स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 221–230

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २११ ६१ – सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रम् नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।

भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥ १ ॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।

तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २ ॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।

सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३ ॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४ ॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥ ५ ॥

नारदजी बोले –पार्वतीनन्दन देवदेव श्रीगणेशजीको सिर झुकाकर प्रणाम करे और फिर अपनी आयु, कामना और अर्थकी सिद्धिके लिये उन भक्तनिवासका नित्यप्रति स्मरण करे ॥ १ ॥ पहला वक्रतुण्ड ( टेढ़े मुखवाले ),

दूसरा एकदन्त ( एक दाँतवाले ), तीसरा कृष्णपिङ्गाक्ष ( काली और भूरी आँखोंवाले ), चौथा गजवक्त्र ( हाथीके - से मुखवाले ) ॥ २ ॥ पाँचवाँ लम्बोदर

( बड़े पेटवाले ), छठा विकट ( विकराल ), सातवाँ विघ्नराजेन्द्र ( विघ्नोंका शासन राजाधिराज ) तथा आठवाँ धूम्रवर्ण ( धूसर वर्णवाले ) ॥ ३ ॥ नवाँ

करनेवाले ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित है ), दसवाँ विनायक, ग्यारहवाँ भालचन्द्र ( जिसके गजानन ॥ ४ ॥ इन बारह नामोंका जो पुरुष ( प्रातः,

गणपति और बारहवाँ

पृष्ठ 222

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२१२ * स्तोत्ररत्नावली *

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६ ॥

जपेद्रणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।

संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७ ॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।

तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥

इति श्रीनारदपुराणे सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ६२ - सूर्याष्टकम्

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।

दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥

मध्याह्न और सायंकाल ) तीनों सन्ध्याओंमें पाठ करता है, हे प्रभो! उसे किसी प्रकारके विघ्नका भय नहीं रहता; इस प्रकारका स्मरण सब प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाला है ॥ ५ ॥ इससे विद्याभिलाषी विद्या, धनाभिलाषी धन, पुत्रेच्छु पुत्र

तथा मुमुक्षु मोक्षगति प्राप्त कर लेता है | ६ || इस गणपतिस्तोत्रका जप करे तो छः मासमें इच्छित फल प्राप्त हो जाता है तथा एक वर्षमें पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है — इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है ॥ ७ ॥ जो पुरुष इसे

लिखकर आठ ब्राह्मणोंको समर्पण करता है, गणेशजीकी कृपासे उसे सब प्रकारकी विद्या प्राप्त हो जाती है ॥ ८ ॥

हे आदिदेव भास्कर! आपको प्रणाम है, आप मुझपर प्रसन्न हों, हे दिवाकर! आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर! आपको प्रणाम है ॥ १ ॥

पृष्ठ 223

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २१३ ****** सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्ड कश्यपात्मजम् । श्वेतपद्मधरं देवं तं लोहितं रथमारूढं महापापहरं देवं तं त्रैगुण्यं च महाशूरं महापापहरं देवं तं बृंहितं तेजःपुञ्जं च प्रभुं च सर्वलोकानां बन्धूकपुष्पसङ्काशं एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ २ ॥

सर्वलोकपितामहम् ।

सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।

सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

वायुमाकाशमेव च ।

तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ५ ॥

हारकुण्डलभूषितम् ।

सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम् ।

महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ७ ॥

सात घोड़ोंवाले रथपर आरूढ़, हाथमें श्वेत कमल धारण किये हुए, प्रचण्ड तेजस्वी कश्यपकुमार सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥ लोहितवर्ण

रथारूढ़ सर्वलोकपितामह महापापहारी सूर्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥

जो त्रिगुणमय ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप हैं, उन महापापहारी महान् वीर सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ जो बढ़े हुए तेजके पुञ्ज हैं और वायु

तथा आकाशस्वरूप हैं, उन समस्त लोकोंके अधिपति सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥ जो बन्धूक ( दुपहरिया ) के पुष्पसमान रक्तवर्ण और हार तथा

कुण्डलोंसे विभूषित हैं, उन एक चक्रधारी सूर्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६॥ महान् तेजके प्रकाशक, जगत्के कर्ता, महापापहारी उन सूर्य

भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥

पृष्ठ 224

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* स्तोत्ररत्नावली * २१४

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।

महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

इति श्रीशिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम् । ६३ - श्रीसूर्यमण्डलाष्टकम्

नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहेतवे ।

त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरञ्चिनारायणशङ्करात्मने ॥ १ ॥

यन्मण्डलं दीप्तिकरं विशालं रत्नप्रभं तीव्रमनादिरूपम् ।

दारिद्र्यदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २ ॥

यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितं विप्रैः स्तुतं भावनमुक्तिकोविदम् ।

