स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 181–190
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १७१ यतः सर्वं जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं
स्थितौ निःशेषं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा ।
लये सर्वं स्वस्मिन् हरति कलया यस्तु स विभुः । शरण्योः ॥ २ ॥
असूनाम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरणै-निरुध्येदं चित्तं हृदि विमलमानीय सकलम् ।
यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ । शरण्यो ० ॥ ३ ॥
पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा वेदो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ 1 । शरण्यो ० ॥ ४ ॥
महेन्द्रादिर्देवो जयति दितिजान्यस्य बलतो
न कस्य स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते ।
कवित्वादेर्गर्वं परिहरति योऽसौ विजयिनः । शरण्योः ॥ ५ ॥
( सृष्टिकालमें ) आकाश और पवनादिसे लेकर यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय भी जो मधुसूदन अपने आनन्दांशसे उसकी सर्वथा रक्षा करते हैं तथा लयके समय जो लीलामात्रसे उसे अपनेंहीमें लीन कर लेते हैं वे विभु, शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ २ ॥ जिस स्तवनीय मायापतिको बुधजन, यम - नियमादि
उपायोंसे पहले प्राणोंको अपने अधीनकर फिर चित्तनिरोधद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्को लीन करके अपने अन्तःकरणमें देखते हैं वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ ३ ॥ पृथ्वीमें रहकर
जो पृथ्वीका नियमन करते हैं परन्तु पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती ( यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिवीं यमयति यं पृथिवी न वेद ) आदि श्रुतियोंसे वेद जिन अमलस्वरूपको जगत्का स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बतलाता है, वे शरणागतपालक, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ ४ ॥ जिनके बलसे इन्द्रादि देवगण
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१७२ * स्तोत्ररत्नावली * विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखां
विना यस्य ज्ञानं जनिमृतिभयं याति जनता ।
विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभुः । शरण्यो ० ॥ ६ ॥
नरातङ्कोत्तङ्कः शरणशरणो भ्रान्तिहरणो
घनश्यामः व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसखः ।
स्वयम्भूर्भूतानां जनक उचिताचारसुखदः । शरण्यो ॰ ॥ ७ ॥
यदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभकरणी
तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुधृगजः ।
सतां धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपतिः । शरण्योः ॥ ८ ॥
दैत्योंको जीतते हैं, जिनकी कृतिके बिना किसी कार्यमें कोई भी स्वतन्त्र नहीं है तथा जो कवियोंके कवित्वाभिमानको और विजयियोंके विजयाभिमानको हर लेते हैं, वे शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ ५॥ जिनका ध्यान किये बिना मनुष्य सूकरादि पशु - योनियोंमें पड़ते हैं,
जिनके ज्ञान बिना जनता जन्म - मरणके भयको प्राप्त होती है तथा जिनका स्मरण किये बिना सैकड़ों कीट - पतङ्गादि योनियोंमें गिरना पड़ता है, वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ ६ ॥
जो प्राणियोंके भयको दूर करनेवाले हैं, शरणागतोंको शरण देनेवाले तथा भ्रमको दूर करनेवाले हैं, मेघश्याम हैं, सुन्दर हैं, व्रजबालकोंके समवयस्क साथी और अर्जुनके सखा हैं, स्वयम्भू हैं, समस्त प्राणियोंके पिता हैं तथा उचित आचरणोंद्वारा सुख देनेवाले हैं, वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ ७ ॥ जब संसारको क्षुब्ध कर देनेवाला
धर्मका ह्रास होता है, उस समय जो लोक - मर्यादाकी रक्षा करनेवाले लोकेश्वर, संत - प्रतिपालक, वेदवर्णित शुद्ध एवं अजन्मा भगवान् उनकी रक्षाके लिये
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १७३ इति हरिरखिलात्माराधितः शङ्करेण श्रुतिविशदगुणोऽसौ मातृमोक्षार्थमाद्यः । यतिवरनिकटे श्रीयुक्त आविर्बभूव स्वगुणवृत उदारः शङ्खचक्राब्जहस्तः ॥ ९ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् । ५१ – श्रीकृष्णाष्टकम् भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनङ्गरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम् ॥ १ ॥
शरीर धारण करते हैं, वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर व्रजराज श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों ॥ ८ ॥ इस प्रकार अपनी माताकी मुक्तिके
लिये श्रीशङ्कराचार्यजीने श्रुतिकथित गुणोंवाले, निखिलात्मा आदि नारायण हरिकी आराधना की तो अपने उदार गुणोंसे युक्त श्रीभगवान् लक्ष्मीजीसहित उनके निकट शङ्ख, चक्र, पद्मादि लिये प्रकट हो गये॥९॥
