स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 91–100

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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* स्तोत्ररत्नावली * ८१ यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनं

हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति ।

दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन । दृग्गोचरो • ॥ ८ ॥

दीनबन्ध्वष्टकं पुण्यं ब्रह्मानन्देन भाषितम् ।

यः पठेत् प्रयतो नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥ ९ ॥

इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीदीनबन्ध्वष्टकं सम्पूर्णम् । ३० - – परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रम् त्वमेकः शुद्धोऽसि त्वयि निगमबाह्या मलमयं प्रपञ्चं पश्यन्ति भ्रमपरवशाः पापनिरताः । बहिस्तेभ्यः कृत्वा स्वपदशरणं मानय विभो गजेन्द्रे दृष्टं ते शरणद वदान्यं स्वपददम् ॥ १ ॥

जिन भगवान्‌के नामकीर्तनमें तत्पर चाण्डाल भी निश्चय ही सम्पूर्ण कलिमल ( पाप ) को त्यागकर जगत्‌को पवित्र कर देता है, वे दीनबन्धु भगवान् मेरे समस्त पापको अपनी करुणादृष्टिसे जलाकर आज मेरे नेत्रोंको प्रत्यक्ष दर्शन दें ॥ ८ ॥ जो

लोग ब्रह्मानन्दके कहे हुए इस दीनबन्ध्वष्टक नामक पवित्र स्तोत्रका नित्य संयतचित्तसे पाठ करेंगे उनके ऊपर विष्णुभगवान् प्रसन्न रहेंगे ॥ ९ ॥

= हे शरण देनेवाले परमात्मन्! तुम एक और शुद्ध हो, किंतु वेदके विरुद्ध बुद्धि रखनेवाले भ्रान्त और पापपरायणजन तुम्हारे ऐसे स्वरूपमें भी विकाररूप प्रपञ्च ( संसार ) देखते हैं । हे सर्वव्यापी भगवन्! मुझे उन लोगोंसे अलग करके अपने चरणोंकी शरणमें ले लो । [ अपनी शरणमें लेनेकी ] तुम्हारी उदारता गजेन्द्रके

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८२ * स्तोत्ररत्नावली * न सृष्टेस्ते हानिर्यदि हि कृपयातोऽवसि च मां त्वयानेके गुप्ता व्यसनमिति तेऽस्ति श्रुतिपथे । अतो मामुद्धर्तुं घटय मयि दृष्टिं सुविमलां न रिक्तां मे याच्ञां स्वजनरत कर्तुं भव हरे ॥ २ ॥

कदाहं भो स्वामिन्नियतमनसा त्वां हृदि भज-नभद्रे संसारे ह्यनवरतदुःखेऽतिविरसः । लभेयं तां शान्तिं परममुनिभिर्या ह्यधिगता दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्तिं भवहर ॥ ३ ॥

विधाता चेद्विश्वं सृजति सृजतां मे शुभकृतिं विधुश्चेत्पाता मावतु जनिमृतेर्दुःखजलधेः । हरः संहर्ता संहरतु मम शोकं सजनकं यथाहं मुक्तः स्यां किमपि तु तथा ते विदधताम् ॥ ४ ॥

विषयमें देखी गयी है कि तुमने उसकी रक्षा करके उसे अपना धाम दे दिया ॥ १ ॥ हे भगवन्! यदि तुम कृपा करके मेरी रक्षा करते हो तो इससे तुम्हारी

सृष्टिमर्यादाकी कोई हानि नहीं है । तुमने अनेकोंकी रक्षा की है, हमारे कानोंमें यह बात पड़ चुकी है कि तुम्हें शरणागतोंकी रक्षा करनेका व्यसन है, अतः मेरा उद्धार करनेके लिये तुम मुझपर भी अपनी निर्मल दृष्टि डालो । अपने भक्तजनोंकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले हे भगवन्! मेरी प्रार्थनाको असफल न करो ॥ २ ॥ हे प्रभो! मैं

कब तुमको अपने हृदयमें संयतमनसे भजता हुआ अमङ्गलमय एवं सर्वदा दुःखयुक्त इस संसारसे विरक्त होकर उस शान्तिको प्राप्त करूँगा जिसको कि महामुनियोंने पाया है । हे भव - बन्धनसे मुक्त करनेवाले भगवन्! तुम दया करके मुझे वही पराशान्ति दो ॥ ३ ॥ हे भगवन्! ब्रह्मा यदि संसारकी सृष्टि करते हैं

