स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 211–220

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * २०१

गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।

सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ६ ॥

गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।

दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ७ ॥

गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।

दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ८ ॥

इति श्रीमद्वल्लभाचार्यकृतं मधुराष्टकं सम्पूर्णम् । मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥ ५ ॥ उनकी गुञ्जा मधुर है,

माला मधुर है, यमुना मधुर है, उसकी तरङ्गे मधुर हैं, उसका जल मधुर और कमल भी अति मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥ ६ ॥

गोपियाँ मधुर हैं, उनकी लीला मधुर है, उनका संयोग मधुर है, वियोग मधुर है, निरीक्षण मधुर है और शिष्टाचार भी मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है || ७ || गोप मधुर हैं, गौएँ मधुर हैं, लकुटी मधुर है, रचना मधुर है, दलन मधुर है और उसका फल भी अति मधुर है; श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥ ८ ॥

पृष्ठ 212

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२०२ * स्तोत्ररत्नावली * ५८ - श्रीनन्दकुमाराष्टकम्

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम् ।

वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम् ॥

वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ।

भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम् ॥ १ ॥

सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम् ।

गुञ्जाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम् ॥

वल्लभपटपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं विबुधवरं । भज ० ॥ २ ॥

शोभितमुखधूलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदतरम् ।

मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरसुरम् ॥

वल्लभमतिविमलं शुभपदकमलं नखरुचिअमलं तिमिरहरं । भज जिनके हृदयमें वनमाला है, नेत्र बड़े - बड़े हैं, जो शोकहारी, वृन्दावनके चन्द्रमा, परमानन्दमय और पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं, जो सबके प्रिय, मेघके समान श्यामल, पूर्णकाम, अत्यन्त सुन्दर और प्रेम करनेवाले हैं; उन समस्त सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन मनमोहन, गोपाल श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो ॥ १ ॥ जिनका सुन्दर कमलके समान मुख है, जो

अपनी कान्तिसे कामदेवको भी जीत चुके हैं, जो आनन्दके आगार, मुकुटधारी, गुञ्जाकी माला पहननेवाले, वृन्दावनविहारी परम उदार और गोपियोंके चीर हरण करनेवाले हैं, जिनको पीताम्बर प्रिय है, जो सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये हु और हाथमें माखन लिये हुए हैं, उन समस्त सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, देवेश्वर नन्दनन्दन, श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो ॥ २ ॥ जो यमुनातटपर मुँहमें धूल

लपेटे शोभा पा रहे हैं, जिनकी कहीं तुलना नहीं है, जो परम सुखद हैं, जो धूलिधूसरितमुख हो, धेनु चराते और मधुर स्वरसे वेणु बजाते हैं, जो सबके प्रिय

पृष्ठ 213

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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * २०३ शिरमुकुटसुदेशं मायाकृतमनुजं वल्लभव्रजपालं इन्दीवरभासं हृतमन्मथमानं वल्लभमृदुहासं अतिपरप्रवीणं मोहनमतिधीरं

कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम् ।

हरधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ॥

सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरं । भज ० ॥ ४ ॥

प्रकटसुरासं कुसुमविकासं वंशिधरम् ।

रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ॥

कुञ्जनिवासं विविधविलासं केलिकरं । भज ० ॥ ५ ॥

पालितदीनं भक्ताधीनं कर्मकरम् ।

फणिबलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ॥

वल्लभव्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरं । भज ० ॥ ६ ॥

तथा अत्यन्त विमल हैं, जिनके चरणकमल सुन्दर हैं, नखोंकी कान्ति निर्मल है, जो अज्ञानान्धकारको दूर करते हैं, उन समस्त सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो ॥ ३ ॥ जिनके सुन्दर मस्तकपर

मुकुट है, बाल घुँघराले हैं, नटवर वेष है, जो कामसे भी अधिक सुन्दर हैं, मायासे मनुष्य - अवतार धारण करते हैं, बलरामजीके छोटे भाई हैं, दानवोंको मारकर पृथ्वीका भार हरण करते हैं; जो व्रजके रक्षक, प्रियतम, सुन्दर गतिशील, प्रतिक्षण हित चाहनेवाले और उत्तम भाववाले हैं; उन सब सुखोंके सारभूत परब्रह्मस्वरूप, श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो ॥ ४ ॥ जिनकी नीलकमलके

