श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 911–920
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920
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यथा भवेद् वचः सत्यं तथा राम विधीयताम् ॥३५ श्रीभगवानुवाच
आत्मा वै पुत्र उत्पन्न इति वेदानुशासनम् ।
तस्मादस्य भवेद् वक्ता आयुरिन्द्रियसत्त्ववान् ॥३६
किं वः कामो मुनिश्रेष्ठा ब्रूताहं करवाण्यथ ।
अजानतस्त्वपचितिं यथा मे चिन्त्यतां बुधाः ॥३७
यदुवंशशिरोमणे! सूतजीको हम लोगोंने ही ब्राह्मणोचित आसनपर बैठाया था और जबतक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तबतकके लिये उन्हें शारीरिक कष्टसे रहित आयु भी दे दी थी ॥३० ॥ आपने अनजानमें यह ऐसा काम कर दिया, जो ब्रह्महत्याके समान है ।
हमलोग यह मानते हैं कि आप योगेश्वर हैं, वेद भी आपपर शासन नहीं कर सकता । फिर भी आपसे यह प्रार्थना है कि आपका अवतार लोगोंको पवित्र करनेके लिये हुआ है; यदि आप किसीकी प्रेरणाके बिना स्वयं अपनी इच्छासे ही इस ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त कर लेंगे तो इससे लोगोंको बहुत शिक्षा मिलेगी' ॥३१-३२ ॥ भगवान् बलरामने कहा- मैं लोगोंको शिक्षा देनेके लिये, लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये इस ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त अवश्य करूँगा, अतः इसके लिये प्रथम श्रेणीका जो प्रायश्चित्त हो, आपलोग उसीका विधान कीजिये || ३३ || आपलोग इस सूतको लम्बी आयु, बल, इन्द्रिय-शक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हों, मुझे बतला दीजिये, मैं अपने योगबलसे सब कुछ सम्पन्न किये देता हूँ ॥३४ ॥
ऋषियोंने कहा — बलरामजी! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये जिससे आपका शस्त्र, पराक्रम और इनकी मृत्यु भी व्यर्थ न हो और हमलोगोंने इन्हें जो वरदान दिया था, वह भी सत्य हो जाय ॥३५ ॥
भगवान् बलरामने कहा -ऋषियो! वेदोंका ऐसा कहना है कि आत्मा ही पुत्रके रूपमें उत्पन्न होता है । इसलिये रोमहर्षणके स्थानपर उनका पुत्र आपलोगोंको पुराणोंकी कथा सुनायेगा । उसे मैं अपनी शक्तिसे दीर्घायु, इन्द्रियशक्ति और बल दिये देता हूँ ॥ ३६ ॥
ऋषियो! इसके अतिरिक्त आपलोग और जो कुछ भी चाहते हों, मुझसे कहिये । मैं आपलोगोंकी इच्छा पूर्ण करूँगा । अनजानमें मुझसे जो अपराध हो गया है, उसका प्रायश्चित्त भी आपलोग सोच - विचारकर बतलाइये; क्योंकि आपलोग इस बिषयके विद्वान् हैं ॥३७ ॥
ऋषय ऊचुः
इल्वलस्य सुतो घोरो बल्वलो नाम दानवः ।
स दूषयति नः सत्रमेत्य पर्वणि पर्वणि ॥३८
तं पापं जहि दाशार्ह तन्नः शुश्रूषणं परम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पूयशोणितविण्मूत्रसुरामांसाभिवर्षिणम् ॥३९
ततश्च भारतं वर्षं परीत्य सुसमाहितः ।
चरित्वा द्वादश मासांस्तीर्थस्नायी विशुद्धयसे ॥ ४०
ऋषियोंने कहा - बलरामजी! इल्वलका पुत्र बल्वल नामका एक भयंकर दानव है । वह प्रत्येक पर्वपर यहाँ आ पहुँचता है और हमारे इस सत्रको दूषित कर देता है ॥३८ ॥
यदुनन्दन! वह यहाँ आकर पीब, खून, विष्ठा, मूत्र, शराब और मांसकी वर्षा करने लगता है । आप उस पापीको मार डालिये। हमलोगोंकी यह बहुत बड़ी सेवा होगी ॥३९ ॥ इसके बाद
