स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 241–250

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २३१ ६७ - श्रीगङ्गास्तोत्रम्

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।

शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥ १ ॥

भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।

नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २ ॥

हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।

दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३ ॥

तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।

मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४ ॥

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।

भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५ ॥

हे देवि गङ्गे! तुम देवगणकी ईश्वरी हो, हे भगवति! तुम त्रिभुवनको तारनेवाली, विमल और तरल तरङ्गमयी तथा शङ्करके मस्तकपर विहार हो । हे मातः! तुम्हारे चरणकमलोंमें मेरी मति लगी रहे ॥ १ ॥ हे

करनेवाली! तुम सब प्राणियोंको सुख देती हो, हे मातः! वेद - शास्त्रमें तुम्हारे भागीरथि वर्णित है, मैं तुम्हारी महिमा कुछ नहीं जानता, हे दयामयि! जलका माहात्म्य रक्षा करो ॥ २ ॥ हे गङ्गे! तुम श्रीहरिके चरणोंकी

मुझ अज्ञानीकी नदी हो, हे देवि! तुम्हारी तरङ्गे हिम, चन्द्रमा और मोतीकी भाँति चरणोदकमयी हैं, तुम मेरे पापोंका भार दूर कर दो और कृपा करके मुझे भवसागरके पार श्वेत ॥ ३ ॥ हे देवि! जिसने तुम्हारा जल पी लिया, अवश्य ही उसने

उतारो पा लिया, हे मातः गङ्गे! जो तुम्हारी भक्ति करता है, उसको यमराज परमपद ( अर्थात् तुम्हारे भक्तगण यमपुरीमें न जाकर वैकुण्ठमें जाते नहीं देख सकता करनेवाली जह्नुकुमारी गङ्गे! तुम्हारी तरङ्गे हैं ) ॥ ४ ॥ हे पतितजनोंका उद्धार

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२३२ * स्तोत्ररत्नावली *

कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।

पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६ ॥

तव चेन्मातः स्रोतःस्नातः पुनरपि

63636363636K जठरे सोऽपि न जातः ।

नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७ ॥

पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।

इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८ ॥

रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।

त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ ९ ॥

अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।

तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १० ॥

गिरिराज हिमालयको खण्डित करके बहती हुई सुशोभित होती हैं, तुम भीष्मकी जननी और जह्नुमुनिकी कन्या हो, पतितपावनी होनेके कारण तुम त्रिभुवनमें धन्य हो ॥ ५ ॥ हे मातः! तुम इस लोकमें कल्पलताकी भाँति फल प्रदान

करनेवाली हो, तुम्हें जो प्रणाम करता है, वह कभी शोकमें नहीं पड़ता, हे गङ्गे! तुम समुद्रके साथ विहार करती हो और तुम्हारा चपल अपाङ्ग ( नेत्र - कोण ) विमुख वनिताकी तरह चञ्चल है ॥ ६ ॥ हे गङ्गे! जिसने तुम्हारे

प्रवाहमें स्नान कर लिया, वह फिर मातृगर्भ में प्रवेश नहीं करता, हे जाह्नवि! तुम भक्तोंको नरकसे बचाती हो और उनके पापोंका नाश करती हो, तुम्हारा माहात्म्य अतीव उच्च है ॥ ७ ॥ हे करुणाकटाक्षवाली जह्नुपुत्री गङ्गे! मेरे

अपावन अङ्गोंपर अपनी पावन तरङ्गोंसे युक्त हो उल्लसित होनेवाली, तुम्हारी जय हो! जय हो!! तुम्हारे चरण इन्द्रके मुकुटमणिसे प्रदीप्त हैं, तुम सबको सुख और शुभ देनेवाली हो और अपने सेवकको आश्रय प्रदान करती हो ॥ ८ ॥ हे भगवति! तुम मेरे रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति - कलापको

हर लो, तुम त्रिभुवनकी सार और वसुधाका हार हो, हे देवि! इस संसारमें एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ९ ॥ हे दुःखियोंकी वन्दनीया देवि गङ्गे! तुम

