स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 41–50
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50
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* शिवस्तोत्राणि * ३१ सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ७ ॥
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे । यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥ ८ ॥
सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः । श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥ ९ ॥
यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥ १० ॥
देवता, असुर, यक्ष और महान् सर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन एक कल्याणकारक भगवान् केदारनाथका मैं स्तवन करता हूँ ॥७ ॥ जो
गोदावरीतटके पवित्र देशमें सह्यपर्वतके विमल शिखरपर वास करते हैं, जिनके दर्शनसे तुरंत ही पातक नष्ट हो जाता है, उन श्रीत्र्यम्बकेश्वरका मैं स्तवन करता हूँ ॥८ ॥ जो भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा ताम्रपर्णी और सागरके
संगममें अनेक बाणोंद्वारा पुल बाँधकर स्थापित किये गये, उन श्रीरामेश्वरको मैं नियमसे प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥ जो डाकिनी और शाकिनीवृन्दमें प्रेतोंद्वारा
सदैव सेवित होते हैं, उन भक्तहितकारी भगवान् भीमशङ्करको मैं प्रणाम करता
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३२ * स्तोत्ररत्नावली * सानन्दमानन्दवने वसन्त-मानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ११ ॥
इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् । वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥ १२ ॥
ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥ १३ ॥
इति श्रीद्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् । हूँ ॥ १०॥ जो स्वयं आनन्दकन्द हैं और आनन्दपूर्वक आनन्दवन
( काशीक्षेत्र ) में वास करते हैं, जो पापसमूहके नाश करनेवाले हैं, उन अनाथोंके नाथ काशीपति श्रीविश्वनाथकी शरणमें मैं जाता हूँ ॥ ११॥ जो
इलापुरके सुरम्यमन्दिरमें विराजमान होकर समस्त जगत्के आराधनीय हो रहे हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही उदार है, उन घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्मय भगवान् शिवकी शरणमें मैं जाता हूँ ॥ १२ ॥ यदि मनुष्य क्रमशः कहे गये इन द्वादश
ज्योतिर्मय शिवलिङ्गोंके स्तोत्रका भक्तिपूर्वक पाठ करे तो इनके दर्शनसे होनेवाला फल प्राप्त कर सकता है ॥ १३ ॥
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* शिवस्तोत्राणि * ३३ १४ - शिवताण्डवस्तोत्रम् जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं प्रतिक्षणं धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु शिवम् ॥ १ ॥
मम ॥ २ ॥
वस्तुनि ॥ ३ ॥
जिन्होंने जटारूपी अटवी ( वन ) से निकलती हुई गङ्गाजीके गिरते हुए प्रवाहोंसे पवित्र किये गये गलेमें सर्पोंकी लटकती हुई विशाल मालाको धारणकर, डमरूके डम - डम शब्दोंसे मण्डित प्रचण्ड ताण्डव ( नृत्य ) किया, वे शिवजी हमारे कल्याणका विस्तार करें ॥ १ ॥ जिनका मस्तक जटारूपी
कड़ाहमें वेगसे घूमती हुई गङ्गाकी चञ्चल तरङ्ग - लताओंसे सुशोभित हो रहा है, ललाटाग्नि धक् - धक् जल रही है, सिरपर बाल चन्द्रमा विराजमान हैं, उन ( भगवान् शिव ) में मेरा निरन्तर अनुराग हो ॥ २ ॥ गिरिराजकिशोरी पार्वतीके
विलासकालोपयोगी शिरोभूषणसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित होते देख जिनका मन आनन्दित हो रहा है, जिनकी निरन्तर कृपादृष्टिसे कठिन आपत्तिका भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगम्बर तत्त्वमें मेरा मन विनोद करे ॥ ३ ॥
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३४ * स्तोत्ररत्नावली * जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ ५ ॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥ ६ ॥
जिनके जटाजूटवर्ती भुजङ्गमोंके फणोंकी मणियोंका फैलता हुआ पिङ्गल प्रभापुञ्ज दिशारूपिणी अङ्गनाओंके मुखपर कुङ्कुमरागका अनुलेप कर रहा है, मतवाले हाथीके हिलते हुए चमड़ेका उत्तरीय वस्त्र ( चादर ) धारण करनेसे स्निग्धवर्ण हुए उन भूतनाथमें मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ॥४ ॥ जिनकी
चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देवताओंके [ प्रणाम करते समय ] मस्तकवर्ती कुसुमोंकी धूलिसे धूसरित हो रही हैं; नागराज ( शेष ) के हारसे बँधी हुई जटावाले वे भगवान् चन्द्रशेखर मेरे लिये चिरस्थायिनी सम्पत्तिके साधक हों ॥ ५॥ जिसने ललाट - वेदीपर प्रज्वलित हुई अग्निके स्फुलिङ्गोंके तेजसे
कामदेवको नष्ट कर डाला था, जिसे इन्द्र नमस्कार किया करते हैं, सुधाकरकी कलासे सुशोभित मुकुटवाला वह [ श्रीमहादेवजीका ] उन्नत विशाल ललाटवाला जटिल मस्तक हमारी सम्पत्तिका साधक हो ॥ ६ ॥
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शिवस्तोत्राणि * ३५ करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७ ॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-त्कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ ८ ॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥
जिन्होंने अपने विकराल भालपट्टपर धक् धक् जलती हुई अग्निमें प्रचण्ड कामदेवको हवन कर दिया था, गिरिराजकिशोरीके स्तनोंपर पत्रभङ्ग-रचना करनेके एकमात्र कारीगर उन भगवान् त्रिलोचनमें मेरी धारणा लगी रहे ॥ ७ ॥ जिनके कण्ठमें नवीन मेघमालासे घिरी हुई अमावस्याकी आधी
रातके समय फैलते हुए दुरूह अन्धकारके समान श्यामता अङ्कित है; जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसारभारको धारण करनेवाले चन्द्रमा [ के सम्पर्क ] से मनोहर कान्तिवाले भगवान् गङ्गाधर मेरी सम्पत्तिका विस्तार करें ॥ ८ ॥ जिनका कण्ठदेश खिले हुए नील कमलसमूहकी श्याम प्रभाका
अनुकरण करनेवाली हरिणीकी - सी छविवाले चिह्नसे सुशोभित है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, भव ( संसार ), दक्ष - यज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराजका भी उच्छेदन करनेवाले हैं उन्हें मैं भजता हूँ ॥ ९ ॥
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३६ * स्तोत्ररत्नावली * ********* FFFFFFFFFFFFFFFFFF £££££££££££££ अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १० ॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२ ॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् । जो अभिमानरहित पार्वतीकी कलारूप कदम्बमञ्जरीके मकरन्दस्रोतकी बढ़ती हुई माधुरीके पान करनेवाले मधुप हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्ष - यज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराजका भी अन्त करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ ॥ १० ॥ जिनके मस्तकपर बड़े वेगके साथ घूमते हुए भुजङ्गके
फुफकारनेसे ललाटकी भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है, धिमि - धिमि बजते हुए मृदङ्गके गम्भीर मङ्गल घोषके क्रमानुसार जिनका प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उन भगवान् शङ्करकी जय हो ॥ ११ ॥ पत्थर और सुन्दर
बिछौनोंमें, साँप और मुक्ताकी मालामें, बहुमूल्य रत्न तथा मिट्टीके ढेलेमें, मित्र या शत्रुपक्षमें, तृण अथवा कमललोचना तरुणीमें, प्रजा और पृथ्वीके महाराजमें समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिवको भजूँगा ॥ १२ ॥ सुन्दर ललाटवाले
भगवान् चन्द्रशेखरमें दत्तचित्त हो अपने कुविचारोंको त्यागकर गङ्गाजीके तटवर्ती
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* शिवस्तोत्राणि * ३७ विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ १४ ॥
दशवक्त्रगीतं पूजावसानसमये यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥ १५ ॥
इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् । = निकुञ्जके भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबायी हुई विह्वल आँखोंसे ‘ शिव ’ मन्त्रका उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा? ॥ १३ ॥ जो मनुष्य
इस प्रकारसे उक्त इस उत्तमोत्तम स्तोत्रका नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता रहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही सुरगुरु श्रीशङ्करजीकी अच्छी भक्ति प्राप्त कर लेता है, वह विरुद्धगतिको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि श्रीशिवजीका प्रकारका चिन्तन प्राणिवर्गके मोहका नाश करनेवाला है ॥ १४ ॥