तं देवदेवं प्रणमामि सूर्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ३ ॥

उन सूर्यदेवको, जो जगत्के नायक हैं, ज्ञान, विज्ञान तथा मोक्षको भी देते हैं, साथ ही जो बड़े - बड़े पापोंको भी हर लेते हैं, मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥

जो जगत्के एकमात्र नेत्र ( प्रकाशक ) हैं; संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कारण हैं; उन वेदत्रयीस्वरूप, सत्त्वादि तीनों गुणोंके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक तीन रूप धारण करनेवाले सूर्यभगवान्‌को नमस्कार है ॥ १ ॥

जो प्रकाश करनेवाला, विशाल, रत्नोंके समान प्रभावाला, तीव्र, अनादिरूप और दारिद्र्यदुःखके नाशका कारण है; वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ २ ॥ जिनका मण्डल देवगणोंसे अच्छी प्रकार पूजित है; ब्राह्मणोंसे स्तुत है

और भक्तोंको मुक्ति देनेवाला है; उन देवाधिदेव सूर्यभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ और वह सूर्यभगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ३ ॥

पृष्ठ 225

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २१५

यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् ।

समस्ततेजोमयदिव्यरूपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ४ ॥

यन्मण्डलं गूढमतिप्रबोधं धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् ।

यत्सर्वपापक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ५ ॥

यन्मण्डलं व्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजुःसामसु संप्रगीतम् ।

प्रकाशितं येन च भूर्भुवः स्वः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ६ ॥।

यन्मण्डलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।

यद्योगिनो योगजुषां च संघाः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ७ ॥

यन्मण्डलं सर्वजनेषु पूजितं ज्योतिश्च कुर्यादिह मर्त्यलोके ।

यत्कालकल्पक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८ ॥

जो ज्ञानघन, अगम्य, त्रिलोकीपूज्य, त्रिगुणस्वरूप, पूर्ण तेजोमय और दिव्यरूप है, वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ४ ॥ जो सूक्ष्म

बुद्धिसे जाननेयोग्य है और सम्पूर्ण मनुष्योंके धर्मकी वृद्धि करता है तथा जो सबके पापोंके नाशका कारण है; वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ५॥ जो रोगोंका विनाश करनेमें समर्थ है, जो ऋक्, यजु और

साम — इन तीनों वेदोंमें सम्यक् प्रकारसे गाया गया है तथा जिसने भूः, भुवः और स्वः — इन तीनों लोकोंको प्रकाशित किया है; वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ६ ॥ वेदज्ञाता लोग जिसका वर्णन करते हैं; चारणों

और सिद्धोंका समूह जिसका गान किया करता है तथा योगका सेवन करनेवाले और योगीलोग जिसका गुणगान करते हैं; वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ७ ॥ जो समस्त जनोंमें पूजित है और इस

मर्त्यलोकमें प्रकाश करता है तथा जो काल और कल्पके क्षयका कारण भी है; वह सूर्यभगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ८ ॥

पृष्ठ 226

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* स्तोत्ररत्नावली * २१६

यन्मण्डलं विश्वसृजां प्रसिद्धमुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् ।

यस्मिञ्जगत्संहरतेऽखिलञ्च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ९ ॥

यन्मण्डलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा परं धाम विशुद्धतत्त्वम् ।

सूक्ष्मान्तरैर्योगपथानुगम्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १० ॥

यन्मण्डलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।

यन्मण्डलं वेदविदः स्मरन्ति पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ११ ॥

यन्मण्डलं वेदविदोपगीतं यद्योगिनां योगपथानुगम्यम् ।

तत्सर्ववेदं प्रणमामि सूर्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १२ ॥

मण्डलाष्टतयं पुण्यं यः पठेत्सततं नरः ।

सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते ॥ १३ ॥

इति श्रीमदादित्यहृदये मण्डलाष्टकं सम्पूर्णम् । जो संसारकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा आदिमें प्रसिद्ध है; जो संसारकी उत्पत्ति, रक्षा और प्रलय करनेमें समर्थ है; और जिसमें समस्त जगत् लीन हो जाता है, वह सूर्य-भगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ९ ॥ जो सर्वान्तर्यामी विष्णुभगवान्का

आत्मा तथा विशुद्ध तत्त्ववाला परमधाम है; और जो सूक्ष्म बुद्धिवालोंके द्वारा योगमार्गसे गमन करनेयोग्य है; वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ १० ॥ वेदके जाननेवाले जिसका वर्णन करते हैं; चारण और सिद्धगण जिसको

गाते हैं; और वेदज्ञलोग जिसका स्मरण करते हैं; वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ११ ॥ जिनका मण्डल वेदवेत्ताओंके द्वारा गाया गया है; और जो

