स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 121–130

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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* • विष्णुस्तोत्राणि * १११ यस्मात्प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्म-शोकाग्निना सकलयोनिषु दह्यमानः । दुःखौषधं तदपि दुःखमतद्वियाहं भूमन् भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम् ॥ १० ॥

सोऽहं प्रियस्य सुहृदः परदेवताया लीलाकथास्तव नृसिंह विरिञ्चगीताः । अञ्जस्तितर्म्यनुगृणन् गुणविप्रमुक्तो दुर्गाणि ते पदयुगालयहंससङ्गः ॥ ११ ॥

बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः । दुःखसे भयभीत हो रहा हूँ, जहाँ मुझे कर्मोंने बाँधकर हिंस्र जीवोंके बीचमें डाल दिया है । हे श्रेष्ठतम! अब आप प्रसन्न होकर मुझे अपने मोक्षप्रद और शरणदायक चरणोंमें कब बुलायेंगे ॥ ९ ॥ हे भूमन्! मैं सभी योनियोंमें

प्रियके वियोग और अप्रियके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले शोकानलसे सन्तप्त होता रहा हूँ; उस दुःखकी जो ( इष्टप्राप्तिरूप ) ओषधि है वह भी दुःख ही है; अतः मैं देहादि अनात्मामें आत्मबुद्धिकर चिरकालसे भटक रहा हूँ, सो आप मुझे अपने दास्यभावका उपदेश दीजिये ॥ १० ॥ हे नृसिंह! आप सबके प्रिय,

सुहृद् और श्रेष्ठ देवतारूप हैं; आपके दासभावको प्राप्त होकर मैं, आपके चरणयुगलमें निवास करनेवाले ज्ञानियोंका सहवास करता हुआ गुणोंसे मुक्त हो ब्रह्माजीद्वारा कही हुई आपकी लीलाकथाओंको गाकर सुगमतासे ही संसारसे पार हो जाऊँगा ॥ ११ ॥ हे नृसिंह! इस लोकमें सन्तप्त पुरुषोंकी

दुःखनिवृत्तिका जो उपाय माना जाता है, आपके उपेक्षा करनेपर वह एक

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११२ * स्तोत्ररत्नावली * तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाञ्जसेष्ट-स्तावद्विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ॥ १२ ॥

यस्मिन्यतो यर्हि येन च यस्य यस्मा-द्यस्मै यथा यदुत यस्त्वपरः परो वा । भावः करोति विकरोति पृथक्स्वभावः सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ १३ ॥

माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः क चोदितगुणानुमतेन पुंसः । छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥ १४ ॥

क्षणके लिये ही होता है ( कुछ स्थायी नहीं होता ) । बालकके लिये माता - पिता, रोगीके लिये ओषधि और समुद्रमें डूबते हुएके लिये नौका सदा ही सहायक नहीं होते ( उनके रहते हुए भी विपरीत फल होता देखा गया है ) ॥ १२ ॥ हे भगवन्! ( ब्रह्मादि ) पुरातन अथवा ( उनसे प्रेरित

माता - पितादि ) अर्वाचीन कर्ता जिसमें जिससे जब जिसके द्वारा जिसका जिससे जिसके लिये जिस प्रकार जो कुछ बनाते अथवा बिगाड़ते हैं, वह सब भिन्न - भिन्न स्वभाववाला आपहीका रूप है ॥ १३ ॥ हे प्रभो! पुरुषकी

अनुमतिसे कालके द्वारा गुणोंमें क्षोभ होनेपर माया मनःप्रधान लिङ्गदेहकी रचना करती है जो अति बलवान्, कर्ममय, वैदिक कर्मकलापमें आसक्त तथा अविद्याद्वारा अर्पित ( मन, दस इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्रा- -इन ) सोलह विकारोंसे युक्त है; सो हे अजन्मा प्रभो! आपसे अलग रहनेवाला ऐसा कौन पुरुष है जो उस ( मनरूप ) संसारचक्रको पार कर सके ॥ १४ ॥

