स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 111–120

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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* विष्णुस्तोत्राणि * १०१ येनाञ्जसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः ॥ ६ ॥

ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः । ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द-सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-मर्त्यादिभिः परिचितं रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं नातः परं परम वेद्मि कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृह्णन् कृतप्रसङ्गाः ॥ ७ ॥

सदसद्विशेषम् ।

न यत्र वादः ॥ ८ ॥

शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्के । शुद्धचित्त महापुरुषोंसे ही मेरा बारंबार समागम हो, जिससे मैं आपके गुणोंके कथामृतका पान करनेसे उन्मत्त होकर अति उग्र और नाना प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण इस संसार - सागरको सुगमतासे ही पार कर लूँ ॥ ६ ॥ हे कमलनाभ!

आपके चरणकमलोंकी सुगन्धमें जिनका चित्त लुभाया हुआ है, उन महापुरुषोंका जो लोग समागम करते हैं, हे ईश! वे अपने इस अत्यन्त प्रिय शरीर और इसके सम्बन्धी पुत्र, मित्र, गृह और स्त्री आदिका स्मरण भी नहीं करते ॥ ७॥ हे अज! मैं तो पशु आदि तिर्यग्योनि, पर्वत, पक्षी, सर्प,

देवता, दैत्य और मनुष्य आदिसे परिपूर्ण तथा महत्तत्त्वादि अनेकों कारणोंसे आपके इस सदसत्स्वरूप स्थूल शरीरको ही जानता हूँ । इसके परे जो सम्पादित स्वरूप है, जिसमें वाणीकी गति नहीं है, उसको मैं नहीं आपका जानता ॥ परम ८ ॥ हे नाथ! कल्पके अन्तमें जो स्वयंप्रकाश परमपुरुष भगवान् इस

पृष्ठ 112

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१०२ * स्तोत्ररत्नावली * यन्नाभिसिन्धुरुहकाञ्चनलोकपद्म-गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै ॥ ९ ॥

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा कूटस्थ आदिपुरुषो भगवास्त्रयधीशः । यद् बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥ १० ॥

यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति

विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् ।

तद् ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य-मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥ ११ ॥

सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें लीन करके शेषनागका सहारा ले उनकी गोदमें शयन करते हैं तथा जिनके नाभिसिन्धुसे प्रकट हुए सकल लोकोंके उत्पत्तिस्थान सुवर्णमय कमलसे परम तेजोमय ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं आप परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥ हे प्रभो! आप जीवात्मासे भिन्न

अर्थात् पुरुषोत्तम हैं; क्योंकि आप नित्यमुक्त, नित्यशुद्ध, चेतन, आत्मा, निर्विकार, आदिपुरुष, षडैश्वर्यसम्पन्न, तीनों लोकोंके स्वामी और अपनी दृष्टिसे बुद्धिकी अवस्थाओंको अखण्डरूपसे देखनेवाले हैं । संसारकी स्थितिके लिये ही आप यज्ञपुरुष श्रीविष्णुभगवान् के रूपसे स्थित हैं ॥ १० ॥ जिनसे विद्या,

अविद्या आदि विरुद्ध गतियोंवाली अनेक शक्तियाँ क्रमशः अहर्निश प्रकट होती हैं, उन विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले एक, अनन्त, आद्य, आनन्दमात्र एवं निर्विकार ब्रह्मकी मैं शरण लेता हूँ ॥११ ॥

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* • विष्णुस्तोत्राणि: * १०३ सत्याऽऽशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म-माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः । अप्येवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥ १२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे चतुर्थस्कन्धे नवमेऽध्याये ध्रुवकृत भगवत्स्तुतिः सम्पूर्णा । ३५ - श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रम् श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे भोगीन्द्रभोगमणिरञ्जितपुण्यमूर्ते योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १ ॥

हे भगवन्! ‘ आप परम पुरुषार्थस्वरूप हैं ' ऐसा समझकर जो निष्काम-भावसे निरन्तर आपका भजन करते हैं, उन श्रेष्ठ भक्तोंके लिये राज्यादि भोगोंकी अपेक्षा पुरुषार्थस्वरूप आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति ही भजनका यथार्थ फल है । यद्यपि यही ठीक है तो भी गौ जैसे अपने तुरंतके जन्मे हुए बछड़ेको दूध पिलाती और व्याघ्रादिसे बचाती है, उसी प्रकार भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सदा विकल रहनेवाले आप हम - जैसे सकाम भक्तोंको भी हमारी कामना पूर्ण करके संसारसागरसे बचाते हैं ॥ १२ ॥