तो मेरे शुभकर्मोंकी सृष्टि करें, विष्णुभगवान् यदि संसारकी रक्षा करते हैं तो

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* • विष्णुस्तोत्राणि: * ८३ अहं ब्रह्मानन्दस्त्वमपि च तदाख्यः सुविदित-स्ततोऽहं भिन्नो नो कथमपि भवत्तः श्रुतिदृशा । तथा चेदानीं त्वं त्वयि मम विभेदस्य जननीं स्वमायां संवार्य प्रभव मम भेदं निरसितुम् ॥ ५ ॥

कदाहं हे स्वामिञ्जनिमृतिमयं दुःखनिबिडं भवं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपुषि । रमे तस्मिन्नित्यं निखिलमुनयो ब्रह्मरसिका रमन्ते यस्मिंस्ते कृतसकलकृत्या यतिवराः ॥ ६ ॥

पठन्त्येके शास्त्रं निगममपरे तत्परतया यजन्त्यन्ये त्वां वै ददति च पदार्थांस्तव हितान् । जन्म - मरणके दुःखरूपी सागरसे मेरी रक्षा करें और शिवजी यदि संसारका संहार करते हैं तो मेरे शोकोंका उनके कारणभूत अशुभ कर्मोंसहित संहार करें । जिस प्रकार मेरी मुक्ति हो सके वैसा कोई उपाय वे लोग करें ॥ ४ ॥ हे भगवन्! मेरा नाम ब्रह्मा-नन्द है और तुम्हारा भी यही नाम प्रसिद्ध है । इसलिये श्रुतिदृष्ट्या ' ( सुननेमें ) मैं

तुमसे किसी प्रकार भिन्न नहीं हूँ । ऐसी स्थितिमें तुम इस समय अपने और मेरेमें भेदको प्रकट करनेवाली अपनी माया दूर कर मेरी भिन्नताको निकाल दो ॥ ५ ॥ हे

प्रभो! मैं कब जन्म - मरणमय घोर दुःखवाले संसारको छोड़कर निरन्तर आनन्दमय सत्य आत्मस्वरूपमें नित्य रमण करूँगा, जिसमें कि ब्रह्मास्वादके रसिक तथा कृतकृत्य योगीश्वर महामुनि रमण करते हैं ॥ ६ ॥ हे भगवन्! तुमको प्रसन्न करनेके

लिये कोई शास्त्र पढ़ते हैं और कोई तत्पर होकर वेद पढ़ते हैं तथा दूसरे लोग यज्ञके १. वेदवाक्यके अनुसार ।

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८४ * स्तोत्ररत्नावली * अहं तु स्वामिंस्ते शरणमगमं संसृतिभया-द्यथा ते प्रीतिः स्याद्धितकर तथा त्वं कुरु विभो ॥ ७ ॥

अहं ज्योतिर्नित्यो गगनमिव तृप्तः 69696963636363636363636363 सुखमयः श्रुतौ सिद्धोऽद्वैतः कथमपि न भिन्नोऽस्मि विधुतः । इति ज्ञाते तत्त्वे भवति च परः संसृतिलया-दतस्तत्त्वज्ञानं मयि सुघटयेस्त्वं हि कृपया ॥ ८ ॥

अनादौ संसारे जनिमृतिमये दुःखितमना मुमुक्षुः सन्कश्चिद्भजति हि गुरुं ज्ञानपरमम् । ततो ज्ञात्वा यं वै तुदति न पुनः क्लेशनिवहै-भजेऽहं तं देवं भवति च परो यस्य भजनात् ॥ ९ ॥

द्वारा तुम्हारी आराधना करते हैं और तुम्हें रुचिकर वस्तु अर्पण करते हैं; किन्तु हे प्रभो! मैं तो संसारके दुःखोंके डरसे तुम्हारी शरणमें आया हूँ । हे हित करनेवाले व्यापक परमात्मन्! जिस प्रकार मुझपर तुम्हारी प्रसन्नता हो सके वैसा करो ॥ ७ ॥

हे भगवन्! मैं प्रकाशरूप, नित्य, आकाशके समान व्यापक, पूर्णकाम, आनन्दमय और श्रुतिसिद्ध अद्वैतरूप हूँ; किसी प्रकार ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार तत्त्वज्ञान हो जानेपर विवेक - दृष्टिसे जगत्का लय हो जानेके कारण ज्ञानी ब्रह्मरूप हो जाता है; इसलिये तुम कृपा करके मुझमें तत्त्वज्ञान भर दो ॥ ८ ॥

