स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 21–30
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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* विनयस्तोत्राणि * ११ ********* £ 55555555555555555555 भवकारक नारकहारक हे
भवतारक पातकदारक हे ।
हर शङ्कर किङ्करकर्मचयं । जन ० ॥ ६ ॥
तृषितश्चिरमस्मि सुधां हित मे-ऽच्युत चिन्मय देहि वदान्यवर ।
अतिमोहवशेन विनष्टकृतं । जन ० ॥ ७ ॥
प्रणमामि नमामि नमामि भवं
भवजन्मकृतिप्रणिषूदनकम् ।
गुणहीनमनन्तमितं शरणं । जनः ॥ ८ ॥
इति परमेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् । दुःखितका उद्धार कीजिये ॥ ५ ॥ हे जगत्कर्ता! हे नारकीय यन्त्रणाओंका
अपहरण करनेवाले! हे संसारका उद्धार करनेवाले! हे पापराशिको विदीर्ण करनेवाले! हे शङ्कर! इस दासकी कर्मराशिका हरण कीजिये और हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस संसारसन्तप्त जनका उद्धार कीजिये ॥ ६॥ हे
अच्युत! हे चिन्मय! हे उदारचूडामणि! हे कल्याणस्वरूप! मैं अत्यन्त तृषित हूँ, मुझे ज्ञानरूप अमृतका पान कराइये । मैं अत्यन्त मोहके वशीभूत होकर नष्ट हो रहा हूँ । हे जीवोंका उद्धार करनेवाले! मुझ संसारसन्तप्तको पार लगाइये ॥७ ॥ संसारमें जन्मप्राप्तिके कारणभूत कर्मोंका नाश करनेवाले
आपको मैं बारंबार प्रणाम और नमस्कार करता हूँ । हे जीवोंका उद्धार करनेवाले! आप निर्गुण और अनन्तकी शरणको प्राप्त हुए इस संसारसन्तप्त जनका उद्धार कीजिये ॥ ८ ॥
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ॐ शिवस्तोत्राणि ७- शिवमानसपूजा रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् । जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥ १ ॥
सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् । शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥ २ ॥
छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा । साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३ ॥
हे दयानिधे! हे पशुपते! हे देव! यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल जलसे स्नान, नाना रत्नावलिविभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरिकागन्धसमन्वित चन्दन, जुही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पाञ्जलि तथा धूप और दीप यह सब मानसिक [ पूजोपहार ] ग्रहण कीजिये ॥ १ ॥ मैंने नवीन रत्नखण्डोंसे
खचित सुवर्णपात्रमें घृतयुक्त खीर, दूध और दधिसहित पाँच प्रकारका व्यञ्जन, कदलीफल, शर्बत, अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और ताम्बूल – ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं; प्रभो! कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये ॥ २ ॥
छत्र, दो चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदङ्ग, दुन्दुभीके वाद्य, गान और नृत्य, साष्टाङ्ग प्रणाम, नानाविधि स्तुति – ये सब मैं संकल्पसे ही
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* शिवस्तोत्राणि * १३ आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ ४ ॥
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् । विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ ५ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता ॥ I -८ - श्रीशिवापराधक्षमापनस्तोत्रम् आदौ कर्मप्रसङ्गात् कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां विण्मूत्रामेध्यमध्ये क्वथयति नितरां जाठरो जातवेदाः । आपको समर्पण करता हूँ; प्रभो! मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये ॥ ३ ॥ हे शम्भो!
मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मन्दिर है, सम्पूर्ण विषय - भोगकी रचना आपकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा चलना - फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं; इस प्रकार मैं जो - जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है ॥ ४ ॥ प्रभो! मैंने
हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मनसे जो भी अपराध किये हों; वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको आप क्षमा कीजिये । हे करुणासागर श्रीमहादेव शङ्कर! आपकी जय हो ॥ ५ ॥
पहले कर्मप्रसङ्गसे किया हुआ पाप मुझे माताकी कुक्षिमें ला बिठाता है, फिर उस अपवित्र विष्ठा - मूत्रके बीच जठराग्नि खूब सन्तप्त करता है । वहाँ जो - जो
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१४ * स्तोत्ररत्नावली * K यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते केन वक्तुं क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो । १ । बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति । नानारोगादिदुःखाद्गुदनपरवशः शङ्करं न स्मरामि । क्षन्तव्यो ० । २ । प्रौढोऽहं यौवनस्थ विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादसौख्ये निषण्णः । शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं । क्षन्तव्यो ०।३ । वार्द्धक् चेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादितापैः पापै रोगैर्वियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम् । मिथ्यामोहाभिलाषैर्भ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं । क्षन्तव्यो ० ।४ । दुःख निरन्तर व्यथित करते रहते हैं उन्हें कौन कह सकता है? हे शिव! हें शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ १ ॥ बाल्यावस्थामें दुःखकी अधिकता रहती थी, शरीर मल - मूत्रसे
लिथड़ा रहता था और निरन्तर स्तनपानकी लालसा रहती थी; इन्द्रियोंमें कोई कार्य करनेकी सामर्थ्य न थी; शैवी मायासे उत्पन्न हुए नाना जन्तु मुझे काटते थे; नाना रोगादि दुःखोंके कारण मैं रोता ही रहता था, ( उस समय भी ) मुझसे शङ्करका स्मरण नहीं बना, इसलिये हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ २ ॥ जब मैं युवा अवस्थामें आकर
प्रौढ़ हुआ तो पाँच विषयरूपी सर्पोंने मेरे मर्मस्थानोंमें डँसा, जिससे मेरा विवेक नष्ट हो गया और मैं धन, स्त्री और सन्तानके सुख भोगनेमें लग गया । उस समय भी आपके चिन्तनको भूलकर मेरा हृदय बड़े घमण्ड और अभिमानसे भर गया । अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ ३ ॥ वृद्धावस्थामें भी, जब इन्द्रियोंकी गति शिथिल
हो गयी है, बुद्धि मन्द पड़ गयी है और आधिदैविकादि तापों, पापों, रोगों और वियोगोंसे शरीर जर्जरित हो गया है, मेरा मन मिथ्या मोह और अभिलाषाओंसे दुर्बल और दीन होकर ( आप ) श्रीमहादेवजीके चिन्तनसे शून्य ही भ्रम रहा है ।
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* शिवस्तोत्राणि * १५ नो शक्यं स्मार्तकर्म प्रतिपदगहनप्रत्यवायाकुलाख्यं श्रौते वार्ता कथं मे द्विजकुलविहिते ब्रह्ममार्गे सुसारे । नास्था धर्मे विचारः श्रवणमननयोः किं निदिध्यासितव्यं । क्षन्तव्यो ० । ५ । स्नात्वा प्रत्यूषकाले स्त्रपनविधिविधौ नाहृतं गाङ्गतोयं पूजार्थ वा कदाचिद्बहुतरगहनात्खण्डबिल्वीदलानि । नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धपुष्पे त्वदर्थं । क्षन्तव्यो ० । ६ । दुग्धैर्मध्वाज्ययुक्तैर्दधिसितसहितैः स्त्रापितं नैव लिङ्गं नो लिप्तं चन्दनाद्यैः कनकविरचितैः पूजितं न प्रसूनैः । धूपैः कर्पूरदीपैर्विविधरसयुतैर्नैव भक्ष्योपहारैः । क्षन्तव्यो ०।७ । अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ ४ ॥ पद - पदपर अति गहन प्रायश्चित्तोंसे
व्याप्त होनेके कारण मुझसे तो स्मार्तकर्म भी नहीं हो सकते, फिर जो द्विजकुलके लिये विहित हैं, उन ब्रह्मप्राप्तिके मार्गस्वरूप श्रौतकर्मोंकी तो बात ही क्या है? धर्ममें आस्था नहीं है और श्रवण - मननके विषयमें विचार ही नहीं होता, निदिध्यासन ( ध्यान ) भी कैसे किया जाय? अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ ५॥ प्रातःकाल स्नान करके आपका अभिषेक करनेके लिये मैं