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* विष्णुस्तोत्राणि * ११३ स त्वं हि नित्यविजितात्मगुणः स्वधाम्ना वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः । चक्रे विसृष्टमजयेश्वर षोडशारे निष्पीड्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम् ॥ १५ ॥

दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपाना-मायुः श्रियो विभव इच्छति याञ्जनोऽयम् ।

येऽस्मत्पितुः कुपितहासविजृम्भितभ्रू-विस्फूर्जितेन लुलिताः स तु ते निरस्तः ॥ १६ ॥

तस्मादमूस्तनुभृतामहमाशिषो ज्ञ आयुः श्रियं विभवमैन्द्रियमा विरिञ्चात् । नेच्छामि ते विलुलितानुरुविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपार्श्वम् ॥ १७ ॥

हे प्रभो! आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणों पर नित्य विजय प्राप्तकर कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनको अपने वशमें रखनेवाले हैं, हे ईश्वर! मैं मायाद्वारा इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डाला जाकर ( इक्षुदण्डके समान ) पेरा जा रहा हूँ, कृपया आप मुझ शरणागतको अपने समीप खींच लें ॥ १५ ॥ हे विभो! संसारी लोग जिनकी इच्छा रखते हैं वे

स्वर्गलोकमें मिलनेवाली सम्पूर्ण लोकपालोंकी आयु, लक्ष्मी और विभूतियाँ तो मैंने खूब देख लीं । वे तो हमारे पिताके क्रोधयुक्त हास्यद्वारा किये हुए भृकुटिविलाससे ही नष्ट हो गयी थीं और अब आपने उन्हें भी मार डाला ॥ १६ ॥ अतः जीवोंके इन भोगादिके परिणामको जाननेवाला मैं ब्रह्माके

भी आयु, वैभव और इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंकी इच्छा नहीं करता; क्योंकि वे

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११४ * स्तोत्ररत्नावली * ***** कुत्राशिषः श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाः वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोहः । निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान् कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः ॥ १८ ॥

क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मि-ञ्जातः सुरेतरकुले क्व न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै यन्मेऽर्पितः शिरसि नैषा परावरमतिर्भवतो ननु ज्जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो संसेवया सुरतरोरिव ते सेवानुरूपमुदयो तवानुकम्पा । रमाया पद्मकरः प्रसादः ॥ १ ९ ॥ स्या-जगतस्तथापि । प्रसादः परावरत्वम् ॥ २० ॥।

सभी परम पराक्रमी कालरूप परमेश्वरसे ग्रस्त हैं । अतः मुझे आप अपने दासोंके समीप ले चलिये ॥ १७ ॥ अहो! कहाँ केवल सुननेमें सुखदायक

मृगतृष्णारूप विषयभोग और कहाँ सम्पूर्ण रोगोंका उत्पत्तिस्थान यह शरीर! किन्तु मनुष्य इनकी असारता और नाशवत्ताको जानकर भी, बड़ी कठिनतासे प्राप्त होनेवाले ( भोगरूप ) मधुकणोंसे अपनी भोगेच्छारूप अग्निको शान्त करनेकी चेष्टा करता है । इनसे विरक्त नहीं होता ॥ १८ ॥ हे ईश! कहाँ तो इस

तमःप्रधान असुरकुलमें रजोगुणसे उत्पन्न हुआ मैं? और कहाँ आपकी कृपा? अहो! जो अपना प्रसादस्वरूप ( और सकलसन्तापहारी ) करकमल आपने कभी ब्रह्मा, महादेव और लक्ष्मीके सिरपर भी नहीं रखा वही मेरे मस्तकपर रखा ॥ १ ९ ॥ अन्य संसारी पुरुषोंके समान ( ब्रह्मादिक और मेरे - जैसे

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* विष्णुस्तोत्राणि * ११५ एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात् । कृत्वाऽऽत्मसात्सुरर्षिणा भगवन्गृहीतः सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम् ॥ २१ ॥

मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्च 5555555555555555555555555555555555555555