जन्ममरणरूप भयसे युक्त इस अनादि संसारमें मन - ही - मन सदा दुःखी रहनेवाला कोई पुरुष इससे मुक्त होनेकी इच्छासे परम ज्ञानी गुरुकी सेवा करता है और उससे जिस भगवान्‌को जानकर फिर सांसारिक क्लेशसमूहोंसे पीडित नहीं होता उस देवको मैं भजता हूँ, जिसके भजनसे भक्त परब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥ ९ ॥

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* विष्णुस्तोत्राणि * ८५ विवेको वैराग्यो न च शमदमाद्याः षडपरे मुमुक्षा मे नास्ति प्रभवति कथं ज्ञानममलम् । अतः संसाराब्धेस्तरणसरणिं मामुपदिशन् स्वबुद्धिं श्रौतों मे वितर भगवंस्त्वं हि कृपया ॥ १० ॥

कदाहं भो स्वामिन्निगममतिवेद्यं शिवमयं चिदानन्दं नित्यं श्रुतिहृतपरिच्छेदनिवहम् । त्वमर्थाभिन्नं त्वामभिरम इहात्मन्यविरतं मनीषामेवं मे सफलय वदान्य स्वकृपया ॥ ११ ॥

यदर्थं सर्वं वै प्रियमसुधनादि प्रभवति स्वयं नान्यार्थो हि प्रिय इति च वेदे प्रविदितम् । स आत्मा सर्वेषां जनिमृतिमतां वेदगदित-स्ततोऽहं तं वेद्यं सततममलं यामि शरणम् ॥ १२ ॥

हे भगवन्! मुझमें न विवेक है, न वैराग्य और न शम, दम आदि ज्ञानके अन्य छः साधन ही हैं; मुझमें मुक्त होनेकी सुदृढ़ इच्छा भी नहीं है; फिर कैसे निर्मल ज्ञान प्राप्त हो सकता है? इसलिये संसारसागरको पार करनेके मार्गका उपदेश देते हुए तुम कृपाकर मुझको अपनी वैदिक बुद्धि ( ब्रह्मविद्या ) प्रदान करो ॥ १० ॥ हे स्वामिन्! श्रुतिने जिनके त्रिविध

परिच्छेद ( इयत्ता ) का बाध किया है; जो वैदिक बुद्धिसे ही जाननेयोग्य हैं, जो नित्य चिदानन्दघन एवं कल्याण स्वरूप हैं तथा जो ' त्वम् ' पदके अर्थभूत जीवात्मासे अभिन्न हैं ऐसे आपका निरन्तर अपने हृदय - देशमें मैं कब ध्यान करूँगा, हे उदार परमेश्वर! आप अपनी कृपासे मेरे इस विचारको सफल करें ॥ ११ ॥ हे भगवन्! जिसके लिये प्रिय होनेके कारण ही ये

प्राण, धन आदि समस्त वस्तु प्रिय प्रतीत होते हैं; और जो किसी दूसरेके

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८६ * स्तोत्ररत्नावली * मया त्यक्तं सर्वं कथमपि भवेत्स्वात्मनि मति-स्त्वदीया माया मां प्रति तु विपरीतं कृतवती । ततोऽहं किं कुर्यां न हि मम मतिः क्वापि चरति दयां कृत्वा नाथ स्वपदशरणं देहि शिवदम् ॥ १३ ॥

नगा दैत्याः कीशा भवजलधिपारं हि गमिता-स्त्वया चान्ये स्वामिन्किमिति समयेऽस्मिञ्छयितवान् । न हेलां त्वं कुर्यास्त्वयि निहितसर्वे मयि विभो न हि त्वाहं हित्वा कमपि शरणं चान्यमगमम् ॥ १४ ॥

अनन्ताद्या विज्ञा न गुणजलधेस्तेऽन्तमगम-न्नतः पारं यायात्तव गुणगणानां कथमयम् । लिये प्रिय होनेके कारण प्रिय नहीं है अपितु स्वतः प्रिय है; यह बात वेदमें प्रसिद्ध है, वही जन्मने - मरनेवाले समस्त प्राणियोंका आत्मा है और उसीका वेदोंमें वर्णन किया गया है, अतः मैं उसी जाननेके योग्य निर्मल आत्मदेवकी सदा ही शरण लेता हूँ ॥ १२ ॥ हे नाथ! मेरी मति किसी प्रकार आत्मस्वरूप

तुममें लगी रहे, इसी उद्देश्यसे मैंने अपना सब कुछ परित्याग कर दिया, किन्तु तुम्हारी मायाने तो मेरे प्रति विपरीत ही कार्य किया, अतः अब मैं क्या करूँ, मेरी बुद्धि कुछ काम नहीं करती, अब तुम्हीं दया करके मुझे कल्याण देनेवाले अपने चरणोंकी शरण दो ॥ १३ ॥ हे प्रभो! तुमने पर्वत - वृक्षादि स्थावरों,