गङ्गाजल लेकर प्रस्तुत नहीं हुआ, न कभी आपकी पूजाके लिये वनसे बिल्वपत्र ही लाया और न आपके लिये तालाबमें खिले हुए कमलोंकी माला तथा गन्ध - पुष्प ही लाकर अर्पण किये । अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ ६ ॥
मधु, घृत, दधि और शर्करायुक्त दूध ( पञ्चामृत ) से मैंने आपके लिङ्गको स्नान नहीं कराया, चन्दन आदिसे अनुलेपन नहीं किया, धतूरेके फूल, धूप, दीप, नाना रसोंसे युक्त नैवेद्योंद्वारा पूजन भी नहीं किया । अतः हे शिव! कपूर तथा! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा हे शिव
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१६ * स्तोत्ररत्नावली * 33333 ध्यात्वा चित्ते शिवाख्यं प्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो हव्यं ते लक्षसंख्यैर्हुतवहवदने नार्पितं बीजमन्त्रैः । नो तप्तं गाङ्गतीरे व्रतजपनियमै रुद्रजाप्यैर्न वेदैः । क्षन्तव्यो । ८ । स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुण्डले सूक्ष्ममार्गे शान्ते स्वान्ते प्रलीने प्रकटितविभवे ज्योतिरूपे पराख्ये । लिङ्गज्ञे ब्रह्मवाक्ये सकलतनुगतं शङ्करं न स्मरामि । क्षन्तव्यो । ९ । नग्नो निःसङ्गशुद्धस्त्रिगुणविरहितो ध्वस्तमोहान्धकारो नासाग्रे न्यस्तदृष्टिर्विदितभवगुणो नैव दृष्टः कदाचित् । · उन्मन्यावस्थया त्वां विगतकलिमलं शंकरं न स्मरामि । क्षन्तव्यो ० । १० । करो! क्षमा करो! ॥ ७ ॥ मैंने चित्तमें शिव नामक आपका स्मरण करके
ब्राह्मणोंको प्रचुर धन नहीं दिया, न आपके एक लक्ष बीजमन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुतियाँ दीं और न व्रत एवं जपके नियमसे तथा रुद्रजाप और वेदविधिसे गङ्गातटपर कोई साधना ही की । अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ ८ ॥
जिस सूक्ष्ममार्गप्राप्य सहस्रदल कमलमें पहुँचकर प्राणसमूह प्रणवनादमें लीन हो जाते हैं और जहाँ जाकर वेदके वाक्यार्थ तथा तात्पर्यभूत पूर्णतया आविर्भूत ज्योतिरूप शान्त परम तत्त्वमें लीन हो जाता है, उस कमलमें स्थित होकर मैं सर्वान्तर्यामी कल्याणकारी आपका स्मरण नहीं करता हूँ । अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ ९ ॥ नग्न, निःसङ्ग, शुद्ध और त्रिगुणातीत होकर, मोहान्धकारका
ध्वंस कर तथा नासिकाग्रमें दृष्टि स्थिरकर मैंने ( आप ) शङ्करके गुणोंको जानकर कभी आपका दर्शन नहीं किया और न उन्मनी अवस्थासे कलिमलरहित आप कल्याणस्वरूपका स्मरण ही करता हूँ । अतः हे शिव! हे शिव! हे शङ्कर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो! ॥ १० ॥
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* शिवस्तोत्राणि * १७ चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गङ्गाधरे शंकरे सर्पैर्भूषितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थवैश्वानरे । दन्तित्वक्कतसुन्दराम्बरधरे त्रैलोक्यसारे हरे मोक्षार्थं कुरु चित्तवृत्तिमखिलामन्यैस्तु किं कर्मभिः ॥ ११ ॥
किं वानेन धनेन वाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं किं वा पुत्रकलत्रमित्रपशुभिर्देहेन गेहेन किम् । ज्ञात्वैतत्क्षणभङ्गरं सपदि रे त्याज्यं मनो दूरतः स्वात्मार्थं गुरुवाक्यतो भज भज श्रीपार्वतीवल्लभम् ॥ १२ ॥
आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः । लक्ष्मीस्तोयतरङ्गभङ्गचपला विद्युच्चलं जीवितं तस्मान्मां शरणागतं शरणद त्वं रक्ष रक्षाधुना ॥ १३ ॥
चन्द्रकलासे जिनका ललाट- प्रदेश भासित हो रहा है, जो कन्दर्पदर्पहारी हैं, गङ्गाधर हैं, कल्याणस्वरूप हैं, सर्पोंसे जिनके कण्ठ और कर्ण भूषित हैं, नेत्रोंसे अग्नि प्रकट हो रहा है, हस्तिचर्मकी जिनकी कन्था है तथा जो त्रिलोकीके सार हैं, उन शिवमें मोक्षके लिये अपनी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियोंको लगा दे; और कर्मोंसे क्या प्रयोजन है? ॥ ११ ॥ इस धन, घोड़े, हाथी और राज्यादिकी
प्राप्तिसे क्या? पुत्र, स्त्री, मित्र, पशु, देह और घरसे क्या? इनको क्षणभङ्गुर जानकर रे मन! दूरहीसे त्याग दे और आत्मानुभवके लिये गुरुवचनानुसार पार्वतीवल्लभ श्रीशङ्करका भजन कर ॥ १२ ॥ देखते - देखते आयु नित्य नष्ट
हो रही है, यौवन प्रतिदिन क्षीण हो रहा है; बीते हुए दिन फिर लौटकर नहीं आते; काल सम्पूर्ण जगत्को खा रहा है । लक्ष्मी जलकी तरङ्गमालाके समान चपल है; जीवन बिजलीके समान चञ्चल है; अतः मुझ शरणागतकी हे शरणागतवत्सल शङ्कर! अब रक्षा करो रक्षा करो! ॥ १३ ॥