नन्दनन्दन समान कान्ति है, जिन्होंने पवित्र रास - रसको प्रकट किया है, जो कुसुमोंके समान विकसित रहते हैं, वंशी धारण करते हैं; जिन्होंने कन्दर्पके दर्पको चूर कर दिया है, जो रूपकी राशि हैं, मधुर गायनके द्वारा मन मोह लेते हैं, जिनका मधुर हास प्रिय है, जो निकुञ्जोंमें रहकर नाना प्रकारकी लीलाएँ किया करते हैं, उन सब लगता, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप और भक्तोंके अधीन कर्म भजो ॥ ५॥ जो परम प्रवीण हैं, दीनोंके पालक

करनेवाले, जो अत्यन्त धीर मनमोहन, शेषके अवतार बलभद्ररूप, शत्रुवीरोंके

पृष्ठ 214

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* स्तोत्ररत्नावली * २०४ जलधरद्युतिअङ्गं

KKKKK ललितत्रिभङ्गं बहुकृतरङ्गं रसिकवरम् ।

गोकुलपरिवारं मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ॥

वल्लभव्रजचन्द्रं सुभगसुछन्दं कृतआनन्दं भ्रान्तिहरं । भज ० ॥ ७ ॥

वन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् ।

कालियशिरगमनं कृतफणिनमनं घातितयमनं मृदुलतरम् ॥

वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरं । भज ० ॥ ८ ॥

इति श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यविरचितं श्रीनन्दकुमाराष्टकं सम्पूर्णम् । नाशक, अतिशय चपल,, प्रेममय व्रजमें रमनेवाले, कमल - वदन गोवर्धनधारी और हलधरजीको शान्त करनेवाले हैं; उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो ॥ ६ ॥ जिनके अङ्गकी कान्ति मेघके सदृश

श्याम है, उसमें ललित त्रिभंग शोभा पाता है, जो नाना रङ्गोंमें रहते हैं, परम रसिक हैं, गोकुल ही जिनका परिवार है, मदनके समान सुन्दर आकृति है, जो कुञ्जमें विहार करते हैं, सर्वत्र अत्यन्त गूढ़भावसे छिपे हैं, जो प्यारे व्रजचन्द्र, बड़भागी और दिव्य लीलामय हैं, सदा आनन्द करनेवाले और भ्रान्तिको भगानेवाले हैं, उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो ॥ ७ ॥ जिनके दोनों चरण

( भक्तोंद्वारा ) वन्दित हैं, जो सबको पवित्र करते हैं और जगत्का उद्धार करनेवाले हैं, निर्मल भक्तोंको हृदयमें धारण करनेवाले तथा कालियनागके मस्तकपर नृत्य करनेवाले हैं, जिनकी शेषनाग भी स्तुति करते हैं, जो कालयवनके घातक और अति कोमल हैं, जो अपने प्रियजनोंके शोकहारी, निर्मल चरणोंवाले, अशरणोंकी शरण और मोक्ष देनेवाले हैं, उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णका तत्त्वरूपसे भजन करो ॥ ८ ॥

पृष्ठ 215

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* श्रीकृष्णस्तोत्राणि * २०५ ५ ९ – चतुःश्लोकी

सदा सर्वात्मभावेन भजनीयो व्रजेश्वरः ।

करिष्यति स एवास्मदैहिकं पारलौकिकम् ॥ १ ॥

अन्याश्रयो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः ।

स्वकीये स्वात्मभावश्च कर्तव्यः सर्वथा सदा ॥ २ ॥

सदा सर्वात्मना कृष्णः सेव्यः कालादिदोषनुत् ।

तद्भक्तेषु च निर्दोष भावेन स्थेयमादरात् ॥ ३ ॥

भगवत्येव सततं स्थापनीयं मनः स्वयम् ।

कालोऽयं कठिनोऽपि श्रीकृष्णभक्तान्न बाधते ॥ ४ ॥

इति श्रीविट्ठलेश्वरोक्ता ( द्वितीया ) चतुःश्लोकी समाप्ता । सबके आत्मारूपसे व्याप्त, भगवान् व्रजराज श्रीकृष्णका ही सदैव भजन करना चाहिये, वे ही हमलोगोंके लौकिक और पारलौकिक लाभ सिद्ध करेंगे ॥ १ ॥ दूसरेका आश्रय नहीं लेना चाहिये, क्योंकि वह सर्वथा बाधक

