स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 201–210
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १ ९ १
ध्येयः सदा योगिभिरप्रमेयश्चिन्ताहरश्चिन्तितपारिजातः ।
कस्तूरिकाकल्पितनीलवर्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४ ९ ॥
संसारकूपे पतितोऽत्यगाधे मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते ।
करावलम्बं मम देहि विष्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५० ॥
त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५१ ॥
भजस्व मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै जिह्वे रसज्ञे सुलभं मनोज्ञम् ।
द्वैपायनाद्यैर्मुनिभिः प्रजप्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५२ ॥
गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण दीनबन्धो ।
उच्चस्वरैस्त्वं वद सर्वदैव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५३ ॥
ऋषिने शिष्योंसहित आकर भोजन माँगा तब ] वनवासिनी द्रौपदीने भोजन देना स्वीकार कर अपने अन्तःकरणमें स्थित श्रीश्यामसुन्दरको ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' कहकर बुलाया ॥ ४८ ॥ योगी भी जिन्हें ठीक - ठीक नहीं
जान पाते, जो सभी प्रकारकी चिन्ताओंको हरनेवाले और मनोवाञ्छित वस्तुओंको देनेके लिये कल्पवृक्षके समान हैं तथा जिनके शरीरका वर्ण कस्तूरीके समान नीला है, उन्हें सदा ही ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंसे स्मरण करना चाहिये ॥ ४ ९ ॥ जो मोहरूपी अन्धकारसे व्याप्त और विषयोंकी ज्वालासे सन्तप्त है, ऐसे अथाह संसाररूपी कूपमें मैं पड़ा हुआ हूँ । ' हे मेरे मधुसूदन! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' मुझे अपने हाथका सहारा दीजिये ॥ ५० ॥ हे जिह्वे!
तुझीसे एक भिक्षा माँगता हूँ, तू ही मुझे दे । वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीरका अन्त करने आवें तो बड़े ही प्रेमसे गद्गद स्वरमें ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इन मञ्जुल नामोंका उच्चारण करती रहना ॥ ५१ ॥ हे
जिह्वे! हे रसज्ञे! संसाररूपी बन्धनको काटनेके लिये तू सर्वदा ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इस नामरूपी मन्त्रका जप किया कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और जिसे व्यास, वसिष्ठादि ऋषियोंने भी जपा है ॥ ५२ ॥ रे जिह्वे! तू
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१ ९ २ * स्तोत्ररत्नावली *
जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि ।
समस्तभक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५४ ॥
गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण ।
गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५५ ॥
सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम् ।
देहावसाने त्विदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५६ ॥
दुर्वारवाक्यं परिगृह्य कृष्णा मृगीव भीता तु कथं कथञ्चित् ।
सभां प्रविष्टा मनसाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५७ ॥
श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५८ ॥
निरन्तर ' गोपाल! वंशीधर! रूपसिन्धो! लोकेश! नारायण! दीनबन्धो! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंका उच्च स्वरसे कीर्तन किया कर ॥ ५३ ॥ हे जिह्वे! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्रके ' गोविन्द! दामोदर!
माधव! ' इन मनोहर मञ्जुल नामोंको, जो भक्तोंके समस्त संकटोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, भजती रह ॥ ५४ ॥ हे जिह्वे! ' गोविन्द! गोविन्द! हरे!
मुरारे! गोविन्द! गोविन्द! मुकुन्द! कृष्ण! गोविन्द! गोविन्द! रथाङ्गपाणे! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंको तू सदा जप रह ॥ ५५ ॥ सुखके अन्तमें यही सार है, दुःखके अन्तमें यही गाने योग्य है
और शरीरका अन्त होनेके समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन - -सा स मन्त्र? यही कि ‘ हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' ॥ ५६ ॥ दुःशासनके
दुर्निवार्य वचनोंको स्वीकार कर मृगीके समान भयभीत हुई द्रौपदी किसी-किसी तरह सभामें प्रवेश कर मन - ही - मन ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ” इस प्रकार भगवान्का स्मरण करने लगी ॥ ५७ ॥ हे जिह्वे! तू ' श्रीकृष्ण!
