स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 151–160

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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* रामस्तोत्राणि * १४१ सदा भोगभाजां सुदूरे विभान्तं सदा योगभाजामदूरे विभान्तम् । चिदानन्दकन्दं सदा राघवेशं विदेहात्मजानन्दरूपं प्रपद्ये ॥ ४ ॥

महायोगमायाविशेषानुयुक्तो विभासीश लीलानराकारवृत्तिः । त्वदानन्दलीलाकथापूर्णकर्णाः सदानन्दरूपा भवन्तीह लोके ॥ ५ ॥

अहं मानपानाभिमत्तप्रमत्तो न वेदाखिलेशाभिमानाभिमानः । इदानीं भवत्पादपद्मप्रसादात् त्रिलोकाधिपत्याभिमानो विनष्टः ॥ ६ ॥

स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिरामं धराभारभूतासुरानीकदावम् जो सुग्रीवादिके मित्र हैं, उन मित्ररूप भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥ ३ ॥ ज़ो

भोगपरायण लोगोंसे सदा दूर रहते हैं और योगनिष्ठ पुरुषोंके सदा समीप ही विराजते हैं, श्रीजानकीजीके लिये आनन्दस्वरूप उन चिदानन्दघन श्रीरघुनाथजीको मैं सर्वदा भजता हूँ ॥ ४ ॥ हे भगवन्! आप अपनी

महायोगमायाके गुणोंसे युक्त होकर लीलासे ही मनुष्यरूप प्रतीत हो रहे हैं । जिनके कर्ण आपकी इन आनन्दमयी लीलाओंके कथामृतसे पूर्ण होते हैं, वे संसारमें नित्यानन्दरूप हो जाते हैं ॥ ५ ॥ प्रभो! मैं तो सम्मान और सोमपानके

उन्मादसे मतवाला हो रहा था, सर्वेश्वरताके अभिमानवश मैं अपने आगे किसीको कुछ भी नहीं समझता था । अब आपके चरणकमलोंकी कृपासे मेरा त्रिलोकाधिपतित्वका अभिमान चूर हो गया ॥ ६॥ जो चमचमाते हुए

रत्नजटित भुजबंद और हारोंसे सुशोभित हैं, वे पृथ्वीके भाररूप राक्षसोंकी

पृष्ठ 152

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१४२ स्तोत्ररत्नावली * शरच्चन्द्रवक्त्रं लसत्पद्मनेत्रं दुरावारपारं भजे राघवेशम् ॥ ७ ॥

सुराधीशनीलाभ्रनीलाङ्गकान्तिं विराधादिरक्षोवधाल्लोकशान्तिम् । किरीटादिशोभं पुरारातिलाभं भजे रामचन्द्रं रघूणामधीशम् ॥ ८ ॥

लसच्चन्द्रकोटिप्रकाशादिपीठे समासीनमङ्के समाधाय सीताम् । स्फुरद्धेमवर्णां तडित्पुञ्जभासां भजे रामचन्द्रं निवृत्तार्तितन्द्रम् ॥ ९ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशसर्गे इन्द्रकृतश्रीरामस्तोत्रं सम्पूर्णम् । सेनाके लिये दावानलके समान हैं, जिनका शरच्चन्द्रके समान मुख और अति मनोहर नेत्रकमल हैं तथा जिनका आदि - अन्त जानना अत्यन्त कठिन है, उन रघुनाथजीको मैं भजता हूँ ॥ ७ ॥ जिनके शरीरकी इन्द्रनीलमणि और मेघके

समान श्याम कान्ति है, जिन्होंने विराध आदि राक्षसोंको मारकर सम्पूर्ण लोकोंमें शान्ति स्थापित की है, उन किरीटादिसे सुशोभित और श्रीमहादेवजीके परमधन रघुकुलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ ॥ ८ ॥ जो तेजोमय सुवर्णके - से

