स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 31–40

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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* शिवस्तोत्राणि E २१ प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र ॥ शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९ ॥

शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते

********* पशुपते पशुपाशनाशिन् ।

काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥। १० ॥

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ । त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ ११ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतो वेदसारशिवस्तवः सम्पूर्णः । हे प्रभो! हे त्रिशूलपाणे! हे विभो! हे विश्वनाथ! हे महादेव! हे शम्भो! हे महेश्वर! हे त्रिनेत्र! हे पार्वतीप्राणवल्लभ! हे शान्त! हे कामारे! हे त्रिपुरारे! तुम्हारे अतिरिक्त न कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न गणनीय है ॥ ९ ॥

हे शम्भो! हे महेश्वर! हे करुणामय! हे त्रिशूलिन्! हे गौरीपते! हे पशुपते! हे पशुबन्धमोचन! हे काशीश्वर! एक तुम्हीं करुणावश इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हो; प्रभो! तुम ही इसके एकमात्र स्वामी हो ॥ १० ॥ हे देव! हे शङ्कर! हे कन्दर्पदलन! हे शिव! हे विश्वनाथ! हे

ईश्वर! हे हर! हे चराचरजगद्रूप प्रभो! यह लिङ्गस्वरूप समस्त जगत् तुम्हींसे उत्पन्न होता है, तुम्हींमें स्थित रहता है और तुम्हींमें लय हो जाता है ॥ ११ ॥

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२२ * स्तोत्ररत्नावली * KKKKK १० - शिवाष्टकम् तस्मै नमः परमकारणकारणाय दीप्तोज्ज्वलज्ज्वलितपिङ्गललोचनाय नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नमः श्रीमत्प्रसन्नशशिपन्नगभूषणाय शैलेन्द्रजावदनचुम्बितलोचनाय कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय लोकत्रयार्तिहरणाय नमः पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय नीलाब्जकण्ठसदृशाय नमः शिवाय ॥ १ ॥

शिवाय ॥ २ ॥

शिवाय ॥ ३ ॥

जो कारणके भी परम कारण हैं, ( अग्निशिखाके समान ) अति देदीप्यमान उज्ज्वल और पिङ्गल नेत्रोंवाले हैं, सर्पराजोंके हार - कुण्डलादिसे भूषित हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रादिको भी वर देनेवाले हैं, उन श्रीशङ्करको नमस्कार करता हूँ ॥ १॥ शोभायमान एवं निर्मल चन्द्रकला तथा सर्प ही

जिनके भूषण हैं, गिरिराजकुमारी अपने मुखसे जिनके लोचनोंका चुम्बन करती हैं, कैलास और महेन्द्रगिरि जिनके निवासस्थान हैं तथा जो त्रिलोकीके दुःखको दूर करनेवाले हैं, उन श्रीशङ्करको नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो स्वच्छ

पद्मरागमणिके कुण्डलोंसे किरणोंकी वर्षा करनेवाले, अगरु और बहुत -से - से चन्दनसे चर्चित तथा भस्म, प्रफुल्लित कमल और जूहीसे सुशोभित हैं, ऐसे नीलकमलसदृश कण्ठवाले शिवको नमस्कार है ॥ ३ ॥

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2 / शिवस्तोत्राणि * २३ ********** लम्बत्सपिङ्गलजटामुकुटोत्कटाय दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय त्रैलोक्यनाथनमिताय नमः शिवाय ॥ ४ ॥

दक्षप्रजापतिमहामखनाशनाय क्षिप्रं महात्रिपुरदानवघातनाय । ब्रह्मोर्जितोर्ध्वगकरोटिनिकृन्तनाय योगाय योगनमिताय नमः शिवाय ॥ ५ ॥

संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय रक्षः पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय । सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय शार्दूलचर्मवसनाय नमः शिवाय ॥। ६ ॥ लटकती हुई पिङ्गलवर्ण जटाओंके सहित मुकुट धारण करनेसे जो उत्कट जान पड़ते हैं, तीक्ष्ण दाढ़ोंके कारण जो अति विकट और भयानक प्रतीत होते हैं, व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हैं, अति मनोहर हैं तथा तीनों लोकोंके अधीश्वर भी जिनके चरणोंमें झुकते हैं, उन श्रीशङ्करको प्रणाम है ॥ ४ ॥ दक्षप्रजापतिके महायज्ञको ध्वंस करनेवाले, महान् त्रिपुरासुरको शीघ्र