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २३३

वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।

अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ ११ ॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।

गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२ ॥

येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।

परमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३ ॥

मधुराकान्तापज्झटिकाभिः

गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।

शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ १४ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् । अलकापुरीको आनन्द देनेवाली और परमानन्दमयी हो, तुम मुझपर कृपा करो, हे मातः! जो तुम्हारे तटके निकट वास करता है, वह मानो वैकुण्ठमें ही वास करता है ॥ १० ॥ हे देवि! तुम्हारे जलमें कच्छप या मीन बनकर रहना अच्छा

है, तुम्हारे तीरपर दुबला - पतला गिरगिट ( कृकलास ) बनकर रहना अच्छा है या अति मलिन दीन चाण्डालकुलमें जन्म ग्रहण कर रहना अच्छा है परन्तु ( तुमसे ) दूर कुलीन नरपति होकर रहना भी अच्छा नहीं ॥ ११ ॥ हे देवि!

तुम त्रिभुवनकी ईश्वरी हो, तुम पावन और धन्य हो, जलमयी तथा मुनिवरकी कन्या हो । जो प्रतिदिन इस गङ्गास्तवका पाठ करता है, वह निश्चय ही संसारमें कर सकता है ॥ १२ ॥ जिनके हृदयमें गङ्गाके प्रति अचला भक्ति है,

जयलाभ वे सदा ही आनन्द और मुक्ति लाभ करते हैं; यह स्तुति परमानन्दमयी सुललित पदावलीसे युक्त, मधुर और कमनीय है ॥ १३ ॥ इस असार संसारमें उक्त

ही निर्मल सारवान् पदार्थ है, यह भक्तोंको अभिलषित फल प्रदान गङ्गास्तव सेवक शङ्कराचार्यकृत इस स्तोत्रको जो पढ़ता है, वह सुखी करता है; शङ्करके होता है — इस प्रकार यह स्तोत्र समाप्त हुआ ॥ १४ ॥

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२३४ * स्तोत्ररत्नावली * ६८ - श्रीयमुनाष्टकम् मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी । मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ १ ॥

मलापहारिवारिपूर भूरिमण्डितामृता भृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम्

सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता । धुनोतु ॥ २ ॥

लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका

तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा । धुनोतु ॰ ॥ ३ ॥

जो भगवान् कृष्णचन्द्रके अङ्गोंकी नीलिमा लिये हुए मनोहर जलौघ धारण करती है, त्रिभुवनका शोक हरनेवाली होनेके कारण स्वर्गलोकको तृणके समान सारहीन समझती है, जिसके मनोरम तटपर निकुञ्जोंका पुञ्ज वर्तमान है, जो लोगोंका दुर्मद दूर कर देती है; वह कालिन्दी यमुना सदा हमारे आन्तरिक मलको धोवे ॥ १ ॥ जो मलापहारी सलिलसमूहसे अत्यन्त सुशोभित है, मुक्तिदायक है,

सदा ही बड़े - बड़े पातकोंको लूट लेनेमें अत्यन्त प्रवीण है, सुन्दर नन्द - नन्दनके अङ्गस्पर्शजनित रागसे रञ्जित है, सबकी हितकारिणी है, वह कालिन्दी यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको धोवे ॥ २ ॥ जो अपनी सुहावनी तरङ्गोंकें

सम्पर्कसे समस्त प्राणियोंके पापोंको धो डालती है, जिसके तटपर नूतन मधुरिमासे भरे भक्तिरसके अनेकों चातक रहा करते हैं, तटके समीप वास करनेवाले भक्तरूपी हंसोंसे जो सेवित रहती है और उनकी कामनाओं को

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २३५ विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता

गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता ।

प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा । धुनोतु ॥ ४ ॥

तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिता शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता

भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा । धुनोतु ॥ ५ ॥

जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी । धुनोतु ॥ ६ ॥

स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा पूर्ण करनेवाली है; वह कलिन्द - कन्या यमुना सदा हमारे मानसिक मलको मिटावे ॥ ३ ॥ जिसके तटपर विहार और रास - विलासके खेदको मिटा

देनेवाली मन्द - मन्द वायु चल रही है, जिसके नीरकी सुन्दरताका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता, जो अपने प्रवाहके सहयोगसे पृथ्वी, नदी और नदोंको पावन बनाती है; वह कलिन्दनन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ॥४ ॥ लहरोंसे सम्पर्कित वालुकामय तटसे जिसका मध्यभाग सुशोभित

है, जिसका वर्ण सदा ही श्यामल रहता है, जो शरद् ऋतुके चन्द्रमाकी मनोहर मञ्जरीसे अलङ्कृत होती है और सुन्दर सलिलसे संसारको किरणमयी देनेमें जो कुशल है, वह कलिन्द- कन्या यमुना सदा हमारे मानसिक सन्तोष नष्ट करे ॥ ५ ॥ जो जलके भीतर क्रीडा करनेवाली सुन्दरी राधाके

मलको युक्त है, अपने स्वामी श्रीकृष्णके अङ्गस्पर्शसुखका, जो अन्य अङ्गरागसे लिये दुर्लभ है, उपभोग करती है, जो अपने प्रवाहसे प्रशान्त सप्त-किसीके पैदा करनेमें अत्यन्त कुशल है; वह कालिन्दी यमुना सदा समुद्रोंमें हलचल हमारे आन्तरिक मलको धोवे ॥ ६ ॥

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२३६ * स्तोत्ररत्नावली * ******* 55555555555555555 जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी 1

सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा । धुनोतु ॥ ७ ॥

सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा । धुनोतु ॥ ८ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम् । ६ ९ - यमुनाष्टकम् कृपापारावारां तपनतनयां तापशमनीं मुरारिप्रेयस्कां भवभयदवां भक्तवरदाम् । जलमें धुलकर गिरे हुए श्रीकृष्णके अङ्गरागसे अपना अङ्गस्नान करती हुई सखियोंसे जिसकी शोभा बढ़ रही है, जो राधाकी चञ्चल अलकोंमें गुँथी हुई चम्पक - मालासे मालाधारिणी हो गयी है, स्वामी श्रीकृष्णके भृत्य नारद आदि जिसमें सदा ही स्नान करनेके लिये आया करते हैं; वह कलिन्द - कन्या यमुना हमारे आन्तरिक मलको धो डाले ॥ ७ ॥ जिसके तटवर्ती मञ्जुल निकुञ्ज सदा

ही नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी लीलाओंसे सुशोभित होते हैं; किनारेपर बढ़कर खिली हुई मल्लिका और कदम्बके पुष्प - परागसे जिसका वर्ण उज्ज्वल हो रहा है, जो अपने जलमें डुबकी लगानेवाले मनुष्योंको भवसागरसे पार कर देती है, वह कलिन्द - कन्या यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको दूर बहावे ॥ ८ ॥

जो कृपाकी समुद्र, सूर्यकुमारी, तापको शान्त करनेवाली, श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रेमिका, संसारभीतिके लिये दावानलस्वरूप, भक्तोंको वर देनेवाली और आकाशजालसे मुक्त लक्ष्मीस्वरूपा हैं, उन नित्यफलदायनी यमुनाजीका धीर

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* विविधदेवस्तोत्राणि * २३७ वियज्जालान्मुक्तां श्रियमपि सुखाप्तेः प्रतिदिनं सदा धीरो नूनं भजति यमुनां नित्यफलदाम् ॥ १ ॥

मधुवनचारिणि भास्करवाहिनि जाह्रविसङ्गिनि सिन्धुसुते मधुरिपुभूषिणि माधवतोषिणि गोकुलभीतिविनाशकृते । जगदघमोचिनि मानसदायिनि केशवकेलिनिदानगते जय यमुने जय भीति निवारिणि सङ्कटनाशिनि पावय माम् ॥ २ ॥

