स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 191–200
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
पृष्ठ 191
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
** श्रीकृष्णस्तोत्राणि *, १८१ ५३ - गोविन्ददामोदरस्तोत्रम्
अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा ।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १ ॥
श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २ ॥
विक्रेतुकामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः ।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३ ॥
उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च संघट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः ।
गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४ ॥
काचित्कराम्भोजपुटे निषण्णं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम् ।
अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५ ॥
[ जिस समय ] कौरव और पाण्डवोंके सामने भरी सभामें दुःशासनने द्रौपदीके वस्त्र और बालोंको पकड़कर खींचा, उस समय जिसका कोई दूसरा नाथ नहीं है ऐसी द्रौपदीने रोकर पुकारा – ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ’ ॥ १॥ ‘ हे श्रीकृष्ण! हे विष्णो! हे मधुकैटभको मारनेवाले! हे
भक्तोंके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले! हे भगवन्! हे मुरारे! हे केशव! हे लोकेश्वर! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ' ॥ २ ॥ जिनकी चित्तवृत्ति मुरारिके चरणकमलोंमें लगी हुई है, वे सभी
गोपकन्याएँ दूध - दही बेचनेकी इच्छासे घरसे चलीं । उनका मन तो मुरारिके पास था; अतः प्रेमवश सुध - बुध भूल जानेके कारण ' दही लो दही ' इसके स्थानपर जोर - जोरसे ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' आदि पुकारने लगीं ॥३ ॥
ओखलीमें धान भरे हुए हैं, उन्हें मुग्धा गोपरमणियाँ मूसलोंसे कूट रही हैं और कूटते - कूटते कृष्णप्रेममें विभोर होकर ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इस प्रकार गायन करती जाती हैं ॥ ४ ॥ कोई कमलनयनी बाला मनोविनोदके लिये पाले हुए
पृष्ठ 192
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८२ * • स्तोत्ररत्नावली * *************
गृहे गृहे गोपवधूसमूहः प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम् ।
स्खलद्गिरं वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६ ॥
पर्य्यङ्किकाभाजमलं कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिलगोपकन्याः ।
जगुः प्रबन्धं स्वरतालबन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७ ॥
रामानुजं वीक्षणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् ।
आबालकं बालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ८ ॥
विचित्रवर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहि वक्त्राम्बुजराजहंसि ।
सदा मदीये रसनेऽग्ररङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९ ॥
अङ्काधिरूढं शिशुगोपगूढं स्तनं धयन्तं कमलैककान्तम् ।
सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १० ॥
अपने करकमलपर बैठे किंशुककुसुमके समान रक्तवर्ण चोंचवाले सुग्गेको पढ़ा रही थी- पढ़ो तो तोता! ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' ॥ ५ ॥ प्रत्येक घरमें
समूह - की - समूह गोपाङ्गनाएँ पिंजरोंमें पाली हुई अपनी मैनाओंसे उनकी लड़खड़ाती हुई वाणीको क्षण - क्षणमें ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इत्यादि रूपसे कहलानेमें लगी रहती थीं ॥ ६ ॥ पालनेमें पौढ़े हुए अपने नन्हें
बच्चेको सुलाती हुई सभी गोपकन्याएँ ताल - स्वरके साथ ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इस पदको ही गाती जाती थीं ॥ ७ ॥ हाथमें माखनका गोला लेकर मैया
यशोदाने आँखमिचौनीकी क्रीडामें व्यस्त बलरामके छोटे भाई कृष्णको बालकोंके बीचसे पकड़कर पुकारा – ' अरे गोविन्द! अरे दामोदर! अरे माधव! ' ॥ ८ ॥
विचित्र वर्णमय आभरणोंसे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होनेवाली हे मुखकमलकी राजहंसीरूपिणी मेरी रसने! तू सर्वप्रथम ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इस ध्वनिका ही विस्तार कर ॥ ९ ॥ अपनी गोदमें बैठकर दूध पीते हुए
बालगोपालरूपधारी भगवान् लक्ष्मीकान्तको लक्ष्य करके प्रेमानन्दमें मग्न हुई यशोदामैया इस प्रकार बुलाया करती थीं- ' ऐ मेरे गोविन्द! ऐ मेरे दामोदर!
