श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 921–930
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930
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‘ भगवन्! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण आपके सखा हैं । वे भक्तवाञ्छाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणोंके परम भक्त हैं || ९ || परम भाग्यवान् आर्यपुत्र! वे साधु- संतोंके, सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय हैं । आप उनके पास जाइये । जब वे जानेंगे कि आप कुटुम्बी हैं और अन्नके बिना दुःखी हो रहे हैं तो वे आपको बहुत-सा धन देंगे ॥१० ॥
आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामीके रूपमें द्वारकामें ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरणकमलोंका स्मरण करते हैं, उन प्रेमी भक्तोंको वे अपने - आपतकका दान कर डालते हैं । ऐसी स्थितिमें जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तोंको यदि धन और विषय - सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दे दें तो इसमें आश्चर्यकी कौन- सी बात है? ' ॥११ ॥ इस प्रकार जब उन ब्राह्मणदेवताकी पत्नीने अपने पतिदेवसे कई
बार बड़ी नम्रतासे प्रार्थना की, तब उन्होंने सोचा कि ' धनकी तो कोई बात नहीं है; परन्तु भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हो जायगा, यह तो जीवनका बहुत बड़ा लाभ है ' ॥१२ ॥ यही
विचार करके उन्होंने जानेका निश्चय किया और अपनी पत्नीसे बोले – ' कल्याणी! घरमें कुछ भेंट देनेयोग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो' ॥१३ ॥ तब उस ब्राह्मणीने पास - पड़ोसके
ब्राह्मणोंके घरसे चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर एक कपड़ेमें बाँध दिये और भगवान्को भेंट देनेके लिये अपने पतिदेवको दे दिये ॥१४ ॥ इसके बाद वे ब्राह्मणदेवता उन चिउड़ोंको लेकर
द्वारकाके लिये चल पड़े । वे मार्गमें यह सोचते जाते थे कि ' मुझे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे? ' ॥१५ ॥
इति संचिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे ।
अप्यस्त्युपायनं किंचिद् गृहे कल्याणि दीयताम् ॥१३
याचित्वा चतुरो मुष्टीन् विप्रान् पृथुकतण्डुलान् ।
चैलखण्डेन तान् बद्ध्वा भर्त्रे प्रादादुपायनम् ॥१४
स तानादाय विप्राग्र्यः प्रययौ द्वारकां किल ।
कृष्णसन्दर्शनं मह्यं कथं स्यादिति चिन्तयन् ॥१५
त्रीणि गुल्मान्यतीयाय तिस्रः कक्षाश्च स द्विजः ।
विप्रोऽगम्यान्धकवृष्णीनां गृहेष्वच्युतधर्मिणाम् ॥१६
गृहं द्व्यष्टसहस्राणां महिषीणां हरेर्द्विजः ।
विवेशैकतमं श्रीमद् ब्रह्मानन्दं गतो यथा ॥१७
तं विलोक्याच्युतो दूरात् प्रियापर्यंकमास्थितः ।
सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोर्भ्यां पर्यग्रहीन्मुदा ॥ १८
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सख्युः प्रियस्य विप्रर्षेरंगसंगातिनिर्वृतः ।
प्रीतो व्यमुंचदब्बिन्दून् नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः ॥ १ ९
अथोपवेश्य पर्यंके स्वयं सख्युः समर्हणम् ।
उपहृत्यावनिज्यास्य पादौ पादावनेजनीः ॥ २०
अग्रहीच्छिसा राजन् भगवाँल्लोकपावनः ।
व्यलिम्पद् दिव्यगन्धेन चन्दनागुरुकुंकुमैः ॥२१
परीक्षित्! द्वारकामें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणदेवता दूसरे ब्राह्मणोंके साथ सैनिकोंकी तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके भगवद्धर्मका पालन करनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके महलोंमें, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, जा पहुँचे ॥१६ ॥ उनके बीच
भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियोंके महल थे । उनमेंसे एकमें उन ब्राह्मणदेवताने प्रवेश किया। वह महल खूब सजा-सजाया - अत्यन्त शोभा- युक्त था । उसमें प्रवेश करते समय उन्हें एसे मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्दके समुद्रमें डूब- उतरा रहे हों! ॥१७ ॥
