स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 131–140

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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* विष्णुस्तोत्राणि * १२१ प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ३७ ॥ ॥

यन्मैथुनादि गृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् ।

तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःख भाजः ।

कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः ॥ ३८ ॥

मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म-व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्याः । करते रहते हैं ॥ ३६ ॥ हे देव! मुनिजन प्रायः अपनी ही मुक्तिकी इच्छासे

एकान्तमें रहकर मौनव्रत धारण कर लेते हैं, वे दूसरेके हितमें तत्पर नहीं होते । किन्तु मुझे इन गरीबोंको छोड़कर अकेले ही मुक्त होनेकी इच्छा नहीं है और संसारमें भटकनेवाले इन लोगोंके लिये आपके सिवा और कोई मुझे उद्धार करनेवाला भी दिखायी नहीं देता ॥ ३७ ॥ हे प्रभो! मैथुनादि जो गृहस्थीके

सुख हैं वे खुजलीके समान हैं । जिस प्रकार हाथोंसे खुजलानेपर खुजलीमें ( पहले कुछ चैन पड़नेपर भी फिर ) अधिकाधिक दुःख ही बढ़ता है, उसी प्रकार ये भोग भी अत्यन्त तुच्छ हैं । किन्तु अनेकों दुःख उठानेपर भी ये दीनजन इनसे तृप्त नहीं होते । कोई धीर पुरुष ही खुजलीके समान कामादि वेगोंको सहन करता है ॥३८ ॥ हे परमपुरुष! मौनव्रत, शास्त्रश्रवण, तप, वेदाध्ययन,

स्वधर्मपालन, शास्त्रोंकी व्याख्या करना, एकान्तसेवन, जप और समाधि-

पृष्ठ 132

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१२२ * स्तोत्ररत्नावली * प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥ ३ ९ ॥ रूपे इमे सदसती तव वेदसृष्टे बीजाङ्कराविव न चान्यदरूपकस्य । युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४० ॥

त्वं वायुरग्निरवनिर्वियदम्बुमात्राः प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्च । सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम् ॥ ४१ ॥

नैते गुणा न गुणिनो महदादयो ये सर्वे मनःप्रभृतयः सहदेवमर्त्याः । ये जो मोक्षके दस साधन हैं वे भी प्रायः अजितेन्द्रिय पुरुषोंकी जीविकाके साधन बन जाते हैं; तथा दाम्भिकोंके लिये तो वे कभी जीविकाके साधन रहते भी हैं और कभी ( दम्भ खुल जानेपर ) नहीं भी रहते ॥ ३ ९ ॥ वेदने बीज और अङ्कुरके समान कार्य और कारण – ये आपके दो रूप बतलाये हैं । वास्तवमें आप रूपरहित हैं; परन्तु इन्हें छोड़कर आपके ज्ञानका और कोई साधन भी नहीं है । योगीजन काष्ठमें निहित अग्निके समान भक्तियोगद्वारा इन ( कार्य और कारण ) दोनोंहीमें आपका साक्षात्कार करते हैं; क्योंकि आपके सिवा इनकी पृथक् कोई सत्ता नहीं है ॥ ४० ॥ हे भूमन्! वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश,

जल, पञ्चतन्मात्रा, प्राण, इन्द्रिय, मन, चित्त, अहङ्कार तथा स्थूल सूक्ष्म सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं । अधिक क्या, जितने भी पदार्थ मन या वाणीके विषय हैं उनमेंसे कोई भी आपसे पृथक् नहीं हैं ॥ ४१ ॥ किन्तु हे महाकीर्ते!