पृष्ठ 193
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १८३
क्रीडन्तमन्तर्व्रजमात्मजं स्वं समं वयस्यैः पशुपालबालैः ।
प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ११ ॥
यशोदया गाढमुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निबध्यमानः ।
रुरोद मन्दं नवनीतभोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १२ ॥
निजाङ्गणे कङ्कणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् ।
आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १३ ॥
गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाययोगे ।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १४ ॥
मन्दारमूले वदनाभिरामं विम्बाधरे पूरितवेणुनादम् ।
गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १५ ॥
ऐ मेरे माधव! जरा बोलो तो सही! ' ॥ १० ॥ अपने समवयस्क गोपबालकोंके
साथ गोष्ठमें खेलते हुए अपने प्यारे पुत्र कृष्णको यशोदामैयाने अत्यन्त स्नेहके साथ पुकारा -- ‘ अरे ओ गोविन्द! ओ दामोदर! अरे माधव! [ कहाँ चला गया? ] ' ॥ ११ ॥ अधिक चपलता करनेके कारण यशोदामैयाने गौ बाँधनेकी
रस्सीसे खूब कसकर ओखलीमें उन घनश्यामको बाँध दिया तब तो वे माखनभोगी कृष्ण धीरे - धीरे [ आँखें मलते हुए ] सिसक - सिसककर ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' कहते हुए रोने लगे ॥ १२ ॥ श्रीनन्दनन्दन अपने ही घरके
आँगनमें अपने हाथके कङ्कणसे खेलनेमें लगे हुए हैं, उसी समय मैयाने धीरेसे जाकर उनके दोनों कमलनयनोंको अपनी हथेलीसे मूँद लिया तथा दूसरे हाथमें नवनीतका गोला लेकर प्रेमपूर्वक कहने लगी — ' गोविन्द! दामोदर! माधव [ लो देखो, यह माखन खा लो ] ' ॥ १३ ॥ व्रजके प्रत्येक घरमें गोपाङ्गनाएँ एकत्र
होनेका अवसर पानेपर झुंड -की- झुंड आपसमें मिलकर उन मनमोहन माधवके ' गोविन्द, दामोदर, माधव ' इन पवित्र नामोंको पढ़ा करती हैं ॥ १४ ॥ जिनका
मुखारविन्द बड़ा ही मनोहर है, जो अपने बिम्बके समान अरुण अधरोंपर रखकर
पृष्ठ 194
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८४ * स्तोत्ररत्नावली *
उत्थाय गोप्योऽपररात्रभागे स्मृत्वा यशोदासुतबालकेलिम् ।
गायन्ति प्रोच्चैर्दधि मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १६ ॥
जग्धोऽथ दत्तो नवनीतपिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती ।
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १७ ॥
अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दधि निर्ममन्थ ।
गायन्ति गोप्योऽथ सखीसमेता गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १८ ॥
क्वचित् प्रभाते दधिपूर्णपात्रे निक्षिप्य मन्थं युवती मुकुन्दम् ।
आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १ ९ ॥
वंशीकी मधुर ध्वनि कर रहे हैं तथा जो कदम्बके तले गौ, गोप और गोपियों के मध्यमें विराजमान हैं, उन भगवान्का ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इस प्रकार कहते हुए सदा स्मरण करना चाहिये ॥ १५ ॥ व्रजाङ्गनाएँ ब्राह्ममुहूर्तमें
उठकर और उन यशुमतिनन्दनकी बालक्रीडाओंकी बातोंको याद करके दही मथते - मथते ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन पदोंको उच्च स्वरसे गाया करती हैं ॥ १६ ॥ [ दधि मथकर माखनका लौंदा रख दिया था । माखनभोगी कृष्णकी
दृष्टि पड़ गयी, झट उसे धीरेसे उठा लाये ] कुछ खाया, कुछ बाँट दिया । जब ढूँढ़ते - ढूँढ़ते न मिला तो यशोदामैयाने आपपर सन्देह करते हुए पूछा — ‘ हे मुरारे! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ठीक - ठीक बता माखनका लौंदा क्या हुआ? ' ॥ १७ ॥ जिसके हृदयमें प्रेमकी बाढ़ आ रही है ऐसी माता यशोदा
घरको लीपकर दही मथने लगी । तब और सब गोपाङ्गनाएँ तथा सखियाँ मिलकर ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इस पदका गान करने लगीं ॥ १८ ॥
किसी दिन प्रातःकाल ज्यों ही माता यशोदा दहीभरे भाण्डमें मथानीको छोड़कर उठी त्यों ही उसकी दृष्टि शय्यापर बैठे हुए मनमोहन मुकुन्दपर पड़ी । सरकारको देखते ही वह प्रेमसे पगली हो गयी और ' मेरा गोविन्द! मेरा दामोदर! मेरा माधव! ' ऐसा कहकर तरह - तरहसे गाने लगी ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 195
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १८५ 5
क्रीडापरं भोजनमज्जनार्थं हितैषिणी स्त्री तनुजं यशोदा ।
आजूहवत् प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २० ॥
सुखं शयानं निलये च विष्णुं देवर्षिमुख्या मुनयः प्रपन्नाः ।
तेनाच्युते तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति । २१ ॥
विहाय निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः ।
वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २२ ॥
वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्नाम् ।
राधां जगुः साश्रुविलोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २३ ॥
प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्ररक्षणार्थं तनयं यशोदा ।
प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २४ ॥
क्रीडाविहारी मुरारि बालकोंके साथ खेल रहे हैं [ अभीतक न स्नान किया है न भोजन ] अतः प्रेममें विह्वल हुई माता उन्हें स्नान और भोजनके लिये पुकारने लगी- ' अरे ओ गोविन्द! ओ दामोदर! ओ माधव! [ आ बेटा! आ! पानी ठंडा हो रहा है जल्दीसे नहा ले और कुछ खा ले ] ' ॥ २० ॥ नारद आदि ऋषि ‘ हे
गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इस प्रकार प्रार्थना करते हुए घरमें सुखपूर्वक सोये हुए उन पुराणपुरुष बालकृष्णकी शरणमें आये; अतः उन्होंने श्रीअच्युतमें तन्मयता प्राप्त कर ली ॥ २१ ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर और अपने
नित्य - नैमित्तिक कर्मोंको पूर्णकर वेदपाठके अन्तमें नित्य ही ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन मञ्जुल नामोंका कीर्तन करते हैं ॥ २२ ॥ वृन्दावनमें
श्रीवृषभानुकुमारीको वनवारीके वियोगसे विह्वल देख गोपगण और गोपियाँ अपने कमलनयनोंसे नीर बहाती हुई ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' आदि कहकर पुकारने लगीं ॥ २३ ॥ प्रातःकाल होनेपर जब गौएँ वनमें चरने
चली गयीं तब उनकी रक्षाके लिये यशोदामैया शय्यापर शयन करते हुए बालकृष्णको मीठी - मीठी थपकियोंसे जगाती हुई बोलीं- ' बेटा गोविन्द! मुन्ना
पृष्ठ 196
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८६ * स्तोत्ररत्नावली * *****
प्रवालशोभा इव दीर्घकेशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहाः ।
मूले तरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २५ ॥
एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः ।
विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २६ ॥
गोपी कदाचिन्मणिपिञ्जरस्थं शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता ।
आनन्दकन्द व्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २७ ॥
गोवत्सबालैः शिशुकाकपक्षं बध्नन्तमम्भोजदलायताक्षम् ।
उवाच माता चिबुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २८ ॥
प्रभातकाले वरवल्लवौघा गोरक्षणार्थं धृतवेत्रदण्डाः ।
आकारयामासुरनन्तमाद्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २ ९ ॥
माधव! लल्लू दामोदर! [ उठ, जा गौओंको चरा ला ] ' ॥ २४ ॥ केवल
वायु, जल और पत्तोंके खानेसे जिनके शरीर पवित्र हो गये हैं, ऐसे प्रवालके समान शोभायमान लंबी - लंबी एवं कुछ अरुण रंगकी जटाओंवाले मुनिगण पवित्र वृक्षोंकी छायामें विराजमान होकर निरन्तर ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंका पाठ करते हैं ॥ २५ ॥ श्रीवनमालीके विरहमें विह्वल हुई
व्रजाङ्गनाएँ उनके विषयमें विविध प्रकारकी बातें कहती हुई लोक - लज्जाको तिलाञ्जलि दे बड़े आर्त्तस्वरसे ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' कहकर जोर - जोरसे रोने लगीं ॥ २६ ॥ गोपी श्रीराधिकाजी किसी दिन मणियोंके
पिंजड़ेमें पले हुए तोतेसे बार - बार ' आनन्दकन्द! व्रजचन्द्र! कृष्ण! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंको बुलवाने लगीं ॥। २७ ॥ कमलनयन श्रीकृष्णचन्द्रको किसी गोपबालककी चोटी बछड़ेके पूँछके बालोंसे बाँधते देख मैया प्यारसे उनकी ठोढ़ीको पकड़कर कहने लगी — ' मेरा गोविन्द! मेरा दामोदर! मेरा माधव! ' ॥ २८ ॥ प्रातःकाल हुआ,
ग्वाल - बालोंकी मित्रमण्डली हाथोंमें बेतकी छड़ी और लाठी ले गौओंको चरानेके लिये निकली । तब वे अपने प्यारे सखा अनन्त आदिपुरुष श्रीकृष्णको
पृष्ठ 197
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १८७
जलाशये कालियामर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारिः ।
गोपाङ्गनाश्चक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३० ॥
अक्रूरमासाद्य यदा मुकुन्दश्चापोत्सवार्थं मथुरां प्रविष्टः ।
तदा स पौरैर्जयतीत्यभाषि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३१ ॥
कंसस्य दूतेन यदैव नीतौ वृन्दावनान्ताद् वसुदेवसूनू ।
रुरोद गोपी भवनस्य मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३२ ॥
सरोवरे कालियनागबद्धं शिशुं यशोदातनयं निशम्य ।
चक्रुर्लुठन्त्यः पथि गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३३ ॥
अक्रूरयाने यदुवंशनाथं संगच्छमानं मथुरां निरीक्ष्य ।
ऊचुर्वियोगात् किल गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३४ ॥
