स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 101–110

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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* • विष्णुस्तोत्राणि * ९ १

दीने तथा न करुणा मुदिता च पुण्ये ।

पापेऽनुपेक्षणवतो मम मुत्कथं स्यात्तस्मात् ॰ ॥। १३ ॥

नेत्रादिकं मम बहिर्विषयेषु सक्तं

नान्तर्मुखं भवति तानविहाय तस्य ।

क्वान्तर्मुखत्वमपहाय सुखस्य वार्ता । तस्मात् ॰ ॥ १४ ॥

त्यक्तं गृहाद्यपि मया भवतापशान्त्यै

नासीदसौ हृतहृदो मम मायया ते ।

सा चाधुना किमु विधास्यति नेति जाने । तस्मात् ॥ १५ ॥

प्राप्ता धनं गृहकुटुम्बगजाश्वदारा

राज्यं यदैहिकमठेन्द्रपुरश्च नाथ ।

सर्वं विनश्वरमिदं न फलाय कस्मै । तस्मात् ॥ १६ ॥

मित्रता नहीं है और मैंने न तो कभी दीनोंपर दया दिखायी और न कभी पुण्यके विषयमें प्रसन्नता ही प्रकट की । जब मैंने पापमें उपेक्षा नहीं दिखायी तो मुझे प्रसन्नता कैसे मिले? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १३ ॥ हे भगवन्! मेरी नेत्रादि इन्द्रियाँ बाह्य - विषयोंमें ही आसक्त हैं,

इनकी वृत्ति अन्तर्मुखी नहीं होती, भला विषयोंको त्यागे बिना ही इन्द्रियोंमें अन्तर्मुखता कहाँसे होगी? और इन्द्रियोंके अन्तर्मुख हुए बिना सुखकी वार्ता कहाँ? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १४ ॥ हे

! मैंने सांसारिक दुःखोंकी शान्तिके लिये स्त्री - गृह आदि सबका भगवन् कर दिया, किन्तु आपकी मायाने मेरे मनको हर लिया, इससे परित्याग शान्ति नहीं हुई । अब समझमें नहीं आता इस समय आपकी माया दुःखोंकी क्या - क्या करेगी? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण और हैं! प्राप्त हुए धन, गृह, परिवार, हाथी एवं घोड़े, स्त्री आदि ॥ १५ ॥ हे प्रभो ये सब वस्तुएँ नश्वर हैं, किसी भी

तथा इस पृथ्वी अथवा इन्द्रपुरीका राज्य-

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९ २ * स्तोत्ररत्नावली * KKKKKKKKKKKK ************* प्राणान्निरुध्य विधिना न कृतो हि योगो

योगं विनास्ति मनसः स्थिरता कुतो मे ।

तां वै विना मम न चेतसि शान्तिवार्ता । तस्मात् ॰ ॥ १७ ॥

ज्ञानं यथा मम भवेत्कृपया गुरूणां

सेवां तथा न विधिनाकरवं हि तेषाम् ।

सेवापि साधनतयाविदितास्ति चित्ते । तस्मात् ॰ ॥ १८ ॥

तीर्थादिसेवनमहो विधिना हि नाथ

नाकारि येन मनसो मम शोधनं स्यात् ।

शुद्धिं विना न मनसोऽवगमापवर्गौ । तस्मात् ॰ ॥ १ ९ ॥

वेदान्तशीलनमपि प्रमितिं करोति अच्छे फलको देनेवाली नहीं हैं; इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १६ ॥ हे भगवन्! मैंने प्राणायामके द्वारा योग ( ध्यान ) नहीं

किया; बिना योगके मेरा मन स्थिर कैसे हो सकता है और स्थिरताके बिना चित्तमें शान्ति कथनमात्रके लिये भी नहीं हो सकती, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १७ ॥ हे भगवन्! मैंने गुरुजनोंकी ऐसी सेवा भी कभी

नहीं की, जिससे उनकी कृपा प्राप्त होकर उसके द्वारा मुझमें यथावत् ज्ञान होता, गुरुजनोंकी सेवा भी ज्ञानका साधन है ऐसा मैंने कभी मनमें जाना ही नहीं, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १८ ॥ हे नाथ! यह