आप एकाग्रचित्तसे तीर्थोंमें स्नान करते हुए बारह महीनोंतक भारतवर्षकी परिक्रमा करते हुए विचरण कीजिये । इससे आपकी शुद्धि हो जायगी ॥४० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे बलदेवचरित्रे बल्वलवधोपक्रमो नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥७८ ॥
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अथैकोनाशीतितमोऽध्यायः बल्वलका उद्धार और बलरामजीकी तीर्थयात्रा श्रीशुक उवाच
ततः पर्वण्युपावृत्ते प्रचण्डः पांसुवर्षणः ।
भीमो वायुरभूद् राजन् पूयगन्धस्तु सर्वशः ॥१
ततोऽमेध्यमयं वर्षं बल्वलेन विनिर्मितम् ।
अभवद् यज्ञशालायां सोऽन्वदृश्यत शूलधृक् ॥२
तं विलोक्य बृहत्कायं भिन्नाञ्जनचयोपमम् ।
तप्तताम्रशिखाश्मश्रुं दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीमुखम् ॥ ३
सस्मार मुसलं रामः परसैन्यविदारणम् ।
हलं च दैत्यदमनं ते तूर्णमुपतस्थतुः ॥ ४
तमाकृष्य हलाग्रेण बल्वलं गगनेचरम् ।
मुसलेनाहनत् क्रुद्धो मूर्ध्नि ब्रह्मद्रुहं बलः ॥ ५
सोऽपतद् भुवि निर्भिन्नललाटोऽसृक् समुत्सृजन् ।
मुंचन्नार्तस्वरं शैलो यथा वज्रहतोऽरुणः ॥ ६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! पर्वका दिन आनेपर बड़ा भयंकर अंधड़ चलने लगा । धूलकी वर्षा होने लगी और चारों ओरसे पीबकी दुर्गन्ध आने लगी ॥ १ ॥ इसके बाद
यज्ञशालामें बल्वल दानवने मल- मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा की । तदनन्तर हाथमें त्रिशूल लिये वह स्वयं दिखायी पड़ा ॥ २ ॥ उसका डील- डौल बहुत बड़ा था, ऐसा जान पड़ता
मानो ढेर- का- ढेर कालिख इकट्ठा कर दिया गया हो । उसकी चोटी और दाढ़ी - मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल- लाल थीं । बड़ी -बड़ी दाढ़ों और भौंहोंके कारण उसका मुँह बड़ा भयावना लगता था । उसे देखकर भगवान् बलरामजीने शत्रुसेनाकी कुंदी करने - वाले मूसल और दैत्योंको चीर- फाड़ डालनेवाले हलका स्मरण किया । उनके स्मरण करते ही वे दोनों शस्त्र तुरंत वहाँ आ पहुँचे ॥३-४ ॥ बलरामजीने आकाशमें विचरनेवाले बल्वल दैत्यको अपने हलके अगले भागसे खींचकर उस ब्रह्मद्रोहीके सिरपर बड़े क्रोधसे एक मूसल कसकर जमाया, जिससे उसका ललाट फट गया और वह खून उगलता तथा आर्तस्वरसे चिल्लाता हुआ धरतीपर गिर पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे वज्रकी चोट खाकर गेरू आदिसे लाल हुआ कोई पहाड़ गिर पड़ा हो ॥५-६ ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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संस्तुत्य मुनयो रामं प्रयुज्यावितथाशिषः ।
अभ्यषिंचन् महाभागा वृत्रघ्नं विबुधा यथा ॥७
वैजयन्तीं ददुर्मालां श्रीधामाम्लानपंकजाम् ।
रामाय वाससी दिव्ये दिव्यान्याभरणानि च ॥८
अथ तैरभ्यनुज्ञातः कौशिकीमेत्य ब्राह्मणैः ।
स्नात्वा सरोवरमगाद् यतः सरयुरास्रवत् ॥९
अनुस्रोतेन सरयूं' प्रयागमुपगम्य सः ।
स्नात्वा सन्तर्प्य देवादीन् जगाम पुलहाश्रमम् ॥१०
गोमतीं गण्डकीं स्नात्वा विपाशां शोण आप्लुतः ।
गयां गत्वा पितॄनिष्ट्वा गंगासागरसंगमे ॥११
उपस्पृश्य महेन्द्राद्रौ रामं दृष्ट्वाभिवाद्य च ।
सप्तगोदावरीं वेणां पम्पां भीमरथीं ततः ॥१२
स्कन्दं दृष्ट्वा ययौ रामः श्रीशैलं गिरिशालयम् ।
द्रविडेषु महापुण्यं दृष्ट्वाद्रिं वेंकटं प्रभुः ॥ १३
कामकोष्णीं पुरीं कांचीं कावेरीं च सरिद्वराम् ।
श्रीरंगाख्यं महापुण्यं यत्र सन्निहितो हरिः ॥१४
ऋषभाद्रिं हरेः क्षेत्रं दक्षिणां मथुरां तथा ।