= हे अति शोभायमान क्षीरसमुद्रमें निवास करनेवाले, हाथमें चक्र धारण

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१०४ * स्तोत्ररत्नावली *

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।

लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस । लक्ष्मी ॰ ॥ २ ॥

संसारघोरगहने चरतो मुरारे मारोग्रभीकरमृगप्रवरार्दितस्य

आर्तस्य मत्सरनिदाघनिपीडितस्य । लक्ष्मी ॰ ॥ ३ ॥

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं

सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।

दीनस्य देव कृपणापदमागतस्य । लक्ष्मी ॰ ॥ ४ ॥

करनेवाले, नागनाथ ( शेषजी ) के फणोंकी मणियोंसे देदीप्यमान मनोहर मूर्तिवाले! हे योगीश! हे सनातन! हे शरणागतवत्सल! हे संसारसागरके लिये नौकास्वरूप! श्रीलक्ष्मीनृसिंह! मुझे अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ १॥ आपके अमल चरणकमल ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मरुत् और सूर्य

आदिके किरीटोंकी कोटियोंके समूहसे अति देदीप्यमान हो रहे हैं । हे श्रीलक्ष्मीजीके कुचकमलके राजहंस श्रीलक्ष्मीनृसिंह! मुझे अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ २ ॥ हे मुरारे! संसाररूप गहन वनमें विचरते

हुए कामदेवरूप अति उग्र और भयानक मृगराजसे पीड़ित तथा मत्सररूप घामसे सन्तप्त अति आर्तको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ३॥ संसाररूप अति भयानक और अगाध कूपके मूलमें पहुँचकर

जो सैकड़ों प्रकारके दुःखरूप सर्पोंसे व्याकुल और अत्यन्त दीन हो रहा है, उस अति कृपण और आपत्तिग्रस्त मुझको हे लक्ष्मीनृसिंहदेव! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ४ ॥

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* विष्णुस्तोत्राणि * १०५ संसारसागरविशालकरालकाल-नक्रग्रहग्रसननिग्रहविग्रहस्य व्यग्रस्य रागरसनोर्मिनिपीडितस्य लक्ष्मी ० ॥ ५ ॥

संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-शाखाशतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।

आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो । लक्ष्मी ॰ ॥ ६ ॥

संसारसर्पघनवक्त्रभयोग्रतीव्र-दंष्ट्राकरालविषदग्धविनष्टमूर्तेः

नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे । लक्ष्मी ० ॥ ७ ॥

संसारदावदहनातुरभीकरोरु-ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य त्वत्पादपद्मसरसीशरणागतस्य लक्ष्मी ० ॥ ८ ॥

संसारसागरमें अति कराल और महान् कालरूप नक्रों और ग्राहोंके ग्रसनेसे जिसका शरीर निगृहीत हो रहा है तथा आसक्ति और रसनारूप तरङ्गमालासे जो अति पीड़ित है, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ५ ॥ हे दयालो! पाप जिसका बीज है, अनन्त कर्म सैकड़ों शाखाएँ हैं,

इन्द्रियाँ पत्ते हैं, कामदेव पुष्प है तथा दुःख ही जिसका फल है, ऐसे संसाररूप वृक्षपर चढ़कर मैं नीचे गिर रहा हूँ, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ६ ॥ इस संसारसर्पके विकट मुखकी भयरूप

उग्र दाढ़ोंके कराल विषसे दग्ध होकर नष्ट हुए मुझको हे गरुडवाहन, क्षीरसागरशायी, शौरि श्रीलक्ष्मीनृसिंह! आप अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ७ ॥ संसाररूप दावानलके दाहसे अति आतुर और उसकी भयंकर

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१०६ * स्तोत्ररत्नावली * संसारजालपतितस्य जगन्निवास सर्वेन्द्रियार्तवडिशार्थझषोपमस्य

प्रोत्खण्डितप्रचुरतालुकमस्तकस्य । लक्ष्मी ० ॥ ९ ॥

संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-निष्पिष्टमर्मवपुषः सकलार्तिनाश ।