राधारमण! व्रजराज! गोपाल! गोवर्धन! नाथ! विष्णो! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' 1- इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ५८ ॥
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १ ९ ३
श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५ ९ ॥
गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६० ॥
गोपीजनाह्लादकर व्रजेश गोचारणारण्यकृत प्रवेश ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६१ ॥
प्राणेश विश्वम्भर कैटभारे वैकुण्ठ नारायण चक्रपाणे ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६२ ॥
हरे मुरारे मधुसूदनाद्य श्रीराम सीतावर रावणारे ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६३ ॥
श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष गोगोपगोपी सुखदानदक्ष ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६४ ॥
हे जिह्वे! तू ‘ श्रीनाथ! सर्वेश्वर! श्रीविष्णुस्वरूप! श्रीदेवकीनन्दन! असुरनिकन्दन! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' ' - इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ५ ९ ॥ हे जिह्वे! तू ' गोपीपते! कंसरिपो! मुकुन्द! लक्ष्मीपते! केशव! वासुदेव! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' -इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ६० ॥ जो व्रजराज व्रजाङ्गनाओंको आनन्दित करनेवाले हैं,
जिन्होंने गौओंको चरानेके लिये वनमें प्रवेश किया है; हे जिह्वे! तुम उन्हीं मुरारिके ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' - इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ६१ ॥ हे जिह्वे! तू ' प्राणेश! विश्वम्भर! कैटभारे! वैकुण्ठ! नारायण!
चक्रपाणे! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' -इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ६२ ॥ ' हे हरे! हे मुरारे! हे मधुसूदन! हे पुराणपुरुषोत्तम! हे
रावणारे! हे सीतापते श्रीराम! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' – इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह ॥ ६३ ॥ हे जिह्वे!
' श्रीयदुकुलनाथ! गिरिधर! कमलनयन! गौ, गोप और गोपियोंको सुख देनेमें
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१ ९ ४ * स्तोत्ररत्नावली *
धराभरोत्तारणगोपवेष विहारलीलाकृतबन्धुशेष ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६५ ॥
बकीबकाघासुरधेनुकारे केशीतृणावर्तविघातदक्ष ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६६ ॥
श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे भरताग्रजेश ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६७ ॥
नारायणानन्त हरे नृसिंह प्रह्लादबाधाहर हे कृपालो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६८ ॥
लीलामनुष्याकृतिरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६ ९ ॥
कुशल श्रीगोविन्द! दामोदर! माधव! ' -इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह || ६४ || जिन्होंने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये सुन्दर ग्वालका रूप धारण किया है और आनन्दमयी लीला करनेके निमित्त ही शेषजीको अपना भाई बनाया है, ऐसे उन नटनागरके ‘ गोविन्द! दामोदर! माधव! ' –इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह ॥ ६५ ॥ जो पूतना, बकासुर, अघासुर और
