स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 231–240
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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विविधदेवस्तोत्राणि: ** २२१ मूर्तेर्गृहासुभिरिव द्युपुरं व्रजद्भि-व्यनि क्षणं परिगतं पतगैर्ज्वलद्भिः । पीताम्बरं दधतमुच्छ्रितदीप्ति पुच्छं सेनां वहद्विहगराजमिवाहमीडे ॥ १३ ॥
स्तम्भीभवत्स्वगुरुवालधिलग्नवह्नि-ज्वालोल्ललध्वजपटामिव देवतुष्ट्यै ।
वन्दे यथोपरि पुरो दिवि दर्शयन्त-मद्यैव रामविजयाजिकवैजयन्तीम् ॥ १४ ॥
किनारे अग्नि लगी थी, उससे समस्त लङ्कानगरी अत्यन्त वेगसे जल रही थी, बाहर निशाचरकुलका करुणक्रन्दन मचा हुआ था, उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निज्वालासे झुलसे हुए घर ही बाहर निकलकर रो रहे हैं, ऐसी लङ्कामें चारों ओर दौड़ते हुए हनूमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥
प्रासादशिखरपर रहनेवाले तोता और कबूतर आदि पक्षी जलते हुए जब आकाशमें उड़ते थे, तो ऐसा मालूम होता था मानो उन दग्ध होनेवाले गृहोंके प्राण ही मूर्तिमान् होकर स्वर्गमें जा रहे हैं; उन पक्षियोंसे क्षणभर घिरकर ऊपर हुई ज्वालाओंवाली पूँछ धारण किये, जिनकी शोभा पीताम्बरधारी उठी पीठपर चढ़ाकर अपना समूह साथ लिये विचरनेवाले भगवान् गरुडकी विष्णुको - सी हो रही थी, उन हनुमान्जीकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ १३ ॥
पक्षिराज विशाल पूँछरूपी खंभेमें लगी हुई अग्निकी ज्वाला लङ्कानगरके ऊपर अपनी रणविजयवैजयन्तीको ही जिसमें पताकाके समान है, ऐसी रामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये मानो आज ही आकाशमें दिखलाते हुए देवताओंकी महावीरजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १४ ॥
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२२२ * स्तोत्ररत्नावली * रक्षश्चयैकचितकक्षकपूश्चितौ यः सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः । दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं लाङ्गूलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु ॥ १५ ॥
आशुद्धये रघुपतिप्रणयैकसाक्ष्ये
वैदेहराजदुहितुः सरिदीश्वराय ।
न्यासं ददानमिव पावकमापतन्त-मब्धौ प्रभञ्जनतनूजनुषं भजामि ॥ १६ ॥
रक्षस्स्वतृप्तिरुडशान्तिविशेषशोण-मक्षक्षय क्षणविधानुमितात्मदाक्ष्यम् । भास्वत्प्रभातरविभानुभरावभासं लङ्काभयङ्करममुं भगवन्तमीडे ॥। १७ ॥ जिन्होंने सीताजीकी पीड़ाको, जो उनके दर्शनमात्रसे मर चुकी थी, एकमात्र राक्षस - समूहरूप काठ - कबाड़ोंसे बनी हुई लङ्कारूपिणी चितापर सुलाकर, अपनी पूँछकी लगायी हुई अग्निसे उसका मरणान्त कालोचित दाह - संस्कार किया, वे हनूमान्जी हमारी प्रसन्नताके कारण हों ॥ १५ ॥ विदेहनन्दिनी सीताकी
शुद्धिके लिये श्रीरामचन्द्रजीके प्रति प्रेमके एकमात्र साक्षीपदपर स्थित पावकको मानो समुद्रके यहाँ धरोहर रखनेके निमित्त, उसमें कूद पड़नेवाले, वायुनन्दनको मैं भजता हूँ ॥ १६ ॥ राक्षसों [ के साथ संग्राम ] में तृप्त न होनेके कारण, क्रोध