प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य लक्ष्मी ० ॥ १० ॥

अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य

चोरैः प्रभो बलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।

मोहान्धकूपकुहरे विनिपातितस्य । लक्ष्मी ० ॥। ११ ॥

तथा विशाल ज्वाला - मालाओंसे जिसके रोम - रोम दग्ध हो रहे हैं तथा जिसने आपके चरण - कमलरूप सरोवरकी शरण ली है, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ८ ॥ हे जगन्निवास! सकल इन्द्रियोंके

विषयरूप बंसी [ उसमें फँसने ] के लिये मत्स्यके समान संसारपाशमें पड़कर जिसके तालु और • मस्तक खण्डित हो गये हैं, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ९ ॥ हे सकलार्तिनाशन! संसाररूप

भयानक गजराजकी सूँड़के आघातसे जिसके मर्मस्थान कुचल गये हैं तथा जो प्राणप्रयाणके सदृश संसार ( जन्म - मरण ) के भयसे अति व्याकुल है, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ १० ॥ हे प्रभो!

इन्द्रिय नामक प्रबल चोरोंने जिसके विवेकरूप परम धनको हर लिया है तथा मोहरूप अन्धकूपके गड्ढेमें जो गिरा दिया गया है, ऐसे मुझ अन्धको हे लक्ष्मीनृसिंह! आप अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ११ ॥

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* विष्णुस्तोत्राणि * १०७ लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो वैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष । ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम् ॥ १२ ॥

यन्माययोर्जितवपुः प्रचुरप्रवाह-मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् । लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥। १३ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ३६ – प्रह्लादकृतनृसिंहस्तोत्रम् प्रह्राद उवाच ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः सत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहैः । हे लक्ष्मीपते! हे कमलनाभ! हे देवेश्वर! हे विष्णो! हे वैकुण्ठ! हे कृष्ण! हे मधुसूदन! हे कमलनयन! हे ब्रह्मण्य! हे केशव! हे जनार्दन! हे वासुदेव! हे देवेश! मुझ दीनको आप अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥१२ ॥ जिसका स्वरूप मायासे ही प्रकट हुआ है उस प्रचुर

संसारप्रवाहमें डूबे हुए पुरुषोंके लिये जो इस लोकमें अति बलवान् करावलम्बरूप है ऐसा यह सुखप्रद स्तोत्र इस पृथ्वीतलपर लक्ष्मीनृसिंहके चरणकमलके लिये मधुकररूप शङ्कर ( शङ्कराचार्यजी ) ने रचा है ॥ १३ ॥

प्रह्लादजी बोले — जिनकी बुद्धि एकमात्र सत्त्वगुणमें ही स्थित है, वे ब्रह्मादि देवगण तथा मुनि और सिद्धगण भी अपने वचनोंके प्रवाहसे, अनन्त

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१०८ * स्तोत्ररत्नावली * नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पित्रः किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातेः ॥ १ ॥

मन्ये धनाभिजनरूपतपः श्रुतौज-स्तेजःप्रभावबलपौरुषबुद्धियोगाः नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसो भक्त्या तुतोष भगवान् गजयूथपाय ॥ २ ॥

विप्राद्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।

मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ-प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ ३ ॥

नैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभपूर्णो मानं जनादविदुषः करुणो वृणीते । गुणोंके कारण अभीतक जिनकी आराधना नहीं कर सके, वे भगवान् हरि मुझ उग्रजातिमें उत्पन्न हुए दैत्यपर कैसे सन्तुष्ट हो सकते हैं? ॥ १ ॥ मेरा तो ऐसा

विचार है कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग- ये सभी गुण परम पुरुष श्रीहरिकी आराधनाके साधक नहीं हो सकते; और भक्तिसे तो वे गजेन्द्रपर भी प्रसन्न हो गये थे ॥२ ॥ जो ब्राह्मण उपर्युक्त बारह गुणोंसे युक्त है, किन्तु भगवान्

कमलनाभके चरणकमलोंसे विमुख है उससे तो मैं उस चाण्डालको श्रेष्ठ समझता हूँ जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण श्रीहरिमें लगा रखे हैं; वह अपने कुलको पवित्र कर देता है किन्तु अधिक सम्मानशाली ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता ॥ ३ ॥ ( इससे यह न समझना चाहिये कि भगवान्‌को

