स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 11–20
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20
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ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः स्तोत्ररत्नावली. विनयस्तोत्राणि १ – मङ्गलम्
स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।
वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥ १ ॥
कपिलो गजकर्णकः । सुमुखश्चैकदन्तश्च लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ २ ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥ ३ ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ४ ॥
देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । शुक्लाम्बरधरं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ ५ ॥
प्रसन्नवदनं उन गजवदन देवदेवकी जय हो, जिनके चरणकमलका स्मरण सम्पूर्ण इस प्रकार नष्ट कर देता है जैसे सूर्य अन्धकारराशिको ॥ १ ॥
विघ्नसमूहको पुरुष विद्यारम्भ, विवाह, गृहप्रवेश, निर्गमन ( घरसे बाहर जाने ), संग्राम जो सङ्कटके समय सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन अथवा, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन – इन बारह नामोंका पाठ या श्रवण भी करता है, उसे किसी प्रकारका विघ्न नहीं होता ॥ २–४ ॥ जो श्वेत वस्त्र धारण किये हैं, चन्द्रमाके समान जिनका वर्ण
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२ * स्तोत्ररत्नावली *
व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् ।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ६ ॥
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ७ ॥
अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥ ८ ॥
इति मङ्गलं सम्पूर्णम् । २ – श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् अर्जुन उवाच
किं नु नाम सहस्राणि जपते च पुनः पुनः ।
यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव ॥ १ ॥
है तथा जो प्रसन्नवदन हैं, उन देवदेव चतुर्भुज भगवान् विष्णुका सब विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये ध्यान करना चाहिये ॥ ५ ॥ जो वसिष्ठजीके नाती ( प्रपौत्र ),
शक्तिके पौत्र, पराशरजीके पुत्र तथा शुकदेवजीके पिता हैं, उन निष्पाप, तपोनिधि व्यासजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ६ ॥ विष्णुरूप व्यास अथवा
व्यासरूप श्रीविष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ । वसिष्ठवंशज ब्रह्मनिधि श्रीव्यासजीको बारम्बार नमस्कार है ॥ ७ ॥ भगवान् वेदव्यासजी बिना चार
मुखके ब्रह्मा हैं, दो भुजावाले दूसरे विष्णु हैं और ललाटलोचन ( तीसरे नेत्र ) से रहित साक्षात् महादेवजी हैं ॥ ८ ॥
= अर्जुनने पूछा- केशव! मनुष्य बार - बार एक हजार नामोंका जप क्यों करता है? आपके जो दिव्य नाम हों, उनका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
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* विनयस्तोत्राणि * ३ श्रीभगवानुवाच
मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ २ ॥
पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥ ३ ॥
विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्ग गरुडध्वजम् ॥ ४ ॥
अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।
गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ॥५ ॥
कन्यादानसहस्राणां फलं प्राप्नोति मानवः ।
अमायां वा पौर्णमास्यामेकादश्यां तथैव च ॥ ६ ॥
सन्ध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रातःकाले तथैव च ।
मध्याह्ने च जपन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ७ ॥
इति श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् । श्रीभगवान् बोले – अर्जुन! मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, जनार्दन, गोविन्द, पुण्डरीकाक्ष, माधव, मधुसूदन, पद्मनाभ, सहस्राक्ष, वनमाली, हलायुध, गोवर्धन, हृषीकेश, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम, विश्वरूप, वासुदेव, राम, नारायण, हरि, दामोदर, श्रीधर, वेदाङ्ग, गरुडध्वज, अनन्त और कृष्णगोपाल — इन नामोंका जप करनेवाले मनुष्यके भीतर पाप नहीं रहता । वह एक करोड़ गो - दान, एक सौ अश्वमेधयज्ञ और एक हजार कन्यादानका फल प्राप्त करता है । अमावस्या, पूर्णिमा तथा एकादशी तिथिको और प्रतिदिन सायं - प्रातः एवं मध्याह्नके समय इन नामोंका स्मरणपूर्वक जप करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥२–७ ॥
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४ * स्तोत्ररत्नावली * ***** ३ - षट्पदी
अविनयमपनय विष्णो दमय मनः शमय विषयमृगतृष्णाम् ।
भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरतः ॥ १ ॥
दिव्यधुनीमकरन्दे परिमलपरिभोगसच्चिदानन्दे ।
श्रीपतिपदारविन्दे भवभयखेदच्छिदे वन्दे ॥ २ ॥
सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् ।
सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ ३ ॥
उद्धृतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे ।
दृष्टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कारः ॥ ४ ॥
मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवतावता सदा वसुधाम् ।
परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम् ॥ ५ ॥
हे विष्णुभगवान्! मेरी उद्दण्डता दूर कीजिये, मेरे मनका दमन कीजिये और विषयोंकी मृगतृष्णाको शान्त कर दीजिये, प्राणियोंके प्रति मेरा दयाभाव बढ़ाइये और इस संसार - समुद्रसे मुझे पार लगाइये ॥ १ ॥ भगवान् लक्ष्मीपतिके उन
चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जिनका मकरन्द गङ्गा और सौरभ सच्चिदानन्द है तथा जो संसारके भय और खेदका छेदन करनेवाले हैं ॥ २ ॥ हे नाथ! [ मुझमें
और आपमें ] भेद न होनेपर भी, मैं ही आपका हूँ, आप मेरे नहीं; क्योंकि तरङ्ग ही समुद्रकी होती है, तरङ्गका समुद्र कहीं नहीं होता ॥ ३ ॥
हे गोवर्धनधारिन्! हे इन्द्रके अनुज ( वामन )! हे राक्षसकुलके शत्रु! हे सूर्य - चन्द्ररूपी नेत्रवाले! आप- प - जैसे प्रभुके दर्शन होनेपर क्या संसारके प्रति उपेक्षा नहीं हो जाती? [ अपितु अवश्य ही हो जाती है ] ॥ ४ ॥ हे परमेश्वर!
