स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 161–170

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

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भेट रामस्तोत्राणि * १५१ ************** 5555555555555555

दण्डकारण्यवासाय खरदूषणशत्रवे ।

गृधराजाय भक्ताय मुक्तिदायास्तु मङ्गलम् ॥ ७ ॥

सादरं शबरीदत्तफलमूलाभिलाषिणे ।

सौलभ्यपरिपूर्णाय सत्त्वोद्रिक्ताय मङ्गलम् ॥ ८ ॥

हनुमत्समवेताय हरीशाभीष्टदायिने ।

बालिप्रमथनायास्तु महाधीराय मङ्गलम् ॥ ९ ॥

श्रीमते रघुवीराय सेतूल्लङ्घितसिन्धवे ।

जितराक्षसराजाय रणधीराय मङ्गलम् ॥ १० ॥।

विभीषणकृते प्रीत्या लङ्काभीष्टप्रदायिने ।

सर्वलोकशरण्याय श्रीराघवाय मङ्गलम् ॥ ११ ॥

आसाद्य नगरीं दिव्यामभिषिक्ताय सीतया ।

राजाधिराजराजाय रामभद्राय मङ्गलम् ॥ १२ ॥

और तलवारको धारण किये हुए हैं, उन मेरे स्वामी श्रीरामभद्रका मङ्गल हो || ६ || जिन्होंने दण्डकवनमें निवास किया है, जो खर - दूषणके शत्रु हैं और अपने भक्त गृध्रराजको मुक्ति देनेवाले हैं, उन श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ ७ ॥

जो आदरसहित शबरीके भी दिये हुए फल - मूलके अभिलाषी हुए, जो सुलभतासे पूर्ण ( अर्थात् थोड़े ही परिश्रमसे प्राप्य ) हैं और जिनमें सत्त्वगुणका आधिक्य है, उन श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ ८ ॥ जो हनुमानजीसे युक्त हैं,

हरीश ( सुग्रीव ) के अभीष्टको देनेवाले हैं और बालिको मारनेवाले हैं, उन महाधीर श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ ९ ॥ जो सेतु बाँधकर समुद्रको लाँघ गये

और जिन्होंने राक्षसराज रावणपर विजय पायी, उन रणधीर श्रीमान् रघुवीरका मङ्गल हो ॥ १० ॥ जिन्होंने प्रसन्नतासे विभीषणको उनका अभीष्ट लङ्काका

राज्य दे दिया और जो सब लोकोंको शरणमें रखनेवाले हैं, उन श्रीराघव रामभद्रका मङ्गल हो ॥ ११ ॥ वनसे दिव्य नगरी अयोध्यामें आनेपर जिनका

सीताजीके सहित राज्याभिषेक हुआ, उन महाराजाओंके राजा श्रीरामभद्रका

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१५२ * स्तोत्ररत्नावली *

ब्रह्मादिदेवसेव्याय ब्रह्मण्याय महात्मने ।

जानकीप्राणनाथाय रघुनाथाय मङ्गलम् ॥ १३ ॥ 393696969696363636

श्रीसौम्यजामातृमुनेः कृपयास्मानुपेयुषे ।

महते मम नाथाय रघुनाथाय मङ्गलम् ॥ १४ ॥

मङ्गलाशासनपरैर्मदाचार्यपुरोगमैः सर्वैश्च पूर्वैराचार्यैः सत्कृतायास्तु मङ्गलम् ॥ १५ ॥

रम्यजामातृमुनिना मङ्गलाशासनं कृतम् ।

त्रैलोक्याधिपतिः श्रीमान् करोतु मङ्गलं सदा ॥ १६ ॥

इति श्रीवरवरमुनिस्वामिकृतश्रीराममङ्गलाशासनं सम्पूर्णम् । मङ्गल हो ॥ १२ ॥ जो ब्रह्मा आदि देवताओंके सेव्य हैं, ब्रह्मण्य ( ब्राह्मणों

और वेदोंकी रक्षा करनेवाले ) हैं, श्रीजानकीजीके प्राणनाथ हैं, उन रघुकुलके नाथ श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ १३ ॥ जो श्रीसम्पन्न सुन्दर आकारवाले