वर्णवाली और बिजलीके समान कान्तिमयी जानकीजीको गोदमें लिये करोड़ों चन्द्रमाओंके समान देदीप्यमान सिंहासनपर विराजमान हैं, उन दुःख और आलस्यसे हीन भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥ ९ ॥

पृष्ठ 153

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* रामस्तोत्राणि * १४३ ४१ - श्रीरामाष्टकम्

कृतार्तदेववन्दनं दिनेशवंशनन्दनम् ।

सुशोभिभालचन्दनं नमामि राममीश्वरम् ॥ १ ॥

मुनीन्द्रयज्ञकारकं शिलाविपत्तिहारकम् ।

महाधनुर्विदारकं नमामि राममीश्वरम् ॥ २ ॥

स्वतातवाक्यकारिणं तपोवने विहारिणम् ।

करे सुचापधारिणं नमामि राममीश्वरम् ॥ ३ ॥

कुरङ्गमुक्तसायकं जटायुमोक्षदायकम् ।

प्रविद्धकीशनायकं नमामि राममीश्वरम् ॥४ ॥

प्लवङ्गसङ्गसम्मति निबद्धनिम्नगापतिम् ।

दशास्यवंशसङ्गतिं नमामि राममीश्वरम् ॥ ५ ॥

आर्त देवताओंने जिनकी वन्दना की है, जो सूर्यवंशको आनन्दित करनेवाले हैं तथा जिनके ललाटपर चन्दन सुशोभित है, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ जो मुनिराज विश्वामित्रका यज्ञ सम्पन्न करानेवाले,

पाषाणरूपा अहल्याका कष्ट निवारण करनेवाले तथा श्रीशङ्करका महान् धनुष तोड़नेवाले हैं, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो अपने

पिताके वचनोंका पालन करनेवाले, तपोवनमें विचरनेवाले और हाथोंमें धनुष धारण करनेवाले हैं, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ जिन्होंने

मायामृगपर बाण छोड़ा था, जटायुको मोक्ष प्रदान किया था तथा कपिराज बालीको विद्ध किया था, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥४ ॥

जिन्होंने वानरोंके साथ मित्रता की, समुद्रका पुल बाँधा और रावणके वंशका विनाश किया, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ५ ॥

पृष्ठ 154

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१४४ * विदीनदेवहर्षणं KKKKKK स्वबन्धुशोककर्षणं गतारिराज्यरक्षणं कृतास्तमोहलक्षणं हताखिलाचलाभरं जगत्तमोदिवाकरं स्तोत्ररत्नावली *

कपीप्सितार्थवर्षणम् ।

नमामि राममीश्वरम् ॥ ६ ॥

प्रजाजनार्तिभक्षणम् ।

नमामि राममीश्वरम् ॥ ७ ॥

स्वधामनीतनागरम् ।

नमामि राममीश्वरम् ॥ ८ ॥

इदं समाहितात्मना नरो रघूत्तमाष्टकम् ।

पठन्निरन्तरं भयं भवोद्भवं न विन्दते ॥ ९ ॥

इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीरामाष्टकं सम्पूर्णम् । जो अति दीन देवताओंको प्रसन्न करनेवाले, वानरोंकी इच्छित कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और अपने बन्धुओंका शोक शान्त करनेवाले हैं, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥ जो शत्रुहीन ( निष्कण्टक )

राज्यके पालक, प्रजाजनकी भीतिके भक्षक और मोहकी निवृत्ति करनेवाले हैं, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ जिन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वीका भार

हरण किया है, जो सकल नगरनिवासियोंको अपने धामको ले गये तथा जो संसाररूप अन्धकारके लिये सूर्यरूप हैं, उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ८ ॥ जो पुरुष इस रामाष्टकको एकाग्रचित्तसे निरन्तर पढ़ता है, उसे