एवं अशान्तिसे जो विशेष रक्तवर्ण हो गये हैं, अक्षकुमारके संहारकालके कार्योंसे जिनकी दक्षताका अनुमान किया जा चुका है तथा जो प्रभातसमयके प्रभामय सूर्यके किरणोंके समान कान्तिमान् हैं, लङ्काको भय देनेवाले उन
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* विविधदेवस्तोत्राणि * २२३ तीर्त्वादधिं जनकजार्पितमाप्य चूडा-रत्नं रिपोरपि पुरं परमस्य दग्ध्वा । श्रीरामहर्षगलदश्र्वभिषिच्यमानं तं ब्रह्मचारिवरवानरमाश्रयेऽहम् ॥ १८ ॥
यः प्राणवायुजनितो गिरिशस्य शान्तः शिष्योऽपि गौतमगुरुर्मुनिशङ्करात्मा । हृद्यो हरस्य हरिवद्धरितां गतोऽपि धीधैर्यशास्त्रविभवेऽतुलमाश्रये तम् ॥ १ ९ ॥ स्कन्धेऽधिवाह्य जगदुत्तरगीतिरीत्या यः पार्वतीश्वरमतोषयदाशुतोषम् । तस्मादवाप च वरानपरानवाप्यान् तं वानरं परमवैष्णवमीशमीडे ॥ २० ॥
हनूमान्की मैं स्तुति करता हूँ ॥ १७ ॥ समुद्र लाँघकर, सीताके दिये
भगवान् पाकर और शत्रुके महान् नगरको भी जलाकर, हुए चूडारत्नको सींचे जानेवाले, ब्रह्मचारिश्रेष्ठ वानरवीरकी मैं श्रीरामचन्द्रजीके लेता हूँ ॥ आनन्दाश्रुसे १८ ॥ जो पूर्वजन्ममें गौतम ऋषिके शंकरात्मा नामक शान्त शिष्य शरण होनेपर भी उनके गुरुके समान श्रद्धापात्र थे; शङ्करजीके प्राणवायुसे प्रादुर्भाव हुआ है, जो हरि ( वानर ) भावको प्राप्त होकर भी हरि जिनका शङ्करजीके हार्दिक प्रेमी हैं तथा बुद्धि, धैर्य और शास्त्रके ( विष्णु ) की भाँति नहीं है, उन हनूमान्जीकी मैं शरण लेता वैभवमें जिनकी कहीं समता कंधेपर चढ़ाकर, अपनी लोकोत्तर हूँ ॥ १ ९ ॥ जिन्होंने आशुतोष उमानाथको पाने योग्य उत्तम वरोंको भी प्राप्त गायनशैलीसे उन्हें प्रसन्न किया और उनसे
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२२४ * स्तोत्ररत्नावली * ****** उमापतेः कविपतेः स्तुतिर्बाल्यविजृम्भिता ॥ हनूमतस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकाभिधा ॥ इति श्रीकविपत्युपनामकोमापतिशर्मद्विवेदिविरचितं वीरविंशतिकाख्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् । ६५ – गङ्गाष्टकम् मातः शैलसुतासपत्नि वसुधाशृङ्गारहारावलि स्वर्गारोहणवैजयन्ति भवतीं भागीरथि प्रार्थये । त्वत्तीरे वसतस्त्वदम्बु पिबतस्त्वद्वीचिषु प्रेङ्खत-स्त्वन्नाम स्मरतस्त्वदर्पितदृशः स्यान्मे शरीरव्ययः ॥ १ ॥
त्वत्तीरे तरुकोटरान्तरगतो गङ्गे विहङ्गो वरं
त्वन्नीरे नरकान्तकारिणि वरं मत्स्योऽथवा कच्छपः ।
कर लिया, मैं उन परम वैष्णव भगवान् वानरवीरकी स्तुति करता हूँ ॥ २० ॥
कविपति श्रीउमापतिजीकी बालकालमें रचित, यह वीरविंशतिका नामकी स्तुति हनुमान्जीकी प्रसन्नताके लिये हो । पृथ्वीकी शृङ्गारमाला, पार्वतीजीकी सपत्नी और स्वर्गारोहणके लिये वैजयन्ती पताकारूपिणी हे माता भागीरथि! मैं तुमसे यह प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे तटपर निवास करते हुए, तुम्हारा जल पान करते हुए, तुम्हारी तरङ्गभङ्गीमें तरङ्गायमान होते हुए, तुम्हारा नामस्मरण करते हुए और तुम्हींमें दृष्टि लगाये हुए मेरा शरीरपात हो ॥ १ ॥ हे गङ्गे! तुम्हारे तटवर्ती तरुवरके कोटरमें
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* विविधदेवस्तोत्राणि *, २२५ नैवान्यत्र मदान्धसिन्धुरघटासङ्घट्टघण्टारण-त्कारत्रस्तसमस्तवैरिवनितालब्धस्तुतिर्भूपतिः ॥२ ॥