जामाता मुनिकी कृपासे हमलोगोंको प्राप्त हुए हैं, उन मेरे महान् प्रभु रघुनाथजीका मङ्गल हो ॥ १४ ॥ मेरे आचार्य जिनमें मुख्य हैं, उन अर्वाचीन

आचार्यों तथा सम्पूर्ण प्राचीन आचार्योंने मङ्गलाशासनमें परायण होकर जिनका सत्कार किया है, उन श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ १५ ॥ जामातामुनिने इस सुन्दर

मङ्गलाशासनका निर्माण किया है । इससे प्रसन्न होकर तीनों लोकोंके पति श्रीमान् रामभद्र सदा ही मङ्गल करें ॥ १६ ॥

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* रामस्तोत्राणि * १५३ ४५ - श्रीरामप्रेमाष्टकम् श्यामाम्बुदाभमरविन्दविशालनेत्रं बन्धूकपुष्पसदृशाधरपाणिपादम् सीतासहायमुदितं धृतचापबाणं रामं नमामि शिरसा रमणीयवेषम् ॥ १ ॥

पटुजलधरधीरध्वानमादाय चापं पवनदमनमेकं बाणमाकृष्य तूणात् । अभयवचनदायी सानुजः सर्वतो मे रहतदनुजेन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ २ ॥

दशरथकुलदीपोऽमेयबाहुप्रतापो दशवदनसकोपः क्षालिताशेषपापः । जो नील मेघके समान श्याम वर्ण हैं, जिनके कमलके समान विशाल नेत्र हैं, जो बन्धूक पुष्पके समान अरुण ओष्ठ, हस्त और चरणोंसे शोभित हैं, जो सीताजीके साथ विराजमान एवं अभ्युदयशील हैं, जिन्होंने धनुष - बाणको धारण किया है, जिनका वेष बड़ा ही सुन्दर है, सीताजीके सहित उन श्रीरामको मैं सिरसे नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ जो प्रौढ़ मेघके समान धीर - गम्भीर,

टंकार - ध्वनि करनेवाले धनुषको धारणकर और अपने वेगसे वायुका भी मान - मर्दन करनेवाले एक बाणको तूणीर ( तरकस ) से खींचकर ' मत डरो ' ऐसा कहते हुए अपने आश्रितोंको अभय - वचन देनेवाले हैं तथा जिन्होंने रणमें दानवराज ( रावण ) को मारा है, लक्ष्मणके सहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सब प्रकार सहायक हैं ॥ २ ॥ जो राजा दशरथके कुलके दीपक ( प्रकाशक ) हैं,

जिनके बाहुबलका प्रताप मापा नहीं जा सकता, जो रावणके ऊपर कोप करनेवाले, समस्त पापको दूर करनेवाले, असुरोंको ताप देनेवाले और अनेक

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१५४ * स्तोत्ररत्नावली * कृतसुररिपुतापो नन्दितानेक भूपो विगततिमिरपङ्को रामचन्द्रः सहायः ॥ ३ ॥

कुवलयदलनीलः कामितार्थप्रदो मे कृतमुनिजनरक्षो रक्षसामेकहन्ता । अपहृतदुरितोऽसौ नाममात्रेण पुंसा-मखिलसुरनृपेन्द्रो रामचन्द्रः असुरकुलकृशानुर्मानसाम्भोजभानुः सुरनरनिकराणामग्रणीर्मे अगणितगुणसीमा नीलमेघौघधामा शमदमितमुनीन्द्रो रामचन्द्रः कुशिकतनययागं रक्षिता लक्ष्मणाढ्यः सहायः ॥ ४ ॥

रघूणाम् ।

सहायः ॥ ५ ॥

पवनशरनिकायक्षिप्तमारीचमायः राजाओंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, अज्ञान और पापसे रहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ३ ॥ जो कमल - पत्रके समान श्यामवर्ण,

मेरी इष्ट वस्तुओंके दाता, मुनिजनोंकी रक्षा करनेवाले और राक्षसोंको एकमात्र मारनेवाले हैं, जो [ अपने ] राम - नामके उच्चारणमात्रसे ही पुरुषोंके पापका नाश करनेवाले हैं, समस्त देवताओं और राजाओंके स्वामी वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ४ ॥ जो असुरकुल [ को भस्म करने ] के लिये अग्नि हैं, देवता