धेनुकासुर आदि राक्षसोंके शत्रु हैं और केशी तथा तृणावर्तको पछाड़नेवाले हैं, हे जिह्वे! उन असुरारि मुरारिके ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' -इस नामामृतका तू निरन्तर पान करती रह ॥ ६६ ॥ ' हे जानकीजीवन भगवान् राम! हे दैत्यदलन
भरताग्रज! हे ईश! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' -इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह ॥ ६७ ॥ ' हे प्रह्लादकी बाधा हरनेवाले दयामय
नृसिंह! नारायण! अनन्त! हरे! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' 1 - इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह || ६८ || हे जिह्वे! जिन्होंने लीलाहीसे मनुष्योंकी - सी आकृति बनाकर रामरूप प्रकट किया है और अपने प्रबल पराक्रमसे सभी भूपोंको दास बना लिया है, तू उन नीलाम्बुज श्यामसुन्दर
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १ ९ ५
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७० ॥
वक्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७१ ॥
इति श्रीबिल्वमङ्गलाचार्यविरचितं श्रीगोविन्ददामोदरस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ५४ - श्रीप्रपन्नगीतम् ( पञ्चमस्वरमेकतालं भजनम्, विहागरागेण गीयते )
परमसखे श्रीकृष्ण भयङ्करभवार्णवेऽव्यय विनिमग्नम् ।
मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ॥
( ध्रुवपदम् ) श्रीरामके ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' -इस नामामृतका ही निरन्तर पान करती रह ॥ ६ ९ ॥ हे जिह्वे! तू ' श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! तथा गोविन्द! दामोदर! माधव! ' – इस नामामृतका ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह ॥ ७० ॥ अहो! मनुष्योंकी विषयलोलुपता कैसी
आश्चर्यजनक है! कोई - कोई तो बोलनेमें समर्थ होनेपर भी भगवन्नामका उच्चारण नहीं करते; किन्तु हे जिह्वे! मैं तुमसे कहता हूँ, तू ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' – इस नामामृतका ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह ॥ ७१ ॥
इस प्रकार यह श्रीबिल्वमङ्गलाचार्यका बनाया हुआ गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र समाप्त हुआ । हे परमसखे! श्रीकृष्ण! हे अच्युत! श्रीलक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सेवित आपके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए एवं भयंकर भवसागरमें डूबते हुए मेरा उद्धार कीजिये । त्रिगुणमयी मायारूपिणी मृगतृष्णासे जिसकी बुद्धि चञ्चल हो रही है, जिसकी दसों इन्द्रियाँ विषयभोगोंके लिये उत्कण्ठित रहा करती हैं, जो दुष्ट मनुष्योंद्वारा अपमानित हो चुका है, अपनी बुद्धि मारी जानेके कारण जिसने भगवान्की शरण छोड़ गुणोंकी शरण ली है; उस सदा भयभीत मनवाले, कामादि छः शत्रुओंके जालमें
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१ ९ ६ स्तोत्ररत्नावली **
गुणमृगतृष्णाचलितधियं विषयार्थसमुत्सुकदशकरणम् ।