होता है; सदा स्वावलम्बी होकर, सब तरहसे आत्मभावका पालन करना चाहिये ॥ २ ॥ कालादि दोषोंको दूर करनेवाले भगवान् कृष्णका सदा - सर्वथा

सेवन करना चाहिये और दोष - दृष्टिको त्यागकर, श्रद्धापूर्वक उनके भक्तोंका सङ्ग करना चाहिये ॥ ३ ॥ भगवान् कृष्णमें ही सदैव अपने मनको लगाये

रखना चाहिये; क्योंकि उनके भक्तोंको यह कठिन काल भी बाधा नहीं पहुँचा सकता ॥४ ॥

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ॐ विविधदेवस्तोत्राणि ६० - श्रीगणपतिस्तोत्रम् जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजाद्बलिं बध्नता स्त्रष्टुं वारिभवोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तुं धराम् । पार्वत्या महिषासुरप्रमथने सिद्धाधिपैः सिद्धये ध्यातः पञ्चशरेण विश्वजितये पायात्स नागाननः ॥ १ ॥

विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाड् विघ्नव्यालकुलाभिमानगरुडो विघ्नेभपञ्चाननः । विघ्नोत्तुङ्गगिरिप्रभेदनपविर्विघ्नाम्बुधेर्वाडवो विघ्नाघौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु नः ॥ २ ॥

त्रिपुरासुरको जीतनेके लिये शिवने, बलिको छलसे बाँधते समय विष्णुने, जगत्‌को रचनेके लिये ब्रह्माने, पृथ्वी धारण करनेके लिये शेषनागने, महिषासुरको मारनेके समय पार्वतीने, सिद्धि पानेके लिये सिद्धोंके अधिपतियों ( सनकादि ऋषियों ) ने और सब संसारको जीतनेके लिये कामदेवने जिन गणेशजीका ध्यान किया है, वे हमलोगोंका पालन करें ॥ १ ॥

विघ्नरूप अन्धकारका नाश करनेवाले एकमात्र सूर्य, विघ्नरूप वनके जलानेवाले अग्नि, विघ्नरूप सर्पकुलका दर्प नष्ट करनेके लिये गरुड, विघ्नरूप हाथीको मारनेवाले सिंह, विघ्नरूप ऊँचे पहाड़के तोड़नेवाले वज्र, विघ्नरूप

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २०७ खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरं वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥ ३ ॥

गजाननाय महसे प्रत्यूहतिमिरच्छिदे ।

अपारकरुणापूरतरङ्गितदृशे नमः ॥। ४ ॥

अगजाननपद्मार्कं गजाननमहर्निशम् ।

अनेकदन्तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे ॥ ५ ॥

श्वेताङ्गं श्वेतवस्त्रं सितकुसुमगणैः पूजितं श्वेतगन्धैः क्षीराब्धौ रत्नदीपैः सुरनरतिलकं रत्नसिंहासनस्थम् । महासागरके वडवानल, विघ्नरूपी मेघ - समूहको उड़ा देनेवाले प्रचण्ड गणेशजी हमलोगोंका पालन करें ॥ २ ॥ जो नाटे और मोटे

वायुसदृश शरीरवाले हैं, जिनका गजराजके समान मुँह और लंबा उदर है, जो सुन्दर हैं तथा बहते हुए मदकी सुगन्धके लोभी भौरोंके चाटनेसे जिनका गण्डस्थल चपल हो रहा है, दाँतोंकी चोटसे विदीर्ण हुए शत्रुओंके खूनसे जो सिन्दूरकी - सी शोभा धारण करते हैं, कामनाओंके दाता और सिद्धि देनेवाले उन पार्वतीके पुत्र, गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ३ ॥ विघ्नरूप