और मनुष्यके समूहोंके हृदय - कमलको विकसित करनेके लिये सूर्य हैं, असंख्य गुणोंकी सीमा हैं, नील मेघ - मण्डलीके समान जिनका श्याम शरीर है और जो शममें मुनीश्वरोंको भी जीतनेवाले हैं, वे रघुकुलके अग्रणी श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ५ ॥ जिन्होंने लक्ष्मणको साथ लेकर

विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा की है और वायुवेगवाले बाणोंके समूहसे मारीच

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* रामस्तोत्राणि: * १५५ विदलितहरचापो मेदिनीनन्दनाया नयनकुमुदचन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ६ ॥

पवनतनयहस्तन्यस्तपादाम्बुजात्मा कलशभववचोभिः प्राप्तमाहेन्द्रधन्वा । अपरिमितशरौघैः पूर्णतूणीरधीरो लघुनिहतकपीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ७ ॥

कनकविमलकान्त्या सीतयालिङ्गिताङ्गो मुनिमनुजवरेण्यः सर्ववागीशवन्द्यः । स्वजननिकरबन्धुर्लीलया बद्धसेतुः सुरमनुजकपीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ८ ॥

निशाचरकी मायाका नाश किया है, जो शिवजीके धनुषका भञ्जन करनेवाले तथा पृथ्वीकी पुत्री ( सीता ) के नयनकुमुदको विकसित करनेके लिये चन्द्रमाके समान हैं, वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ६ ॥ जो

हनुमान्जीके हाथोंपर अपने चरण - कमलोंको रखे हुए हैं, जिन्होंने अगस्त्य ऋषिके कहनेसे इन्द्रधनुषको ग्रहण किया, जिनका तूणीर ( तरकस ) असंख्य बाणोंसे परिपूर्ण है, जो रणधीर हैं और जिन्होंने अति शीघ्रतासे वानरराज बालीको मार गिराया, वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ७ ॥ जो सुवर्णके

समान निर्मल और गौर कान्तिवाली सीताके सम्पर्कमें रहते हैं, ऋषियों और मनुष्योंने भी जिन्हें श्रेष्ठ एवं आदरणीय माना है, जो सम्पूर्ण वागीश्वरोंके वन्दनीय तथा अपने भक्त - समुदायकी बन्धुके समान रक्षा करनेवाले हैं, जिन्होंने लीलासे ही समुद्रपर पुल बाँध दिया था, वे देवता, मनुष्य तथा वानरोंके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ८ ॥

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१५६ * स्तोत्ररत्नावली * **

यामुनाचार्यकृतं दिव्यं रामाष्टकमिदं शुभम् ।

यः पठेत् प्रयतो भूत्वा स श्रीरामान्तिकं व्रजेत् ॥ ९ ॥

इति श्रीयामुनाचार्यकृतं श्रीरामप्रेमाष्टकं सम्पूर्णम् । = ४६ – श्रीरामचन्द्राष्टकम् चिदाकारो धाता परमसुखदः पावनतनु-र्मुनीन्द्रैर्योगीन्द्रैर्यतिपतिसुरेन्द्रैर्हनुमता I सदा सेव्यः पूर्णो जनकतनयाङ्गः सुरगुरू रमानाथो रामो रमतु मम चित्ते तु सततम् ॥ १ ॥

मुकुन्दो गोविन्दो जनकतनयालालितपदः

पदं प्राप्ता यस्याधमकुलभवा चापि शबरी ।

गिरातीतोऽगम्यो विमलधिषणैर्वेदवचसा । रमा ० ॥ २ ॥

जो पुरुष यामुनाचार्यके द्वारा रचित इस दिव्य तथा कल्याणदायक श्रीरामप्रेमाष्टक - स्तोत्रका शुद्धभावसे पाठ करता है, वह श्रीरामचन्द्रजीके सन्निकट निवास प्राप्त करता है ॥ ९ ॥