सामुद्रं सेतुमगमन्महापातकनाशनम् ॥१५
नैमिषारण्यवासी महाभाग्यवान् मुनियोंने बलरामजीकी स्तुति की, उन्हें कभी न व्यर्थ होनेवाले आशीर्वाद दिये और जैसे देवतालोग देवराज इन्द्रका अभिषेक करते हैं, वैसे ही उनका अभिषेक किया ॥७ ॥ इसके बाद ऋषियोंने बलरामजीको दिव्य वस्त्र और दिव्य
आभूषण दिये तथा एक ऐसी वैजयन्ती माला भी दी, जो सौन्दर्यका आश्रय एवं कभी न मुरझानेवाले कमलके पुष्पोंसे युक्त थी ॥८ ॥
तदनन्तर नैमिषारण्यवासी ऋषियोंसे विदा होकर उनके आज्ञानुसार बलरामजी ब्राह्मणोंके साथ कौशिकी नदीके तटपर आये । वहाँ स्नान करके वे उस सरोवरपर गये, जहाँसे सरयू नदी निकली है ॥९ ॥ वहाँसे सरयूके किनारे- किनारे चलने लगे, फिर उसे छोड़कर
प्रयाग आये; और वहाँ स्नान तथा देवता, ऋषि एवं पितरोंका तर्पण करके वहाँसे पुलहाश्रम ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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गये ॥१० ॥ वहाँसे गण्डकी, गोमती तथा विपाशा नदियोंमें स्नान करके वे सोननदके तटपर
गये और वहाँ स्नान किया। इसके बाद गयामें जाकर पितरोंका वसुदेवजीके आज्ञानुसार पूजन - यजन किया । फिर गंगासागर- संगमपर गये; वहाँ भी स्नान आदि तीर्थ- कृत्योंसे निवृत्त होकर महेन्द्र पर्वतपर गये । वहाँ परशुरामजीका दर्शन और अभिवादन किया । तदनन्तर सप्तगोदावरी, वेणा, पम्पा और भीमरथी आदिमें स्नान करते हुए स्वामिकार्तिकका दर्शन करने गये तथा वहाँसे महादेवजीके निवासस्थान श्रीशैलपर पहुँचे । इसके बाद भगवान् बलरामने द्रविड़ देशके परम पुण्यमय स्थान वेंकटाचल ( बालाजी ) का दर्शन किया और वहाँसे वे कामाक्षी – शिवकांची, विष्णुकांची होते हुए तथा श्रेष्ठ नदी कावेरीमें स्नान करते हुए पुण्यमय श्रीरंगक्षेत्रमें पहुँचे । श्रीरंगक्षेत्रमें भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहते हैं ॥११-१४ ॥ वहाँसे उन्होंने विष्णुभगवान्के क्षेत्र ऋषभ पर्वत, दक्षिण मथुरा तथा बड़े - बड़े महापापोंको नष्ट करनेवाले सेतुबन्धकी यात्रा की ॥१५ ॥
तत्रायुतमदाद् धेनूर्ब्राह्मणेभ्यो हलायुधः ।
कृतमालां ताम्रपर्णी मलयं च कुलाचलम् ॥१६
तत्रागस्त्यं समासीनं नमस्कृत्याभिवाद्य च ।
योजितस्तेन चाशीर्भिरनुज्ञातो गतोऽर्णवम् ।
दक्षिणं तत्र कन्याख्यां दुर्गां देवीं ददर्श सः ॥१७
ततः फाल्गुनमासाद्य पंचाप्सरसमुत्तमम् ।
विष्णुः सन्निहितो यत्र स्नात्वास्पर्शद् गवायुतम् ॥१८
ततोऽभिव्रज्य भगवान् केरलांस्तु त्रिगर्तकान् ।
गोकर्णाख्यं शिवक्षेत्रं सान्निध्यं यत्र धूर्जटेः ॥ १ ९
आर्यां द्वैपायनीं दृष्ट्वा शूर्पारकमगाद् बलः ।
तापीं पयोष्णीं निर्विन्ध्यामुपस्पृश्याथ दण्डकम् ॥२०
प्रविश्य रेवामगमद् यत्र माहिष्मती पुरी ।
मनुतीर्थमुपस्पृश्य प्रभासं पुनरागमत् ॥ २१
श्रुत्वा द्विजैः कथ्यमानं कुरुपाण्डवसंयुगे ।
सर्वराजन्यनिधनं भारं मेने हृतं भुवः ॥२२
स भीमदुर्योधनयोर्गदाभ्यां युध्यतोर्मृधे ।
वारयिष्यन् विनशनं जगाम यदुनन्दनः ॥२३
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युधिष्ठिरस्तु तं दृष्ट्वा यमी कृष्णार्जुनावपि ।
अभिवाद्याभवंस्तूष्णीं किंविवक्षुरिहागतः ॥२४
वहाँ बलरामजीने ब्राह्मणोंको दस हजार गौएँ दान कीं । फिर वहाँसे कृतमाला और ताम्रपर्णी नदियोंमें स्नान करते हुए वे मलयपर्वतपर गये । वह पर्वत सात कुलपर्वतोंमेंसे एक है ॥१६ ॥ वहाँपर विराजमान अगस्त्य मुनिको उन्होंने नमस्कार और अभिवादन किया ।