उक्षा पक्षी तुरग उरगः कोऽपि वा वारणो वा वारीणः स्यां जननमरणक्लेशदुःखासहिष्णुः । न त्वन्यन्त्र प्रविरलरणत्कङ्कणक्वाणमिश्रं वारस्त्रीभिश्चमरमरुता वीजितो भूमिपालः ॥ ३ ॥
काकैर्निष्कुषितं श्वभिः कवलितं गोमायुभिर्लुण्ठितं स्त्रोतोभिश्चलितं तटाम्बुलुलितं वीचीभिरान्दोलितम् । दिव्यस्त्रीकरचारुचामरमरुत्संवीज्यमानः कदा द्रक्ष्येऽहं परमेश्वरि त्रिपथगे भागीरथि स्वं वपुः ॥ ४ ॥
पक्षी होकर रहना अच्छा है तथा हे नरकनिवारिणि! तुम्हारे जलमें मत्स्य या कच्छप होकर जन्म लेना भी बहुत अच्छा है, किन्तु दूसरी जगह मदमत्त गजराजोंके जमघटके घण्टारवसे भयभीत हुई शत्रुमहिलाओंसे स्तुत पृथ्वीपति भी होना अच्छा नहीं ॥ २ ॥ हे मातः! मैं भले ही आपके आरपार रहनेवाला
क्लेशको सहन न करनेवाला कोई बैल, पक्षी, घोड़ा, सर्प अथवा जन्म - मरणरूप, किन्तु [ आपसे दूर ] किसी अन्य स्थानपर ऐसा राजा ' न होऊँ, हाथी हो जाऊँ जिसपर वाराङ्गनाएँ मन्द मन्द झनकारते हुए कङ्कणोंकी सुमधुर ध्वनिसे युक्त चमर डुला रही हों || ३ || हे परमेश्वरि! हे त्रिपथगे! हे भागीरथि! [ मरनेके करकमलोंमें सुशोभित सुन्दर चमरोंकी हवासे सेवित अनन्तर ] देवाङ्गनाओंके काकोंसे कुरेदा जाता हुआ, कुत्तोंसे भक्षित होता हुआ मैं अपने मृत शरीरको हुआ, गीदड़ोंसे लुण्ठित होता हुआ, तुम्हारे स्रोतमें पड़कर बहता हुआ, कभी किनारेके स्वल्प जलमें हिलता हुआ और फिर तरङ्गभङ्गियोंसे आन्दोलित होता
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२२६ * स्तोत्ररत्नावली * *********** अभिनवबिसवल्ली पादपद्मस्य विष्णो-मदनमथनमौलेर्मालतीपुष्पमाला जयति जयपताका काप्यसौ मोक्षलक्ष्म्याः क्षपितकलिकलङ्का जाह्नवी नः पुनातु ॥ ५ ॥
एतत्तालतमालसालसरलव्यालोलवल्लीलता-च्छन्नं सूर्यकरप्रतापरहितं शङ्खेन्दुकुन्दोज्ज्वलम् । गन्धर्वामरसिद्धकिन्नरवधूत्तुङ्गस्तनास्फालितं स्नानाय प्रतिवासरं भवतु मे गाङ्गं जलं निर्मलम् ॥ ६ ॥
गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।
त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥ ७ ॥
पापापहारि दुरितारि तरङ्गधारि शैलप्रचारि गिरिराजगुहाविदारि । हुआ कब देखूँगा? ॥ ४ ॥ जो भगवान् विष्णुके चरणकमलका नूतनमृणाल
( कमलनाल ) है तथा कामारि त्रिपुरारिके ललाटकी मालती - माला है, वह मोक्षलक्ष्मीकी विलक्षण विजयपताका जयको प्राप्त हो । कलिकलङ्कको नष्ट करनेवाली, वह जाह्नवी हमें पवित्र करे ॥ ५ ॥ जो ताल, तमाल, साल, सरल तथा
चञ्चल वल्लरी और लताओंसे आच्छादित है, सूर्यकिरणोंके तापसे रहित है, शङ्ख, कुन्द और चन्द्रके समान उज्ज्वल है तथा गन्धर्व, देवता, सिद्ध और किन्नरोंकी कामिनियोंके पीन पयोधरोंसे आस्फालित ( टकराया हुआ ) है, वह अत्यन्त निर्मल गङ्गाजल नित्यप्रति मेरे स्नानके लिये हो ॥ ६ ॥ जो श्रीमुरारिके चरणोंसे उत्पन्न
हुआ है, श्रीशङ्करके सिरपर विराजमान है तथा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाला है, वह मनोहर गङ्गाजल मुझे पवित्र करे ॥ ७ ॥ जो पापोंको हरण करनेवाला,
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* विविधदेवस्तोत्राणि * २२७ झङ्कारकारि हरिपादरजोऽपहारि गाङ्गं पुनातु सततं शुभकारि वारि ॥ ८ ॥