परिभूतं दुर्मतिनरनिकरैर्मतिभ्रमार्जितगुणशरणम् ॥
सततं सभयमनो निवहन्तं षड्रिपुभिर्निखिलेड्यगुरुम् ।
कालिन्दीहृदयप्रियविष्णोश्चरणकमलरजसो विधुरम् ॥
मनः शोकमतिमोहक्षतयेऽभिकाङ्क्षन्तमजमुखपद्मम् मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ॥ १ ॥
कालिन्दीरुक्मिणीराधिकासत्याजाम्बवतीसुहृदम् निजशरणागतभक्तजनेभ्यः कृपया गतभवभयवरदम् ॥ गोपीजनवल्लभरासेश्वरगोवर्धनधरमधुमथनम् वन्देऽहं निखिलाधिपतिं त्वामतिशयसुन्दरगुणभवनम् ॥
कृष्णलालजीद्विजाधिपं हे मनोऽनिशं त्वं भज यज्ञम् ।
मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ॥ २ ॥
इति श्रीकृष्णलालद्विजविरचितायां गीताभजनसप्तशत्यां प्रपन्नगीतं सम्पूर्णम् । फँसकर सबकी खुशामद करनेवाले, कालिन्दीके प्राणनाथ आप ( श्रीकृष्ण ) के चरणारविन्दपरागसे शून्य, मनके शोक और बुद्धिके भ्रमको नाश करनेके लिये अजन्मा आपके मुखकमलके दर्शनाभिलाषी तथा लक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सेवित आपके चरणकमलोंकी शरणमें आये हुए मेरा आप उद्धार कीजिये ॥ १ ॥
कालिन्दी, रुक्मिणी, राधा, सत्यभामा और जाम्बवतीके सुहृद्, अपने शरणागत भक्तजनोंपर कृपा करके उन्हें भव - भयसे मुक्त करनेवाला वर देनेवाले, गोपबालाओंके प्रियतम, रासके अधिनायक, गोवर्धनधारी, मधुसूदन, सर्वेश्वर, अत्यन्त कमनीय गुणोंके आश्रय, आपको मैं नमस्कार करता हूँ, हे मन! तू सर्वदा कृष्णलालद्विजके स्वामी यज्ञेश्वर कृष्णका भजन कर; हे परमसखे! लक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सेवित आपके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए मेरा उद्धार कीजिये ॥ २ ॥
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * १ ९ ७ ५५ - श्रीकृष्णः शरणं मम श्रीकृष्ण एव शरणं मम श्रीकृष्ण एव शरणम् ॥ ( ध्रुवपदम् )
गुणमय्येषा न यत्र माया न च जनुरपि मरणम् ।
यद्यतयः पश्यन्ति समाधौ परममुदाभरणम् ॥ १ ॥
यद्धेतोर्निवहन्ति बुधा ये जगति सदाचरणम् ।
सर्वापद्भ्यो विहितं महतां येन समुद्धरणम् ॥ २ ॥
भगवति यत्सन्मतिमुद्वहतां हृदयतमोहरणम् ।
हरिपरमा यद्भजन्ति सततं निषेव्य गुरुचरणम् ॥ ३ ॥
असुरकुलक्षतये कृतममरैर्यस्य सदादरणम् ।
भुवनतरुं धत्ते यन्निखिलं विविधविषयपर्णम् ॥ ४ ॥
मेरे लिये श्रीकृष्ण ही शरण है, एकमात्र कृष्ण ही शरण है । जहाँ यह त्रिगुणमयी माया और जन्म - मृत्यु नहीं हैं तथा योगीलोग समाधिमें जिस आनन्दमयका यहीं दर्शन करते हैं ॥ १ ॥ जिनकी प्राप्तिके लिये विद्वान् लोग
संसारमें अनेक धर्माचरण करते हैं और जिन्होंने सभी आपत्तियोंसे महात्माओंका उद्धार किया है ॥ २ ॥ जो भगवान्में सद्बुद्धि रखनेवालोंके
हृदयका अज्ञानान्धकार नष्ट कर देते हैं और भगवद्भक्तजन गुरुचरणोंकी सेवा करके जिनका सदा भजन करते हैं ॥ ३ ॥ असुरोंके विनाशके लिये देवताओंने
जिनका सदा आदर किया है और जो अनेक विषयरूपी पत्रोंवाले इस संसार - वृक्षको धारण किये हुए हैं ॥४ ॥
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१ ९ ८ * स्तोत्ररत्नावली *
अवाप्य यद्भूयोऽच्युतभक्ता न यान्ति संसरणम् ।
कृष्णलालजीद्विजस्य भूयात्तदघहरस्मरणम् ॥ ५ ॥