दुःखकी बात है कि मैंने विधिसे तीर्थ आदिका सेवन नहीं किया, जिससे मेरे मनकी शुद्धि हो, मनकी शुद्धिके बिना ज्ञान और मोक्ष नहीं होते; इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १ ९ ॥ हे प्रभो! आत्मा ही ब्रह्म है, इसके यथार्थ ज्ञानके साधनमें लगे हुए पुरुषको वेदान्त ब्रह्मतत्त्वका

पृष्ठ 103

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* विष्णुस्तोत्राणि * ९ ३ ब्रह्मात्मनः प्रमितिसाधनसंयुतस्य नैवास्ति साधनलवो मयि नाथ तस्यास्तस्मात् ॥ २० ॥

गोविन्द शङ्कर हरे गिरिजेश मेश शम्भो जनार्दन गिरीश मुकुन्द नान्या गतिर्मम कथञ्चन वां विहाय तस्मात्प्रभो मम गतिः कृपया एवं स्तवं भगवदाश्रयणाभिधानं ये मानवाः प्रतिदिनं प्रणताः ते मानवाः भवरतिं परिभूय शान्तिं

साम्ब ।

विधेया ॥ २१ ॥

पठन्ति ।

गच्छन्ति किं च परमात्मनि भक्तिमद्धा ॥ २२ ॥

इति श्रीब्रह्मानन्दविरचितं भगवच्छरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् । यथावत् ज्ञान करा देता है, परन्तु मुझमें तो उस सत्य ज्ञानके साधनका अंशमात्र भी नहीं है, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ २० ॥ हे गोविन्द! हे शङ्कर! हे हरे! हे गिरिजापते! हे लक्ष्मीपते!

हे शम्भो! हे जनार्दन! हे पार्वती माताके सहित गिरीश! हे मुकुन्द! मेरे लिये आप दोनों ( इष्टदेवों ) के अतिरिक्त किसी प्रकार कोई भी दूसरा सहारा नहीं है, इसलिये हे प्रभो! कृपा करके मुझे सद्गति प्रदान कीजिये ॥ २१ ॥ जो

विनीतभावसे इस भगवच्छरण नामक स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करेंगे वे संसारकी मनुष्य आसक्ति त्यागकर परमशान्ति और परमात्माकी साक्षात् भक्ति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥

पृष्ठ 104

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९ ४ * स्तोत्ररत्नावली * ३२ – मङ्गलगीतम् श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल कलितललितवनमाल जय जय देव दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन मुनिजनमानसहंस जय जय देव कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव अमलकमलदललोचन भवमोचन त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव

ए ।

हरे ॥ १ ॥

ए ।

हरे ॥ २ ॥

ए ।

हरे ॥ ३ ॥

ए ।

हरे ॥ ४ ॥

ए ।

हरे ॥ ५ ॥

लक्ष्मीजीके कुचकुम्भोंका आश्रय करनेवाले, कुण्डलधारी और अति मनोहर वनमालाधारी हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ १ ॥ सूर्यमण्डलको

सुशोभित करनेवाले, भवभयके नाशक और मुनियोंके मनरूप सरोवरके हंस हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ २ ॥ कालियनागका दमन

करनेवाले, भक्तोंको आनन्दित करनेवाले एवं यदुकुलकमलदिवाकर हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ ३ ॥ मधु, मुर और नरकासुरके संहारकर्ता,

गरुडवाहन, देवताओंकी क्रीडाके आश्रय हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ ४ ॥ निर्मल कमलदलके समान नेत्रोंवाले, भवबन्धनको काटनेवाले

एवं त्रिभुवनके आश्रयभूत हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ ५ ॥

पृष्ठ 105

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विष्णुस्तोत्राणि 2 / ९ ५ जनकसुताकृत भूषण जितदूषण समरशमितदशकण्ठ जय जय देव अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव तव चरणे प्रणता वयमिति भावय कुरु कुशलं प्रणतेषु जय जय देव श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मङ्गलमञ्जुलगीतं जय जय