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* विष्णुस्तोत्राणि * १० ९ यद्यज्जनो भगवते विदधीत मानं तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः ॥ ४ ॥

तस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य सर्वात्मना महि गृणामि यथामनीषम् । नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन ॥ ५ ॥

सर्वे ह्यमी विधिकरास्तव सत्त्वधानो ब्रह्मादयो वयमिवेश न चोद्विजन्तः । क्षेमाय भूतय उतात्मसुखाय चास्य विक्रीडितं भगवतो रुचिरावतारैः ॥ ६ ॥

पूजाकी आवश्यकता है ) भगवान् तो आत्मलाभसे ही पूर्ण हैं, वे क्षुद्र पुरुषोंसे अपना मान कराना नहीं चाहते । केवल करुणावश ही वे अपने भक्तोंद्वारा की हुई परिचर्याको स्वीकार कर लेते हैं, ( इससे भी उन उपासकोंका ही लाभ है ) क्योंकि जिस प्रकार अपने मुखकी शोभा ( दर्पणादिमें प्रतीत होनेवाली ) प्रतिबिम्बको भी सुशोभित करती है, उसी प्रकार भक्त भगवान्‌के प्रति जो - जो मान प्रदर्शित करता है, वह ( भगवत्प्रतिबिम्बरूप ) उसे ही प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ अतः यद्यपि मैं नीच हूँ, तो भी निःशङ्क होकर अपने बुद्धिके अनुसार

सब प्रकार उन ईश्वरकी महिमाका वर्णन करता हूँ, जिसका वर्णन करनेसे, अविद्यावश संसारचक्रमें पड़ा हुआ जीव तत्काल पवित्र हो जाता है ॥ ५ ॥

हे ईश! ये ब्रह्मादिक समस्त देवगण सत्त्वस्वरूप आपकी आज्ञाका अनुवर्तन करनेवाले हैं; हम दैत्योंकी भाँति आपसे द्वेष करनेवाले नहीं हैं, और हे भगवन्! अपने मनोहर अवतारोंद्वारा आप जो - जो लीलाएँ करते हैं वे भी जगत्के कल्याण, उद्भव तथा आत्मानन्दके लिये ही होती हैं ॥ ६ ॥

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११० * स्तोत्ररत्नावली * तद्यच्छ KKKKKKK मन्युमसुरश्च हतस्त्वयाद्य मोदेत साधुरपि वृश्चिकसर्पहत्या । लोकाश्च निर्वृतिमिताः प्रतियन्ति सर्वे रूपं नृसिंह विभयाय जनाः स्मरन्ति ॥ ७ ॥

नाहं बिभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य-जिह्वार्कनेत्रभ्रुकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात् आन्त्रस्त्रजः क्षतजकेसरशङ्कुकर्णा-निर्ह्रादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात् ॥ ८ ॥

त्रस्तोऽस्म्यहं कृपणवत्सल दुःसहोग्र-संसारचक्रकदनासतां प्रणीतः । बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽङ्घ्रिमूलं प्रीतोऽपवर्गशरणं ह्वयसे कदा नु ॥९ ॥

अतः अब आप क्रोध शान्त कीजिये; क्योंकि असुरका संहार हो चुका । हे देव! सर्प और बिच्छू आदि दुःखदायी जीवोंके मारे जानेपर साधुजन भी आनन्द मानते हैं, अतः इस असुरके संहारसे आनन्दित हुए सब लोक आपका कोप शान्त होनेकी बाट देख रहे हैं । हे नृसिंह! भयसे मुक्त होनेके लिये मनुष्य आपके रूपका स्मरण करते हैं ॥ ७ ॥ हे अजित! जिसमें अति

भयानक मुख और जिह्वा, सूर्यके समान देदीप्यमान नेत्र, भृकुटिका वेग एवं उग्र दाढ़ें हैं, जो आँतोंकी माला, रक्ताक्त सटाकलाप एवं सीधे खड़े हुए कानोंसे युक्त है, जिसके सिंहनादने दिग्गजोंको भी भयभीत कर दिया है तथा जिसके नखाग्र शत्रुको विदीर्ण करनेवाले हैं, आपके उस भयंकर स्वरूपसे मुझे कुछ भी भय नहीं है ॥ ८ ॥ हे दीनवत्सल! मैं तो अति उग्र और दुःसह संसारचक्रके