अयि मधुरे मधुमोदविलासिनि शैलविहारिणि वेगभरे

परिजनपालिनि दुष्टनिषूदिनि वाञ्छितकामविलासधरे ।

व्रजपुरवासिजनार्जितपातकहारिणि विश्वजनोद्धरिके । जय ० ॥ ३ ॥

अतिविपदम्बुधिमग्नजनं भवतापशताकुलमानसकं गतिमतिहीनमशेषभयाकुलमागतपादसरोजयुगम् 1 ऋणभयभीतिमनिष्कृतिपातककोटिशतायुतपुञ्जतरं । जय ० ॥ ४ ॥

पुरुष सुखप्राप्तिके लिये निश्चयपूर्वक निरन्तर प्रतिदिन भजन करता है ॥ १ ॥ हे

मधुवनमें विहार करनेवाली! हे भास्करवाहिनि! हे गङ्गाजीकी सहचरी! हे सिन्धुसुते! हे श्रीमधुसूदनविभूषिणि! हे माधवतृप्तिकारिणि! हे गोकुलका भय दूर करनेवाली! हे जगत्पापविनाशिनि! हे वाञ्छितफलदायिनि! हे कृष्णकेलिकी आश्रयभूता सकलभयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ॥ २ ॥ अयि मधुरे! अयि मधुगन्धविलासिनि! हे पर्वतोंमें

विहार करनेवाली! परम वेगवती अपने तीरवर्ती भक्तजनोंका पालन करनेवाली, दुष्टोंका संहार करनेवाली, इच्छित कामनाओंकी विलासभूमि, व्रजभूमिनिवासियों-के अर्जित पापोंको हरण करनेवाली तथा सम्पूर्ण जीवोंका उद्धार करनेवाली, सकलभयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ॥ ३ ॥ जो महान् विपत्तिसागरमें निमग्न है, सैकड़ों सांसारिक संतापोंसे

जिसका मन व्याकुल है, जो गति ( आश्रय ) और मति ( विचार ) से शून्य तथा सब प्रकारके भयोंसे व्याकुल है, जो ऋण और भयसे दबा हुआ तथा

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२३८ * स्तोत्ररत्नावली * नवजलदद्युतिकोटिलसत्तनुहेममयाभररञ्जितके तडिदवहेलिपदाञ्चलचञ्चलशोभितपीतसुचैलधरे मणिमयभूषणचित्रपटासनरञ्जितगञ्जितभानुकरे । जय ० ॥ ५ ॥

शुभपुलि मधुमत्तयदूद्भवरासमहोत्सवकेलिभरे उच्चकुलाचलराजितमौक्तिकहारमयाभररोदसिके नवमणिकोटिकभास्करकञ्चुकिशोभिततारकहारयुते । जय ० ॥ ६ ॥

करिवरमौक्तिकनासिकभूषणवातचमत्कृतचञ्चलके **************************** । मुखकमलामलसौरभचञ्चलमत्तमधुव्रतलोचनिके मणिगणकुण्डललोलपरिस्फुरदाकुलगण्डयुगामलके । जय ० ॥ ७ ॥

सैकड़ों - हजारों - करोड़ों प्रतिकारशून्य पापोंका पुतला है, तुम्हारे चरणकमलयुगलमें प्राप्त हुए ऐसे मुझको, हे सकलभयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ॥ ४ ॥ तुम्हारा शरीर करोड़ों नवीन मेघोंकी

कान्तिसे सुशोभित तथा सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित है, जिसका चञ्चल अञ्चल चपलाकी भी अवहेलना करता है, ऐसे पीत दुकूलको धारण करके तुम परम शोभायमान हो रही हो तथा मणिमय आभूषण और चित्र - विचित्र वस्त्र एवं आसनसे रञ्जित होकर तुमने सूर्यकी किरणोंको भी कुण्ठित कर दिया है; हे सकलभयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ॥ ५॥ हे सुन्दर तटोंवाली! हे मधुमत्त - यदुकुलोत्पन्न श्रीकृष्ण और

