स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 171–180

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि ** १६१

धिया धीरैर्येयं श्रवणपुटपेयं यतिवरै-महावाक्यैज्ञेयं त्रिभुवनविधेयं विधिपरम् ।

मनोमानामेयं सपदि हृदि नेयं नवतनुं । सदा ० ॥ ३ ॥

महामायाजालं विमलवनमालं मलहरं

सुभालं गोपालं निहतशिशुपालं शशिमुखम् ।

कलातीतं कालं गतिहतमरालं मुररिपुं । सदा ० ॥ ४ ॥

नभोबिम्बस्फीतं निगमगणगीतं समगतिं

सुरौघैः सम्प्रीतं दितिजविपरीतं पुरिशयम् ।

गिरां मार्गातीतं स्वदितनवनीतं नयकरं । सदा ॥ ५ ॥

जो यमों ( अहिंसा, सत्यादि ) में बसा हुआ है, मनोज्ञ है, ज्ञानस्वरूप है, मुनिजनोंका आश्रय है, ध्रुवस्थान है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दको सदैव भज ॥ २ ॥ धीर पुरुषोंद्वारा बुद्धिसे जिनका ध्यान किया जाता है और कर्णपुटोंसे

पान किया जाता है, योगिजन जिसे महावाक्योंद्वारा जान पाते हैं, जो त्रिलोकीका विधाता और विधिवाक्योंसे परे है, जिसे मन प्रमाणोंद्वारा नहीं जान सकता तथा जो हृदयमें शीघ्र ही धारण करनेयोग्य है एवं नूतन तनुधारी है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ३ ॥ जिसका मायारूपी महाजाल

है, जिसने निर्मल वनमाला धारण किया है, जो मलका अपहरण करनेवाला है, जिसका सुन्दर भाल है, जो गोपाल है, शिशुपालवधकारी है, जिसका चाँद - सा मुखड़ा है, जो सम्पूर्ण कलातीत है, काल है, अपनी सुन्दर गतिसे हंसका भी विजय करनेवाला है, मुर दैत्यका शत्रु है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ४ ॥ जो आकाशबिम्बके समान व्यापक है,

जिसका शास्त्र संकीर्तन करते हैं, जो सबकी समान गति है, देवताओंसे परम प्रसन्न तथा दैत्योंका विरोधी है, बुद्धिरूपी गुहामें स्थित है, वाणीकी गतिसे

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१६२ * स्तोत्ररत्नावली * परेशं पद्मेशं शिवकमलजेशं शिवकरं

द्विजेशं देवेशं तनुकुटिलकेशं कलिहरम् ।

खगेशं नागेशं निखिलभुवनेशं नगधरं । सदा ० ॥ ६ ॥

रमाकान्तं कान्तं भवभयभयान्तं भवसुखं

दुराशान्तं शान्तं निखिलहृदि भान्तं भुवनपम् ।

विवादान्तं दान्तं दनुजनिचयान्तं सुचरितं । सदा ० ॥ ७ ॥

जगज्ज्येष्ठं श्रेष्ठं सुरपतिकनिष्ठं क्रतुपतिं

बलिष्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् ।

स्वनिष्ठं धर्मिष्ठं गुरुगुणगरिष्ठं गुरुवरं । सदा ॥ ८ ॥

बाहर है, नवनीतका आस्वादन करनेवाला है तथा नीतिका संस्थापक है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ५ ॥ जो परमेश्वर है,

लक्ष्मीपति है, शिव और ब्रह्माका भी स्वामी है, कल्याणकारी है, द्विज और देवोंका ईश्वर है, महीन और घुँघराले केशोंवाला है, कलिमलहारी है, आकाशसञ्चारी सूर्यका भी शासक है, धरातलधारी शेष है, सम्पूर्ण भुवनमण्डलका स्वामी है, गोवर्धनधारी है! अरे, उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ६ ॥ जो लक्ष्मीपति है, विमल द्युति है, भवभयहारी है,

संसारका सुख है, दुराशाका काल है, शान्त है, सम्पूर्ण हृदयोंमें भासमान है, त्रिभुवनका प्रतिपालक है, विवादका जहाँ अन्त हो जाता है, दमशील है, दैत्य - दल - दलन है, सुन्दर चरित्रवाला है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ७ ॥ जो संसारमें सबसे बड़ा है, श्रेष्ठ है, सुरराज इन्द्रका

अनुज ( वामन ) है, यज्ञपति है, बलिष्ठ है, भूयिष्ठ है, त्रिभुवनमें सर्वश्रेष्ठ है, वरदायक है, आत्मनिष्ठ है, धर्मिष्ठ है, महान् गुणोंसे गौरवयुक्त है, गुरुवर है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर ॥ ८ ॥