व्रज - भूमिके एकमात्र आभूषण, समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले तथा अपने भक्तोंके चित्तोंको आनन्दित करनेवाले नन्दनन्दनको सर्वदा भजता हूँ, जिनके मस्तकपर मनोहर मोर -पङ्खका मुकुट है, हाथोंमें सुरीली बाँसुरी है तथा जो काम - कलाके सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
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१७४ * स्तोत्ररत्नावली * मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥ २ ॥
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥ ३ ॥
सदैव पादपङ्कजं मदीयमानसे निजं दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम् । समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम् ॥ ४ ॥
कामदेवका मान मर्दन करनेवाले, बड़े - बड़े सुन्दर नेत्रोंवाले तथा व्रजगोपोंका शोक हरनेवाले कमलनयन भगवान्को नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने अपने करकमलोंपर गिरिराजको धारण किया था तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्रका मान मर्दन करनेवाले उन श्रीकृष्णरूपी गजराजको नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जिनके कानोंमें कदम्ब-पुष्पोंके कुण्डल हैं, परम सुन्दर कपोल हैं तथा व्रजबालाओंके जो एकमात्र
प्राणाधार हैं, उन दुर्लभ कृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजीके सहित अतिप्रसन्ना यशोदाजीसे युक्त हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं, उन गोपनायक गोपालको नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ जिन्होंने अपने
चरणकमलोंको मेरे मनरूपी सरोवरमें स्थापित कर रखा है, उन अति सुन्दर
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि: * १७५ *********** भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदासङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ॥ ५ ॥
गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् । नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम् ॥ ६ ॥
समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकमोदनं नमामि कुञ्जमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम् । निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं रसालवेणुगायकं नमामि कुञ्जनायकम् ॥ ७ ॥
अलकोंवाले, नन्दकुमारको नमस्कार करता हूँ तथा समस्त दोषोंको दूर .करनेवाले, समस्त लोकोंका पालन करनेवाले और समस्त व्रजगोपोंके हृदय तथा नन्दजीकी लालसारूप श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ भूमिका
भार उतारनेवाले संसारसागरके कर्णधार मनोहर यशोदाकुमारको नमस्कार करता हूँ; अति कमनीय कटाक्षवाले, सदैव सुन्दर भूषण धारण करनेवाले नित्य नूतन नन्दकुमारको नमस्कार करता हूँ ॥ ५ ॥ गुणोंके भण्डार, सुखसागर,
कृपानिधान और कृपालु गोपालको, जो देव - शत्रुओंको ध्वंस करनेवाले हैं, नमस्कार करता हूँ; नित्य नूतन लीलाविहारी, मेघश्याम नटनागर गोपालको, जो बिजलीकी - सी आभावाला अति सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, नमस्कार करता हूँ ॥६ ॥ जो समस्त गोपोंको आनन्दित करनेवाले और
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१७६ * स्तोत्ररत्नावली * विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञतल्पशायिनं नमामि कुञ्जकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम् । किशोरकान्ति रञ्जितं दुगञ्जनं सुशोभितं गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम् ॥ ८ ॥
यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् । प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान् भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान् ॥ ९ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीकृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् । हृदयकमलको विकसित करनेवाले, देदीप्यमान सूर्यके समान शोभायमान हैं, उन कुञ्जमध्यवर्ती श्यामसुन्दरको नमस्कार करता हूँ । जो कामनाओंको भलीभाँति पूर्ण करनेवाले हैं, जिनकी चारु चितवन बाणोंके समान है, सुमधुर वेणु बजाकर गान करनेवाले उन कुञ्जनायकको नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ चतुर
गोपिकाओंके मनरूपी सुकोमल शय्यापर शयन करनेवाले तथा कुञ्जवनमें बढ़ती हुई दावाग्निको पान कर जानेवाले, किशोरावस्थाकी कान्तिसे सुशोभित अञ्जनयुक्त सुन्दर नेत्रोंवाले, गजेन्द्रको ग्राहसे मुक्त करनेवाले, श्रीजीके साथ विहार करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ८ ॥ प्रभो! मेरे ऊपर
ऐसी कृपा हो कि जब - तब जैसी भी परिस्थितिमें रहूँ, सदा आपकी सत्कथाओंका गान करूँ । जो पुरुष इन दोनों प्रामाणिक अष्टकोंका पाठ या जप करेगा वह जन्म - जन्ममें नन्दनन्दन श्यामसुन्दरकी भक्तिसे युक्त होगा ॥ ९ ॥