अगस्त्यजीसे आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त करके बलरामजीने दक्षिण समुद्रकी यात्रा की । वहाँ उन्होंने दुर्गादेवीका कन्याकुमारीके रूपमें दर्शन किया ॥ १७ ॥ इसके बाद वे फाल्गुन
तीर्थ — अनन्तशयन क्षेत्रमें गये और वहाँके सर्वश्रेष्ठ पंचाप्सरस तीर्थमें स्नान किया । उस तीर्थमें सर्वदा विष्णुभगवान्का सान्निध्य रहता है । वहाँ बलरामजीने दस हजार गौएँ दान कीं ॥१८ ॥
अब भगवान् बलराम वहाँसे चलकर केरल और त्रिगर्त देशोंमें होकर भगवान् शंकरके क्षेत्र गोकर्णतीर्थमें आये । वहाँ सदा- सर्वदा भगवान् शंकर विराजमान रहते हैं ॥ १ ९ ॥ वहाँसे जलसे घिरे द्वीपमें निवास करनेवाली आर्यादेवीका दर्शन करने गये और फिर उस द्वीपसे चलकर शूर्पारक- क्षेत्रकी यात्रा की, इसके बाद तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या नदियोंमें स्नान करके वे दण्डकारण्यमें आये || २० || वहाँ होकर वे नर्मदाजीके तटपर गये । परीक्षित्! इस पवित्र नदीके तटपर ही माहिष्मतीपुरी है । वहाँ मनुतीर्थमें स्नान करके वे फिर प्रभासक्षेत्रमें चले आये ॥२१ ॥ वहीं उन्होंने ब्राह्मणोंसे सुना कि कौरव और पाण्डवोंके युद्धमें अधिकांश
क्षत्रियोंका संहार हो गया । उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि अब पृथ्वीका बहुत - सा भार उतर गया ॥२२ ॥ जिस दिन रणभूमिमें भीमसेन और दुर्योधन गदायुद्ध कर रहे थे, उसी दिन
बलरामजी उन्हें रोकनेके लिये कुरुक्षेत्र जा पहुँचे ॥२३ ॥
महाराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने बलरामजीको देखकर प्रणाम किया तथा चुप हो रहे । वे डरते हुए मन-ही- मन सोचने लगे कि ये न जाने क्या कहनेके लिये यहाँ पधारे हैं? ॥२४ ॥
गदापाणी उभौ दृष्ट्वा संरब्धौ विजयैषिणौ ।
मण्डलानि विचित्राणि चरन्ताविदमब्रवीत् ॥२५
युवां तुल्यबलौ वीरौ हे राजन् हे वृकोदर ।
एकं प्राणाधिकं मन्ये उतैकं शिक्षयाधिकम् ॥२६
तस्मादेकतरस्येह युवयोः समवीर्ययोः ।
न लक्ष्यते जयोऽन्यो वा विरमत्वफलो रणः ॥२७
न तद्वाक्यं जगृहतुर्बद्धवैरौ नृपार्थवत् ।
अनुस्मरन्तावन्योन्यं दुरुक्तं दुष्कृतानि च ॥२८
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दिष्टं तदनुमन्वानो रामो द्वारवतीं ययौ ।
उग्रसेनादिभिः प्रीतैर्ज्ञातिभिः समुपागतः ॥२९
तं पुनर्नैमिषं प्राप्तमृषयोऽयाजयन् मुदा ।
क्रत्वङ्गं क्रतुभिः सर्वैर्निवृत्ताखिलविग्रहम् ॥३०
तेभ्यो विशुद्धविज्ञानं भगवान् व्यतरद् विभुः ।
येनैवात्मन्यदो विश्वमात्मानं विश्वगं विदुः ॥ ३१
स्वपत्न्यावभृथस्नातो ज्ञातिबन्धुसुहृद्वृतः ।
रेजे स्वज्योत्स्नयेवेन्दुः सुवासाः सुष्ट्वलङ्कृतः ॥३२
उस समय भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही हाथमें गदा लेकर एक- दूसरेको जीतनेके लिये क्रोधसे भरकर भाँति - भाँतिके पैंतरे बदल रहे थे । उन्हें देखकर बलरामजीने कहा - ॥२५ ॥
' राजा दुर्योधन और भीमसेन! तुम दोनों वीर हो। तुम दोनोंमें बल- पौरुष भी समान है । मैं ऐसा समझता हूँ कि भीमसेनमें बल अधिक है और दुर्योधनने गदायुद्धमें शिक्षा अधिक पायी है ॥२६ ॥
इसलिये तुमलोगों- जैसे समान बलशालियोंमें किसी एककी जय या पराजय नहीं होती दीखती । अतः तुमलोग व्यर्थका युद्ध मत करो, अब इसे बंद कर दो' ॥२७ ॥ परीक्षित्!