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* विष्णुस्तोत्राणि ** १२३ आद्यन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा-मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात् ॥ ४२ ॥

तत् तम नमः स्तुतिकर्मपूजाः कर्म स्मृतिश्चरणयोः श्रवणं कथायाम् । संसेवया त्वयि विनेति षडङ्गया किं भक्तिं जनः एतावद्वर्णितगुणो प्रह्लादं प्रणतं प्रह्लाद भद्र भद्रं वरं वृणीष्वाभिमतं परमहंसगतौ लभेत ॥ ४३ ॥

नारद उवाच

भक्त्या भक्तेन निर्गुणः ।

प्रीतो यतमन्युरभाषत ॥ ४४ ॥

श्रीभगवानुवाच

ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम ।

कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम् ॥ ४५ ॥

ये सत्त्वादि गुण, गुणोंके परिणाम महत्तत्त्वादि तथा देवता और मनुष्योंके सहित मन - बुद्धि आदि कोई भी आपको नहीं जानते; क्योंकि सभी आदि - अन्तयुक्त हैं । आप ऐसे हैं - यह जानकर पण्डितजन शब्दतः आपका प्रतिपादन करनेसे उपरत हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ हे पूज्यतम! प्रणाम, स्तुति, सर्वकर्मार्पण, उपासना,

चरणोंका ध्यान तथा कथाश्रवण - इन छः अङ्गोंके सहित आपकी भली प्रकार सेवा किये बिना मनुष्यको केवल परमहंसोंको ही प्राप्त होनेवाले आपमें किस प्रकार भक्ति हो सकती है? ( अतः आपकी भक्ति प्राप्त हो — इसलिये मुझे अपना दास्यभाव ही प्रदान कीजिये ) ॥ ४३ ॥ श्रीनारदजी बोले — हे

राजन्! भक्त प्रह्लादद्वारा इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुणोंका वर्णन किया जानेपर उन निर्गुण भगवान्का क्रोध शान्त हो गया और वे विनयसम्पन्न प्रह्लादजीसे प्रसन्न होकर बोले ॥ ४४ ॥ श्रीभगवान्‌ने कहा— भद्र प्रह्लाद! तुम्हारा शुभ

पृष्ठ 134

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१२४ * स्तोत्ररत्नावली * ********

मामप्रीणत आयुष्मन् दर्शनं दुर्लभं हि मे ।

दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमर्हति ॥ ४६ ॥

प्रीणन्ति ह्यथ मां धीराः सर्वभावेन साधवः ।

श्रेयस्कामा महाभागाः सर्वासामाशिषां पतिम् ॥ ४७ ॥

एवं प्रलोभ्यमानोऽपि वरैर्लोकप्रलोभनैः ।

एकान्तित्वाद् भगवति नैच्छत् तानसुरोत्तमः ॥ ४८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे नवमेऽध्याये प्रह्लादकृत-नृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् । हो । हे असुरश्रेष्ठ! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ । तुम मुझसे इच्छित वर माँगो, मैं मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर देता हूँ ॥ ४५ ॥ हे आयुष्मन्! जो

व्यक्ति मुझे प्रसन्न नहीं कर पाता उसे मेरा दर्शन मिलना अत्यन्त कठिन है । किन्तु जब मेरा दर्शन हो गया तब उसे किसी तरहका संताप नहीं करना पड़ता ॥४६ ॥ मैं सकल शुभ इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ, इसलिये

जितेन्द्रिय और अपना कल्याण चाहनेवाले महाभाग साधुजन सब प्रकार मुझे प्रसन्न करनेका प्रयत्न करते हैं ॥ ४७ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंको प्रलोभित

करनेवाले वरोंका लोभ दिखानेपर भी असुरश्रेष्ठ प्रह्लादने उनकी इच्छा नहीं की, क्योंकि वे भगवान्‌के अनन्य भक्त थे ॥ ४८ ॥

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रामस्तोत्राणि ३७ - श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीता-रामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः । अथ ध्यानम् ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥ इस रामरक्षास्तोत्र - मन्त्रके बुधकौशिक ऋषि हैं । सीता और रामचन्द्र देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है, सीता शक्ति हैं, श्रीमान् हनुमान्जी कीलक हैं तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये रामरक्षास्तोत्रके जपमें विनियोग किया जाता है । ध्यान — जो धनुष - बाण धारण किये हुए हैं, बद्धपद्मासनसे विराजमान हैं, पीताम्बर पहने हुए हैं, जिनके प्रसन्न नयन नूतन कमलदलसे स्पर्धा करते तथा वामभागमें विराजमान श्रीसीताजीके मुखकमलसे मिले हुए हैं उन आजानुबाहु, मेघश्याम, नाना प्रकारके अलङ्कारोंसे विभूषित तथा विशाल जटाजूटधारी श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करे ।