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १७७ ५२ - भगवत्स्तुतिः भीष्म उवाच इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूनि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ १ ॥
त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्-कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये
मम निशितशरैर्विभिद्यमान-दधाने ।
मेऽनवद्या ॥ २ ॥
त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३ ॥
भीष्मजी बोले — जो निजानन्दमें मग्न है और कभी विहार ( लीला ) करनेकी इच्छासे प्रकृतिको स्वीकार करता है तब उससे संसारका प्रवाह चलता है ऐसे भूमास्वरूप, यदुश्रेष्ठ भगवान् कृष्णमें मैंने अपनी तृष्णारहित बुद्धि समर्पित कर दी है ॥ १ ॥ त्रिभुवनसुन्दर तमालवर्ण सूर्यकिरणोंके समान
उज्ज्वल और पवित्र वस्त्र धारण करनेवाले तथा जिनका मुखकमल अलकावलीसे आवृत है, उन अर्जुन - सखामें मेरी निष्काम प्रीति हो ॥ २ ॥
युद्धमें घोड़ोंकी टापसे उड़ी हुई रजसे धूसरित तथा चारों ओर छिटकी हुई
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१७८ * स्तोत्ररत्नावली * सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य
कुमतिमहरदात्मविद्यया य-निवेश्य ।
रतिर्ममास्तु ॥ ४ ॥
दोषबुद्ध्या ।
श्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ५ ॥
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः ।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गु-हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ६ ॥
अलकोंवाले, परिश्रमजन्य पसीनेकी बूँदोंसे सुशोभित मुखवाले और मेरे तीक्ष्ण बाणोंसे विदीर्ण हुई त्वचावाले, सुन्दर कवचधारी कृष्णमें मेरी आत्मा प्रवेश करे ॥ ३ ॥ सखाके वचनोंको सुनकर शीघ्र ही अपनी और विपक्षियोंकी
सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा करके अपने भृकुटि - विलाससे विपक्षी सैनिकोंकी आयुको हरनेवाले पार्थ - सखामें मेरी प्रीति हो ॥४ ॥ दूर खड़ी
सेनाके मुखका निरीक्षण करके स्वजन - वधमें दोषबुद्धिसे निवृत्त हुए अर्जुनकी कुमतिको जिसने आत्मविद्या ( गीता - ज्ञान ) द्वारा हर लिया था, उस परमपुरुष ( कृष्ण ) के चरणोंमें मेरी प्रीति हो ॥ ५ ॥ मेरी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये,
अपनी प्रतिज्ञा छोड़कर रथसे उतर पड़े और सिंह जैसे हाथीको मारने दौड़ता है उसी तरह चक्रको लेकर पृथ्वी कँपाते हुए कृष्ण ( मेरी ओर ) दौड़े, उस समय
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १७ ९ शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ७ ॥
विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे
धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये ।
भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षो-र्यमिह निरीक्ष्य हता गताः सरूपम् ॥ ८ ॥
ललितगतिविलासवल्गुहास-प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन्किल यस्य गोपवध्वः ॥ ९ ॥
शीघ्रताके कारण उनका दुपट्टा ( पृथ्वीको सान्त्वना देनेके लिये ) गिर पड़ा था ॥ ६ ॥ मुझ आततायीके तीक्ष्ण बाणोंसे विदीर्ण होकर, फटे हुए
कवचवाले, घाव और रुधिरसे सने हुए, जो भगवान् मुकुन्द मुझे हठपूर्वक मारनेको दौड़े, वे मेरी गति हों ॥ ७ ॥ अर्जुनके रथमें - चाबुक लेकर और
घोड़ोंकी लगाम पकड़कर बैठे हुए ( अहा! ) ऐसी शोभासे दर्शनीय भगवान्में मुझ मरणाकाङ्क्षीकी प्रीति हो; जिनका दर्शन करके इस युद्धमें मरे हुए वीर भगवत् - स्वरूपको प्राप्त हो गये हैं ॥ ८ ॥ ललित गति, विलास, मनोहर हास्य
और प्रेमपूर्ण निरीक्षणके समय बहुत मान धारण करनेवाली तथा ( कृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर ) उन्मत्त होकर भगवत् - चरित्रोंका अनुकरण करनेवाली गोपवधुएँ जिनके स्वरूपको निश्चय ही प्राप्त हो गयीं ॥ ९ ॥
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१८० स्तोत्ररत्नावली * F मुर्निपणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः-सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥ १० ॥
तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥। ११ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे प्रथमस्कन्धे नवमेऽध्याये भीष्मकृता भगवत्स्तुतिः सम्पूर्णा । युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें, मुनिगण और नृपतियोंके समक्ष जिनकी अग्रपूजा हुई, अहो! ऐसे दर्शनीय भगवान् ही ये मेरी दृष्टिके सामने प्रकट हुए हैं ॥ १० ॥ मैं भेद और मोहसे रहित होकर अपने ही रचे हुए प्रत्येक
शरीरधारीके हृदयमें स्थित सूर्यकी तरह एक होते हुए भी नाना दृष्टिसे अनेक रूप दीखनेवाले और जन्मरहित इस परमात्मा ( कृष्ण ) की शरणमें जाता हूँ ॥ ११ ॥