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणीजीके पलंगपर विराजे हुए थे । ब्राह्मणदेवताको दूरसे ही देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उनके पास आकर बड़े आनन्दसे उन्हें अपने भुजपाशमें बाँध लिया ॥ १८ ॥ परीक्षित्! परमानन्दस्वरूप भगवान्
अपने प्यारे सखा ब्राह्मणदेवताके अंग-स्पर्शसे अत्यन्त आनन्दित हुए। उनके कमलके समान कोमल नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बरसने लगे || १ ९|| परीक्षित्! कुछ समयके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और स्वयं पूजनकी सामग्री लाकर उनकी पूजा की । प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सभीको पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवताके पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और उनके शरीरमें चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धोंका लेपन किया ॥२०- २१ ॥ फिर उन्होंने बड़े आनन्दसे सुगन्धित धूप और दीपावलीसे अपने मित्रकी आरती उतारी । इस प्रकार पूजा करके पान एवं गाय देकर मधुर वचनोंसे ' भले पधारे ' ऐसा कहकर उनका स्वागत किया ॥२२ ॥ ब्राह्मणदेवता फटे - पुराने वस्त्र पहने हुए थे । शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल
था । देहकी सारी नसें दिखायी पड़ती थीं । स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं || २३ || अन्तःपुरकी स्त्रियाँ यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अतिशय प्रेमसे इस मैले - कुचैले अवधूत ब्राह्मणकी पूजा कर रहे हैं ॥२४ ॥ वे आपसमें कहने लगीं- ' इस नंग- धड़ंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगेने
ऐसा कौन- सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी- गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं । देखो तो सही, इन्होंने अपने पलंगपर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीको छोड़कर इस ब्राह्मणको अपने बड़े भाई बलरामजीके समान हृदयसे लगाया है ' ॥२५-२६ ॥ प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक- दूसरेका हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवनकी उन आनन्ददायक घटनाओंका स्मरण और वर्णन करने लगे जो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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गुरुकुलमें रहते समय घटित हुई थीं ॥२७ ॥
धूपैः सुरभिभिर्मित्रं प्रदीपावलिभिर्मुदा ।
अर्चित्वाऽऽवेद्य ताम्बूलं गां च स्वागतमब्रवीत् ॥२२
कुचैलं मलिनं क्षामं द्विजं धमनिसंततम् ।
देवी पर्यचरत् साक्षाच्चामरव्यजनेन वै ॥२३
अन्तःपुरजनो दृष्ट्वा कृष्णेनामलकीर्तिना ।
विस्मितोऽभूदतिप्रीत्या अवधूतं सभाजितम् ॥२४
किमनेन कृतं पुण्यमवधूतेन भिक्षुणा ।
श्रिया हीनेन लोकेऽस्मिन् गर्हितेनाधमेन च ॥२५
योऽसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भृतः ।
पर्यंकस्थां श्रियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा ॥२६
कथयांचक्रतुर्गाथाः पूर्वा गुरुकुले सतोः ।
आत्मनो ललिता राजन् करौ गृह्य परस्परम् ॥२७
श्री भगवानुवाच
अपि ब्रह्मन् गुरुकुलाद् भवता लब्धदक्षिणात् ।
समावृत्तेन धर्मज्ञ भार्योढा सदृशी न वा ॥२८
प्रायो गृहेषु ते चित्तमकामविहतं तथा ।
नैवातिप्रीयसे विद्वन् धनेषु विदितं हि मे ॥२९
केचित् कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतचेतसः ।
त्यजन्तः प्रकृतीर्दैवीर्यथाहं लोकसङ्ग्रहम् ॥३०
कच्चिद् गुरुकुले वासं ब्रह्मन् स्मरसि नौ यतः ।
द्विजो विज्ञाय विज्ञेयं तमसः पारमश्नुते ॥३१
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- धर्मके मर्मज्ञ ब्राह्मणदेव! गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुलसे लौट आये, तब आपने अपने अनुरूप स्त्रीसे विवाह किया या नहीं? ॥२८ ॥ मैं