मन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम् ।

खड्गं प्रगृह्य यदवोचदसद्विधित्सु-स्त्वामीश्वरो मदपरोऽवतु कं हरामि ॥। २२ ॥

एकस्त्वमेव जगदेतदमुष्य यत्त्व-माद्यन्तयोः पृथगवस्यसि पृथगवस्यसि मध्यतश्च । प्राणियोंमें ) आपकी उत्तम अधम बुद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्के आत्मा और सुहृद् हैं । ( फिर भी आपकी कृपामें जो अन्तर देखा जाता है उसका कारण यही है कि ) कल्पवृक्षके समान आपकी कृपा भी सेवासे ही प्राप्त होती है — सेवाके अनुसार ही आप कृपा करते हैं— कुछ ऊँच - नीच दृष्टिसे नहीं ॥ २० ॥ हे भगवन्! संसाररूप सर्पयुक्त कुएँ में पड़े हुए अन्य

कामासक्त पुरुषोंके साथ मैं भी उसीमें गिरा जा रहा था । उस समय देवर्षि नारदने मुझे अपना मानकर अनुगृहीत किया था । ( उन्हींकी कृपासे आज मुझे आपके दर्शनोंका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ) अतः मैं आपके दासोंकी सेवा किस प्रकार त्याग सकता हूँ? ॥ २१ ॥ हे अनन्त! मेरे पिताने अन्याय करनेकी

इच्छासे हाथमें खड्ग लेकर जो कहा कि ' मुझसे अतिरिक्त यदि कोई ईश्वर है तो तेरी रक्षा करे — मैं तेरा सिर काटता हूँ, उस समय आपने जो मेरे प्राणोंकी रक्षा की और मेरे पिताका वध किया, वह भी अपने दास देवर्षि नारदके वचनोंको सत्य करनेके लिये ही था - ऐसा मैं मानता हूँ ॥ २२ ॥ हे नाथ! यह

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११६ * स्तोत्ररत्नावली * सृष्ट्वा गुणव्यतिकरं निजमाययेदं नाव तैरवसितस्तदनुप्रविष्टः ॥ २३ ॥

त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो माया यदात्मपरबुद्धिरियं पार्था । यद्यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च तद्वै तदेव वसुकालवदष्टितर्वोः ॥ २४ ॥

न्यस्येदमात्मनि जगद्विलयाम्बुमध्ये

शेषेऽऽत्मना निजसुखानुभवो निरीहः ।

योगेन मीलितदृगात्मनिपीतनिद्र-स्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्च युङ्गे ॥ २५ ॥

सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं, क्योंकि ( सत्स्वरूप होनेके कारण ) इसके आदि और अन्तमें ( कारण और अवधिरूपसे ) आप ही अवशिष्ट रहते हैं तथा मध्यमें ( अधिष्ठानरूपसे ) आप ही स्थित हैं । आप ही अपनी मायासे गुणोंके परिणामरूप इस जगत्को रचकर इसमें अनुप्रविष्ट हो उन गुणों i ( सृष्टि- ट - प्रलय आदि ) व्यापारोंसे जगत्के स्रष्टा, रक्षक और संहारक आदि भिन्न - भिन्न रूपोंसे प्रतीत होते हैं ॥ २३ ॥ हे ईश! यह सत् ( कार्य ), असत्

( कारण ) रूप सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं, किन्तु आप ( इसके आदि और अन्तमें भी वर्तमान रहनेके कारण ) इससे भिन्न हैं । अतः ' यह मेरा है — यह पराया है ' ऐसी निरर्थक बुद्धि माया ही है; क्योंकि जिसका जिससे जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता है, वह तद्रूप ही होता है; अतः जिस प्रकार ( कार्यरूप ) वृक्ष और ( कारणरूप ) बीज दोनों ही गन्धतन्मात्रारूप हैं उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं ॥ २४ ॥ हे प्रभो! आप इस निखिल

प्रपञ्चको अपनेमें समेटकर आत्मसुखका अनुभव करते हुए निरीह होकर

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* विष्णुस्तोत्राणि * ११७ तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या