संसारजनित भयकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ९ ॥

पृष्ठ 155

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* रामस्तोत्राणि * १४५ ४२ - श्रीसीतारामाष्टकम् ब्रह्ममहेन्द्रसुरेन्द्रमरुद्गणरुद्रमुनीन्द्रगणैरतिरम्यं क्षीरसरित्पतितीरमुपेत्य नुतं हि सतामवितारमुदारम् । भूमिभरप्रशमार्थमथ प्रथितप्रकटीकृतचिद्धनमूर्ति त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम् पद्मदलायतलोचन हे रघुवंशविभूषण देव दयालो निर्मलनीरदनीलतनोऽखिललोकहदम्बुजभासक भानो । कोमलगा पवित्रपदाब्जरजःकणपावितगौतमकान्त । पूर्ण परात्पर पालय मामतिदीनमनाथमनन्तसुखाब्धे प्रावृडदभ्रतडित्सुमनोहरपीतवराम्बर राम नमस्ते ।

कामविभञ्जन कान्ततरानन काञ्चनभूषण रत्नकिरीट ।

॥ १ ॥

त्वां ॰ ॥ २ ॥

त्वां ॰ ॥ ३ ॥

ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, मरुद्गण, रुद्र और मुनिजनोंने जब अति रमणीय क्षीरसागरके तटपर जाकर संत - प्रतिपालक अति उदार आपकी वन्दना की, तब भूमिका भार उतारनेके लिये जिन आपने अपनी चिद्घन मूर्तिको प्रकट किया, हे दयामय रघुनन्दन! उन आपको भजनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ १ ॥ हे कमलदललोचन! हे रघुवंशावतंस!

हे देव! हे दयालो! हे निर्मल श्यामघनके सदृश शरीरवाले! हे निखिललोकहृत्पद्म - प्रभाकर! हे अति सुकुमार शरीरवाले! अपने अति पुनीत चरणारविन्दोंकी धूलिसे गौतमपत्नी अहल्याको पवित्र करनेवाले, दयामय रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ २ ॥ हे पूर्ण! हे परात्पर! हे अनन्त सुखसागर! मुझ अति दीन और

अनाथकी रक्षा करो । वर्षाकालीन अति चपल चञ्चलाके समान मनोहर पीताम्बरधारी श्रीराम! आपको नमस्कार है । हे कन्दर्प- दर्प - दलन, हे सुन्दर वदन, सुवर्ण - भूषण एवं रत्नकिरीटधारी, दयामय, रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ३ ॥

पृष्ठ 156

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१४६ * स्तोत्ररत्नावली * दिव्यशरच्छशिकान्तिहरोज्ज्वलमौक्तिकमालविशालसुमौले कोटिरविप्रभ चारुचरित्रपवित्र विचित्रधनुः शरपाणे । चण्डमहाभुजदण्डविखण्डितराक्षसराजमहागजदण्डं दोषविहिंस्रभुजङ्गसहस्रसुरोषमहानलकीलकलापे जन्मजरामरणोर्मिमये मदमन्मथनक्रविचक्रभवाब्धौ । दुःखनिधौ च चिरं पतितं कृपयाद्य समुद्धर राम ततो मां । संसृतिघोरमदोत्कटकुञ्जरतृक्षुदनीरदपिण्डिततुण्डं दण्डकरोन्मथितं च रजस्तम उन्मदमोहपदोज्झितमार्तम् । दीनमनन्यगतिं कृपणं शरणागतमाशु विमोचय मूढं । जन्मशतार्जितपापसमन्वितहृत्कमले पति पशुकल्पे हे रघुवीर महारणधीर दयां कुरु मय्यतिमन्दमनीषे । त्वं जननी भगिनी च पिता मम तावदसि त्ववितापि कृपालो । त्वां ॰ ॥ ४ ॥

त्वां ॥ ५ ॥

त्वां ॥। ६ ॥

। त्वां ॥ ७ ॥

दिव्यशरच्चन्द्रकी कान्तिको मलिन करनेवाली स्वच्छ मुक्तामालाको अपने सुविशाल मौलिपर धारण करनेवाले, कोटि सूर्यकी - सी आभावाले, सदाचारसे पवित्र, करकमलोंमें विचित्र धनुष - बाण धारण करनेवाले एवं अपने प्रचण्ड भुजदण्डसे रावणरूपी महागजका वध करनेवाले हे दयामय श्रीरघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥४ ॥

जिसमें दोषरूपी हजारों हिंसक सर्प हैं, क्रोधरूपी बड़वानलकी ज्वालाएँ उठ रही हैं, जन्म - जरा - मरणरूपिणी तरङ्गावली है तथा मद और कामरूपी मगरमच्छ और भँवर हैं, ऐसे इस दुःखमय भवसागरमें चिरकालसे पड़े हुए मुझको, हे राम! कृपया अब निकालिये; और हे दयामय रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ५ ॥ तृषा और क्षुधा जिसके तीक्ष्ण दाँत हैं,

ऐसा संसाररूपी एक उन्मत्त हाथी है । उसकी यमरूपी सूँड़से झटकोंमें पड़े हुए तथा रज, तम, उन्माद और मोहरूप चारों पगोंसे कुचले हुए अति आर्त, दीन, अनन्यशरण मुझ मूढ़को शीघ्र ही छुड़ाइये; और हे दयामय रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ६ ॥ जिसका

हृदयकमल सैकड़ों जन्मोंके सञ्चित पापोंसे युक्त है, जो पशुतुल्य पतित हो गया है,

पृष्ठ 157

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* रामस्तोत्राणि * १४७ त्वां तु दयालुमकिञ्चनवत्सलमुत्पलहारमपारमुदारं

राम विहाय कमन्यमनामयमीश जनं शरणं ननु यायाम् ।

त्वत्पदपद्ममतः श्रितमेव मुदा खलु देव सदाव ससीत । त्वां ॥। ८ ॥

यः करुणामृतसिन्धुरनाथजनोत्तमबन्धुरजोत्तमकारी भक्तभयोर्मिभवाब्धितरिः सरयूतटिनीतटचारुविहारी । तस्य रघुप्रवरस्य निरन्तरमष्टकमेतदनिष्टहरं वै यस्तु पठेदमरः स नरो लभतेऽच्युतरामपदाम्बुजदास्यम् ॥ ९ ॥

इति श्रीमन्मधुसूदनाश्रमशिष्याच्युतयतिविरचितं श्रीसीतारामाष्टकं सम्पूर्णम् । उस अति मतिमन्द मुझपर हे महारणधीर रघुवीर! कृपा कीजिये । आप ही मेरे माता, पिता और भगिनी हैं तथा हे कृपालो! आप ही मेरे रक्षक हैं । हे दयामय रघुनन्दन! अपना भजन करनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ७ ॥ हे मेरे स्वामी राम! गलेमें कमलपुष्पोंकी माला धारण

करनेवाले आप - सदृश अतिशय उदार दीनवत्सल और दयामय प्रभुको छोड़कर मैं और किस अनामय पुरुषकी शरण लूँ? अतः मैंने तो आपके ही चरणकमलोंका आसरा लिया है । हे सीताजीके सहित राम! आप प्रसन्न होकर मेरी सर्वदा रक्षा कीजिये और हे दयामय भगवान् रघुनन्दन! आपका भजन करनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ ८ ॥ जो

करुणारूप अमृतके समुद्र हैं, अनाथोंके उत्तम बन्धु हैं, अजन्मा और उत्तम कर्मा हैं, भक्तोंको भयरूप तरङ्गावलिसे पूर्ण संसारसागरसे पार करनेके लिये नौकारूप हैं और सरयू नदीके तीरपर सुन्दर लीलाएँ करनेवाले हैं, उन रघुश्रेष्ठके इस अष्टकका, जो सर्वदा सब अनिष्टोंको दूर करनेवाला है, जो पुरुष पाठ करता है, वह अमर हो जाता है और अविनाशी भगवान् रामके चरणकमलोंकी दासता प्राप्त करता है ॥ ९ ॥