अच्छी सायङ्कालमें पूजा समाप्त होनेपर रावणके गाये हुए इस शम्भुपूजनसम्बन्धी स्तोत्रका जो पाठ करता है, भगवान् शङ्कर उस मनुष्यको रथ, हाथी, घोड़ोंसे युक्त सदा स्थिर रहनेवाली अनुकूल सम्पत्ति देते हैं ॥ १५ ॥
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३८ * स्तोत्ररत्नावली * १५ – श्रीरुद्राष्टकम् नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिरा ग्यान गोतीतमीशं करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भालबालेन्दु कंठे भजेऽहं ॥ १ ॥
गिरीशं ।
नतोऽहं ॥ २ ॥
शरीरं ।
भुजंगा ॥ ३ ॥
हे ईशान! मैं मुक्तिस्वरूप, समर्थ, सर्वव्यापक, ब्रह्म, वेदस्वरूप, निजस्वरूपमें स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह, अनन्त ज्ञानमय और आकाशके समान सर्वत्र व्याप्त प्रभुको प्रणाम करता हूँ ॥१ ॥ जो
निराकार हैं, ओङ्काररूप आदिकारण हैं, तुरीय हैं, वाणी, बुद्धि और इन्द्रियोंके पथसे परे हैं, कैलासनाथ हैं, विकराल, और महाकालके भी काल, कृपाल, गुणोंके आगार और संसारसे तारनेवाले हैं, उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो हिमालयके समान श्वेतवर्ण, गम्भीर और करोड़ों
कामदेवके समान कान्तिमान् शरीरवाले हैं, जिनके मस्तकपर मनोहर गङ्गाजी लहरा रही हैं, भालदेशमें बालचन्द्रमा सुशोभित होते हैं और
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* शिवस्तोत्राणि * ३ ९ चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं । मृगाधीशचर्माम्बरं मुंडमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥
प्रचंड प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखंड अजं भानुकोटिप्रकाशं । त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपति कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता चिदानंद संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजंतीह लोके परे वा भावगम्यं ॥ ५ ॥
पुरारी ।
मन्मथारी ॥ ६ ॥
नराणाम् । गलेमें सर्पोंकी माला शोभा देती है ॥ ३ ॥ जिनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे
हैं, जिनके नेत्र एवं भृकुटी सुन्दर और विशाल हैं, जिनका मुख प्रसन्न और कण्ठ नील है, जो बड़े ही दयालु हैं, जो बाघकी खालका वस्त्र और मुण्डोंकी माला पहनते हैं, उन सर्वाधीश्वर प्रियतम शिवका मैं भजन करता हूँ ॥४ ॥
जो प्रचण्ड, सर्वश्रेष्ठ, प्रगल्भ, परमेश्वर, पूर्ण, अजन्मा, कोटि सूर्यके समान , त्रिभुवनके शूलनाशक और हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले हैं, उन प्रकाशमान भावगम्य भवानीपतिका मैं भजन करता हूँ ॥ ५ ॥ हे प्रभो! आप
कलारहित, कल्याणकारी और कल्पका अन्त करनेवाले हैं । आप सर्वदा सत्पुरुषोंको आनन्द देते हैं, आपने त्रिपुरासुरका नाश किया था, आप मोहनाशक और ज्ञानानन्दघन परमेश्वर हैं, कामदेवके आप शत्रु हैं, आप मुझपर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों ॥ ६ ॥ मनुष्य जबतक उमाकान्त महादेवजीके
चरणारविन्दोंका भजन नहीं करते, उन्हें इहलोक या परलोकमें कभी सुख और
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४० * स्तोत्ररत्नावली * FFFFF न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥ ७ ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥ ८ ॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥ ९ ॥
इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् । १६– श्रीपशुपत्यष्टकम् ध्यानम् ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् । शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती और न उनका सन्ताप ही दूर होता है । हे समस्त भूतोंके निवासस्थान भगवान् शिव! आप मुझपर प्रसन्न हों || ७ || हे प्रभो! हे शम्भो! हे ईश! मैं योग, जप और पूजा कुछ भी नहीं जानता, हे शम्भो! मैं सदा - सर्वदा आपको नमस्कार करता हूँ । जरा, जन्म और दुःखसमूहसे सन्तप्त होते हुए मुझ दुःखीकी दुःखसे आप रक्षा कीजिये ॥ ८ ॥
जो मनुष्य भगवान् शङ्करकी तुष्टिके लिये ब्राह्मणद्वारा कहे हुए इस रुद्राष्टकका भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उनपर शङ्करजी प्रसन्न होते हैं ॥ ९ ॥
# चाँदीके पर्वतसमान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो सुन्दर चन्द्रमाको आभूषणरूपसे धारण करते हैं, रत्नमय अलङ्कारोंसे जिनका शरीर उज्ज्वल है,