सञ्चोदितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम् ।

अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधे-र्नाभेरभूत्स्वकणिकावटवन्महाब्जम् ॥ २६ ॥

तत्सम्भवः कविरतो ऽन्यदपश्यमान-स्त्वां बीजमात्मनि ततं स्वबहिर्विचिन्त्य । नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो जातेऽङ्करे कथम् होपलभेत बीजम् ॥ २७ ॥

स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आस्थितोऽब्जं T तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । प्रलयकालीन जलमें शयन करते हैं । उस समय योगद्वारा बाह्य दृष्टि मूँदकर और आत्मस्वरूपके प्रकाशसे निद्राको जीतकर आप तुरीयपदमें स्थित रहते हैं- -न तो तमोयुक्त ही होते हैं और न विषयोंके भोक्ता ही ॥ २५ ॥ यह

ब्रह्माण्ड, अपनी कालशक्तिसे प्रकृतिके गुणोंको प्रेरित करनेवाले उन्हीं आपका रूप है । पहले यह आपहीमें निहित था; जब प्रलयकालीन जलके भीतर शेषशय्यापर शयन करनेवाले आपने योगनिद्रारूप समाधिको त्यागा तो वटके बीजसे उत्पन्न हुए महावृक्षके समान आपकी नाभिसे अति विशाल ब्रह्माण्डकमल उत्पन्न हुआ ॥ २६ ॥ उससे उत्पन्न हुए सूक्ष्मदर्शी ब्रह्माजीको

जब उस कमलके अतिरिक्त और कुछ भी दिखायी न दिया तो अपनेमें व्याप्त बीजरूप आपको अपनेसे बाहर समझकर वे सौ वर्षतक जलके भीतर घुसकर ढूँढ़ते रहे, किन्तु उन्हें कुछ भी न मिला — सो ठीक ही है, क्योंकि अङ्कर उत्पन्न हो जानेपर ( उसमें व्याप्त हुए ) बीजको कोई पुरुष पृथक् कैसे देख सकता है ॥२७ ॥ इससे आत्मयोनि श्रीब्रह्माजी अति विस्मित हो उस

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११८ * स्तोत्ररत्नावली * ******* त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं भूतेन्द्रियाशयमये विततं एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् मायामयं सदुपलक्षितसन्निवेशं ददर्श ॥ २८ ॥

दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ २ ९ ॥ तस्मै भवान् हयशिरस्तनुवं च बिभ्रद् वेदावतिबलौ मधुकैटभाख्यौ । हत्वाऽऽनयच्छ्रतिगणांस्तु रजस्तमश्च सत्त्वं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥ ३० ॥

इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै-र्लोकान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान् । कमलपर बैठ गये । हे ईश! फिर बहुत समयतक तीव्र तपस्याद्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जानेपर उन्हें, पृथ्वीमें व्याप्त अति सूक्ष्म गन्धतन्मात्राके समान भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप अपने शरीरमें व्याप्त हुए आपका साक्षात्कार हुआ ॥ २८ ॥ इस प्रकार सहस्रों वदन, चरण, सिर, हाथ, ऊरु,

नासिका, मुख, कर्ण, नयन, आभूषण और आयुधोंसे सम्पन्न चौदह लोकरूप अवयवोंसे विभूषित आप मायामय विराट् पुरुषका दर्शनकर ब्रह्माजीको परमानन्द प्राप्त हुआ ॥ २ ९ ॥ तब आपने हयग्रीवरूप धारणकर अति प्रबल और वेदद्रोही रजोगुण- तमोगुणरूप मधु और कैटभ नामक दो दैत्योंको मारकर उन ब्रह्माजीको सत्त्वगुणरूप समस्त वेद समर्पण किये । अतः सत्त्वगुणको ही आपका प्रियतम रूप कहा जाता है ॥ ३० ॥ हे परमपुरुष! इस प्रकार आप

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* विष्णुस्तोत्राणि * ११ ९ 555555555555555555 ££££££ * £ * £££ * £££ धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम् ॥ ३१ ॥