नाश करनेवाले, अथाह करुणारूप जलराशिसे तरङ्गित नेत्रोंवाले, अन्धकारका नामक ज्योतिको नमस्कार है ॥ ४ ॥ जो पार्वतीके मुखरूप कमलको

गणेश सूर्यरूप हैं, जो भक्तोंको अनेक प्रकारके फल देते हैं, उन प्रकाशित करनेमें मैं सदैव उपासना करता हूँ ॥ ५ ॥ जिनका शरीर

एक दाँतवाले गणेशजीकी क्षीरसमुद्रके तटपर श्वेत है, कपड़े श्वेत हैं, श्वेत फूल, चन्दन और रत्नदीपोंसे

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२०८ * स्तोत्ररत्नावली * दोर्भिः पाशाङ्कुशाब्जाभयवरमनसं चन्द्रमौलिं त्रिनेत्रं ध्यायेच्छान्त्यर्थमीशं गणपतिममलं श्रीसमेतं प्रसन्नम् ॥ ६ ॥

आवाहये तं गणराजदेवं रक्तोत्पलाभासमशेषवन्द्यम् ।

विघ्नान्तकं विघ्नहरं गणेशं भजामि रौद्रं सहितं च सिद्ध्या ॥ ७ ॥

यं ब्रह्म वेदान्तविदो वदन्ति परं प्रधानं पुरुषं तथान्ये ।

विश्वोद्गतेः कारणमीश्वरं वा तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय ॥ ८ ॥

विघ्नेश वीर्याणि विचित्रकाणि वन्दीजनैर्मागधकैः स्मृतानि ।

श्रुत्वा समुत्तिष्ठ गजानन त्वं ब्राह्मे जगन्मङ्गलकं कुरुष्व ॥ ९ ॥

गणेश हेरम्ब गजाननेति महोदर स्वानुभवप्रकाशिन् ।

वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथ वदन्त एवं त्यजत प्रभीतीः ॥ १० ॥

जिनकी पूजा हुई है; देवता और मनुष्य जिनको अपना प्रधान पूज्य समझते हैं, जो रत्नके सिंहासनपर बैठे हैं, जिनके हाथोंमें पाश ( एक प्रकारकी डोरी ), अंकुश और कमलके फूल हैं, जो अभयदान और वरदान देनेवाले हैं, जिनके सिरमें चन्द्रमा रहते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं; निर्मल लक्ष्मीके साथ रहनेवाले, उन प्रसन्नप्रभु गणेशजीका अपनी शान्तिके लिये ध्यान करे ॥ ६ ॥

जो देवताओंके गणके राजा हैं, लाल कमलके समान जिनके देहकी आभा है, जो सबके वन्दनीय हैं, विघ्नके काल हैं, विघ्नके हरनेवाले हैं, शिवजीके पुत्र हैं; उन गणेशजीका मैं सिद्धिके साथ आवाहन और भजन करता हूँ ॥ ७ ॥

जिनको वेदान्ती लोग ब्रह्म कहते हैं और दूसरे लोग परम प्रधान पुरुष अथवा संसारकी सृष्टिके कारण या ईश्वर कहते हैं; उन विघ्नविनाशक गणेशजीको नमस्कार है ॥ ८ ॥ हे विघ्नेश! हे गजानन! मागध और वन्दीजनोंके मुखसे गाये

जाते हुए अपने विचित्र पराक्रमोंको सुनकर, ब्राह्ममुहूर्तमें उठो और जगत्का कल्याण करो ॥ ९ ॥ ' हे गणेश! हे हेरम्ब! हे गजानन! हे लम्बोदर!