योगियोंसे योगमार्गद्वारा अनुगमन करनेयोग्य हैं; उन सब वेदोंके स्वरूप सूर्य-भगवान्‌को प्रणाम करता हूँ; और वह सूर्यभगवान्‌का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ १२ ॥ जो पुरुष परम पवित्र इस मण्डलाष्टकस्तोत्रका पाठ सर्वदा करता है; वह

पापोंसे मुक्त हो, विशुद्धचित्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठा पाता है ॥ १३ ॥

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विविधदेवस्तोत्राणि * २१७ ६४ - वीरविंशतिकाख्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम् लाङ्गूलमृष्टवियदम्बुधिमध्यमार्ग-मुत्प्लुत्य यान्तममरेन्द्रमुदो निदानम् । आस्फालितस्वक भुजस्फुटिताद्रिकाण्डं द्राङ्मैथिलीनयननन्दनमद्य वन्दे ॥ १ ॥

मध्येनिशाचरमहाभयदुर्विषह्यं घोराद्भुतव्रतमियं यददश्चचार । पत्ये तदस्य बहुधापरिणामदूतं सीतापुरस्कृततनुं हनुमन्तमीडे ॥ २ ॥

यः पादपङ्कजयुगं रघुनाथपल्या नैराश्यरूषितविरक्तमपि स्वरागैः । प्रागेव रागि विदधे बहु वन्दमानो वन्देऽञ्जनाजनुषमेष विशेषतुष्ट्यै ॥ ३ ॥

जो अपनी पूँछसे साफ किये हुए आकाश तथा समुद्रके मध्यवर्ती चलते समय इन्द्रके आनन्दका कारण हो रहे थे और मार्गपर उछलकर भुजाओंसे पर्वतखण्ड फूटते जाते थे, आगेकी ओर फैलायी हुई जिनकी आज मैं जानकीजीके नेत्रोंको शीघ्र ही आनन्द देनेवाले उन हनुमान्जीकी करता हूँ ॥१ ॥ जानकीजीने पतिके लिये जो निशाचरोंके बीच

वन्दना कारण दुःसह, घोर एवं अद्भुत व्रत किया था, उसीके विविध अत्यन्त भयके अपने शरीरको प्रकट किये हुए फलस्वरूप दूतवेषमें सीताके सम्मुख जानकीके दोनों हनुमान्जीकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ २ ॥ जिन्होंने श्रीरघुनाथपत्नी

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२१८ * स्तोत्ररत्नावली * KKKK ताञ्जानकीविरहवेदनहेतुभूतान्

द्रागाकलय्य सदशोकवनीयवृक्षान् ।

लङ्कालकानिव घनानुदपाटयद्य-स्तं हेमसुन्दरकपिं प्रणमामि पुष्ट्यै ॥ ४ ॥

घोषप्रतिध्वनितशैलगुहासहस्र-सम्भ्रान्तनादितवलन्मृगनाथयूथम् ।

अक्षक्षयक्षणविलक्षितराक्षसेन्द्र-मिन्द्रं कपीन्द्रपृतनावलयस्य वन्दे ॥ ५ ॥

हेलाविलङ्घितमहार्णवमप्यमन्दं घूर्णगदाविहतिविक्षतराक्षसेषु चरणारविन्दोंको, जो निराशारूप धूलिसे धूसरित होनेके कारण रागशून्य हो गये थे, बारंबार प्रणाम करते हुए, अपने अनुरागोंद्वारा [ पतिमिलनके— ] पहले ही रागरञ्जित कर दिया; उन अञ्जनीनन्दन महावीरजीकी मैं विशेष सन्तोषके लिये वन्दना करता हूँ ॥ ३ ॥ सुन्दर अशोकवनके घने वृक्षोंको जानकीजीकी

विरहवेदना [ को बढ़ाने ] का कारण समझकर जिन्होंने लङ्कानगरीकी स्निग्ध अलकावलीके समान उन्हें शीघ्र ही उखाड़ डाला, उन सुवर्णके सदृश सुन्दर शरीरवाले कपिवर हनुमानजीको मैं अपने पालन - पोषणके लिये प्रणाम करता हूँ ॥४ ॥ अपने गम्भीर घोषसे प्रतिध्वनित पर्वतोंकी सहस्रों कन्दराओंमें

रहनेवाले सिंहोंके समूहको जिन्होंने सम्भ्रमवश शब्दायमान एवं विचलित कर दिया और अक्षकुमारके विनाशकालमें राक्षसराज रावणको भी आश्चर्यमें डाल दिया, उन कपिराज सुग्रीवकी सेनाके नायक हनुमान्जीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ५॥ लीलासे ही महासागरको लाँघ जानेपर भी जो तीव्र गतिसे