मत्स्यादि अवतारोंसे अवतरित होकर पृथ्वीकी सर्वदा रक्षा करनेवाले आपके द्वारा संसारके त्रिविध तापोंसे भयभीत हुआ मैं रक्षा करनेके योग्य हूँ ॥ ५ ॥
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* विनयस्तोत्राणि * ५
दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द ।
भवजलधिमथनमन्दर परमं दरमपनय त्वं मे ॥ ६ ॥
नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावकौ चरणौ ।
इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु ॥ ७ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं षट्पदीस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ४ - श्रीहरिशरणाष्टकम् ध्येयं वदन्ति शिवमेव हि केचिदन्ये शक्तिं गणेशमपरे तु दिवाकरं वै । रूपैस्तु तैरपि विभासि यतस्त्वमेव तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो * ॥ १ ॥
हे गुणमन्दिर दामोदर! हे मनोहर मुखारविन्द गोविन्द! हे संसारसमुद्रका मन्थन करनेके लिये मन्दराचलरूप! मेरे महान् भयको आप दूर कीजिये ॥ ६ ॥ हे
करुणामय नारायण! मैं सब प्रकारसे आपके चरणोंकी शरण लूँ । यह पूर्वोक्त षट्पदी ( छः पदोंकी स्तुतिरूपिणी भ्रमरी ) सर्वदा मेरे मुख - कमलमें निवास करे ॥ ७ ॥
कोई शिवको ही ध्येय बताते हैं तथा कोई शक्तिको, कोई गणेशको और कोई भगवान् भास्करको ध्येय कहते हैं; उन सब रूपोंमें आप ही भास रहे हैं, * ' शङ्खपाणे ' इति पाठान्तरम् ।
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६ * स्तोत्ररत्नावली * नो सोदरो न जनको जननी न जाया
नैवात्मजो न च कुलं विपुलं बलं वा ।
सन्दृश्यते न किल कोऽपि सहायको मे । तस्मा ० ॥ २ ॥
नोपासिता मदमपास्य मया महान्त-स्तीर्थानि चास्तिकधिया न हि सेवितानि ।
देवार्चनं च विधिवन्न कृतं कदापि । तस्मा ० ॥ ३ ॥
दुर्वासना मम सदा परिकर्षयन्ति
चित्तं शरीरमपि रोगगणा दहन्ति ।
सञ्जीवनं च परहस्तगतं सदैव । तस्मा ० ॥ ४ ॥
पूर्वं कृतानि दुरितानि मया तु यानि
स्मृत्वाखिलानि हृदयं परिकम्पते मे ।
ख्याता च ते पतितपावनता तु यस्मात् । तस्मा ० ॥ ५ ॥
इसलिये हे दीनबन्धो! मेरी शरण तो एकमात्र आप ही हैं ॥ १ ॥ भ्राता, पिता,
माता, स्त्री, पुत्र, कुल एवं प्रचुर बल – - इनमें से कोई भी मुझे अपना सहायक नहीं दीखता; अतः हे दीनबन्धो! आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ २ ॥ मैंने
न तो अभिमानको छोड़कर महात्माओंकी आराधना की, न आस्तिक-बुद्धिसे तीर्थों का सेवन किया है और न कभी विधिपूर्वक देवताओंका पूजन ही किया है; अंतः हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ ३ ॥
दुर्वासनाएँ मेरे चित्तको सदा खींचती रहती हैं, रोगसमूह सर्वदा शरीरको तपाते रहते हैं और जीवन तो सदैव परवश ही है; अतः हे दीनबन्धो! आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ ४ ॥ पहले मुझसे जो - जो पाप बने हैं, उन सबको
याद कर - करके मेरा हृदय काँपता है; किन्तु तुम्हारी पतितपावनता तो प्रसिद्ध ही है, अतः हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ ५ ॥
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* विनयस्तोत्राणि * ७ 5 दुःखं जराजननजं विविधाश्च रोगाः