पृष्ठ 173

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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १६३ गदापाणेरेतदुरितदलनं दुःखशमनं विशुद्धात्मा स्तोत्रं पठति मनुजो यस्तु सततम् । स भुक्त्वा भोगौघं चिरमिह ततोऽपास्तवृजिनः परं विष्णोः स्थानं व्रजति खलु वैकुण्ठभुवनम् ॥ ९ ॥

इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं गोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम् । ४८ - श्रीगोविन्दाष्टकम् सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं गोष्ठप्राङ्गणरिङ्गणलोलमनायासं परमायासम् । मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारं क्ष्माया नाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ १ ॥

जो विशुद्धात्मा पुरुष गदापाणि गोविन्दके इस पापनाशन, दुःखदलन स्तोत्रको निरन्तर पढ़ता है, वह चिरकालपर्यन्त नाना भोगोंको भोगकर, पापोंसे रहित होकर भगवान् विष्णुके परमपावन धाम वैकुण्ठलोकको अवश्यमेव जाता है॥९॥

जो सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त एवं नित्य हैं, आकाशसे भिन्न होनेपर भी परम आकाशस्वरूप हैं, जो व्रजके प्राङ्गणमें चलते हुए चपल हो रहे हैं, परिश्रमसे रहित होकर भी बहुत थके - से हो जाते हैं, आकारहीन होनेपर भी मायानिर्मित नाना स्वरूप धारण किये विश्वरूपसे प्रकट हैं और पृथ्वीनाथ होकर भी अनाथ ( बिना स्वामीके ) हैं, उन परमानन्दमय गोविन्दकी वन्दना करो ॥ १ ॥

पृष्ठ 174

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१६४ * स्तोत्ररत्नावली * मृत्स्नामत्सीहेति * यशोदाताडनशैशवसंत्रासं व्यादितवक्त्रालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालिम् । लोकत्रयपुरमूलस्तम्भं लोकालोकमनालोकं लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ २ ॥

त्रैविष्टपरिपुवीरघ्नं क्षितिभारघ्नं भवरोगघ्नं कैवल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम् । वैमल्यस्फुटचेतोवृत्तिविशेषाभासमनाभासं शैवं केवलशान्तं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ३ ॥

गोपालं भूलीलाविग्रहगोपालं कुलगोपालं गोपीखेलनगोवर्धनधृतिलीलालालितगोपालम् ' क्या तू यहाँ मिट्टी खा रहा है? ' यह पूछती हुई यशोदाद्वारा मारे जानेका जिन्हें शैशवकालोचित भय हो रहा है, मिट्टी न खानेका प्रमाण देनेके लिये जो मुँह फैलाकर उसमें लोकालोक पर्वतसहित चौदह भुवन दिखला देते हैं, त्रिभुवनरूपी नगरके जो आधारस्तम्भ हैं, आलोकसे परे ( अर्थात् दर्शनातीत ) होनेपर भी जो विश्वके आलोक ( प्रकाश ) हैं, उन परमानन्दस्वरूप, लोकनाथ, परमेश्वर गोविन्दको नमस्कार करो ॥ २ ॥ जो दैत्यवीरोंके नाशक,

पृथ्वीका भार हरनेवाले और संसाररोगको मिटा देनेवाले कैवल्य ( मोक्ष ) पद हैं, आहाररहित होकर भी नवनीतभोजी एवं विश्वभक्षी हैं, आभाससे पृथक् होनेपर भी मलरहित होनेके कारण स्वच्छ चित्तकी वृत्तिमें जिनका विशेषरूपसे आभास मिलता है, जो अद्वितीय, शान्त एवं कल्याणस्वरूप हैं, उन परमानन्दमय गोविन्दको प्रणाम करो ॥ ३ ॥ जो गौओंके पालक हैं, जिन्होंने

* पाठान्तरम् - मृत्स्नामत्सि किमीह ।

पृष्ठ 175

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** श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १६५ गोभिर्निगदितगोविन्दस्फुटनामानं बहुनामानं गोपीगोचरदूरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ४ ॥

गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं भेदावस्थमभेदाभं शश्वद्गोखुरनिर्धूतोद्धतधूलीधूसरसौभाग्यम् श्रद्धाभक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तितसद्भावं चिन्तामणिमहिमानं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ५ ॥

स्नानव्याकुलयोषिद्वस्त्रमुपादायागमुपारूढं व्यादित्सन्तीरथ दिग्वस्त्रा ह्युपदातुमुपाकर्षन्तम् । निर्धूतद्वयशोकविमोहं बुद्धं बुद्धेरन्तःस्थं सत्तामात्रशरीरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ६ ॥

