
जगदीश्वर! इसके बाद आयु समाप्त होनेपर यमराजके दूत आये और मुझे यमपुरी ले गये । वहाँ यमराजने मुझसे पूछा– ॥२२ ॥ ' राजन्! तुम पहले अपने पापका फल भोगना चाहते
हो या पुण्यका? तुम्हारे दान और धर्मके फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होनेवाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है' || २३ || भगवन्! तब मैंने यमराजसे कहा — ' देव! पहले मैं अपने पापका फल भोगना चाहता हूँ। ' और उसी क्षण यमराजने कहा-' तुम गिर जाओ । ' उनके ऐसा कहते ही मैं वहाँसे गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट हो गया हूँ ॥२४ ॥ प्रभो! मैं ब्राह्मणोंका सेवक, उदार, दानी और आपका भक्त था । मुझे इस बातकी
उत्कट अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जायँ । इस प्रकार आपकी कृपासे मेरे पूर्वजन्मोंकी स्मृति नष्ट न हुई ॥ २५ ॥ भगवन्! आप परमात्मा हैं । बड़े -बड़े शुद्ध-हृदय
योगीश्वर उपनिषदोंकी दृष्टिसे ( अभेददृष्टिसे ) अपने हृदयमें आपका ध्यान करते रहते हैं । इन्द्रियातीत परमात्मन्! साक्षात् आप मेरे नेत्रोंके सामने कैसे आ गये! क्योंकि मैं तो अनेक प्रकारके व्यसनों, दुःखद कर्मोंमें फँसकर अंधा हो रहा था । आपका दर्शन तो तब होता है, ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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जब संसारके चक्करसे छुटकारा मिलनेका समय आता है ॥ २६ ॥ देवताओंके भी
आराध्यदेव! पुरुषोत्तम गोविन्द! आप ही व्यक्त और अव्यक्त जगत् तथा जीवोंके स्वामी हैं । अविनाशी अच्युत! आपकी कीर्ति पवित्र है । अन्तर्यामी नारायण! आप ही समस्त वृत्तियों और इन्द्रियोंके स्वामी हैं ॥ २७ ॥ प्रभो! श्रीकृष्ण! मैं अब देवताओंके लोकमें जा रहा हूँ । आप
मुझे आज्ञा दीजिये । आप ऐसी कृपा कीजिये कि मैं चाहे कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरा चित्त सदा आपके चरणकमलोंमें ही लगा रहे || २८ || आप समस्त कार्यों और कारणोंके रूपमें विद्यमान हैं । आपकी शक्ति अनन्त है और आप स्वयं ब्रह्म हैं । आपको मैं नमस्कार करता सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी वासुदेव श्रीकृष्ण! आप समस्त योगोंके स्वामी, योगेश्वर मैं आपको बार- बार नमस्कार करता हूँ ॥ २ ९ ॥
भवन्तावनुगृह्णीतां किंकरस्याविजानतः ।
समुद्धरत मां कृच्छ्रात् पतन्तं निरयेऽशुचौ ॥२०
नाहं प्रतीच्छे वै राजन्नित्युक्त्वा स्वाम्यपाक्रमत् ।
नान्यद् गवामप्ययुतमिच्छामीत्यपरो ययौ ॥२१
एतस्मिन्नन्तरे याम्यैर्दूतैर्नीतो यमक्षयम् ।
यमेन पृष्टस्तत्राहं देवदेव जगत्पते ॥२२
पूर्वं त्वमशुभं भुंक्षे उताहो नृपते शुभम् ।
नान्तं दानस्य धर्मस्य पश्ये लोकस्य भास्वतः ॥२३
पूर्वं देवाशुभं भुंज इति प्राह पतेति सः ।
तावदद्राक्षमात्मानं कृकलासं पतन् प्रभो ॥२४
ब्रह्मण्यस्य वदान्यस्य तव दासस्य केशव ।
स्मृतिर्नाद्यापि विध्वस्ता भवत्सन्दर्शनार्थिनः ॥२५
स त्वं कथं मम विभोऽक्षिपथः परात्मा योगेश्वरैः श्रुतिदृशामलहृद्विभाव्यः । साक्षादधोक्षज उरुव्यसनान्धबुद्धेः स्यान्मेऽनुदृश्य इह यस्य भवापवर्गः ॥२६
देवदेव जगन्नाथ गोविन्द पुरुषोत्तम ।
नारायण हृषीकेश पुण्यश्लोकाच्युताव्यय ॥२७
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