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१४८ ** स्तोत्ररत्नावली * ४३ – श्रीरामचन्द्रस्तुतिः नमामि भक्तवत्सलं कृपालु शील भजामि ते पदांबुजं अकामिनां निकाम श्याम सुंदरं भवांबुनाथ प्रफुल्ल कंज लोचनं मदादि दोष प्रलंब बाहु विक्रमं प्रभोऽप्रमेय निषंग चाप सायकं धरं त्रिलोक दिनेश वंश मंडनं महेश चाप मुनींद्र संत रंजनं सुरारि वृंद मनोज वैरि वंदितं अजादि देव विशुद्ध बोध विग्रहं समस्त कोमलं स्वधामदं । मन्दरं मोचनं ॥ १ ॥

वैभवं नायकं । खंडनं भंजनं ॥ २ ॥

सेवितं दूषणापहं । नमामि इंदिरा पतिं सुखाकरं सतां गतिं भजे सशक्ति सानुजं शची पति प्रियानुजं ॥ ३ ॥

भक्तोंके हितकारी, कृपालु और अतिकोमल स्वभाववाले! आपको मैं नमस्कार करता हूँ । जो निष्काम पुरुषोंको अपना धाम देनेवाले हैं ऐसे आपके चरण - कमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ । जो अति सुन्दर श्याम शरीरवाले, संसार-समुद्रके मन्थनके लिये मन्दराचलरूप, खिले हुए कमलके - से नेत्रोंवाले तथा मद आदि दोषोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥ १ ॥ जिनकी भुजाएँ लंबी - लंबी और अति बलिष्ठ हैं,

जिनके वैभवका कोई परिमाण नहीं है, जो धनुष, बाण और तरकश धारण किये हैं, त्रिलोकीके नाथ हैं, सूर्यकुलके भूषण हैं, शङ्करके धनुषको तोड़नेवाले हैं, मुनिजन तथा महात्माओंको आनन्दित करनेवाले हैं, दैत्योंका दलन करनेवाले हैं, कामारि श्रीशङ्करजीसे वन्दित हैं, ब्रह्मा आदि देवगणोंसे सेवित हैं, विशुद्ध बोधस्वरूप हैं, समस्त दोषोंको दूर करनेवाले हैं, श्रीलक्ष्मीजीके पति हैं, सुखकी खानि हैं, संतोंकी एकमात्र गति हैं तथा शचीपति इन्द्रके प्यारे अनुज ( उपेन्द्र ) हैं; हे प्रभो! ऐसे आपको मैं नमस्कार करता हूँ और सीताजी तथा भाई लक्ष्मणके साथ

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* रामस्तोत्राणि * १४ ९ त्वदंघ्रि मूल ये नराः भजन्ति हीन मत्सराः पतंति नो भवार्णवे वितर्क वीचि संकुले । विविक्त वासिनः सदा भजंति मुक्तये मुदा निरस्य इंद्रियादिकं प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥ ४ ॥

तमेकमद्भुतं प्रभुं निरीहमीश्वरं विभुं जगद्गुरुं च शाश्वतं तुरीयमेव केवलं । भजामि भाव वल्लभं कुयोगिनां सुदुर्लभं स्वभक्त कल्प पादपं समं सुसेव्यमन्वहं ॥ ५ ॥

अनूप रूप भूपतिं नतोऽहमुर्विजा पति प्रसीद में नमामि ते पदाब्ज भक्ति देहि मे । पठंति ये स्तवं इदं नरादरेण ते पदं व्रजंति नात्र संशयं त्वदीय भक्ति संयुताः ॥ ६ ॥

इति श्रीमद्गोस्वामितुलसीदासकृता श्रीरामचन्द्रस्तुतिः सम्पूर्णा । आपको भजता हूँ ॥ २-३ ॥ जो लोग मद - मत्सरादिसे रहित होकर आपके चरणोंको भज हैं, वे फिर इस नाना वितर्क - तरङ्गावलिपूर्ण संसार - सागरमें नहीं पड़ते तथा जो एकान्तसेवी महात्मागण अपनी इन्द्रियोंका संयम करके प्रसन्न - चित्तसे भवबन्धविमोचनके लिये आपका भजन करते हैं, वे अपने अभीष्ट पदको पाते हैं ॥ ४ ॥ जो अति निरीह, ईश्वर और