जानता हूँ कि आपका चित्त गृहस्थीमें रहनेपर भी प्रायः विषय - भोगोंमें आसक्त नहीं है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विद्वन्! यह भी मुझे मालूम है कि धन आदिमें भी आपकी कोई प्रीति नहीं है ॥२९ ॥ जगत्में
विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्की मायासे निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर देते हैं और चित्तमें विषयोंकी तनिक भी वासना न रहनेपर भी मेरे समान केवल लोकशिक्षाके लिये कर्म करते रहते हैं || ३० || ब्राह्मणशिरोमणे! क्या आपको उस समयकी बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुलमें निवास करते थे । सचमुच गुरुकुलमें ही द्विजातियोंको अपने ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान होता है, जिसके द्वारा वे अज्ञानान्धकारसे पार हो जाते हैं ॥३१ ॥ मित्र! इस संसारमें शरीरका कारण -जन्मदाता पिता प्रथम गुरु है । इसके
बाद उपनयन- संस्कार करके सत्कर्मोंकी शिक्षा देनेवाला दूसरा गुरु है । वह मेरे ही समान पूज्य है । तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्माको प्राप्त करानेवाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है । वर्णाश्रमियोंके ये तीन गुरु होते हैं || ३२ || मेरे प्यारे मित्र! गुरुके स्वरूपमें स्वयं मैं हूँ । इस जगत्में वर्णाश्रमियोंमें जो लोग अपने गुरुदेवके उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थके सच्चे जानकार हैं ॥ ३३ ॥ प्रिय मित्र! मैं सबका आत्मा
हूँ, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हूँ। मैं गृहस्थके धर्म पंचमहायज्ञ आदिसे, ब्रह्मचारीके धर्म उपनयन- वेदाध्ययन आदिसे, वानप्रस्थीके धर्म तपस्यासे और सब ओरसे उपरत हो जाना — इस संन्यासीके धर्मसे भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेवकी सेवा-शुश्रूषासे सन्तुष्ट होता हूँ ॥ ३४ ॥
स वै सत्कर्मणां साक्षाद् द्विजातेरिह सम्भवः ।
आद्योऽङ्ग यत्राश्रमिणां यथाहं ज्ञानदो गुरुः ॥३२
नन्वर्थकोविदा ब्रह्मन् वर्णाश्रमवतामिह ।
ये मया गुरुणा वाचा तरन्त्यंजो भवार्णवम् ॥३३
नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा ।
तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा ॥३४
अपि नः स्मर्यते ब्रह्मन् वृत्तं निवसतां गुरौ ।
गुरुदारैश्चोदितानामिन्धनानयने क्वचित् ॥३५
प्रविष्टानां महारण्यमपर्ती सुमहद् द्विज ।
वातवर्षमभूत्तीव्रं निष्ठुराः स्तनयित्नवः ॥ ३६
सूर्यश्चास्तं गतस्तावत् तमसा चावृता दिशः ।
निम्नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किंचन ॥३७
वयं भृशं तत्र महानिलाम्बुभि- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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र्निहन्यमाना मुहुरम्बुसम्प्लवे । दिशोऽविदन्तोऽथ परस्परं वने गृहीतहस्ताः परिबभ्रिमातुराः ॥ ३८
एतद् विदित्वा उदिते रवौ सान्दीपनिर्गुरुः ।
अन्वेषमाणो नः शिष्यानाचार्योऽपश्यदातुरान् ॥३९
ब्रह्मन्! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे; उस समयकी वह बात आपको याद है क्या, जब हम दोनोंको एक दिन हमारी गुरुपत्नीने ईंधन लानेके लिये जंगलमें भेजा था ॥३५ ॥ उस समय हमलोग एक घोर जंगलमें गये हुए थे और बिना ऋतुके ही बड़ा
भयंकर आँधी- पानी आ गया था । आकाशमें बिजली कड़कने लगी थी ॥ ३६ ॥ तबतक
सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा - ही - अँधेरा फैल गया । धरतीपर इस प्रकार पानी- ही- पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था ॥ ३७ ॥
वह वर्षा क्या थी, एक छोटा- मोटा प्रलय ही था । आँधीके झटकों और वर्षाकी बौछारोंसे हमलोगोंको बड़ी पीड़ा हुई, दिशाका ज्ञान न रहा । हमलोग अत्यन्त आतुर हो गये और एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जंगलमें इधर- उधर भटकते रहे ॥ ३८ ॥ जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि
मुनिको इस बातका पता चला, तब वे सूर्योदय होनेपर अपने शिष्य हमलोगोंको ढूँढ़ते हुए जंगलमें पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं ॥ ३ ९ ॥ वे कहने लगे —'आश्चर्य है, आश्चर्य है! पुत्रो! तुमलोगोंने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया । सभी प्राणियोंको अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवामें ही संलग्न रहे || ४० || गुरुके ऋणसे मुक्त होनेके लिये सत्- शिष्योंका इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भावसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेवकी सेवामें समर्पित कर दें ॥४१ ॥ द्विज- शिरोमणियो! मैं तुमलोगोंसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी
अभिलाषाएँ पूर्ण हों और तुमलोगोंने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोकमें कहीं भी निष्फल न हो' ॥ ४२ ॥ प्रिय मित्र! जिस समय
हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे, हमारे जीवनमें ऐसी -ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं । इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्तिका अधिकारी होता और पूर्णताको प्राप्त करता है ॥४३ ॥
अहो हे पुत्रका यूयमस्मदर्थेऽतिदुःखिताः ।
आत्मा वै प्राणिनां प्रेष्ठस्तमनादृत्य मत्पराः ॥४०
एतदेव हि सच्छिष्यैः कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम् ।
यद् वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ ॥ ४१
तुष्टोऽहं भो द्विजश्रेष्ठाः सत्याः सन्तु मनोरथाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च ॥४२
इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मसु ।
गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये ॥ ४३
ब्राह्मण उवाच
किमस्माभिरनिर्वृत्तं देवदेव जगद्गुरो ।
भवता सत्यकामेन येषां वासो गुरावभूत् ॥४४
यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो ।
श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम् ॥४५
ब्राह्मणदेवताने कहा- देवताओंके आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुलमें रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था ॥४४ ॥ प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध
पुरुषार्थके मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर । वही आप वेदाध्ययनके लिये गुरुकुलमें निवास करें, यह मनुष्य- लीलाका अभिनय नहीं तो और क्या है? ॥४५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे श्रीदामचरितेऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
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अथैकाशीतितमोऽध्यायः सुदामाजीको ऐश्वर्यकी प्राप्ति श्रीशुक उवाच
स इत्थं द्विजमुख्येन सह संकथयन् हरिः ।
सर्वभूतमनोऽभिज्ञः स्मयमान उवाच तम् ॥१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात जानते हैं । वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, उनके क्लेशोंके नाशक तथा संतोंके एकमात्र आश्रय हैं । वे पूर्वोक्त प्रकारसे उन ब्राह्मणदेवताके साथ बहुत देरतक बातचीत करते रहे । अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मणसे तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले । उस समय भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण - देवताकी ओर प्रेमभरी दृष्टिसे देख रहे थे ॥१-२ ॥
ब्रह्मण्यो ब्राह्मणं कृष्णो भगवान् प्रहसन् प्रियम् ।
प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रेक्षन् खलु सतां गतिः ॥२
श्रीभगवानुवाच किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात् ।
अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत् ।
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते ॥३