जो ज्ञानस्वरूप हैं, जगत्का धारण - पोषण करनेवाले हैं, परमसुखके दाता हैं, जिनका शरीर सबको पवित्र करनेवाला है, मुनीन्द्र, योगीन्द्र, यतीश्वर, देवेश्वर और हनुमान् जिनकी सदा सेवा करते हैं, जो पूर्ण हैं, सीताजी जिनकी अर्द्धाङ्गिनी हैं; जो देवताओंके भी गुरु हैं; वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ १ ॥ जो मुकुन्द, गोविन्द नामसे कहे जाते हैं,

सीताजीने जिनके चरणोंका लालन किया है, [ जिनका भजन करनेसे ] नीच कुलमें उत्पन्न शबरी भी जिनके परमधामको प्राप्त हो गयी, जो विमल बुद्धिवालोंकी भी वाणीके परे हैं और वेदोंके वचनसे भी अगम्य हैं; वे

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* रामस्तोत्राणि * १५७ धराधीशोऽधीशः सुरनरवराणां रघुपतिः किरीटी केयूरी कनककपिशः शोभितवपुः । समासीनः पीठे रविशतनिभे शान्तमनसो । वरेण्यः शारण्यः कपिपतिसखश्चान्तविधुरो ललाटे काश्मीरो रुचिरगतिभङ्गः शशिमुखः । नराकारो रामो यतिपतिनुतः संसृतिहरो विरूपाक्षः काश्यामुपदिशति यन्नाम शिवदं सहस्रं यन्नाम्नां पठति गिरिजा प्रत्युषसि वै स्वलोके गायन्तीश्वरविधिमुखा यस्य चरितं रमा ० ॥ ३ ॥

। रमा ० ॥ ४ ॥

॥ रमा ० ॥ ५ ॥

लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ २ ॥ जो

पृथ्वीके अधीश्वर हैं, श्रेष्ठ देवताओं और मनुष्योंके भी स्वामी हैं, रघुकुलके नाथ हैं, जिन्होंने सिरपर मुकुट और बाहुओंमें केयूर धारण किये हैं, जो सोनेके समान पीतवर्ण ( वस्त्र पहने हुए ) हैं, जिनका शरीर शोभित हो रहा है और जो सैकड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान सिंहासनपर बैठे हुए हैं; वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी शान्त हृदयवाले मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ३ ॥ जो

श्रेष्ठ हैं, शरण देनेवाले हैं, सुग्रीवके मित्र हैं, अन्तसे रहित हैं, जिनके ललाटमें केशरका तिलक है, जिनकी चाल अतिसुन्दर है, मुखारविन्द चन्द्रमाके समान आनन्ददायी है, जो मनुष्यरूपमें प्रतीत होनेपर भी राम ( योगियोंके ध्येय परब्रह्म ) हैं, * यतीश्वरगण जिनकी स्तुति करते हैं, जो जन्म - मृत्युरूप संसारके हरनेवाले हैं; वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण । करें ॥४ ॥ काशीमें भगवान् शंकर जिनके कल्याणप्रद नामका [ मुमूर्षु

* रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः ( इनमें योगीजन रमण करते हैं, इसलिये इनकी संज्ञा ' राम ' है ) इस व्युत्पत्तिके अनुसार यहाँ ' राम'का अर्थ परब्रह्म है । 1

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१५८ * स्तोत्ररत्नावली * ******** परो धीरोऽधीरोऽसुरकुलभवश्चासुरहरः परात्मा सर्वज्ञो नरसुरगणैर्गीतसुयशाः ॥ अहल्याशापघ्नः शरकरऋजुः कौशिकसखो । हृषीकेशः शौरिर्धरणिधरशायी मधुरिपु-रुपेन्द्रो गजरिपुहरस्तुष्टमनसा । बलिध्वंसी वीरो दशरथसुतो नीतिनिपुणो कविः सौमित्रीड्यः कपटमृगघाती वनचरो रणश्लाघी दान्तो धरणिभरहर्ता सुरनुतः अमानी मानज्ञो निखिलजनपूज्यो हृदिशयो रमा ॰ ॥ ६ ॥