बलरामजीकी बात दोनोंके लिये हितकर थी । परन्तु उन दोनोंका वैरभाव इतना दृढमूल हो गया था कि उन्होंने बलरामजीकी बात न मानी । | वे एक-दूसरेकी कटुवाणी और दुर्व्यवहारोंका स्मरण करके उन्मत्त- से हो रहे थे || २८ || भगवान् बलरामजीने निश्चय किया कि इनका प्रारब्ध ऐसा ही है; इसलिये उसके सम्बन्धमें विशेष आग्रह न करके वे द्वारका लौट गये । द्वारकामें उग्रसेन आदि गुरुजनों तथा अन्य सम्बन्धियोंने बड़े प्रेमसे आगे आकर उनका स्वागत किया ॥२९ ॥ वहाँसे बलरामजी फिर नैमिषारण्य क्षेत्रमें गये। वहाँ ऋषियोंने
विरोधभावसे– युद्धादिसे निवृत्त बलरामजीके द्वारा बड़े प्रेमसे सब प्रकारके यज्ञ कराये । परीक्षित्! सच पूछो तो जितने भी यज्ञ हैं, वे बलरामजीके अंग ही हैं । इसलिये उनका यह यज्ञानुष्ठान लोकसंग्रहके लिये ही था ॥ ३० ॥ सर्वसमर्थ भगवान् बलरामने उन ऋषियोंको
विशुद्ध तत्त्वज्ञानका उपदेश किया, जिससे वे लोग इस सम्पूर्ण विश्वको अपने - आपमें और अपने - आपको सारे विश्वमें अनुभव करने लगे || ३१ || इसके बाद बलरामजीने अपनी पत्नी रेवतीके साथ यज्ञान्त- स्नान किया और सुन्दर- सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनकर अपने भाई- बन्धु तथा स्वजन - सम्बन्धियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे अपनी चन्द्रिका एवं नक्षत्रोंके साथ चन्द्रदेव होते हैं ॥ ३२ ॥
ईदृग्विधान्यसंख्यानि बलस्य बलशालिनः ।
अनन्तस्याप्रमेयस्य मायामर्त्यस्य सन्ति हि ॥३३
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योऽनुस्मरेत रामस्य कर्माण्यद्भुतकर्मणः ।
सायं प्रातरनन्तस्य विष्णोः स दयितो भवेत् ॥ ३४
परीक्षित्! भगवान् बलराम स्वयं अनन्त हैं । उनका स्वरूप मन और वाणीके परे है । उन्होंने लीलाके लिये ही यह मनुष्योंका - सा शरीर ग्रहण किया है । उन बलशाली बलरामजीके ऐसे- ऐसे चरित्रोंकी गिनती भी नहीं की जा सकती ॥३३ ॥ जो पुरुष अनन्त, सर्वव्यापक,
अद्भुतकर्मा भगवान् बलरामजीके चरित्रोंका सायं प्रातः स्मरण करता है, वह भगवान्का अत्यन्त प्रिय हो जाता है ॥३४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे बलदेव- तीर्थयात्रानिरूपणं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥७९ ॥
१. रमयन्। ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथाशीतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णके द्वारा सुदामाजीका स्वागत राजोवाच
भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मनः ।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामहे प्रभो ॥१
को`नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्नुत्तमश्लोकसत्कथाः ।
विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः ॥२
सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते करौ च तत्कर्मकरौ मनश्च । स्मरेद् वसन्तं स्थिरजंगमेषु शृणोति तत्पुण्यकथाः स कर्णः ॥३ शिरस्तु तस्योभयलिंगमानमे- त्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षुः । अंगानि विष्णोरथ तज्जनानां पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम् ॥४ राजा परीक्षित्ने कहा - भगवन्! प्रेम और मुक्तिके दाता परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी शक्ति अनन्त है । इसलिये उनकी माधुर्य और ऐश्वर्यसे भरी लीलाएँ भी अनन्त हैं । अब हम उनकी दूसरी लीलाएँ, जिनका वर्णन आपने अबतक नहीं किया है, सुनना चाहते हैं ॥१ ॥ ब्रह्मन्! यह जीव विषय-सुखको खोजते खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है । वे