गोविन्द! दामोदर! माधव! ' कह कहकर बुलाने लगे ॥ २ ९ ॥ जिस समय कालियनागका मर्दन करनेके लिये कन्हैया कदम्बके वृक्षसे कूदे, उस समय गोपाङ्गनाएँ और गोपगण वहाँ आकर ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कहकर बड़े जोरसे रोने लगे ॥ ३० ॥ जिस समय श्रीकृष्णचन्द्रने कंसके
धनुर्यज्ञोत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये अक्रूरजीके साथ मथुरामें प्रवेश किया, उस समय पुरवासीजन ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! तुम्हारी जय हो, जय हो ' ऐसा कहने लगे ॥ ३१ ॥ जब कंसके दूत अक्रूरजी वसुदेवनन्दन
श्रीकृष्ण और बलरामको वृन्दावनसे दूर ले गये तब अपने घरमें बैठी हुई यशोदाजी ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कह कहकर रुदन करने लगीं ॥ ३२॥ यशोदानन्दन बालक श्रीकृष्णको कालियहृदमें कालियनागसे
जकड़ा हुआ सुनकर गोपबालाएँ रास्तेमें लोटती हुई ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कहकर जोरोंसे रुदन करने लगीं ॥ ३३ ॥ अक्रूरके रथपर चढ़कर
मथुरा जाते हुए श्रीकृष्णको देख समस्त गोपबालाएँ वियोगके कारण अधीर होकर कहने लगीं— ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [ हमें छोड़कर तुम कहाँ जाते हो ]? ' ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 198
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८८ * • स्तोत्ररत्नावली * चक्रन्द गोपी
KKKKKKKKK नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे शयाना ।
प्रफुल्लनीलोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३५ ॥
मातापितृभ्यां परिवार्यमाणा गेहं प्रविष्टा विललाप गोपी ।
आगत्य मां पालय विश्वनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३६ ॥
वृन्दावनस्थं हरिमाशु बुद्ध्वा गोपी गता कापि वनं निशायाम् ।
तत्राप्यदृष्ट्वातिभयादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३७ ॥
सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मर्त्याः ।
ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३८ ॥
सा नीरजाक्षीमवलोक्य राधां रुरोद गोविन्द वियोगखिन्नाम् ।
सखी प्रफुल्लोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३ ९ ॥
श्रीराधिकाजी श्रीकृष्णके अलग हो जानेपर कमलवनमें कुसुम - शय्यापर सोकर अपने विकसित कमलसदृश लोचनोंसे आँसू बहाती हुई ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कहकर क्रन्दन करने लगीं ॥ ३५ ॥ माता - पिता आदिसे
घिरी हुई श्रीराधिकाजी घरके भीतर प्रवेश कर विलाप करने लगीं कि ' हे विश्वनाथ! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! तुम आकर मेरी रक्षा करो! रक्षा करो!! ' ॥ ३६ ॥ रात्रिका समय था, किसी गोपीको भ्रम हो गया कि
वृन्दावन - विहारी इस समय वनमें विराजमान हैं । बस, फिर क्या था, झट उसी ओर चल दी, किन्तु जब उसने निर्जन वनमें वनमालीको न देखा तो डरसे काँपती हुई ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कहने लगी ॥ ३७ ॥ [ वनमें न भी
जायँ ] अपने घरमें ही सुखसे शय्यापर शयन करते हुए भी जो लोग ‘ हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इन विष्णुभगवान्के पवित्र नामोंको निरन्तर कहते रहते हैं, वे निश्चय ही भगवान्की तन्मयता प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३८ ॥ कमललोचना
राधाको श्रीगोविन्दकी विरहव्यथासे पीड़ित देख कोई सखी अपने प्रफुल्ल कमलसदृश नयनोंसे नीर बहाती हुई ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! '
पृष्ठ 199
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १८ ९ $
जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि ।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४० ॥
आत्यन्तिकव्याधिहरं जनानां चिकित्सकं वेदविदो वदन्ति ।
संसारतापत्रयनाशबीजं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४१ ॥
ताताज्ञया गच्छति रामचन्द्रे सलक्ष्मणेऽरण्यचये ससीते । चक्रन्द रामस्य निजा जनित्री गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४२ ॥ *
एकाकिनी दण्डककाननान्तात् सा नीयमाना दशकन्धरेण । सीता 55555555555555555555555555555555555555555555555555555555555555 तदाक्रन्ददनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४३ ॥ *
कहकर रुदन करने लगी ॥ ३ ९ ॥ हे रसोंको चखनेवाली जिह्वे! तुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिये मैं तेरे हितकी एक बहुत ही सुन्दर और सच्ची बात बताता हूँ । तू निरन्तर ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इन मधुर मञ्जुल नामोंकी आवृत्ति किया कर ॥ ४० ॥ वेदवेत्ता विद्वान् ' गोविन्द! दामोदर!