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥४
इत्युक्तोऽपि द्विजस्तस्मै व्रीडितः पतये श्रियः ।
पृथुकप्रसृतिं राजन् न प्रायच्छदवाङ्मुखः ॥५
सर्वभूतात्मदृक् साक्षात् तस्यागमनकारणम् ।
विज्ञायाचिन्तयन्नायं श्रीकामो माभजत्पुरा ॥६
पत्न्याः पतिव्रतायास्तु सखा प्रियचिकीर्षया ।
प्राप्तो मामस्य दास्यामि सम्पदोऽमर्त्यदुर्लभाः ॥७
इत्थं विचिन्त्य वसनाच्चीरबद्धान्द्विजन्मनः ।
स्वयं जहार किमिदमिति पृथुकतण्डुलान् ॥८
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नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे ।
तर्पयन्त्यंग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुलाः ॥९
इति मुष्टिं सकृज्जग्ध्वा द्वितीयां जग्धुमाददे ।
तावच्छ्रीर्जगृहे हस्तं तत्परा परमेष्ठिनः ॥१०
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- ' ब्रह्मन्! आप अपने घरसे मेरे लिये क्या उपहार लाये हैं? मेरे प्रेमी भक्त जब प्रेमसे थोड़ी - सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते हैं तो वह मेरे लिये बहुत हो जाती है । परन्तु मेरे अभक्त यदि बहुत- सी सामग्री भी मुझे भेंट करते हैं तो उससे मैं सन्तुष्ट नहीं होता ॥३ ॥ जो पुरुष प्रेम- भक्तिसे फल- फूल अथवा पत्ता- पानीमेंसे कोई भी वस्तु मुझे
समर्पित करता है, तो मैं उस शुद्धचित्त भक्तका वह प्रेमोपहार केवल स्वीकार ही नहीं करता, बल्कि तुरंत भोग लगा लेता हूँ' ॥४ ॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर भी उन
ब्राह्मणदेवताने लज्जावश उन लक्ष्मीपतिको वे चार मुट्ठी चिउड़े नहीं दिये । उन्होंने संकोचसे अपना मुँह नीचे कर लिया था । परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयका एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं । उन्होंने ब्राह्मणके आनेका कारण, उनके हृदयकी बात जान ली । अब वे विचार करने लगे कि ' एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मीकी कामनासे मेरा भजन नहीं किया है । इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्नीको प्रसन्न करनेके लिये उसीके आग्रहसे यहाँ आया है । अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है' ॥५-७ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा विचार करके उनके वस्त्रमेंसे चिथड़ेकी एक पोटलीमें बँधा हुआ चिउड़ा ' यह क्या है' - ऐसा कहकर स्वयं ही छीन लिया || ८ || और बड़े आदरसे कहने लगे – ' प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो । ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं ' ॥९ ॥ ऐसा कहकर वे उसमेंसे एक मुट्ठी चिउड़ा खा गये और दूसरी
मुट्ठी ज्यों ही भरी, त्यों ही रुक्मिणीके रूपमें स्वयं भगवती लक्ष्मीजीने भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया! क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान्के परायण हैं, उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं ॥१० ॥
एतावतालं विश्वात्मन् सर्वसम्पत्समृद्धये ।
अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन् पुंसस्त्वत्तोषकारणम् ॥११
ब्राह्मणस्तां तु रजनीमुषित्वाच्युतमन्दिरे ।
भुक्त्वा पीत्वा सुखं मेने आत्मानं स्वर्गतं यथा ॥१२
श्वोभूते विश्वभावेन स्वसुखेनाभिवन्दितः ।
जगाम स्वालयं तात पथ्यनुव्रज्य नन्दितः ॥१३
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स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्न तु याचितवान् स्वयम् ।
स्वगृहान् व्रीडितोऽगच्छन्महद्दर्शननिर्वृतः ॥१४
अहो ब्रह्मण्यदेवस्य दृष्टा ब्रह्मण्यता मया ।
यद् दरिद्रतमो लक्ष्मीमाश्लिष्टो बिभ्रतोरसि ॥१५
क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः ।
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥१६
निवासितः प्रियाजुष्टे पर्यंके भ्रातरो यथा ।