पृथ्वीपर लीला करनेके निमित्त गोपाल - शरीर धारण किया है, जो वंशद्वारा भी गोपाल ( ग्वाला ) हो चुके हैं, गोपियोंके साथ खेल करते हुए गोवर्धनधारणकी लीलासे जिन्होंने गोपजनोंका पालन किया था, गौओंने स्पष्टरूपसे जिनका गोविन्द नाम बतलाया था, जिनके अनेकों नाम हैं, उन गोप तथा गोचर ( इन्द्रियोंके विषय ) से पृथक् रहनेवाले परमानन्दरूप गोविन्दको प्रणाम करो ॥ ४ ॥ जो गोपीजनोंकी गोष्ठीके भीतर प्रवेश करनेवाले हैं, भेदावस्थामें

रहकर भी अभिन्न भासित होते हैं, जिन्हें सदा गायोंके खुरसे ऊपर उड़ी हुई धूलिद्वारा धूसरित होनेका सौभाग्य प्राप्त है, जो श्रद्धा और भक्ति रखनेसे आनन्दित होते हैं, अचिन्त्य होनेपर भी जिनके सद्भावका चिन्तन किया गया है, उन चिन्तामणिके समान महिमावाले परमानन्दमय गोविन्दकी वन्दना करो ॥ ५॥ स्नानमें व्यग्र हुई गोपाङ्गनाओंके वस्त्र लेकर जो वृक्षपर चढ़ गये

थे और जब उन्होंने वस्त्र लेना चाहा तब देनेके लिये उन्हें पास बुलाने लगे, [ ऐसा होनेपर भी ] जो शोक - मोह दोनोंको ही मिटानेवाले ज्ञानस्वरूप एवं बुद्धिके भी परवर्ती हैं, सत्तामात्र ही जिनका शरीर है ऐसे परमानन्दस्वरूप

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१६६ * स्तोत्ररत्नावली * कान्तं कारणकारणमादिमनादि कालमनाभासं कालिन्दीगतकालियशिरसि मुहुर्नृत्यन्तं नृत्यन्तम् । कालं कालकलातीतं कलिताशेषं कलिदोषघ्नं कालत्रयगतिहेतुं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ७ ॥

वृन्दावनभुवि वृन्दारकगणवृन्दाराध्यं वन्देऽहं कुन्दाभामलमन्दस्मेरसुधानन्दं सुहृदानन्दम् । वन्द्याशेषमहामुनिमानसवन्द्यानन्दपदद्वन्द्वं वन्द्याशेषगुणाब्धिं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ८ ॥

गोविन्दाष्टकमेतदधीते गोविन्दार्पितचेता यो गोविन्दाच्युत माधवविष्णो गोकुलनायक कृष्णेति । गोविन्दको नमस्कार करो ॥ ६ ॥ जो कमनीय, कारणोंके भी आदिकारण,

अनादि और आभासरहित कालस्वरूप होकर भी यमुनाजलमें रहनेवाले कालियनागके मस्तकपर बारंबार नृत्य कर रहे थे, जो कालरूप होनेपर भी कालकी कलाओंसे अतीत और सर्वज्ञ हैं, जो त्रिकालगतिके कारण और कलियुगीय दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं, उन परमानन्दस्वरूप गोविन्दको प्रणाम करो ॥७ ॥ जो वृन्दावनकी भूमिपर देववृन्द तथा वृन्दा नामकी वनदेवताके

आराध्य देव हैं, जिनकी कुन्दके समान निर्मल मन्द मुसकानमें सुधाका आनन्द भरा है, जो मित्रोंके आनन्ददायी हैं उन भगवान्‌की मैं वन्दना करता हूँ । जिनका आमोदमय चरणयुगल समस्त वन्दनीय महामुनियोंके भी हृदयका वन्दनीय है, उन सम्पूर्ण शुभ गुणोंके सागर परमानन्दमय गोविन्दको नमस्कार करो ॥ ८ ॥

जो भगवान् गोविन्दमें अपना चित्त लगा ' गोविन्द! अच्युत! माधव!