माधव! ' इन नामोंको ही लोगोंकी बड़ी - से - बड़ी विकट व्याधिको विच्छेद करनेवाला वैद्य और संसारके आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों तापोंके नाशका बढ़िया बीज बतलाते हैं ॥ ४१ ॥ अपने पिता दशरथकी
आज्ञासे भाई लक्ष्मण और जनकनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामचन्द्रजी बीहड़ वनोंके लिये चलने लगे, तब उनकी माता श्रीकौसल्याजी ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! ] ' ऐसा कहकर जोरोंसे विलाप करने लगीं ॥ ४२ ॥ जब राक्षसराज रावण पञ्चवटीमें जानकीजीको
अकेली देख उन्हें हरकर ले जाने लगा, तब रामचन्द्रजीके सिवा जिनका दूसरा कोई स्वामी नहीं है ऐसी सीताजी ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! ] ' कहकर जोरोंसे रुदन करने लगीं ॥ ४३ ॥।
* अत्र ' हे राम रघुनन्दन राघवेति ' इति पाठान्तरम् ।
पृष्ठ 200
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ ९ ० * स्तोत्ररत्नावली * FKKKKKKKKK रामाद्वियुक्ता जनकात्मजा सा विचिन्तयन्ती हृदि रामरूपम् । रुरोद सीता रघुनाथ पाहि प्रसीद विष्णो रघुवंशनाथ रुरोद सीता तु समुद्रमध्ये अन्तर्जले ग्राहगृहीतपादो तदा गजेन्द्रो नितरां जगाद हंसध्वजः शङ्खयुतो ददर्श पुण्यानि नामानि हरेर्जपन्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४४ ॥ *
सुरासुराणां सुखदुःखहेतो ।
गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४५ ॥
विसृष्टविक्लिष्टसमस्तबन्धुः ।
गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४६ ॥
पुत्रं कटाहे प्रपतन्तमेनम् ।
गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४७ ॥
दुर्वाससो वाक्यमुपेत्य कृष्णा सा चाब्रवीत् काननवासिनीशम् ।
अन्तः प्रविष्टं मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४८ ॥
रथमें बिठाकर ले जाते हुए रावणके साथ, रामवियोगिनी सीता हृदयमें अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई ' हा रघुनाथ! हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! मेरी रक्षा करो ] ' इस प्रकार रोती हुई जाने लगीं ॥ ४४ ॥ जब रावणके साथ सीताजी समुद्रके मध्य में
पहुँचीं, तब यह कहकर जोर - जोरसे रुदन करने लगीं— ' हे विष्णो! हे रघुकुलपते! हे देवताओंको सुख और असुरोंको दुःख देनेवाले! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! ] प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये । ' ॥ ४५ ॥ पानी पीते समय जलके भीतरसे जब ग्राहने गजका पैर
पकड़ लिया और उसका समस्त दुःखी बन्धुओंसे साथ छूट गया, तब वह गजराज अधीर होकर अनन्यभावसे निरन्तर ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' ऐसा कहने लगा || ४६ || अपने पुरोहित शङ्खमुनिके साथ राजा हंसध्वजने अपने पुत्र सुधन्वाको तप्त तैलकी कड़ाहीमें कूदते और ‘ हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इन भगवान्के परमपावन नामोंका जप करते हुए देखा ॥ ४७॥ [ एक दिन द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर असमयमें दुर्वासा
* अत्र ' हे राम रघुनन्दन राघवेति ' इति पाठान्तरम् ।