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विविधदेवस्तोत्राणि * २१ ९ स्वम्मोदवारिधिमपारमिवेक्षमाणं वन्देऽहमक्षयकुमारकमारकेशम् ॥ ६ ॥

जम्भारिजित्प्रसभलम्भितपाशबन्धं

ब्रह्मानुरोधमिव तत्क्षणमुद्वहन्तम् ।

रौद्रावतारमपि रावणदीर्घदृष्टि-सङ्कोचकारणमुदारहरि भजामि ॥ ७ ॥

दर्पोन्नमन्निशिचरेश्वरमूर्धचञ्च-त्कोटीरचुम्बि निजविम्बमुदीक्ष्य हृष्टम् । पश्यन्तमात्मभुजयन्त्रणपिष्यमाण-तत्कायशोणितनिपातमपेक्षि वक्षः 11 2 11 अक्षप्रभृत्यमरविक्रमवीरनाश-क्रोधादिव द्रुतमुदञ्चितचन्द्रहासाम् । निद्रापिताभ्रघनगर्जनघोरघोषैः संस्तम्भयन्तमभिनौमि दशास्यमूर्तिम् ॥ ९ ॥

घूमती हुई गदाद्वारा राक्षसोंके क्षत - विक्षत होनेपर अपने आनन्दसमुद्रको अपार - सा देख रहे थे, उन अक्षयकुमारके मारकेशरूप महावीरजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ जिन्होंने इन्द्रजित् ( मेघनाद ) के हठात् फेंके हुए पाशबन्धको

ब्रह्माजीके अनुरोधकी भाँति तत्काल ग्रहण कर लिया और रुद्रका अवतार होनेपर भी जो रावणकी विशालदृष्टिके संकोचका कारण बन गये, उन उदार वानरवीरको मैं भजता हूँ ॥ ७ ॥ जो अभिमानसे ऊपर उठे हुए रावणके

मस्तकोंपर देदीप्यमान किरीटोंमें अपने प्रतिबिम्बको देखकर उसमें अपने पीसे जानेवाले रावणके शरीरके रक्तपातकी अपेक्षा रखनेवाली अपनी भुजयन्त्रद्वारा छातीकी ओर निहारते हुए प्रसन्न हो रहे थे, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ ॥८ ॥ देवताओंके समान पराक्रम रखनेवाले अक्षकुमार आदि वीरोंके

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२२० * स्तोत्ररत्नावली * आशंस्यमानविजयं रघुनाथधाम शंसन्तमात्मकृतभूरिपराक्रमेण दौत्ये समागमसमन्वयमादिशन्तं वन्दे हरेः क्षितिभृतः पृतनाप्रधानम् ॥ १० ॥

यस्यौचितीं समुपदिष्टवतोऽधिपुच्छं दम्भान्धितां धियमपेक्ष्य विवर्धमानः । नक्तञ्चराधिपतिरोषहिरण्यरेता लङ्कां दिधक्षुरपतत्तमहं वृणोमि ॥ ११ ॥

क्रन्दन्निशाचरकुलां ज्वलनावलीढैः

साक्षाद्गृहैरिव बहिः परिदेवमानाम् ।

स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नकृपीटयोनि-दन्दह्यमाननगरीं परिगाहमानाम् ॥ १२ ॥

नाशजनित क्रोधसे ही मानो जिसने शीघ्र ही बदला लेनेके लिये चन्द्रहास नामक तलवार उठा ली है, उस दशशीश ( रावण ) के शरीरका, गम्भीर मेघगर्जनाको भी मूक बनानेवाले अपने भयङ्कर सिंहनादसे स्तम्भन करते हुए हनुमान्जीको प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥ जो अपने किये हुए प्रचुर पराक्रमोंद्वारा विजयकी आशंसासे युक्त

श्रीरामचन्द्रजीके तेजका वर्णन कर रहे हैं और दूतधर्ममें प्राप्त होनेके समन्वयका [ अथवा समस्त शास्त्रोंके अन्वयका ] उपदेश करते हैं, उन राजा सुग्रीवकी सेनाके प्रधान ( सेनापति ) वीरकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १० ॥ उचित उपदेश दे

चुकनेपर, जिनकी पूँछमें निशाचरराज रावणका कोपानल ही उसकी दम्भसे अन्धी हुई बुद्धिके सहारे बढ़कर, लङ्काको जलानेकी इच्छासे वहाँ कूद पड़ा था, उन्हीं हनुमान्जीका मैं वरण करता हूँ ॥ ११ ॥ उनकी तनी हुई पूँछके