गङ्गाष्टकं पठति यः प्रयतः प्रभाते वाल्मीकिना विरचितं शुभदं मनुष्यः । प्रक्षाल्य गात्रकलिकल्मषपङ्कमाशु मोक्षं लभेत्पतति नैव नरो भवाब्धौ ॥ ९ ॥
इति श्रीमहर्षिवाल्मीकिविरचितं गङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् । ६६ — श्रीगङ्गाष्टकम् भगवति तव तीरे नीरमात्राशनोऽहं विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि । सकलकलुषभङ्गे स्वर्गसोपानसङ्गे तरलतरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ १ ॥
दुष्कर्मोंका शत्रु, तरङ्गमय, शैल - खण्डोंपर बहनेवाला, पर्वतराज हिमालयकी गुहाओंको विदीर्ण करनेवाला, मधुर कलकल - ध्वनियुक्त और श्रीहरिकी चरणरजको धोनेवाला है, वह निरन्तर शुभकारी गङ्गाजल मुझे पवित्र करे ॥ ८ ॥
जो पुरुष वाल्मीकिजीके रचे हुए, इस कल्याणप्रद गङ्गाष्टकको प्रातः काल एकाग्रचित्तसे पढ़ता है, वह अपने शरीरकी कलिकल्मषरूप कीचड़को धोकर, शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करता है और फिर संसार - समुद्रमें नहीं गिरता ॥ ९ ॥
हे देवि! तुम्हारे तीरपर केवल तुम्हारा जलपान करता हुआ, विषय-
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२२८ * स्तोत्ररत्नावली * ********************* £££ 5555555 भगवति भवलीलामौलिमाले तवाम्भः-कणमणुपरिमाणं प्राणिनो ये स्पृशन्ति । अमरनगरनारीचामरग्राहिणीनां विगतकलिकलङ्कातङ्कमङ्के लुठन्ति ॥ २ ॥
ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्स्खलन्ती । क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती पाथोधिं पूरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥ ३ ॥
मज्जन्मातङ्गकुम्भच्युतमदमदिरामोदमत्तालिजालं स्नानैः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम् । सायंप्रातर्मुनीनां कुशकुसुमचयैश्छन्नतीरस्थनीरं पायान्नो गाङ्गमम्भः करिकलभकराक्रान्तरंहस्तरङ्गम् ॥ ४ ॥
तृष्णासे रहित हो, मैं श्रीकृष्णचन्द्रकी आराधना करूँ । हे सकल पापविनाशिनि स्वर्ग - सोपानरूपिणि! तरलतरङ्गिणि! देवि गङ्गे! मुझपर प्रसन्न हो ॥ १ ॥ हे
भगवति! तुम महादेवजीके मस्तककी लीलामयी माला हो, जो प्राणी तुम्हारे जलकणके अणुमात्रको भी स्पर्श करते हैं, वे कलिकलङ्कके भयको त्यागकर, देवपुरीकी चँवरधारिणी अप्सराओंकी गोदमें शयन करते हैं ॥ २ ॥ ब्रह्माण्डको
फोड़कर निकलनेवाली, महादेवजीकी जटा - लताको उल्लसित करती हुई, स्वर्गलोकसे गिरती हुई, सुमेरुकी गुफा और पर्वतमालासे झड़ती हुई, पृथ्वीपर लोटती हुई, पापसमूहकी सेनाको कड़ी फटकार देती हुई, समुद्रको भरती हुई, देवपुरीकी पवित्र नदी गङ्गा हमें पवित्र करे ॥ ३ ॥ स्नान करते हु हाथियोंके
कुम्भस्थलसे झरते हुए मदरूपी मदिराको गन्धके कारण मधुपवृन्द जिससे
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* विविधदेवस्तोत्राणि: २२ ९ आदावादिपितामहस्य नियमव्यापारपात्रे जलं. पश्चात्पन्नगशायिनो भगवतः पादोदकं पावनम् । भूयः शम्भुजटाविभूषणमणिर्जह्वोर्महर्षेरियं कन्या कल्मषनाशिनी भगवती भागीरथी दृश्यते ॥ ५ ॥
शैलेन्द्रादवतारिणी निजजले मज्जज्जनोत्तारिणी पारावारविहारिणी भवभयश्रेणीसमुत्सारिणी । शेषाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गङ्गा मनोहारिणी ॥ ६ ॥