मार डालनेवाले, दर्पयुक्त ब्रह्माके ऊर्ध्वमुख पञ्चम सिरका छेदन करनेवाले, योगस्वरूप, योगसे नमस्कृत शिवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥५ ॥ जो

कल्प - कल्पमें संसाररचनाका परिवर्तन करनेवाले हैं; राक्षस, पिशाच और सिद्धगणोंसे घिरे रहते हैं; सिद्ध, सर्प, ग्रहगण तथा इन्द्रादिसे सेवित हैं तथा जो व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हैं, उन श्रीशङ्करको नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥

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२४ * स्तोत्ररत्नावली * भस्माङ्गरागकृतरूपमनोहराय 66666666 सौम्यावदातवनमाश्रितमाश्रिताय 1 गौरीकटाक्षनयनार्धनिरीक्षणाय गोक्षीरधारधवलाय नमः शिवाय ॥ ७ ॥।

आदित्यसोमवरुणानिलसेविताय यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय ऋक्सामवेदमुनिभिः स्तुतिसंयुताय गोपाय गोपनमिताय नमः शिवाय ॥ ८ ॥

शिवाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ ९ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवाष्टकं सम्पूर्णम् । भस्मरूपी अङ्गरागसे जिन्होंने अपने रूपको अत्यन्त मनोहर बनाया है, जो अति शान्त और सुन्दर वनका आश्रय करनेवालोंके आश्रित हैं, श्रीपार्वतीजीके कटाक्षकी ओर जो बाँकी चितवनसे निहार रहे हैं और गोदुग्धकी धाराके समान जिनका श्वेत वर्ण है, उन श्रीशङ्करको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ सूर्य, चन्द्र,

वरुण और पवनसे जो सेवित हैं, यज्ञ और अग्निहोत्रके धूममें जिनका निवास है, ऋक्सामादि वेद और मुनिजन जिनकी स्तुति करते हैं, उन नन्दीश्वर-पूजित गौओंका पालन करनेवाले महादेवजीको नमस्कार करता हूँ ॥ ८ ॥ जो

इस पवित्र शिवाष्टकको श्रीमहादेवजीके समीप पढ़ता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है और शङ्करजीके साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥ ९ ॥

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* शिवस्तोत्राणि * २५ ११ - – श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय । नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ' न ' काराय नमः मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै ' म ' काराय नमः शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-शिवाय ॥ १ ॥

शिवाय ॥२ ॥

सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै ' शि ' काराय नमः शिवाय ॥ ३ ॥

जिनके कण्ठमें साँपोंका हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अङ्गराग ( अनुलेपन ) है; दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं [ अर्थात् जो नग्न हैं ], उन शुद्ध अविनाशी महेश्वर ' न ' कारस्वरूप शिवको नमस्कार है ॥ १ ॥

गङ्गाजल और चन्दनसे जिनकी अर्चा हुई है, मन्दार - पुष्प तथा अन्यान्य कुसुमोंसे जिनकी सुन्दर पूजा हुई है, उन नन्दीके अधिपति प्रमथगणोंके स्वामी महेश्वर ' म ' कारस्वरूप शिवको नमस्कार है ॥ २ ॥ जो कल्याणस्वरूप हैं,

पार्वतीजीके मुखकमलको विकसित ( प्रसन्न करनेके लिये जो सूर्यस्वरूप हैं, जो दक्षके यज्ञका नाश करनेवाले हैं, जिनकी ध्वजामें बैलका चिह्न है, उन शोभाशाली नीलकण्ठ ' शि ' कारस्वरूप शिवको नमस्कार है ॥३ ॥

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२६ * स्तोत्ररत्नावली * वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै ' व ' काराय नमः शिवाय ॥ ४ ॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय । दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै ' य ' काराय नमः शिवाय ॥५ ॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ ६ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् । वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम आदि श्रेष्ठ मुनियोंने तथा इन्द्र आदि देवताओंने जिनके मस्तककी पूजा की है, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन ' व ' कारस्वरूप शिवको नमस्कार है ॥ ४ ॥ जिन्होंने यक्षरूप धारण

किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथमें पिनाक है, जो दिव्य सनातन पुरुष हैं, उन दिगम्बर देव ' य ' कारस्वरूप शिवको नमस्कार है ॥ ५ ॥ जो शिवके

समीप इस पवित्र पञ्चाक्षरका पाठ करता है, वह शिवलोकको प्राप्त करता और वहाँ शिवजीके साथ आनन्दित होता है ॥ ६ ॥