महिष्या वीजितः श्रान्तो वालव्यजनहस्तया ॥१७
शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभिः ।
पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत् ॥ १८
स्वर्गापवर्गयोः पुंसां रसायां भुवि सम्पदाम् ।
सर्वासामपि सिद्धीनां मूलं तच्चरणार्चनम् ॥१९
अधनोऽयं धनं प्राप्य माद्यन्नुच्चैर्न मां स्मरेत् ।
इति कारुणिको नूनं धनं मेऽभूरि नाददात् ॥२०
रुक्मिणीजीने कहा— ' विश्वात्मन्! बस, बस । मनुष्यको इस लोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्नताका हेतु बन जाता है ' ॥११ ॥
परीक्षित्! ब्राह्मणदेवता उस रातको भगवान् श्रीकृष्णके महलमें ही रहे । उन्होंने बड़े आरामसे वहाँ खाया - पिया और ऐसा अनुभव किया, मानो मैं वैकुण्ठमें ही पहुँच गया हूँ ॥१२ ॥ परीक्षित्! श्रीकृष्णसे ब्राह्मणको प्रत्यक्षरूपमें कुछ भी न मिला । फिर भी उन्होंने
उनसे कुछ माँगा नहीं! वे अपने चित्तकी करतूतपर कुछ लज्जित- से होकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनजनित आनन्दमें डूबते - उतराते अपने घरकी ओर चल पड़े ॥१३-१४ ॥ वे मन-ही -मन सोचने लगे— ' अहो, कितने आनन्द और आश्चर्यकी बात है! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी ब्राह्मणभक्ति आज मैंने अपनी आँखों देख ली । धन्य है! जिनके वक्षःस्थलपर स्वयं लक्ष्मीजी सदा विराजमान रहती हैं, उन्होंने मुझ अत्यन्त दरिद्रको अपने हृदयसे लगा लिया ॥१५ ॥ कहाँ तो मैं अत्यन्त पापी और दरिद्र, और कहाँ
लक्ष्मीके एकमात्र आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण! परन्तु उन्होंने ' यह ब्राह्मण है ’ — ऐसा समझकर मुझे अपनी भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया ॥ १६॥ इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे उस
पलंगपर सुलाया, जिसपर उनकी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी शयन करती हैं । मानो मैं उनका सगा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भाई हूँ! कहाँतक कहूँ? मैं थका हुआ था, इसलिये स्वयं उनकी पटरानी रुक्मिणीजीने अपने हाथों चँवर डुलाकर मेरी सेवा की ॥१७ ॥ ओह, देवताओंके आराध्यदेव होकर भी
ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले प्रभुने पाँव दबाकर, अपने हाथों खिला- पिलाकर मेरी अत्यन्त सेवा- शुश्रूषा की और देवताके समान मेरी पूजा की || १८ || स्वर्ग, मोक्ष, पृथ्वी और रसातलकी सम्पत्ति तथा समस्त योगसिद्धियोंकी प्राप्तिका मूल उनके चरणोंकी पूजा ही है ॥१९ ॥ फिर भी परमदयालु श्रीकृष्णने यह सोचकर मुझे थोड़ा-सा भी धन नहीं दिया कि
कहीं यह दरिद्र धन पाकर बिलकुल मतवाला न हो जाय और मुझे न भूल बैठे ' ॥२० ॥
इति तच्चिन्तयन्नन्तः प्राप्तो निजगृहान्तिकम् ।
सूर्यानलेन्दुसंकाशैर्विमानैः सर्वतो वृतम् ॥२१
विचित्रोपवनोद्यानैः कूजद्विजकुलाकुलैः ।
प्रोत्फुल्लकुमुदाम्भोजकारोत्पलवारिभिः ॥ २२
जुष्टं स्वलंकृतैः पुम्भिः स्त्रीभिश्च हरिणाक्षिभिः ।
किमिदं कस्य वा स्थानं कथं तदिदमित्यभूत् ॥२३
एवं मीमांसमानं तं नरा नार्योऽमरप्रभाः ।
प्रत्यगृह्णन् महाभागं गीतवाद्येन भूयसा ॥२४
पतिमागतमाकर्ण्य पत्न्युद्धर्षातिसम्भ्रमा ।
निश्चक्राम गृहात्तूर्णं रूपिणी श्रीरिवालयात् ॥२५
पतिव्रता पतिं दृष्ट्वा प्रेमोत्कण्ठाश्रुलोचना ।
मीलिताक्ष्यनमद् बुद्धया मनसा परिषस्वजे ॥२६
पत्नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वैमानिकीमिव ।
दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्तीं स विस्मितः ॥२७
प्रीतः स्वयं तया युक्तः प्रविष्टो निजमन्दिरम् ।
मणिस्तम्भशतोपेतं महेन्द्रभवनं यथा ॥२८
पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः ।
पर्यंका हेमदण्डानि चामरव्यजनानि च ॥ २९
इस प्रकार मन-ही- मन विचार करते - करते ब्राह्मणदेवता अपने घरके पास पहुँच गये । वे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******