इति श्रीकृष्णलालजीद्विजविरचितं ' श्रीकृष्णः शरणं मम ' नामक स्तोत्रं समाप्तम् । ५६ - – गोपिकाविरहगीतम् एहि ************* मुरारे कुञ्जविहारे एहि प्रणतजनबन्धो हे माधव मधुमथन वरेण्य केशव करुणासिन्धो । ( ध्रुवपदम् ) रासनिकुञ्जे गुञ्जति नियतं भ्रमरशतं किल कान्त
एहि निभृतपथपान्थ ।
त्वामिह याचे दर्शनदानं हे मधुसूदन शान्त ॥ १ ॥
शून्यं कुसुमासनमिह कुञ्जे शून्यः केलिकदम्बः दीनः केकिकदम्बः । जिनको प्राप्त करके भगवद्भक्त फिर आवागमनके चक्रमें नहीं फँसते, उन्हींकी पापनाशक स्मृति कृष्णलालजी द्विजके हृदयमें बनी रहे ॥ ५ ॥
# हे मुरारे! हे प्रणतजनोंके बन्धु! विहार - कुञ्जमें आइये, आइये । हे माधव! हे मधुमथन! हे पूजनीय! हे केशव! हे करुणासिन्धो! पधारिये । हे अद्वैतपथके पथिक! हे नाथ! रासनिकुञ्जमें सैकड़ों भ्रमर गूँज रहे हैं, पधारिये; हे शान्तिमय मधुसूदन! आपके दर्शनदानकी हम याचना करती हैं ॥ १ ॥ हे नाथ! आपके इस क्रीडास्थल कुञ्जमें बिछा हुआ यह कुसुमासन और
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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * * १ ९९ मृदुकलनादं किल सविषादं रोदिति यमुनास्वम्भः ॥ २ ॥
नवनीरजधरश्यामलसुन्दर चन्द्रकुसुमरुचिवेश गोपीगणहृदयेश | गोवर्द्धनधर वृन्दावनचर वंशीधर परमेश ॥ ३ ॥
राधारञ्जन कंसनिषूदन कंसनिषूदन प्रणतिस्तावकचरणे
निखिलनिराश्रयशरणे ।
एहि जनार्दन पीताम्बरधर कुञ्जे मन्थरपवने ॥ ४ ॥
इति श्रीगोपिकाविरहगीतं सम्पूर्णम् । = यह लीला - कदम्ब, सब आपके बिना सूना मालूम हो रहा है; मयूर आदि पक्षीगण दीन हो रहे हैं, मृदु कलरव करता हुआ श्रीयमुनाजीका निर्मल जल भी आपके वियोगमें शोकके साथ रोता - सा जान पड़ता है ॥ २ ॥ हे नवीन
कमल धारण करनेवाले! हे मेघकी - सी श्यामल सुन्दरतावाले! हे मोरपंख और पुष्पोंसे सुशोभित वेषधारी गोपीजनोंके हृदयेश! हे गोवर्धनधारी! वृन्दावन - विहारी! मुरलीधर! हे प्रभो! पधारिये || ३ || हे राधिकाजीको प्रसन्न करनेवाले! कंसको मारनेवाले! सभी निराश्रयोंको आश्रय देनेवाले आपके चरणोंमें हमारा प्रणाम है, हे जनार्दन! पीताम्बरधारी! हे प्रभो! इस मन्द - मन्द वायुवाले कुञ्जमें पधारिये! पधारिये!! पधारिये!!! ॥४ ॥
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२०० * स्तोत्ररत्नावली * ५७ – मधुराष्टकम् अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं
मधुरम् ।
मधुरम् ॥ १ ॥
मधुरम् ।
मधुरम् ॥ २ ॥
मधुरौ ।
मधुरम् ॥ ३ ॥
मधुरम् ।
मधुरम् ॥ ४ ॥
मधुरम् ।
मधुरम् ॥ ५ ॥
श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है । उनके अधर मधुर हैं, मुख मधुर है, नेत्र मधुर हैं, हास्य मधुर है, हृदय मधुर है और गति भी अति मधुर है ॥ १ ॥ उनके वचन मधुर हैं, चरित्र मधुर हैं, वस्त्र मधुर हैं, अंगभंगी मधुर
है, चाल मधुर है और भ्रमण भी अति मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥ २ ॥ उनका वेणु मधुर है, चरणरज मधुर है, करकमल मधुर हैं,
चरण मधुर हैं, नृत्य मधुर है और सख्य भी अति मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है || ३ || उनका गान मधुर है, पान मधुर है, भोजन मधुर है, शयन मधुर है, रूप मधुर है और तिलक भी अति मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥ ४ ॥ उनका कार्य मधुर है, तैरना मधुर
है, हरण मधुर है, रमण मधुर है, उद्गार मधुर है और शान्ति भी अति