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २० ९

अनेकविघ्नान्तक वक्रतुण्ड स्वसंज्ञवासिंश्च चतुर्भुजेति ।

कवीश देवान्तकनाशकारिन् वदन्त एवं त्यजत प्रभीतीः ॥ ११ ॥

अनन्तचिद्रूपमयं गणेशं ह्यभेदभेदादिविहीनमाद्यम् ।

हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १२ ॥

विश्वादिभूतं हृदि योगिनां वै प्रत्यक्षरूपेण विभान्तमेकम् ।

सदा निरालम्बसमाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १३ ॥

यदीयवीर्येण समर्थभूता माया तया संरचितं च विश्वम् ।

नागात्मकं ह्यात्मतया प्रतीतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १४ ॥

सर्वान्तरे संस्थितमेकगूढं यदाज्ञया सर्वमिदं विभाति ।

अनन्तरूपं हृदि बोधकं वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥। १५ ॥

हे अपने अनुभवसे प्रकाशित होनेवाले! हे श्रेष्ठ! हे सिद्धिके प्रियतम! हे बुद्धिनाथ! ' ऐसा कहते हुए, हे मनुष्यो! अपना भय छोड़ दो ॥ १० ॥ ' हे अनेक

विघ्नोंका नाश करनेवाले! हे वक्रतुण्ड! गणेश आदि अपने नामवालोंमें भी निवास करनेवाले! हे चतुर्भुज! हे कवियोंके नाथ! हे दैत्योंका नाश करनेवाले! ' ऐसा कहते हुए, हे मनुष्यो! अपने भयको भगा दो ॥ ११ ॥ जो

गणेश अनन्त हैं, चेतनरूप हैं, अभेद और भेद आदिसे रहित और सृष्टिके आदि कारण हैं, अपने हृदयमें जो सदा प्रकाश धारण करते हैं तथा अपनी ही बुद्धिमें स्थित रहते हैं; उन एकदन्त गणेशजीकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १२ ॥ जो संसारके

आदि कारण हैं, योगियोंके हृदयमें अद्वितीय रूपसे साक्षात् प्रकाशित होते हैं और निरालम्ब समाधिके द्वारा ही जानने योग्य हैं, उन एकदन्त गणेशकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १३ ॥ जिनके बलसे माया समर्थ हुई है और उसके द्वारा यह संसार

रचा गया है, उन नागस्वरूप तथा आत्मारूपसे प्रतीत होनेवाले एकदन्त गणेशजीकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १४ ॥ जो सब लोगोंके अन्तःकरणमें अकेले

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२१० * स्तोत्ररत्नावली *

यं योगिनो योगबलेन साध्यं कुर्वन्ति तं कः स्तवनेननौति ।

अतः प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १६ ॥

देवेन्द्रमौलिमन्दारमकरन्दकणारुणाः विघ्नान् हरन्तु हेरम्बचरणाम्बुजरेणवः ॥ १७ ॥

एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम् ।

विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ॥ १८ ॥

यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।

तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ॥ १ ९ ॥

इति श्रीगणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् । गूढ़भावसे स्थित रहते हैं, जिनकी आज्ञासे यह जगत् विराजमान है, जो अनन्तरूप हैं और हृदयमें ज्ञान देनेवाले हैं; उन एकदन्त गणेशकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १५॥ जिनको योगीजन योगबलसे साध्य करते ( जान पाते ) हैं,

स्तुतिसे उनका वर्णन कौन कर सकता है? इसलिये हम उनको केवल प्रणाम करते हैं कि हमें सिद्धि दें; उन प्रसिद्ध एकदन्तकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १६ ॥

जो इन्द्रके मुकुटमें गुँथे हुए मन्दारपुष्पोंके मकरन्दकणोंसे लाल हो रही है, वह गणेशजीके चरण - कमलोंकी रज विघ्नोंका हरण करे ॥ १७ ॥ एक दाँतवाले,

बड़े शरीरवाले, स्थूल उदरवाले, हाथीके समान मुखवाले और विघ्नोंका नाश करनेवाले गणेशदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १८ ॥ हे देव! जो अक्षर, पद

अथवा मात्रा छूट गयी हो, उसके लिये क्षमा करो और हे परमेश्वर! प्रसन्न होओ ॥ १ ९ ॥