कुतो वीचिर्वीचिस्तव यदि गता लोचनपथं त्वमापीता पीताम्बरपुरनिवासं वितरसि । मतवाले हो रहे हैं, सिद्धोंकी स्त्रियोंके स्तनोंसे बहे हुए कुङ्कुमके मिलनेसे जो पिङ्गलवर्ण हो रहा है तथा सायं प्रातः मुनियोंद्वारा अर्पित कुश और पुष्पोंके समूहसे जो किनारेपर ढका हुआ है, हाथियोंके बच्चोंकी सूँड़ोंसे जिनकी तरङ्गोंका वेग आक्रान्त हो रहा है, वह गङ्गाजल हमारा कल्याण करे ॥ ४ ॥ जह्नु महर्षिकी
कन्या, पापनाशिनी भगवती भागीरथी, पहले ब्रह्माके कमण्डलुमें जलरूपसे, फिर शेषशायी भगवान्के पवित्र चरणोदकरूपसे और तदनन्तर महादेवजीकी सुशोभित करनेवाली मणिरूपसे दीख रही है ॥ ५ ॥ हिमालयसे
जटाको, अपने जलमें गोता लगानेवालोंका उद्धार करनेवाली, उतरनेवाली , संसार - संकटोंका नाश करनेवाली, [ विस्तारमें ] शेषनागका समुद्रविहारिणी, शिवजीके मस्तकपर लताके समान सुशोभित, अनुकरण करनेवाली गङ्गाजी विजयिनी हो रही हैं ॥ ६ ॥ यदि
काशीक्षेत्रमें बहनेवाली, मनोहारिणी तरङ्ग नेत्रोंके सामने आ जाय, तो फिर संसारकी तरङ्ग कहाँ रह सकती है? तुम्हारी
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२३० स्तोत्ररत्नावली * K त्वदुत्सङ्गे गङ्गे पतति यदि कायस्तनुभृतां तदा मातः शातक्रतवपदलाभोऽप्यतिलघुः ॥ ७ ॥
गङ्गे त्रैलोक्यसारे सकलसुरवधूधौतविस्तीर्णतोये पूर्णब्रह्मस्वरूपे हरिचरणरजोहारिणी स्वर्गमार्गे । प्रायश्चित्तं यदि स्यात्तव जलकणिका ब्रह्महत्यादिपापे कस्त्वां स्तोतुं समर्थस्त्रिजगदघहरे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ ८ ॥
मातर्जाह्नवि शम्भुसङ्गवलिते मौलौ निधायाञ्जलिं त्वत्तीरे वपुषोऽवसानसमये नारायणाङ्घ्रिद्वयम् । सानन्दं स्मरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सवे भूयाद्भक्तिरविच्युताहरिहराद्वैतात्मिका शाश्वती ॥। ९ ॥
गङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १० ॥
इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं श्रीगङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् । तुम अपना जलपान करनेपर वैकुण्ठलोकमें निवास देती हो, हे गङ्गे! यदि जीवोंका शरीर तुम्हारी गोदमें छूट जाता है, तो हे मातः! उस समय इन्द्रपदकी प्राप्ति भी अत्यन्त तुच्छ मालूम होती है ॥ ७ ॥ तीनों लोकोंकी सार, सर्वदेवाङ्गनाएँ
जिसमें स्नान करती हैं, ऐसे विस्तृत जलवाली, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी, स्वर्ग - मार्गमें भगवान्के चरणोंकी धूलि धोनेवाली, हे गङ्गे! जब तुम्हारे जलका एक कणमात्र ही ब्रह्महत्यादि पापोंका प्रायश्चित्त है तो हे त्रैलोक्यपापनाशिनि! तुम्हारी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? हे देवि गङ्गे! प्रसन्न हो ॥ ८ ॥ हे शिवकी संगिनी मातः
गङ्गे! शरीर शान्त होनेके समय प्राण - यात्राके उत्सवमें, तुम्हारे तीरपर, सिर नवाकर हाथ जोड़े हुए, आनन्दसे भगवान्के चरणयुगलका स्मरण करते हुए मेरी अविचल भावसे हरि - हरमें अभेदात्मिका नित्य भक्ति बनी रहे ॥ ९ ॥ जो पुरुष
शुद्ध होकर इस पवित्र गङ्गाष्टकका पाठ करता है; वह सब पापोंसे मुक्त होकर वैकुण्ठलोकमें जाता है ॥ १० ॥