सर्वव्यापक हैं, जगत्के गुरु, नित्य, जाग्रदादि अवस्थात्रयसे विलक्षण और अद्वैत हैं, केवल भावके भूखे हैं, कुयोगियोंको दुर्लभ हैं, अपने भक्तोंके लिये कल्पवृक्षरूप हैं तथा समस्त ( पक्षपातरहित ) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं, ऐसे उन ( आप ) अद्भुत प्रभुको मैं भजता हूँ ॥ ५ ॥ अनुपम रूपवान् राजराजेश्वर जानकीनाथको मैं प्रणाम करता हूँ ।

मैं आपकी बार - बार वन्दना करता हूँ; आप मुझपर प्रसन्न होइये और मुझे अपने चरण - कमलोंकी भक्ति दीजिये । जो मनुष्य इस स्तोत्रका आदरपूर्वक पाठ करेंगे, वे आपके भक्ति - भावसे भरकर आपके निज पदको प्राप्त होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६ ॥

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१५० * स्तोत्ररत्नावली * ४४ - श्रीराममङ्गलाशासनम् मङ्गलं कौशलेन्द्राय महनीयगुणाब्धये । चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय 63636363636KKKKKKK मङ्गलम् ॥ १ ॥

वेदवेदान्तवेद्याय मेघश्यामलमूर्तये ।

पुंसां मोहनरूपाय पुण्यश्लोकाय मङ्गलम् ॥ २ ॥

विश्वामित्रान्तरङ्गाय मिथिलानगरीपतेः ।

भाग्यानां परिपाकाय भव्यरूपाय मङ्गलम् ॥ ३ ॥

पितृभक्ताय सततं भ्रातृभिः सह सीतया ।

नन्दिताखिललोकाय रामभद्राय मङ्गलम् ॥ ४ ॥

त्यक्तसाकेतवासाय चित्रकूटविहारिणे ।

सेव्याय सर्वयमिनां धीरोदयाय मङ्गलम् ॥ ५ ॥

सौमित्रिणा च जानक्या चापबाणासिधारिणे ।

संसेव्याय सदा भक्त्या स्वामिने मम मङ्गलम् ॥ ६ ॥

प्रशंसनीय गुणोंके सागर कौशलेन्द्र श्रीरामचन्द्रजीका मङ्गल हो, चक्रवर्ती राजा दशरथके पुत्र मण्डलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका मङ्गल हो ॥ १ ॥ जो

वेद - वेदान्तोंके ज्ञेय हैं, मेघके समान श्याममूर्तिवाले हैं और पुरुषोंमें जिनका स्वरूप अत्यन्त मनोहर है, उन पुण्यश्लोक ( पवित्र यशवाले ) श्रीरामचन्द्रजीका मङ्गल हो ॥२ ॥ जो विश्वामित्र ऋषिके प्रिय और राजा जनकके भाग्योंके

फलस्वरूप हैं, उन भव्यरूपवाले श्रीरामचन्द्रजीका मङ्गल हो ॥ ३ ॥ जो सदा

पिताकी भक्ति करनेवाले हैं, जो अपने भ्राताओं और सीताजीके साथ सुशोभित होते हैं और जिन्होंने समस्त लोकको आनन्दित किया है, उन श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ ४ ॥ जिन्होंने अयोध्या - निवासको छोड़कर चित्रकूटपर विहार किया

और जो सब यतियोंके सेव्य हैं, उन धीरोदय श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ ५ ॥

लक्ष्मण तथा जानकीजी सदा भक्तिपूर्वक जिनकी सेवा करते हैं, जो धनुष - बाण