स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 141–150

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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* रामस्तोत्राणि * १३१ ***** 5555555555555555555555555ƒ ££££££ श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ २८ ॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ २ ९ ॥ रामो मत्पिता रामचन्द्रः

स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥। ३० ॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।

पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥ ३१ ॥

हे रघुनन्दन श्रीराम! हे भरताग्रज भगवान् राम! हे रणधीर प्रभु राम! आप मेरे आश्रय होइये ॥२८ ॥ मैं श्रीरामचन्द्रके चरणोंका मनसे स्मरण करता हूँ,

श्रीरामचन्द्रके चरणोंका वाणीसे कीर्तन करता हूँ, श्रीरामचन्द्रके चरणोंको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ तथा श्रीरामचन्द्रके चरणोंकी शरण लेता हूँ ॥ २ ९ ॥ राम मेरी माता हैं, राम मेरे पिता हैं, राम स्वामी हैं और राम ही मेरे सखा हैं । दयामय रामचन्द्र ही मेरे सर्वस्व हैं; उनके सिवा और किसीको मैं नहीं जानता – बिलकुल नहीं जानता ॥ ३० ॥ जिनकी दायीं ओर लक्ष्मणजी, बायीं ओर जानकीजी और

सामने हनुमान्जी विराजमान हैं उन रघुनाथजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ३१ ॥

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१३२ * स्तोत्ररत्नावली * लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं मनोजवं जितेन्द्रियं वातात्मजं श्रीरामदूतं कूजन्तं रामरामेति आरुह्य कविताशाखां आपदामपहर्तारं लोकाभिरामं श्रीरामं शरणं प्रपद्ये ॥ ३२ ॥

मारुततुल्यवेगं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वानरयूथमुख्यं शरणं प्रपद्ये ॥ ३३ ॥

मधुरं मधुराक्षरम् ।

वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥ ३४ ॥

दातारं सर्वसम्पदाम् ।

भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ३५ ॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।

तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥ ३६ ॥

जो सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, रणक्रीडामें धीर, कमलनयन, रघुवंशनायक, करुणामूर्ति और करुणाके भण्डार हैं उन श्रीरामचन्द्रजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३२ ॥ जिनकी मनके समान गति और वायुके समान वेग है, जो परम

जितेन्द्रिय और बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं उन पवननन्दन वानराग्रगण्य श्रीरामदूतकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३३ ॥ कवितामयी डालीपर बैठकर मधुर अक्षरोंवाले

' राम - राम ' इस मधुर नामको कूजते हुए वाल्मीकिरूप कोकिलकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ३४ ॥ आपत्तियोंको हरनेवाले तथा सब प्रकारकी सम्पत्ति प्रदान

करनेवाले लोकाभिराम भगवान् रामको बारंबार नमस्कार करता हूँ ॥ ३५ ॥।

' राम - राम ' ऐसा घोष करना सम्पूर्ण संसारबीजोंको भून डालनेवाला, समस्त

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* रामस्तोत्राणि १३३ रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः । रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ ३७ ॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ३८ ॥

इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ३८ - श्रीब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः वन्दे देवं विष्णुमशेषस्थितिहेतुं त्वामध्यात्मज्ञानिभिरन्तर्हृदि भाव्यम् । हेयायद्वन्द्वविहीनं परमेकं सत्तामात्रं सर्वहृदिस्थं दृशिरूपम् ॥ १ ॥

सुख - सम्पत्तिकी प्राप्ति करानेवाला तथा यमदूतोंको भयभीत करनेवाला है ॥ ३६ ॥ राजाओंमें श्रेष्ठ श्रीरामजी सदा विजयको प्राप्त होते हैं । मैं लक्ष्मीपति

भगवान् रामका भजन करता हूँ । जिन रामचन्द्रजीने सम्पूर्ण राक्षससेनाका ध्वंस कर दिया था, मैं उनको प्रणाम करता हूँ । रामसे बड़ा और कोई भी आश्रय नहीं है । मैं उन रामचन्द्रजीका दास हूँ । मेरा चित्त सदा राममें ही लीन रहे; हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये ॥ ३७ ॥ श्रीमहादेवजी पार्वतीजीसे कहते हैं— ) हे

सुमुखि! रामनाम विष्णुसहस्रनामके तुल्य है । मैं सर्वदा ' राम, राम, राम ' इस प्रकार मनोरम राम - नाममें ही रमण करता हूँ ॥ ३८ ॥

= ब्रह्माजी बोले- -जो सम्पूर्ण प्राणियोंकी स्थितिके कारण, आत्मज्ञानियों-द्वारा हृदयमें ध्यान किये जानेवाले, त्याज्य और ग्राह्यरूप द्वन्द्वसे रहित, सबसे

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१३४ * स्तोत्ररत्नावली प्राणापानौ निश्चयबुद्ध्या हृदि रुद्ध्वा छित्त्वा सर्वं संशयबन्धं विषयौघान् । पश्यन्तीशं यं गतमोहा यतयस्तं वन्दे रामं रत्नकिरीटं मायातीतं माधवमाद्यं जगदादि मानातीतं मोहविनाशं योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं वन्दे रामं रञ्जितलोकं भावाभावप्रत्ययहीनं भवमुख्यै-रविभासम् ॥ २ ॥