बलरामके रासमहोत्सवकी क्रीडाभूमि! हे ऊँचे - ऊँचे कुलपर्वतोंकी श्रेणियोंपर शोभायमान मुक्तावलीरूप आभूषणोंसे पृथ्वी और आकाशको विभूषित करनेवाली, हे करोड़ों भास्करोंके समान नवीन मणियोंकी कञ्चुकीसे सुशोभित तथा तारावलीरूप हारसे युक्त, सकलभयनिवारिणी सङ्कटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुझे पवित्र करो || ६ || तुम्हारी नासिकाकी भूषणरूप वायुसे चञ्चल होकर झिलमिला रही है, तुम्हारे नेत्ररूप मतवाले भौरे गजमुक्ता मानो मुखकमलकी सुवाससे चञ्चल हो रहे हैं तथा दोनों अमल कपोल हिलते हुए

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* विविधदेवस्तोत्राणि २३ ९ कलरवनूपुरहेममयाचितपादसरोरुहसारुणिके धिमिधिमिधिमिधिमितालविनोदितमानसमञ्जुलपादगते I तव पदपङ्कजमाश्रितमानवचित्तसदाखिलतापहरे । जय ० ॥ ८ ॥

भवोत्ताप निपतितजनो दुर्गतितो यदि प्रातः ___ प्रतिदिनमनन्याश्रयतया । हयाहेषैः कामं करकुसुमपुङ्खैरविरतं सदा भोक्ता भोगान्मरणसमये याति हरिताम् ॥ ९ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम् । मणिमय कुण्डलोंकी झलकसे झिलमिला रहे हैं, हे सकलभयनिवारिणी सङ्कटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ॥ ७ ॥ तुम्हा

अरुण चरणकमल सुवर्णमय नूपुरोंके कलरवसे युक्त हैं, तुम मनको प्रसन्न करनेवाली ' धिमि धिमि ' स्वरमयी मनोहर गतिसे गमन करती हो, जो मनुष्य तुम्हारे चरणकमलोंमें चित्त लगाता है, तुम उसके सम्पूर्ण ताप हर लेती हो; हे सकलभयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो ॥ ८ ॥ जो मनुष्य संसारके सन्तापसमुद्रमें डूबकर अत्यन्त दुर्गतिग्रस्त

हो रहा है, वह यदि प्रतिदिन प्रातःकाल अनन्य चित्तसे ( इस स्तोत्रद्वारा श्रीयमुनाजीकी ) स्तुति करेगा, वह ( यावज्जीवन ) घोड़ोंकी हिनहिनाहट तथा हाथोंमें पुष्पपुञ्जसे सुशोभित होकर, निरन्तर सम्पूर्ण भोगोंको भोगेगा और मरनेके समय भगवद्रूप हो जायगा ॥ ९ ॥

पृष्ठ 250

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ॐ प्रकीर्णस्तोत्राणि ७० — प्रातःस्मरणम् ( क ) परब्रह्मणः प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् । यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥ १ ॥

प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं

वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण ।

यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचं-स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥ २ ॥

मैं प्रातःकाल, हृदयमें स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्वका स्मरण करता हूँ, जो सत्, चित् और आनन्दरूप है, परमहंसोंका प्राप्य स्थान है और जाग्रदादि तीनों अवस्थाओंसे विलक्षण है, जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत् अवस्थाको नित्य जानता है, वह स्फुरणारहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पञ्चभूतोंका संघात ( शरीर ) मैं नहीं हूँ ॥ १ ॥

जो मन और वाणीसे अगम्य है, जिसकी कृपासे समस्त वाणी भास रही हैं, जिसका शास्त्र ‘ नेति - नेति ' कहकर निरूपण करते हैं, जिस अजन्मा देवदेवेश्वर