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* शिवस्तोत्राणि * २७ १२ – द्वादशज्योतिर्लिङ्गानि

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।

उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम् ॥ १ ॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम् ।

सेतुबन्धे रामेशं नागेशं दारुकावने ॥ २ ॥

तु ( १ ) सौराष्ट्रप्रदेश ( काठियावाड़ ) में श्रीसोमनाथ, १ ( २ ) श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, ( ३ ) उज्जयिनी ( उज्जैन ) में श्रीमहाकाल, ( ४ ) ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर ॥ १ ॥ ( ५ ) परलीमें वैद्यनाथ ',

( ६ ) डाकिनी नामक स्थानमें श्रीभीमशङ्कर ', ( ७ ) सेतुबन्धपर १. श्रीसोमनाथ काठियावाड़ प्रदेशके अन्तर्गत प्रभासक्षेत्रमें विराजमान है । २. यह पर्वत मद्रास प्रान्तके कृष्णा जिलेमें कृष्णा नदीके तटपर है, इसे दक्षिणका कैलास कहते हैं । ३. श्रीमहाकालेश्वर मालवा प्रदेशमें क्षिप्रा नदीके तटपर उज्जैननगरमें विराजमान है, उज्जैनको अवन्तिकापुरी भी कहते हैं । ४. ॐकारेश्वरका स्थान मालवा प्रान्तमें नर्मदा नदीके तटपर है । उज्जैनसे खण्डवा जानेवाली रेलवे लाइनपर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहाँसे यह स्थान १० कि॰मी॰ मील दूर है । यहाँ ॐकारेश्वर और अमलेश्वरके दो पृथक् - पृथक् लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्गके दो स्वरूप हैं । ५. आन्ध्र प्रदेशके हैदराबाद नगरसे पहले परभनी नामक जंकशन है, वहाँसे परलीतक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशनसे थोड़ी दूरपर परली ग्रामके निकट श्रीवैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग है । शिवपुराणमें ' वैद्यनाथं चिताभूमौ ' ऐसा पाठ है, इसके अनुसार संथाल परगनेमें ई ० आई ० रेलवेके जैसीडीह स्टेशनके पासवाला वैद्यनाथ - शिवलिङ्ग ही वास्तविक वैद्यनाथज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है; क्योंकि यही चिताभूमि है । ६. श्रीभीमशङ्करका स्थान बम्बईसे पूर्व और पूनासे उत्तर भीमा नदीके किनारे सह्यपर्वतपर है । यह स्थान लारीके रास्तेसे नासिकसे लगभग १२० मील दूर है I सह्यपर्वतके एक शिखरका नाम डाकिनी है । इससे अनुमान होता है कि कभी यहाँ डाकिनी और भूतोंका निवास था । शिवपुराणकी एक कथाके आधारपर भीमशङ्कर ज्योतिर्लिङ्ग आसामके कामरूप जिलेमें ए ० बी ० रेलवेपर गोहाटीके पास ब्रह्मपुर पहाड़ीपर स्थित बतलाया जाता है । कुछ लोग कहते हैं कि नैनीताल जिलेके उज्जनक

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२८ * स्तोत्ररत्नावली *

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥ ३ ॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।

सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥ ४ ॥।

श्रीरामेश्वर ', ( ८ ) दारुकावनमें श्रीनागेश्वर े ॥ २ ॥ ( ९ ) वाराणसी

( काशी ) में श्रीविश्वनाथ े , ( १० ) गौतमी ( गोदावरी ) के तटपर श्रीत्र्यम्बकेश्वर, ( ११ ) हिमालयपर केदारखण्डमें श्रीकेदारनाथ ' और ( १२ ) शिवालयमें श्रीघुश्मेश्वरको स्मरण करे || ३ || जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सन्ध्याके समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गोंका नाम लेता है, उसके सात जन्मोंका किया हुआ पाप इन लिङ्गोंके स्मरणमात्रसे मिट जाता है ॥ ४ ॥

