स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 51–60
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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* शिवस्तोत्राणि * ४१ पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥ १ ॥
स्तोत्रम्
पशुपतिं पतिं धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् ।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ १ ॥
न ' जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम् ।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ २ ॥
मधुरपञ्चमनादविशारदम् । मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ३ ॥
शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् ।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ४ ॥
जिनके हाथोंमें परशु, मृग, वर और अभय है, जो प्रसन्न हैं, पद्मके आसनपर हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघकी विराजमान खाल पहनते हैं, जो विश्वके आदि, जगत्की उत्पत्तिके बीज और समस्त भयोंको हरनेवाले हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वरका प्रतिदिन ध्यान करे । ! जो समस्त प्राणियों, स्वर्ग, पृथ्वी और नागलोकके पति हैं, अरे मनुष्यो प्राणियों और भक्तजनोंकी पीड़ा दूर दक्ष - कन्या सतीके स्वामी हैं, शरणागत भजो ॥ १ ॥ ऐ मनुष्यो!
करनेवाले हैं, उन परमपुरुष पार्वती - वल्लभ शंकरजीको वशमें पड़े हुए जीवको पिता, माता, भाई, बेटा, अत्यन्त बल और कालके कोई भी नहीं बचा सकता, इसलिये तुम गिरिजापतिको कुल – इनमेंसे! जो मृदङ्ग और डमरू बजानेमें निपुण हैं, मधुर पञ्चम भजो ॥ २ ॥ रे मनुष्यो जिनकी सेवामें रहते हैं, उन
स्वरके गायनमें कुशल हैं, प्रमथ और भूतगण भजो ॥ ३ ॥ हे मनुष्यो! ' शिव! शिव! शिव! ' कहकर मनुष्य
गिरिजापतिको करते हैं, जो शरणागतोंको शरण, सुख और अभय देनेवाले हैं, जिनको प्रणाम
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४२ * स्तोत्ररत्नावली * ************ £££££££ *************
नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् ।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ५ ॥
मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजि फलप्रदम् ।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ६ ॥
मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम् ।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ७ ॥
हरिविरञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम् ।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ८ ॥
पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा ॥
पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम् ॥ ९ ॥
इति श्रीपृथिवीपतिसूरिविरचितं श्रीपशुपत्यष्टकं सम्पूर्णम् । उन दयासागर गिरिजापतिका भजन करो ॥ ४ ॥ अरे मनुष्यो! जो नरमुण्डरूपी
मणियोंका कुण्डल और साँपोंका हार पहनते हैं, जिनका शरीर चिताकी धूलिसे धूसर है, उन वृषभध्वज गिरिजापतिको भजो ॥ ५ ॥ अरे मनुष्यो! जिन्होंने दक्ष यज्ञका
विध्वंस किया था; जिनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित हैं, जो यज्ञ करनेवालोंको सदा ही फल देनेवाले हैं और जो प्रलयकी अग्निमें देवता, दानव और मानवोंको दग्ध करनेवाले हैं, उन गिरिजापतिको भजो ॥ ६ ॥ अरे मनुष्यो! जगत्को जन्म, जरा
और मरणके भयसे पीड़ित, सामने उपस्थित भयसे व्याकुल देखकर बहुत दिनोंसे हृदयमें सञ्चित मदका त्याग कर उन गिरिजापतिको भजो ॥ ७ ॥ अरे मनुष्यो!
विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र जिनकी पूजा करते हैं, यम और कुबेर जिनको प्रणाम करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं तथा जो त्रिभुवनके स्वामी हैं, उन गिरिजापतिको भजो ॥ ८ ॥
जो मनुष्य पृथ्वीपति सूरिके बनाये हुए इस अद्भुत पशुपति - अष्टकका सदा पाठ और श्रवण करता है, वह शिवपुरीमें निवास करता और आनन्दित होता है ॥ ९ ॥
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* शिवस्तोत्राणि * ४३ १७ - श्रीविश्वनाथाष्टकम् गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् । नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ १ ॥
वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं
वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् ।
विग्रहवरेण कलत्रवन्तं । वाराणसी ० ॥ २ ॥
वामेन भूताधिपं भुजगभूषणभूषिताङ्गं जटिलं त्रिनेत्रम् । व्याघ्राजिनाम्बरधरं । वाराणसी ० ॥ ३ ॥
पाशाङ्कुशाभयवरप्रदशूलपाणिं गङ्गाजीकी लहरोंसे सुन्दर प्रतीत होती हैं, जिनका जिनकी जटाएँ रहता है, जो नारायणके प्रिय और वामभाग सदा पार्वतीजीसे सुशोभित विश्वनाथको भज ॥ १ ॥
कामदेवके मदका नाश करनेवाले हैं, उन काशीपति वर्णन नहीं हो सकता, जिनके अनेक गुण और अनेक वाणीद्वारा जिनका देवता जिनकी चरणपादुकाका सेवन करते स्वरूप हैं, ब्रह्मा, विष्णु और अन्य विश्वनाथको सुन्दर वामाङ्गके द्वारा ही सपत्नीक हैं, उन काशीपति हैं, जो अपने हैं, जिनका शरीर सर्परूपी गहनोंसे विभूषित भज ॥ २ ॥ जो भूतोंके अधिपति हाथोंमें पाश, अंकुश, अभय,
है, जो बाघकी खालका वस्त्र पहनते हैं, जिनके भज ॥ ३ ॥
वर और शूल हैं, उन जटाधारी त्रिनेत्र काशीपति विश्वनाथको
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४४ * स्तोत्ररत्नावली * शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं
भालेक्षणानलविशोषितपञ्चबाणम् ।
नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं । वाराणसी ० ॥ ४ ॥
पञ्चाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां
नागान्तकं दनुजपुङ्गवपन्नगानाम् ।
दावानलं मरणशोकजराटवीनां । वाराणसी ० ॥ ५ ॥
तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीय-मानन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम्
नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं । वाराणसी ० ॥ ६ ॥
रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं
वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम् ।
माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं । वाराणसी ० ॥ ७ ॥
जो चन्द्रमाद्वारा प्रकाशित किरीटसे शोभित हैं, जिन्होंने अपने भालस्थ नेत्रकी अग्निसे कामदेवको दग्ध कर दिया, जिनके कानोंमें बड़े - बड़े साँपोंके कुण्डल चमक रहे हैं, उन काशीपति विश्वनाथको भज ॥ ४ ॥ जो पापरूपी
मतवाले हाथियोंके मारनेवाले सिंह हैं, दैत्यसमूहरूपी साँपोंका नाश करनेवाले गरुड़ हैं तथा जो मरण, शोक और बुढ़ापारूपी भीषण वनको जलानेवाले दावानल हैं, ऐसे काशीपति विश्वनाथको भज ॥ ५ ॥ जो तेजपूर्ण, सगुण,
निर्गुण, अद्वितीय, आनन्दकन्द, अपराजित और अतुलनीय हैं, जो अपने शरीरपर साँपोंको धारण करते हैं, जिनका रूप हास - वृद्धिरहित है, ऐसे आत्मस्वरूप काशीपति विश्वनाथको भज ॥ ६ ॥ जो रागादि दोषोंसे रहित हैं;
अपने भक्तोंपर कृपा रखते हैं, वैराग्य और शान्तिके स्थान हैं, पार्वतीजी सदा जिनके साथ रहती हैं, जो धीरता और मधुर स्वभावसे सुन्दर जान पड़ते हैं तथा जो कण्ठमें गरलके चिह्नसे सुशोभित हैं, उन काशीपति विश्वनाथको
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* शिवस्तोत्राणि * ४५ आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां
पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ ।
परेशं । वाराणसी ० ॥ ८ ॥
आदाय हृत्कमलमध्यगतं वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः । विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ ९ ॥
यः पठेच्छिवसन्निधौ । विश्वनाथाष्टकमिदं शिवेन सह मोदते ॥ १० ॥
शिवलोकमवाप्नोति इति श्रीमहर्षिव्यासप्रणीतं श्रीविश्वनाथाष्टकं सम्पूर्णम् । छोड़कर, दूसरोंकी निन्दा त्यागकर और पाप-भज ॥ ७॥ सब आशाओंको लगाकर, हृदयकमलमें प्रकाशमान
कर्मसे अनुराग हटाकर, चित्तको समाधिमें काशीपति शिवके इस परमेश्वर काशीपति विश्वनाथको भज ॥ ८ ॥ जो मनुष्य और
पाठ करता है, वह विद्या, धन, प्रचुर सौख्य आठ श्लोकोंके स्तवनका मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ जो