दैत्यों, वानरों और दूसरोंको भी संसारसागरके पार कर दिया । इस समय क्यों सो गये? हे अन्तर्यामिन्! तुम्हारे विराट् स्वरूपमें समस्त संसार है, इसलिये तुम मेरा अनादर न करो, तुमको छोड़कर मैंने दूसरेकी शरण नहीं ली ॥ १४ ॥

हे भगवन्! विशेष ज्ञान रखनेवाले शेष, शारदा आदि भी यदि तुम्हारे गुणरूपी

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* विष्णुस्तोत्राणि * ८७ गृणन्यावद्धि त्वां जनिमृतिहरं याति परमां गतिं योगिप्राप्यामिति मनसि बुद्ध्वाहमनवम् ॥ १५ ॥

इति श्रीमन्मौक्तिकरामोदासीनशिष्यब्रह्मानन्दविरचितं परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रं सम्पूर्णम् । -३१ - श्रीभगवच्छरणस्तोत्रम्

सच्चिदानन्दरूपाय भक्तानुग्रहकारिणे ।

मायानिर्मितविश्वाय महेशाय नमो नमः ॥ १ ॥

रोगा हरन्ति सततं प्रबलाः शरीरं कामादयोऽप्यनुदिनं प्रदहन्ति चित्तम् । मृत्युश्च नृत्यति सदा कलयन् दिनानि तस्मात्त्वमद्य शरणं मम दीनबन्धो ॥ २ ॥

सागरके पार न जा सके, तो मुझ जैसा साधारण जन तुम्हारे गुणसमूहका पार कैसे पा सकता है; परन्तु जन्म - मरणरूप कष्टको हरनेवाले तुझ परमेश्वरका जितना ही हो सके उतना ही गुणगान करके मनुष्य योगिजनोंके प्राप्त होनेयोग्य परमगतिको प्राप्त कर लेता है, ऐसा मनमें जानकर मैंने आपकी स्तुति की है ॥ १५ ॥

भक्तोंपर दया करनेवाले और मायासे संसारकी रचना करानेवाले सच्चिदानन्दरूप महेश्वरको बारम्बार नमस्कार है ॥ १ ॥ हे भगवन्! इस संसारमें

प्रबल रोग सर्वदा शरीरको क्षीण करते रहते हैं, काम आदि भी प्रतिदिन हृदयको

जलाते रहते हैं और मृत्यु भी दिनोंको गिनती हुई पास ही नृत्य करती रहती है ।

इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ २ ॥

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८८ * स्तोत्ररत्नावली *

देहो विनश्यति सदा परिणामशील-श्चित्तं च खिद्यति सदा विषयानुरागि ।

बुद्धिः सदा हि रमते विषयेषु नान्तस्तस्मात् ॥ ३ ॥

आयुर्विनश्यति यथामघटस्थतोयं

विद्युत्प्रभेव चपला बत यौवनश्रीः ।

वृद्धा प्रधावति यथा मृगराजपत्नी । तस्मात् ० ॥ ४ ॥

आयाद्व्ययो मम भवत्यधिकोऽविनीते

कामादयो हि बलिनो निबलाः शमाद्याः ।

मृत्युर्यदा तुदति मां बत किं वदेयं । तस्मात् ॥ ५ ॥

तप्तं तपो न हि कदापि मयेह तन्वा

वाण्या तथा न हि कदापि तपश्च तप्तम् ।

मिथ्याभिभाषणपरेण न मानसं हि । तस्मात् ॥ ६ ॥

सदा ही परिवर्तनशील यह शरीर नष्ट होता जा रहा है और विषयोंमें आसक्त रहनेवाला चित्त सदा ही खिन्न रहा करता है । मेरी बुद्धि भी सदा विषयोंमें ही रमती

है, अन्तरात्मामें नहीं । इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरी आप ही शरण हैं ॥ ३ ॥

कष्टकी बात है कि कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी तरह आयुका नाश हो रहा है, यौवनकी शोभा बिजलीकी चमक - सी क्षणभङ्गुर है और वृद्धावस्था सिंहनीकी भाँति ( खानेके लिये ) दौड़ी चली आ रही है, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ४ ॥ हे भगवन्! मेरे पास आयसे व्यय ही अधिक है,

क्योंकि मुझ अविनीतपर कामादि ही बली होते हैं [ उन्हींका मुझपर प्रभाव है ] और शम आदि निर्बल रहते हैं [ इनका मुझपर वश नहीं चलता ] । खेद है कि जब मुझे मृत्यु पीड़ित करेगी, उस समय मैं क्या कह सकूँगा? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ५ ॥ हे भगवन्! मैंने इस