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2 / श्रीकृष्णस्तोत्राणि: * १६७ ******************* गोविन्दा‌ङ्घ्रिसरोजध्यानसुधाजलधौतसमस्ताघो गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्थं स समभ्येति ॥ ९ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम् । = ४ ९ - – अच्युताष्टकम् अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं

वासुदेवं हरिम् ।

रामचन्द्रं भजे ॥ १ ॥

राधिकाराधितम् ।

नन्दजं सन्दधे ॥ २ ॥

विष्णो! गोकुलनायक! कृष्ण! ' इत्यादि उच्चारणपूर्वक उनके चरणकमलोंके ध्यानरूपी सुधासलिलसे अपना समस्त पाप धोकर इस गोविन्दाष्टकका पाठ करता है, वह अपने अन्तःकरणमें विद्यमान परमानन्दामृतरूप गोविन्दको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ तथा जानकीनायक रामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ ॥ १ ॥

अच्युत, केशव, सत्यभामापति, लक्ष्मीपति, श्रीधर, राधिकाजीद्वारा आराधित, लक्ष्मीनिवास, परम सुन्दर, देवकीनन्दन, नन्दकुमारका चित्तसे ध्यान

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१६८ * स्तोत्ररत्नावली * विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे ***** रुक्मिणीरागिणे KKKKKKKKKKKKK जानकीजानये । वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥ ३ ॥

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे । अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ ४ ॥

राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो-ऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम् ॥ ५ ॥

करता हूँ ॥ २ ॥ जो विभु हैं, विजयी हैं, शङ्ख - चक्रधारी हैं, रुक्मिणीजीके परम

प्रेमी हैं, जानकीजी जिनकी धर्मपत्नी हैं तथा जो व्रजाङ्गनाओंके प्राणाधार हैं उन परमपूज्य, आत्मस्वरूप, कंसविनाशक मुरलीमनोहर आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३॥ हे कृष्ण! हे गोविन्द! हे राम! हे नारायण! हे रमानाथ! हे

वासुदेव! हे अजेय! हे शोभाधाम! हे अच्युत! हे अनन्त! हे माधव! हे अधोक्षज ( इन्द्रियातीत )! हे द्वारकानाथ! हे द्रौपदीरक्षक! ( मुझपर कृपा कीजिये ) ॥४ ॥ जो राक्षसोंपर अति कुपित हैं, श्रीसीताजीसे सुशोभित हैं,

दण्डकारण्यकी भूमिकी पवित्रताके कारण हैं, श्रीलक्ष्मणजीद्वारा अनुगत हैं, वानरोंसे सेवित हैं और श्रीअगस्त्यजीसे पूजित हैं, वे रघुवंशी श्रीरामचन्द्रजी मेरी रक्षा करें ॥ ५ ॥

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ax श्रीकृष्णस्तोत्राणि * • १६ ९ धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्वेषिहा केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः । पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ॥ ६ ॥

विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् वन्यया मालया शोभितोरः स्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥ ७ ॥

कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः । हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥ ८ ॥

धेनुक और अरिष्टासुर आदिका अनिष्ट करनेवाले, शत्रुओंका ध्वंस करनेवाले, केशी और कंसका वध करनेवाले, वंशीको बजानेवाले, पूतनापर कोप करनेवाले, यमुनातटविहारी बालगोपाल मेरी सदा रक्षा करें ॥ ६ ॥

विद्युत्प्रकाशके सदृश जिनका पीताम्बर विभासित हो रहा है, वर्षाकालीन मेघोंके समान जिनका अति शोभायमान शरीर है, जिनका वक्षःस्थल वनमालासे विभूषित है और चरणयुगल अरुणवर्ण हैं, उन कमलनयन श्रीहरिको भजता हूँ ॥७ ॥ जिनका मुख घुँघराली अलकोंसे सुशोभित है,

मस्तकपर मणिमय मुकुट शोभा दे रहा है तथा कपोलोंपर कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं; उज्ज्वल हार, केयूर ( बाजूबन्द ), कङ्कण और किङ्किणीकलापसे सुशोभित उन मञ्जुलमूर्ति श्रीश्यामसुन्दरको भजता हूँ ॥८ ॥

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१७० * स्तोत्ररत्नावली * अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं

प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् ।

वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भर-स्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥ ९ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतमच्युताष्टकं सम्पूर्णम् । ५० - कृष्णाष्टकम् श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरवपुर्वेदविषयो धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताब्जनयनः । गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ १ ॥

जो पुरुष इस अति सुन्दर छन्दवाले और अभीष्ट फलदायक अच्युताष्टकको प्रेम और श्रद्धासे नित्य पढ़ता है, विश्वम्भर विश्वकर्ता श्रीहरि शीघ्र ही उसके वशीभूत हो जाते हैं ॥ ९ ॥

जो श्रीलक्ष्मीजीद्वारा आलिङ्गित हैं, व्यापक हैं, सम्पूर्ण चराचर जिनका शरीर है, श्रुति - संवेद्य हैं, समस्त बुद्धियोंके साक्षी हैं, शुद्ध हैं, हरि हैं, दैत्यदलन हैं, कमलनयन हैं, शङ्ख, चक्र, गदा और विमल वनमाला धारण किये हुए हैं और स्थिरकान्तिमय हैं, वे शरणागतवत्सल, निखिल श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ १ ॥ भुवनेश्वर