ए ।

हरे ॥ ६ ॥

ए ।

हरे ॥ ७ ॥

ए ।

हरे ॥ ८ ॥

मुदम् ।

हरे ॥ ९ ॥

इति श्रीजयदेवविरचितं मङ्गलगीतं सम्पूर्णम् । सीताके साथ शोभा पानेवाले, दूषण दैत्यको जीतनेवाले और युद्धमें रावणको मारनेवाले हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ ६ ॥ नवीन

मेघके समान श्यामसुन्दर, मन्दराचलको धारण करनेवाले और लक्ष्मीजीके मुखचन्द्रके लिये चकोररूप हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ ७ ॥

आपके चरणोंकी हम शरण लेते हैं, आप भी इधर दया दृष्टि कीजिये और शरणागतोंका कल्याण कीजिये । हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हम हो ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रीजयदेव कविका बनाया हुआ यह मङ्गलमय मधुर

गीत भक्तोंको आनन्द देनेवाला है । हे देव! हे हरे! आपकी जय हो, जय हो ॥ ९ ॥

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९ ६ * स्तोत्ररत्नावली * KKKKKKKKKKKK ******************* ३३ - श्रीदशावतारस्तोत्रम् प्रलयपयोधिजले धृतवानसि विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ॥ केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ॥ केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश वसति दशनशिखरे धरणी तव शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना ॥ केशव धृतसूकररूप जय जगदीश

वेदम् ।

हरे ॥ १ ॥

पृष्ठे ।

हरे ॥ २ ॥

लग्ना ।

हरे || ३ ॥

तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् ।

दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ॥

केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४ ॥

हे मीनावतारधारी केशव! हे जगदीश्वर! हे हरे! प्रलयकालमें बढ़े हुए समुद्रजलमें बिना क्लेश नौका चलानेकी लीला करते हुए आपने वेदोंकी रक्षा की थी, आपकी जय हो ॥ १ ॥ हे केशव! पृथ्वीके धारण करनेके चिह्नसे

कठोर और अत्यन्त विशाल तुम्हारी पीठपर पृथ्वी स्थित है, ऐसे कच्छपरूपधारी जगत्पति आप हरिकी जय हो ॥ २ ॥ चन्द्रमामें निमग्न हुई

कलङ्करेखाके समान यह पृथ्वी आपके दाँतकी नोकपर अटकी हुई सुशोभित हो रही है, ऐसे सूकररूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो ॥ ३ ॥

हिरण्यकशिपुरूपी तुच्छ भृङ्गको चीर डालनेवाले विचित्र नुकीले नख आपके

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* विष्णुस्तोत्राणि Ek ९ ७ *****

छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।

पदनखनीरजनितजनपावन ॥

केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥ ५ ॥

क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।

स्त्रपयसि पयसि शमितभवतापम् ॥

केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥ ६ ॥

वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।

दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ॥

केशव धृतरघुपतिवेष जय जगदीश हरे ॥ ७ ॥

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।

हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ॥

केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥ ८ ॥

करकमलमें हैं, ऐसे नृसिंहरूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो ॥ ४ ॥ हे

आश्चर्यमय वामनरूपधारी केशव! आपने पैर बढ़ाकर राजा बलिको छला तथा अपने चरण - नखोंके जलसे लोगोंको पवित्र किया, ऐसे आप जगत्पति हरिकी जय हो ॥ ५ ॥ हे केशव! आप जगत्के ताप और पापोंका नाश करते

हुए, उसे क्षत्रियोंके रुधिररूप जलसे स्नान कराते हैं, ऐसे आप परशुरामरूपधारी जगत्पति हरिकी जय हो ॥ ६ ॥ जो युद्धमें सब दिशाओंमें

लोकपालोंको प्रसन्न करनेवाली, रावणके सिरकी सुन्दर बलि देते हैं, ऐसे श्रीरामावतारधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥ ७ ॥ जो अपने

गौर शरीरमें हलके भयसे आकर मिली हुई यमुना और मेघके सदृश नीलाम्बर धारण किये रहते हैं, ऐसे आप बलरामरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी

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९ ८ * स्तोत्ररत्नावली निन्दसि यज्ञविधेरहह सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ॥ केशव धृतबुद्धशरीर जय म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥ केशव धृतकल्किशरीर जय श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ॥ केशव धृतदशविधरूप जय * ************