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* विष्णुस्तोत्राणि * ८ ९ स्तब्धं मनो मम सदा न हि याति सौम्यं

चक्षुश्च मे न तव पश्यति विश्वरूपम् ।

वाचा तथैव न वदेन्मम सौम्यवाणीं । तस्मात् ॥ ७ ॥

सत्त्वं न मे मनसि याति रजस्तमोभ्यां

विद्धे तथा कथमहो शुभकर्मवार्ता ।

साक्षात्परम्परतया सुखसाधनं तत्तस्मात् ॥ ८ ॥

पूजा कृता न हि कदापि मया त्वदीया

मन्त्रं त्वदीयमपि मे न जपेद्रसज्ञा ।

चित्तं न मे स्मरति ते चरणौ ह्यवाप्य । तस्मात् ॥ ९ ॥

जीवनमें कभी शरीरसे तप नहीं किया, सदा असत्य भाषणमें लगे रहकर कभी वाणीसे भी तप नहीं किया और मानस तप तो कभी किया ही नहीं, अतः हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ६ ॥ हे भगवन्! मेरा मन सदा

स्तब्ध - जडवत् ज्ञानशून्य रहा है, इस कारण सौम्य ( विशुद्ध एवं विनम्र ) ही नहीं हो रहा है और मेरी आँखें आपके विश्वरूपका दर्शन नहीं कर पातीं, * प्रकार मेरी जिह्वा भी कोमल वाणी नहीं बोलती । अतः हे दीनबन्धो! इसी मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ७ ॥ रजोगुण और तमोगुणसे ' विद्ध हुए मेरे

अब नहीं आने पाता । अहो! ऐसी स्थितिमें शुभ कर्मोंका करना हृदयमें सत्त्वगुण तो दूर रहा उनकी बात भी परम्परासे वह ( शुभ कर्म ) इसलिये हे दीनबन्धो! अब मैंने कभी भी आपकी पूजा * अर्थात् ' जगत् ' रूपमें नहीं हो रही है । कैसे की जा सकती है और साक्षात् अथवा ही सुखका साधन है, [ सो मुझमें नहीं है ] मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ८ ॥ हे भगवन्!

नहीं की, मेरी जिह्वा आपके मन्त्रको भी नहीं भगवान् ही विराजमान हैं, ऐसी प्रतीति इन आँखोंको

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९ ० * स्तोत्ररत्नावली * यज्ञो न मेऽस्ति हुतिदानदयादियुक्तो

ज्ञानस्य साधनगणो न विवेकमुख्यः ।

ज्ञानं क्व साधनगणेन विना क्व मोक्षस्तस्मात् ॥ १० ॥

सत्सङ्गतिर्हि विदिता तव भक्तिहेतुः

साप्यद्य नास्ति बत पण्डितमानिनो मे ।

तामन्तरेण न हि सा क्व च बोधवार्ता । तस्मात् ॥ ११ ॥

दृष्टिर्न भूतविषया समताभिधाना

वैषम्यमेव तदियं विषयीकरोति ।

शान्तिः कुतो मम भवेत्समता न चेत्स्यात्तस्मात् ॥ १२ ॥

मैत्री समेषु न च मेऽस्ति कदापि नाथ जपती और न मेरा चित्त आपके चरणोंको पाकर उनका चिन्तन ही करता है; इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ ९ ॥ हे भगवन्! मैंने

हवन, दान, दया आदिसे युक्त यज्ञ नहीं किया और न ज्ञानके साधनसमूह विवेक आदिको ही प्राप्त किया । साधनसमूहके बिना ज्ञान कैसे हो सकता है? और बिना ज्ञानके मोक्ष कैसे हो सकता है? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १० ॥ हे भगवन्! यह प्रसिद्ध है कि आपकी भक्तिका

कारण सत्सङ्ग है, पर खेद है कि अपनेको पण्डित माननेवाले मुझमें वह ( सत्सङ्ग ) भी नहीं है । सत्सङ्गके बिना भगवद्भक्ति नहीं होती; फिर ज्ञानकी तो बात ही कहाँ हो सकती है? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं । ॥ ११ ॥ हे भगवन्! मेरी दृष्टि प्राणियोंमें समान नहीं रहती है, अपितु यह

प्राणियोंमें विषम भावनाको ही अपनाती है । यदि मेरी दृष्टिमें समता नहीं हुई तो मुझमें शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १२ ॥ हे नाथ! अपने बराबरवालोंमें मेरी