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१२६ EK स्तोत्ररत्नावली * स्तोत्रम्

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।

एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ १ ॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।

जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २ ॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।

स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३ ॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।

शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ ४ ॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।

घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ५ ॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।

स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥ ६ ॥

श्रीरघुनाथजीका चरित्र सौ करोड़ विस्तारवाला है और उसका एक - एक अक्षर भी मनुष्योंके महान् पापोंको नष्ट करनेवाला है ॥ १ ॥ जो नीलकमल-दलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, जटाओंके मुकुटसे सुशोभित, हाथोंमें

खड्ग, तूणीर, धनुष और बाण धारण करनेवाले, राक्षसोंके संहारकारी तथा संसारकी रक्षाके लिये अपनी लीलासे ही अवतीर्ण हुए हैं, उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान् रामका जानकी और लक्ष्मणजीके सहित स्मरणकर प्राज्ञ पुरुष इस सर्वकामप्रदा और पापविनाशिनी रामरक्षाका पाठ करे । मेरे सिरकी राघव और ललाटकी दशरथात्मज रक्षा करें ॥ २–४ ॥ कौसल्यानन्दन नेत्रोंकी रक्षा करें, विश्वामित्रप्रिय कानोंको सुरक्षित रखें तथा यज्ञरक्षक घ्राणकी और सौमित्रिवत्सल मुखकी रक्षा करें ॥ ५ ॥ मेरी जिह्वाकी

विद्यानिधि, कण्ठकी भरतवन्दित, कन्धोंकी दिव्यायुध और भुजाओंकी

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रामस्तोत्राणि * १२७

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।

मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ ७ ॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।

ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥ ८ ॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।

पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ९ ॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।

स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ १० ॥

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ ११ ॥

भग्नेशकार्मुक ( महादेवजीका धनुष तोड़नेवाले ) रक्षा करें ॥ ६ ॥ हाथोंकी

सीतापति, हृदयकी जामदग्न्यजित् ( परशुरामजीको जीतनेवाले ), मध्य-भागकी खरध्वंसी ( खर नामके राक्षसका नाश करनेवाले ) और नाभिकी जाम्बवदाश्रय ( जाम्बवान्‌के आश्रयस्वरूप ) रक्षा करें ॥ ७ ॥ कमरकी

सुग्रीवेश ( सुग्रीवके स्वामी ), सक्थियोंकी हनुमत्प्रभु और ऊरुओंकी राक्षसकुलविनाशक रघुश्रेष्ठ रक्षा करें ॥ ८ ॥ जानुओंकी सेतुकृत्, जङ्घाओंकी

दशमुखान्तक ( रावणको मारनेवाले ), चरणोंकी विभीषणश्रीद ( विभीषणको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ) और सम्पूर्ण शरीरकी श्रीराम रक्षा करें ॥ ९ ॥ जो

पुण्यवान् पुरुष रामबलसे सम्पन्न इस रक्षाका पाठ करता है वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता है ॥ १० ॥ जो जीव पाताल,

पृथ्वी अथवा आकाशमें विचरते हैं और जो छद्मवेशसे घूमते रहते हैं वे रामनामोंसे सुरक्षित पुरुषको देख भी नहीं सकते ॥ ११ ॥

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१२८ * स्तोत्ररत्नावली *

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।

नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२ ॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण यः कण्ठे धारयेत्तस्य वज्रपञ्जरनामेदं यो अव्याहताज्ञः सर्वत्र आदिष्टवान्यथा स्वप्ने तथा लिखितवान्प्रातः आरामः कल्पवृक्षाणां

रामनाम्नाभिरक्षितम् ।

करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥ १३ ॥

रामकवचं स्मरेत् ।

लभते जयमङ्गलम् ॥ १४ ॥

रामरक्षामिमां हरः ।

प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ १५ ॥

विरामः सकलापदाम् ।

अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥ १६ ॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।

पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १७ ॥

‘ राम ', ‘ रामभद्र ', ‘ रामचन्द्र ' इन नामोंका स्मरण करनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता तथा भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥ जो पुरुष जगत्‌को विजय

करनेवाले एकमात्र मन्त्र रामनामसे सुरक्षित इस स्तोत्रको कण्ठमें धारण करता है ( अर्थात् इसे कण्ठस्थ कर लेता है ) सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं ॥ १३ ॥ जो मनुष्य वज्रपञ्जर नामक इस रामकवचका स्मरण करता है उसकी

आज्ञाका कहीं उल्लङ्घन नहीं होता और उसे सर्वत्र जय और मङ्गलकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥ श्रीशङ्करने रात्रिके समय स्वप्नमें इस रामरक्षाका जिस प्रकार आदेश

दिया था उसी प्रकार प्रातःकाल जागनेपर, बुधकौशिकने इसे लिख दिया ॥ १५ ॥ जो मानो कल्पवृक्षोंके बगीचे हैं तथा समस्त आपत्तियोंका अन्त

करनेवाले हैं, जो तीनों लोकोंमें परम सुन्दर हैं वे श्रीमान् राम हमारे प्रभु हैं ॥ १६॥ जो तरुण अवस्थावाले, रूपवान्, सुकुमार, महाबली, कमलके

पृष्ठ 139

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* रामस्तोत्राणि * १२ ९

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।

पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १८ ॥

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।

रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ १ ९ ॥।

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।

रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥ २० ॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।

गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ २१ ॥

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।

काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥ २२ ॥

समान विशाल नेत्रवाले, चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्मधारी, फल - मूल आहार करनेवाले, संयमी, तपस्वी, ब्रह्मचारी, सम्पूर्ण जीवोंको शरण देनेवाले, समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और राक्षसकुलका नाश करनेवाले हैं वे रघुश्रेष्ठ दशरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें ॥। १७ – १ ९ ॥ जिन्होंने सन्धान किया हुआ धनुष ले रखा है, जो बाणका स्पर्श कर रहे हैं तथा अक्षय बाणोंसे युक्त तूणीर लिये हुए हैं वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करनेके लिये मार्गमें सदा ही मेरे आगे चलें ॥ २० ॥ सर्वदा उद्यत,

कवचधारी, हाथमें खड्ग लिये, धनुष - बाण धारण किये तथा युवा अवस्थावाले भगवान् राम लक्ष्मणजीके सहित आगे - आगे चलकर हमारे मनोरथोंकी रक्षा करें ॥ २१ ॥ ( भगवान्‌का कथन है कि ) राम, दाशरथि,

शूर, लक्ष्मणानुचर, बली, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघूत्तम,

पृष्ठ 140

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१३० * स्तोत्ररत्नावली *

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।

जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ २३ ॥

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।

अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥ २४ ॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।

स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥ २५ ॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् । राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्ति वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥ २६ ॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।

रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ २७ ॥

वेदान्तवेद्य, यज्ञेश, पुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ, श्रीमान् और अप्रमेयपराक्रम-इन नामोंका नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करनेसे मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञसे भी अधिक फल प्राप्त करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ २२- - २४ ॥ जो लोग दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, पीताम्बरधारी, भगवान् रामका इन दिव्य नामोंसे स्तवन करते हैं वे संसारचक्रमें नहीं पड़ते ॥ २५ ॥ लक्ष्मणजी

पूर्वज, रघुकुलमें श्रेष्ठ, सीताजीके स्वामी, अति सुन्दर, ककुत्स्थकुलनन्दन, करुणासागर, गुणनिधान, ब्राह्मणभक्त, परम धार्मिक, राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथपुत्र, श्याम और शान्तमूर्ति, सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, रघुकुलतिलक, राघव और रावणारि भगवान् रामकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २६ ॥ राम, रामभद्र,

रामचन्द्र, विधातृस्वरूप, रघुनाथ प्रभु सीतापतिको नमस्कार है ॥ २७ ॥