श्रुतिजातम् ।

जगदीश हरे ॥ ९ ॥

करवालम् ।

जगदीश हरे ॥ १० ॥

जगदीश हरे ॥ ११ ॥

इति श्रीजयदेवविरचितं श्रीदशावतारस्तोत्रं सम्पूर्णम् । जय हो ॥ ८ ॥ सदय हृदयसे पशुहत्याकी कठोरता दिखाते हुए

यज्ञविधानसम्बन्धी श्रुतियोंकी निन्दा करनेवाले आप बुद्धरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥ ९ ॥ जो म्लेच्छसमूहका नाश करनेके लिये

धूमकेतुके समान अत्यन्त भयंकर तलवार चलाते हैं, ऐसे कल्किरूपधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥ १० ॥ [ हे भक्तो! ] इस जयदेव

कविकी कही हुई मनोहर, आनन्ददायक, कल्याणमय तत्त्वरूप स्तुतिको सुनो, हे दशावतारधारी! जगत्पति, हरि केशव! आपकी जय हो ॥ ११ ॥

पृष्ठ 109

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* विष्णुस्तोत्राणि * ९९ ३४- ध्रुवकृतभगवत्स्तुतिः ध्रुव उवाच योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना । अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥ १ ॥

एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम् । सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु नानेव दारुषु विभावसुवद् विभासि ॥ २ ॥

त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः । ध्रुवजी बोले- जो सर्वशक्तिसम्पन्न श्रीहरि मेरे अन्तःकरणमें प्रवेशकर अपने तेजसे मेरी इस सोयी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान और त्वचा आदि अन्य इन्द्रियोंको भी चैतन्य प्रदान करते हैं, वे अन्तर्यामी भगवान् आप ही हैं, आपको प्रणाम है ॥ १ ॥ भगवन्! आप अकेले ही अपनी

अनन्त गुणमयी मायाशक्तिसे इस महदादि सम्पूर्ण जगत्को रचकर उसके इन्द्रियादि असत् गुणोंमें जीवरूपसे अनुप्रविष्ट हो इस प्रकार अनेकवत् भासते हैं, जैसे नाना प्रकारके काष्ठोंमें प्रकट हुई आग अपनी उपाधिजाके अनुसार भिन्न - भिन्न रूपसे भासती है ॥ २ ॥ हे नाथ! ब्रह्माजीने भी आपकी शरणमें

आकर आपके दिये हुए ज्ञानके प्रभावसे इस जगत्‌को सोकर उठे हुए पुरुषके समान देखा था । हे दीनबन्धो! मुक्त पुरुषोंके भी आश्रय करनेयोग्य

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१०० * स्तोत्ररत्नावली * फ्रतस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं विस्मर्य कृतविदा कथमार्तबन्धो ॥ ३ ॥

नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया

ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः ।

अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य-मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नृणाम् ॥ ४ ॥

या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-ध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥ ५ ॥

भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्गो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् । आपके चरणोंको कृतज्ञ पुरुष कैसे भूल सकता है? || ३ || जिनके संसर्गसे होनेवाला सुख नरकतुल्य योनिमें भी प्राप्त हो सकता है, उन शवतुल्य शरीरसे भोगे जानेयोग्य विषयोंकी जो पुरुष इच्छा करते हैं और जो जन्म - मरणरूप संसारसे छुड़ानेवाले कल्पवृक्षरूप आपकी मोक्षके सिवा किसी और हेतुसे उपासना करते हैं, अवश्य ही उनकी बुद्धिको आपकी मायाने ठग लिया है ॥ ४ ॥ आपके चरणकमलोंका ध्यान करनेसे अथवा आपके भक्तोंकी

कथाएँ सुननेसे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, वह अपने स्वरूपभूत ब्रह्ममें भी नहीं मिल सकता है; फिर जिनको कालकी तलवार खण्डित कर डालती है, उन स्वर्गके विमानोंसे गिरनेवाले पुरुषोंको तो वह मिल ही कैसे सकता है ॥ ५॥ अतः हे अनन्त! आपमें निरन्तर भक्तिभाव रखनेवाले