। रमा ० ॥ ७ ॥

॥ रमा ० ॥ ८ ॥

प्राणियोंको ] उपदेश करते हैं, श्रीपार्वतीजी प्रतिदिन प्रभात - कालमें जिनके सहस्र - नामका पाठ करती हैं, शिव, ब्रह्मा आदि ( देवगण ) अपने - अपने लोकोंमें जिनके दिव्य चरित्रका गान करते हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ५ ॥ जो अत्यन्त धीर होकर भी अधीर

( अविद्याको दूर करनेवाले ) हैं, असुर ( सूर्य ) के कुलमें उत्पन्न होकर भी असुर ( राक्षसकुल ) का संहार करनेवाले हैं, परमात्मा हैं, सर्वज्ञ हैं, मनुष्य तथा देवतागण जिनके सुयशका गान करते हैं, जिन्होंने अहल्याके शापका नाश किया, जिनके हाथमें बाण शोभित है, जो सरल स्वभाववाले और विश्वामित्रके मित्र हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ६ ॥ जो हृषीकेश, शौरि, शेषशायी, मधुसूदन, उपेन्द्र, वैकुण्ठ आदि

नामसे कहे जाते हैं, जिन्होंने प्रसन्न होकर गजराजके शत्रु ( ग्राह ) का नाश किया, जो बलिको पदच्युत करनेवाले हैं, वीर हैं, वे नीतिनिपुण, लक्ष्मीपति, दशरथनन्दन, भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ७ ॥ जो कवि

( त्रिकालदर्शी ) हैं, लक्ष्मणजीके पूज्य हैं, जिन्होंने वनमें भ्रमण करते हुए मायामृग ( मारीच ) का वध किया है, जो युद्धप्रिय हैं, दान्त ( मन और

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* रामस्तोत्राणि * १५ ९ इदं रामस्तोत्रं वरममरदासेन रचित-मुषःकाले भक्त्या यदि पठति यो भावसहितम् । मनुष्यः स क्षिप्रं जनिमृतिभयं तापजनकं परित्यज्य श्रेष्ठं रघुपतिपदं याति शिवदम् ॥ ९ ॥

इति श्रीमद्रामदासपूज्यपादशिष्य श्रीमद्धंसदासशिष्येणामरदासाख्यकविना विरचितं श्रीरामचन्द्राष्टकं समाप्तम् । इन्द्रियोंका दमन करनेवाले ) हैं, पृथ्वीके भारको हरनेवाले तथा देवताओंसे स्तुत हैं, जो स्वयं मानरहित होकर दूसरोंके सम्मानके ज्ञाता ( कृतज्ञ ) हैं, सब लोगोंके पूज्य हैं, सबके हृदयमें निवास करनेवाले हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ८ ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल भक्ति और

श्रद्धाके साथ अमरदास कविके बनाये हुए इस सुन्दर रामस्तोत्रका पाठ करेगा, वह बहुत शीघ्र ही तापजनक जन्म - मृत्युके भयका परित्याग कर श्रेष्ठ तथा कल्याणप्रद रघुनाथके पदको प्राप्त करेगा ॥ ९ ॥

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ॐ श्रीकृष्णस्तोत्राणि ४७ – गोविन्दाष्टकम् चिदानन्दाकारं श्रुतिसरससारं समरसं निराधाराधारं भवजलधिपारं परगुणम् । रमाग्रीवाहारं व्रजवनविहारं हरनुतं सदा तं गोविन्दं परमसुखकन्दं भजत रे ॥ १ ॥

महाम्भोधिस्थानं स्थिरचरनिदानं दिविजपं

सुधाधारापानं विहगपतियानं यमरतम् ।

मनोज्ञं सुज्ञानं मुनिजननिधानं ध्रुवपदं । सदा ० ॥ २ ॥

जो चिदानन्दस्वरूप है, श्रुतिका सुमधुर सार है, समरस है, निराश्रयोंका आश्रय है, संसारसागरका पार करानेवाला है, परगुणाश्रय है, श्रीलक्ष्मीजीके गलेका हार है, वृन्दावनविहारी है तथा भगवान् शङ्करसे सम्पूजित है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ १॥ जिसका महासमुद्र आश्रय है, जो चराचरका आदिकारण है,

देवोंका संरक्षक है, अमृतपान करानेवाला है, गरुड़ ही जिसका वाहन है,