काकश्वसूकरजनिर्निरये च पातः ।
ते विस्मृतेः फलमिदं विततं हि लोके । तस्मा ० ॥ ६ ॥
नीचोऽपि पापवलितोऽपि विनिन्दितोऽपि
ब्रूयात्तवाहमिति यस्तु किलैकवारम् ।
तं यच्छसीश निजलोकमिति व्रतं ते । तस्मा ० ॥ ७ ॥
वेदेषु धर्मवचनेषु तथागमेषु
रामायणेऽपि च पुराणकदम्बके वा ।
सर्वत्र सर्वविधिना गदितस्त्वमेव । तस्मा ० ॥ ८ ॥
इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं सम्पूर्णम् । ५ - न्यासदशकम्
अहं मद्रक्षणभरो मद्रक्षणफलं तथा ।
न मम श्रीपतेरेवेत्यात्मानं निक्षिपेद् बुधः ॥ १ ॥
न्यस्याम्यकिञ्चनः श्रीमन्ननुकूलोऽन्यवर्जितः । प्रभो! आपको भूलनेसे जरा - जन्मादिसम्भूत दुःख, नाना व्याधियाँ, काक, कुत्ता, शूकरादि योनियाँ तथा नरकादिमें पतन- -ये ही फल संसारमें विस्तृत हैं, अतः हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥ ६ ॥ नीच, महापापी
अथवा निन्दित ही क्यों न हो; किन्तु जो एक बार भी यह कह देता है कि ' मैं आपका हूँ ', उसीको आप अपना धाम दे देते हैं, हे नाथ! आपका यही व्रत है; अतः हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥ ७ ॥ वेद,
धर्मशास्त्र, आगम, रामायण तथा पुराणसमूहमें भी सर्वत्र सब प्रकार आपहीका कीर्तन है; अतः हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥ ८ ॥
I ' मैं, मेरी रक्षाका भार और उसका फल मेरा नहीं श्रीविष्णुभगवान्का ही
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* स्तोत्ररत्नावली * ८ त्वयि ॥ २ ॥
विश्वासप्रार्थनापूर्वमात्मरक्षाभरं 339666666666
स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वभरत्वेन निर्भरम् ।
स्वदत्तस्वधिया स्वार्थं स्वस्मिन्त्र्यस्यति मां स्वयम् ॥ ३ ॥
श्रीमन्नभीष्टवरद त्वामस्मि शरणं गतः ।
एतद्देहावसाने मां त्वत्पादं प्रापय स्वयम् ॥ ४ ॥
त्वच्छेषत्वे स्थिरधियं त्वत्प्राप्त्येकप्रयोजनम् ।
निषिद्धकाम्यरहितं कुरु मां नित्यकिङ्करम् ॥ ५ ॥
देवी भूषणहेत्यादिजुष्टस्य भगवंस्तव ।
नित्यं निरपराधेषु कैङ्कर्येषु नियुङ्क्ष्व माम् ॥ ६ ॥
मां मदीयं च निखिलं चेतनाचेतनात्मकम् ।
स्वकैङ्कर्योपकरणं वरद स्वीकुरु स्वयम् ॥ ७ ॥
है ' – ऐसा विचारकर विद्वान् पुरुष अपनेको भगवान्पर छोड़ दे ॥ १ ॥ हे
भगवन्! मैं अकिञ्चन अपनी रक्षाका भार अनन्य और अनुकूल ( प्रणत ) होकर विश्वास और प्रार्थनापूर्वक आपको सौंपता हूँ ॥ २ ॥ मेरे स्वामी अपने
शेष, वशीभूत और अपनी ही रक्षकतापर अवलम्बित हुए मुझको अपनी निजकी दी हुई बुद्धिसे स्वयं अपने लिये अपनेमें ही समर्पित करते हैं [ अर्थात् परम पुरुषार्थको सिद्ध करनेके लिये स्वयं ही अपनी शरणमें ले लेते हैं ] ॥ ३ ॥
हे अभीष्ट - वरदायक स्वामिन्! मैं आपकी शरण हूँ । इस देहका अन्त होनेपर आप मुझे स्वयं अपने चरणकमलोंतक पहुँचा दें ॥ ४ ॥ आपका शेष होनेमें
स्थिरबुद्धिवाले, आपकी प्राप्तिका ही एकमात्र प्रयोजन रखनेवाले, निषिद्ध और काम्य कर्मोंसे रहित मुझको आप अपना नित्य सेवक बनाइये ॥ ५ ॥ देवी
( श्रीलक्ष्मीजी ), भूषण ( कौस्तुभादि ) और शस्त्रादि ( गदा, शार्ङ्गदि ) से युक्त अपनी निर्दोष सेवाओंमें, हे भगवन्! आप मुझे नित्य नियुक्त रखिये ॥ ६ ॥