नामक स्थानमें एक विशाल शिवमन्दिर है, वही भीमशङ्करका स्थान है । १. श्रीरामेश्वर तीर्थ प्रसिद्ध है, यह तमिलनाडु ( मद्रास ) प्रान्तके रामनद जिलेमें है । २. यह स्थान बड़ौदा राज्यान्तर्गत गोमतीद्वारकासे ईशानकोणमें बारह - तेरह मीलकी दूरीपर है । कोई - कोई निजाम हैदराबाद राज्यके अन्तर्गत औढ़ाग्राममें स्थित शिवलिङ्गको ही ' नागेश्वर ' ज्योतिर्लिङ्ग मानते हैं । कुछ लोगोंके मतसे अल्मोड़ासे १७ मील उत्तर - पूर्वमें यागेश ( जागेश्वर ) शिवलिङ्ग ही नागेश ज्योतिर्लिङ्ग है । ३. काशीके श्रीविश्वनाथजी प्रसिद्ध ही हैं । ४. यह ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र प्रान्तके नासिक जिलेमें नासिक - पञ्चवटीसे ( जहाँ शूर्पणखा की नाक कटी थी ) १८ मीलकी दूरीपर ब्रह्मगिरिके निकट गोदावरीके किनारे है 1 । ५. श्रीकेदारनाथ हिमालयके केदार नामक श्रृङ्गपर स्थित हैं । शिखरके पूर्वकी ओर अलकनन्दाके तटपर श्रीबदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिममें मन्दाकिनीके किनारे श्रीकेदारनाथ विराजमान हैं । यह स्थान हरद्वारसे १५० मील और ऋषिकेशसे १३२ मील दूर है । ६. श्रीघुश्मेश्वरको घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं । इनका स्थान दौलताबाद स्टेशनसे बारह मील दूर बेरूल गाँवके पास है ।

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* शिवस्तोत्राणि * २ ९ १३ सौराष्ट्रदेशे भक्तिप्रदानाय श्रीशैलशृङ्गे तमर्जुनं – द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम् विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् । कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ १ ॥

विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् । मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥ २ ॥

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३ ॥

जो अपनी भक्ति प्रदान करनेके लिये अत्यन्त रमणीय तथा निर्मल सौराष्ट्र प्रदेश ( काठियावाड़ ) में दयापूर्वक अवतीर्ण हुए हैं, चन्द्रमा जिनके मस्तकका आभूषण है, उन ज्योतिर्लिङ्गस्वरूप भगवान् श्रीसोमनाथकी शरणमें मैं जाता हूँ ॥ १॥ जो ऊँचाईके आदर्शभूत पर्वतोंसे भी बढ़कर ऊँचे श्रीशैलके

शिखरपर, जहाँ देवताओंका अत्यन्त समागम होता रहता है, प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जो संसार - सागरसे पार करानेके लिये पुलके समान हैं, उन एकमात्र प्रभु मल्लिकार्जुनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २॥ संतजनोंको

मोक्ष देनेके लिये जिन्होंने अवन्तिपुरी ( उज्जैन ) में अवतार धारण किया है, उन महाकाल नामसे विख्यात महादेवजीको मैं अकालमृत्युसे बचनेके लिये

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३० * स्तोत्ररत्नावली * कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे

समागमे सज्जनतारणाय ।

सदैव मान्धातृपुरे वसन्त-मोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ४ ॥

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं महाद्रिपार्श्वे च रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं नमामि ॥ ५ ॥

भोगैः ।

प्रपद्ये ॥ ६ ॥

मुनीन्द्रैः । नमस्कार करता ॥ ३ ॥ जो सत्पुरुषोंको संसारसागरसे पार उतारनेके

लिये कावेरी और नर्मदाके पवित्र संगमके निकट मान्धाताके पुरमें सदा निवास करते हैं, उन अद्वितीय कल्याणमय भगवान् ॐकारेश्वरका मैं स्तवन करता ॥ ४ ॥ जो पूर्वोत्तर दिशामें चिताभूमि ( वैद्यनाथ - धाम ) के भीतर सदा ही

गिरिजाके साथ वास करते हैं, देवता और असुर जिनके चरण - कमलोंकी आराधना करते हैं, उन श्रीवैद्यनाथको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥ जो दक्षिणके

अत्यन्त रमणीय सदङ्ग नगरमें विविध भोगोंसे सम्पन्न होकर सुन्दर आभूषणोंसे भूषित हो रहे हैं, जो एकमात्र सद्भक्ति और मुक्तिको देनेवाले हैं, उन प्रभु श्रीनागनाथकी मैं शरणमें जाता हूँ ॥ ६ ॥ जो महागिरि हिमालयके पास

केदारशृङ्गके तटपर सदा निवास करते हुए मुनीश्वरोंद्वारा पूजित होते हैं तथा