मुनिवन्द्यम् ।

रमणीयम् ॥ ३ ॥

योगासक्तैरर्चितपादाम्बुजयुग्मम् परे, अद्वितीय, सत्तामात्र, सबके हृदयमें विराजमान और साक्षीस्वरूप हैं उन आप भगवान् विष्णुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥ मोहहीन संन्यासीगण

निश्चित बुद्धिके द्वारा प्राण और अपानको हृदयमें रोककर तथा अपने सम्पूर्ण संशयबन्धन और विषय - वासनाओंका छेदनकर जिस ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन रत्नकिरीटधारी, सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥२ ॥ जो मायासे परे, लक्ष्मीके पति, सबके आदिकारण, जगत्के

उत्पत्तिस्थान, प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे, मोहका नाश करनेवाले, मुनिजनोंसे वन्दनीय, योगियोंसे ध्यान किये जानेयोग्य, योगमार्गके प्रवर्तक, सर्वत्र परिपूर्ण और सम्पूर्ण संसारको आनन्दित करनेवाले हैं, उन परम सुन्दर भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥ जो भाव और अभावरूप दोनों प्रकारकी प्रतीतियोंसे

रहित हैं तथा जिनके युगलचरणकमलोंका योगपरायण शङ्कर आदि पूजन

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* रामस्तोत्राणि * १३५ नित्यं शुद्धं बुद्धमनन्तं प्रणवाख्यं वन्दे रामं वीरमशेषासुरदावम् ॥ ४ ॥

त्वं मे नाथो नाथितकार्याखिलकारी मानातीतो माधवरूपोऽखिलधारी । भक्त्या गम्यो भावितरूपो भवहारी योगाभ्यासैर्भावितचेतः सहचारी ॥५ ॥

त्वामाद्यन्तं लोकततीनां परमीशं लोकानां नो लौकिकमानैरधिगम्यम् । भक्तिश्रद्धाभावसमेतैर्भजनीयं वन्दे रामं सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ॥ ६ ॥

को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं मायासक्तो माधव शक्तो मुनिमान्यम् । करते हैं और जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनन्त हैं, सम्पूर्ण दानवोंके लिये दावानलके समान उन ओङ्कार नामक वीरवर रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥

हे राम! आप मेरे प्रभु हैं और मेरे सम्पूर्ण प्रार्थित कार्योंको पूर्ण करनेवाले हैं, आप देश - कालादि मान ( परिमाण ) से रहित, नारायणस्वरूप, अखिल विश्वको धारण करनेवाले, भक्तिसे प्राप्य, अपने स्वरूपका ध्यान किये जानेपर संसार - भयको दूर करनेवाले और योगाभ्याससे शुद्ध हुए चित्तमें विहार करनेवाले हैं ॥ ५॥ आप इस लोक - परम्पराके आदि और अन्त ( अर्थात्

उत्पत्ति और प्रलयके स्थान ) हैं, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर हैं, आप किसी भी लौकिक प्रमाणसे जाने नहीं जा सकते, आप भक्ति और श्रद्धासम्पन्न पुरुषोंद्वारा भजन किये जानेयोग्य हैं, ऐसे नीलकमलके समान श्यामसुन्दर आप श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ हे लक्ष्मीपते! आप प्रत्यक्षादि

प्रमाणोंसे परे तथा सर्वथा निर्मान हैं । मायामें आसक्त कौन प्राणी आपको जाननेमें समर्थ हो सकता है? आप अनुपम और महर्षियोंके माननीय हैं तथा

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१३६ * स्तोत्ररत्नावली * KKKKKKKKKKKKKKKKKK वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं वन्दे रामं भवमुखवन्द्यं सुखकन्दम् ॥ ७ ॥

नानाशास्त्रैर्वेदकदम्बैः प्रतिपाद्यं नित्यानन्दं निर्विषयज्ञानमनादिम् । मत्सेवार्थं मानुषभावं प्रतिपन्नं वन्दे रामं मरकतवर्णं मथुरेशम् ॥ ८ ॥

श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं ब्राह्मं ब्रह्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्यः । रामं श्यामं कामितकामप्रदमीशं ध्यात्वा ध्याता पातकजालैर्विगतः स्यात् ॥ ९ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशसर्गे श्रीब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः सम्पूर्णा । ( कृष्णावतारके समय ) वृन्दावनमें अखिल देवसमूहकी वन्दना करनेवाले और रामरूपसे शिव आदि देवताओंके स्वयं वन्दनीय हैं; ऐसे आप आनन्दघन भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ जो नाना शास्त्र और वेदसमूहसे प्रतिपादित, नित्य

आनन्दस्वरूप, निर्विकल्प, ज्ञानस्वरूप और अनादि हैं तथा जिन्होंने मेरा कार्य करनेके लिये मनुष्यरूप धारण किया है उन मरकतमणिके समान नीलवर्ण मथुरानाथ * भगवान् रामको प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥ इस पृथ्वीपर जो मनुष्य