नैतन्मनस्तव कथासु विकुण्ठनाथ सम्प्रय दुरितदुष्टमसाधु तीव्रम् । कामातुरं हर्षशोकभयैषणात तस्मिन् कथं तव गतिं विमृशामि दीनः ॥ ३२ ॥

जिह्वैकतो ऽच्युत विकर्षति मावितृप्ता

शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।

घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-बह्वयः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ ३३ ॥

एवं स्वकर्मपतितं भववैतरण्या-मन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम् मनुष्य, तिर्यक्, ऋषि, देवता और मत्स्यादि अवतार लेकर सम्पूर्ण लोकोंका पालन और जगद्विद्रोहियोंका संहार करते हैं । उन अवतारोंद्वारा आप प्रत्येक युगके धर्मोंकी रक्षा करते हैं, किन्तु कलियुगमें ( अवतार न लेकर ) गुप्तरूपसे ही रहते हैं; इसीलिये आप ' त्रियुग ' नामसे भी प्रसिद्ध हैं ॥ ३१ ॥ हे विकुण्ठनाथ!

यह मेरा मन अति असाधु, दोषदूषित, कामातुर तथा हर्ष, शोक, भय और त्रिविध एषणाओंसे व्याकुल है, आपकी कथाओंमें इसकी प्रीति ही नहीं है । मैं दीन ऐसे कलुषित चित्तमें किस प्रकार आपके स्वरूपका चिन्तन करूँ ॥ ३२ ॥ हे अच्युत!

जिस प्रकार बहुत - सी सपत्नियाँ ( सौतें ) अपने स्वामीको अपनी - अपनी ओर खींचती हैं उसी प्रकार मुझे अतृप्त रसना एक ओर, उपस्थ दूसरी ओर, त्वचा, उदर एवं कर्ण किसी तीसरी ओर, घ्राण और चञ्चल नयन किसी और तरफ तथा कर्मेन्द्रियाँ और ही स्थानकी ओर खींचती हैं ॥ ३३ ॥ इस संसाररूप वैतरणीमें

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१२० * स्तोत्ररत्नावली * पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहवैरमैत्रं हन्तेति पारचर पीपृहि मूढमद्य ॥ ३४ ॥

को न्वत्र तेऽखिलगुरो भगवन् प्रयास उत्तारणेऽस्य भवसम्भवलोपहेतोः । मूढेषु वै महदनुग्रह आर्तबन्धो किं तेन ते प्रियजनाननुसेवतां नः ॥ ३५ ॥

नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्या-स्त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ-मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान् ॥ ३६ ॥

अपने कर्मोंके कारण पड़कर एक - दूसरेके जन्म, मरण एवं खान - पानादिसे अत्यन्त भयभीत तथा अपने और पराये पुरुषोंसे मित्रता एवं द्वेष करनेवाले मूढ़ जनसमुदायका हे पार लगानेवाले! आप अब पालन कीजिये ॥ ३४ ॥ हे

अखिलगुरो! आप सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और पालन करनेवाले हैं । हे भगवन्! इन सबको पार लगाना आपके लिये ऐसी क्या प्रयासकी बात है? हे दीनबन्धो! महापुरुषोंकी कृपा तो मूढ़ोंपर ही होनी चाहिये; आपके प्रिय दासोंकी सेवा करनेवाले हमलोगोंके लिये उसका ऐसा क्या प्रयोजन है? ( हम तो उनकी सेवासे ही तर जायँगे ) ॥ ३५ ॥ हे प्रभो! जिसका पार करना

दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है उस संसाररूप वैतरणीसे मुझे कुछ भी भय नहीं है, क्योंकि मेरा चित्त आपके पौरुषगानरूप परमामृतका पान करके मग्न रहता है, मुझे तो उन्हींकी चिन्ता है जो मूढ़ उससे विमुख रहकर इन्द्रियोंके विषयोंसे प्राप्त होनेवाले मायिक सुखके लिये कुटुम्बपोषणादिका भार वहन