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१८ * स्तोत्ररत्नावली * *********************** 5555555555 करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् । विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ १४ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीशिवापराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ९. - वेदसारशिवस्तवः पशूनां पतिं पापनाशं परेशं # गजैन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् । जटाजूटमध्ये * स्फुरद्गाङ्गवारि महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥ १ ॥
महेशं सुरेशं सुरार्तिनाश विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् । विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥ २ ॥
हाथोंसे, पैरोंसे, वाणीसे, शरीरसे, कर्मसे, कर्णोंसे, नेत्रोंसे अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको हे करुणासागर
महादेव शम्भो! क्षमा कीजिये । आपकी जय हो, जय हो ॥ १४ ॥
= जो सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक हैं, पापका ध्वंस करनेवाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराजका चर्म पहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूटमें श्रीगङ्गाजी खेल रही हैं, उन एकमात्र कामारि श्रीमहादेवजीका मैं स्मरण करता हूँ ॥ १ ॥
चन्द्र, सूर्य और अग्नि- तीनों जिनके नेत्र हैं, उन विरूपनयन महेश्वर, देवेश्वर,
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* शिवस्तोत्राणि * १ ९ गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गणातीतरूपम् । भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥ ३ ॥
शिवाकान्त शम्भो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन् । त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥ ४ ॥
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम् । P यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥ ५ ॥
देवदुःखदलन, विभु, विश्वनाथ, विभूतिभूषण, नित्यानन्दस्वरूप, पञ्चमुख भगवान् महादेवकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ २ ॥ जो कैलासनाथ हैं, गणनाथ हैं,
नीलकण्ठ हैं, बैलपर चढ़े हुए हैं, अगणित रूपवाले हैं, संसारके आदिकारण हैं, प्रकाशस्वरूप हैं, शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं और श्रीपार्वतीजी जिनकी अर्द्धाङ्गिनी हैं, उन पञ्चमुख महादेवजीको मैं भजता हूँ ॥ ३ ॥
हे पार्वतीवल्लभ महादेव! हे चन्द्रशेखर! हे महेश्वर! हे त्रिशूलिन्! हे जटाजूटधारिन्! हे विश्वरूप! एकमात्र आप ही जगत्में व्यापक हैं । हे पूर्णरूप प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये ॥ ४ ॥ जो परमात्मा हैं, एक हैं,
जगत्के आदिकारण हैं, इच्छारहित हैं, निराकार हैं और प्रणवद्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जिनसे सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति और पालन होता है और फिर जिनमें
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२० स्तोत्ररत्नावली * न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायु-र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा । न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥ ६ ॥
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते
भासकानाम् ।
द्वैतहीनम् ॥ ७ ॥
चिदानन्दमूर्ते ।
श्रुतिज्ञानगम्य ॥ ८ ॥
उसका लय हो जाता है उन प्रभुको मैं भजता हूँ ॥ ५ ॥ जो न पृथ्वी हैं, न जल
हैं, न अग्नि हैं, न वायु हैं और न आकाश हैं; न तन्द्रा हैं, न निद्रा हैं, न ग्रीष्म हैं और न शीत हैं तथा जिनका न कोई देश है, न वेष है, उन मूर्तिहीन त्रिमूर्तिकी मैं स्तुति करता हूँ ॥६ ॥
जो अजन्मा हैं, नित्य हैं, कारणके भी कारण हैं, कल्याणस्वरूप हैं, एक हैं, प्रकाशकोंके भी प्रकाशक हैं, अवस्थात्रयसे विलक्षण हैं, अज्ञानसे परे हैं, अनादि और अनन्त हैं, उन परमपावन अद्वैतस्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ हे
विश्वमूर्ते! हे विभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे चिदानन्दमूर्ते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे तप तथा योगसे प्राप्तव्य प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे वेदवेद्य भगवन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ८ ॥