इच्छित कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्याममूर्ति भगवान् रामका ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके कहे हुए इस ब्रह्मज्ञानविधायक आद्य स्तोत्रका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, वह ध्यानशील पुरुष सम्पूर्ण पापजालसे मुक्त हो जायगा ॥ ९ ॥

* यहाँ भगवान् रामको मथुरानाथ कहकर श्रीराम और श्रीकृष्णकी अभिन्नता प्रकट की है ।

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* रामस्तोत्राणि * १३७ ३ ९ - जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रम् जटायुरुवाच

अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।

उपरमपरमं परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥ १ ॥

निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।

नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥ २ ॥

त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।

शरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ३ ॥

भवविपिनदवाग्निनामधेयं भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।

दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥ ४ ॥

जटायु बोला — जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदि-कारण हैं तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं, उन परम शान्तस्वरूप परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ १॥ जो असीम

आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं, उन धनुष - बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥ जो त्रिलोकीमें सबसे

अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं, उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥ जिनका नाम संसाररूप

वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो सहस्रों करोड़ दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं, उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४ ॥

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१३८ * स्तोत्ररत्नावली *

अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।

भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ५ ॥

गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।

सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रि सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥ ६ ॥

परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।

परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥ ७ ॥

स्मितरुचिरविकासिताननाब्जमतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।

सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥ ८ ॥

हरिकमलजशम्भुरूपभेदात्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।

रविवि जलपूरितोदपात्रेष्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥ ९ ॥

जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत ( जहाज ) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं, उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५ ॥

जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन - मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं, उन गिरिवरधारी सुखदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ६ ॥ जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये

गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं, उन निरन्तर परोपकारपरायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ७ ॥ जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे विकसित हो रहा है, जो

भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी - सी शोभावाले हैं, उन श्रीगुरु महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ८ ॥ हे प्रभो!

जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम — इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण आप ही विष्णु, ब्रह्मा और

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* रामस्तोत्राणि * १३ ९ रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं शतपथगोचरभावनाविदूरम् । यतिपतिहृदये सदा विभातं रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः । उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् । स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं इति राघवभाषितं तदा श्रुतवान् हर्षसमाकुलो रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं प्रपद्ये ॥ १० ॥

पदम् ॥ ११ ॥

लभेत् ॥ १२ ॥

द्विजः ।

पदम् ॥ १३ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे अरण्यकाण्डेऽष्टमे सर्गे जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रं सम्पूर्णम् । महादेवरूपसे भासित होते हैं । हे ईश! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ९ ॥ आपका दिव्य शरीर सैकड़ों करोड़

कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और यतीश्वरोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं । ऐसे आप आर्त्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १० ॥ जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर

श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले— ' जटायो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ ' ॥ ११ ॥ जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको

एकाग्रचित्तसे सुने, लिखे अथवा पढ़े, वह मेरा सारूप्य - पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होगा ॥ १२ ॥ पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह

कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारणकर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया ॥ १३ ॥

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१४० * स्तोत्ररत्नावली * ४० – इन्द्रकृतश्रीरामस्तोत्रम् इन्द्र उवाच भजेऽहं सदा राममिन्दीवराभं भवारण्यदावानलाभाभिधानम् भवानीहदा भावितानन्दरूपं भवाभावहेतुं भवादिप्रपन्नम् ॥ १ ॥

सुरानीकदुःखौघनाशैकहेतुं नराकारदेहं निराकारमीड्यम् । परेशं परानन्दरूपं वरेण्यं हरिं राममीशं भजे भारनाशम् ॥ २ ॥

प्रपन्नाखिलानन्ददोहं प्रपन्नं प्रपन्नार्तिनिःशेषनाशाभिधानम् 1 तपोयोगयोगीशभावाभिभाव्यं कपीशादिमित्रं भजे राममित्रम् ॥ ३ ॥

इन्द्र बोले- जो नीलकमलकी - सी आभावाले हैं, संसाररूप वनके लिये जिनका नाम दावानलके समान है, श्रीपार्वतीजी जिनके आनन्दस्वरूपका हृदयमें ध्यान करती हैं, जो ( जन्म - मरणरूप ) संसारसे छुड़ानेवाले हैं और शङ्करादि देवोंके आश्रय हैं, उन भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥ १ ॥

जो देवमण्डलके दुःखसमूहका नाश करनेके एकमात्र कारण हैं तथा जो मनुष्यरूपधारी, आकारहीन और स्तुति किये जानेयोग्य हैं, पृथ्वीका भार उतारनेवाले उन परमेश्वर परमानन्दरूप पूजनीय भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥ २ ॥ जो शरणागतोंको सब प्रकार आनन्द देनेवाले और उनके आश्रय हैं,

जिनका नाम शरणागत भक्तोंके सम्पूर्ण दुःखोंको दूर करनेवाला है, जिनका तप और योग एवं बड़े - बड़े योगीश्वरोंकी भावनाओंद्वारा चिन्तन किया जाता है तथा