बाणकी तरह इसके चित्तमें चुभते रहते हैं । ऐसी स्थितिमें ऐसा कौन- सा रसिक— रसका विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार- बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णकी मंगलमयी लीलाओंका श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा ॥२ ॥ जो वाणी भगवान्के गुणोंका गान करती
है, वही सच्ची वाणी है । वे ही हाथ सच्चे हाथ हैं, जो भगवान्की सेवाके लिये काम करते हैं । वही मन सच्चा मन है, जो चराचर प्राणियोंमें निवास करनेवाले भगवान्का स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तवमें कान कहनेयोग्य हैं, जो भगवान्की पुण्यमयी कथाओंका श्रवण करते हैं ॥३ ॥ वही सिर सिर है, जो चराचर जगत्को भगवानकी चल-अचल प्रतिमा
समझकर नमस्कार करता है; और जो सर्वत्र भगवद्विग्रहका दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तवमें नेत्र हैं । शरीरके जो अंग भगवान् और उनके भक्तोंके चरणोदकका सेवन करते हैं, वे ही अंग वास्तवमें अंग हैं; सच पूछिये तो उन्हींका होना सफल है ॥४ ॥
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सूत उवाच
विष्णुरातेन सम्पृष्टो भगवान् बादरायणिः ।
वासुदेवे भगवति निमग्नहृदयोऽब्रवीत् ॥५
श्रीशुक उवाच
कृष्णस्यासीत् सखा कश्चिद् ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः ।
विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥६
यदृच्छयोपपन्नेन वर्तमानो गृहाश्रमी ।
तस्य भार्या कुचैलस्य क्षुत्क्षामा च तथाविधा ॥७
पतिव्रता पतिं प्राह म्लायता वदनेन सा ।
दरिद्रा सीदमाना सा वेपमानाभिगम्य च ॥८
ननु ब्रह्मन् भगवतः सखा साक्षाच्छ्रियः पतिः ।
ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च भगवान् सात्वतर्षभः ॥९
तमुपैहि महाभाग साधूनां च परायणम् ।
दास्यति द्रविणं भूरि सीदते ते कुटुम्बिने ॥१०
आस्तेऽधुना द्वारवत्यां भोजवृष्ण्यन्धकेश्वरः ।
स्मरतः पादकमलमात्मानमपि यच्छति ।
किं न्वर्थकामान् भजतो नात्यभीष्टांजगद्गुरुः ॥ ११
स एवं भार्यया विप्रो बहुशः प्रार्थितो मृदु अयं हि परमो लाभ उत्तमश्लोकदर्शनम् ॥१२ सूतजी कहते हैं— शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षितने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान् श्रीशुकदेवजीका हृदय भगवान् श्रीकृष्णमें ही तल्लीन हो गया । उन्होंने परीक्षित्से इस प्रकार कहा ॥५ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे । वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे || ६ || वे गृहस्थ होनेपर भी किसी प्रकारका संग्रह - परिग्रह न रखकर प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसीमें सन्तुष्ट रहते थे । उनके वस्त्र तो फटे - पुराने थे ही, उनकी पत्नीके भी वैसे ही थे । वह भी अपने पतिके समान ही भूखसे दुबली हो रही थी ॥७ ॥ एक दिन दरिद्रताकी प्रतिमूर्ति दुःखिनी पतिव्रता
भूखके मारे काँपती हुई अपने पतिदेवके पास गयी और मुरझाये हुए मुँहसे बोली- ॥८ ॥
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