हे वरदायक प्रभो! मुझको और चेतन - अचेतनरूप मेरी समस्त वस्तुओंको,
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* विनयस्तोत्राणि * ९ 55555555555555
त्वमेव रक्षकोऽसि मे त्वमेव करुणाकरः ।
न प्रवर्तय पापानि प्रवृत्तानि निवारय ॥ ८ ॥
अकृत्यानां च करणं कृत्यानां वर्जनं च मे ।
क्षमस्व निखिलं देव प्रणतार्तिहर प्रभो ॥ ९ ॥
श्रीमन्नियतपञ्चाङ्गं मद्रक्षणभरार्पणम् ।
अचीकरत्स्वयं स्वस्मिन्नतोऽहमिह निर्भरः ॥ १० ॥
इति श्रीवेङ्कटनाथकृतं न्यासदशकं सम्पूर्णम् । ६ - परमेश्वरस्तोत्रम् जगदीश सुधीश भवेश विभो परमेश परात्पर पूत पितः । प्रणतं पतितं हतबुद्धिबलं जनतारण तारय तापितकम् ॥ १ ॥
अपनी सेवाकी सामग्रीके रूपमें स्वीकार कीजिये ॥ ७ ॥ हे प्रभो! मेरे एकमात्र
आप ही रक्षक हैं, आप ही मुझपर दया करनेवाले हैं; अतः पापोंको मेरी ओर प्रवृत्त न कीजिये और प्रवृत्त हुए पापोंका निवारण कीजिये ॥ ८ ॥ हे देव! हे
दीनदुःखहारी भगवन्! मेरा न करने योग्य कार्योंका करना और करने योग्योंको न करना आप क्षमा करें ॥ ९ ॥ श्रीमन्! आपने स्वयं ही मेरी पाँचों इन्द्रियोंको
नियन्त्रित करके मेरी रक्षाका भार अपने ऊपर ले लिया; अतः अब मैं निर्भर हो गया ॥ १० ॥
हे जगदीश! हे सुमतियोंके स्वामी! हे विश्वेश! हे सर्वव्यापिन्! हे परमेश्वर! हे प्रकृति आदिसे अतीत! हे परमपावन! हे पितः! हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस शरणागत, पतित और बुद्धि - बलसे हीन संसारसन्तप्त
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१० * स्तोत्ररत्नावली * गुणहीनसुदीनमलीनमतिं
त्वयि पातरि दातरि चापरतिम् ।
तमसा रजसावृतवृत्तिमिमं । जन ० ॥ २ ॥
मम जीवनमीनमिमं पतितं
मरुघोरभुवीह सुवीहो ।
करुणाब्धिचलोर्मिजलानयनं जन ० ॥ ३ ॥
भववारण कारण कर्मततौ
भवसिन्धुजले शिव मग्नमतः ।
करुणाञ्च समर्प्य तरि त्वरितं । जन ० ॥ ४ ॥
अतिनाश्य जनुर्मम पुण्यरुचे
दुरितौघभरैः परिपूर्णभुवः ।
सुजघन्यमगण्यमपुण्यरुचिं जन ० ॥ ५ ॥
दासका उद्धार कीजिये ॥ १ ॥ जो सर्वथा गुणहीन, अत्यन्त दीन और
मलिनमति है तथा अपने रक्षक और दाता आपसे पराङ्मुख है, हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस संसारसन्तप्त उस तामस - राजसवृत्तिवाले दासका आप उद्धार कीजिये ॥ २ ॥ हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस भयानक मरुभूमिमें
पड़कर नितान्त निश्चेष्ट हुए मेरे इस अति सन्तप्त जीवनरूप मीनका अपने करुणावारिधिकी चञ्चल तरङ्गोंका जल लाकर उद्धार कीजिये || ३ || अतः हे संसारकी निवृत्ति करनेवाले! हे कर्मविस्तारके कारणस्वरूप! हे कल्याणमय! हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! संसारसमुद्रके जलमें डूबकर सन्तप्त होते हुए इस दासको अपनी करुणारूप नौका समर्पण करके यहाँसे तुरंत उद्धार कीजिये ॥ ४ ॥ हे पुण्यरुचे! हे जीवोद्धारक! जिसकी पापराशिके
भारसे पृथ्वी परिपूर्ण है, ऐसे मुझ नीचके जन्मको सदाके लिये मिटाकर मुझ अत्यन्त निन्दनीय, नगण्य, पापमें रुचि रखनेवाले और संसारके दुःखोंसे