अनन्त कीर्ति प्राप्तकर देहावसान होनेपर करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता शिवके समीप इस विश्वनाथाष्टकका पाठ और शिवके साथ आनन्दित होता है ॥ १० ॥
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ॐ शक्तिस्तोत्राणि १८ – ललितापञ्चकम् प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं विम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् । आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ॥ १ ॥
प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं रक्ताङ्गुलीयलसदङ्गुलिपल्लवाढ्याम् माणिक्यहेमवलयाङ्गदशोभमानां पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीदधानाम् ॥२ ॥
मैं प्रातःकाल श्रीललितादेवीके उस मनोहर मुखकमलका स्मरण करता हूँ, जिनके बिम्बसमान रक्तवर्ण अधर, विशाल मौक्तिक ( मोतीके बुलाक ) से सुशोभित नासिका और कर्णपर्यन्त फैले हुए विस्तीर्ण नयन हैं, जो मणिमय कुण्डल और मन्द मुसकानसे युक्त हैं तथा जिनका ललाट कस्तूरिकातिलकसे सुशोभित है ॥ १ ॥ मैं श्रीललितादेवीकी भुजारूपिणी कल्पलताका प्रातःकाल
स्मरण करता हूँ, जो लाल अँगूठीसे सुशोभित सुकोमल अंगुलिरूप पल्लवोंवाली तथा रत्नखचित सुवर्णकङ्कण और अङ्गदादिसे भूषित है एवं जिसने पुण्ड्र - ईंखके धनुष, पुष्पमय बाण और अङ्कुश धारण किये हैं ॥ २ ॥
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* शक्तिस्तोत्राणि * ४७ प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् । पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं ॥ ३ ॥
पद्माङ्कुशध्वजसुदर्शनलाञ्छनाढ्यम् प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं त्रय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवद्याम् । विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां विद्येश्वरीं निगमवाङ्मनसातिदूराम् ॥ ४ ॥
प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति । श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति वाग्देवत वचसा त्रिपुरेश्वरीति ॥ ५ ॥
चरणकमलोंको, जो भक्तोंको अभीष्ट फल देनेवाले मैं श्रीललितादेवीके जहाजरूप हैं तथा कमलासन श्रीब्रह्माजी आदि और संसारसागरके लिये सुदृढ़ चिह्नोंसे देवेश्वरोंसे पूजित और पद्म, अङ्कुश, ध्वज एवं सुदर्शनादि मङ्गलमय नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ मैं प्रातःकाल परमकल्याणरूपिणी
युक्त हैं, प्रातःकाल हूँ, जिनका वैभव वेदान्तवेद्य है, जो श्रीललिता भवानीकी स्तुति करता उत्पत्ति, स्थिति और लयकी मुख्य करुणामयी होनेसे शुद्धस्वरूपा हैं, विश्वकी वेद, वाणी और मनकी गतिसे अति हेतु हैं, विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं तथा, कमला, महेश्वरी, दूर हैं ॥४ ॥ हे ललिते! मैं तेरे पुण्यनाम कामेश्वरी अपनी
, जगज्जननी, परा, वाग्देवी तथा त्रिपुरेश्वरी आदिका प्रातःकाल शाम्भवी वाणीद्वारा उच्चारण करता हूँ ॥ ५ ॥
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४८ * स्तोत्ररत्नावली * यः श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकायाः सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते । तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् । इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं ललितापञ्चकं सम्पूर्णम् । १ ९ – मीनाक्षीपञ्चरत्नम् उद्यद्भानुसहस्रकोटिसदृशां केयूरहारोज्ज्वलां विम्बोष्ठ स्मितदन्तपङ्क्तिरुचिरां पीताम्बरालङ्कृताम् । विष्णुब्रह्मसुरेन्द्रसेवितपदां तत्त्वस्वरूपां शिवां मीनाक्षीं प्रणतोऽस्मि सन्ततमहं कारुण्यवारांनिधिम् ॥ १ ॥
माता ललिताके अति सौभाग्यप्रद और सुललित इन पाँच श्लोकोंको जो पुरुष प्रातःकाल पढ़ता है, उसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर ललितादेवी विद्या, धन, निर्मल सुख और अनन्त कीर्ति देती हैं ॥ ६ ॥
जो उदय होते हुए सहस्रकोटि सूर्योक सदृश आभावाली हैं, केयूर और हार आदि आभूषणोंसे भव्य प्रतीत होती हैं, बिम्बाफलके समान अरुण ओठोंवाली हैं, मधुर मुसकानयुक्त दन्तावलिसे जो सुन्दरी मालूम होती हैं तथा पीताम्बरसे अलङ्कृता हैं; ब्रह्मा, विष्णु आदि देवनायकोंसे सेवित चरणोंवाली उन तत्त्वस्वरूपिणी कल्याणकारिणी करुणावरुणालया श्रीमीनाक्षीदेवीका मैं निरन्तर वन्दन करता ॥ १ ॥
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* शक्तिस्तोत्राणि * ४ ९ पूर्णेन्दुवक्त्रप्रभां मुक्ताहारलसत्किरीटरुचिरां
शिञ्जन्नूपुरकिङ्किणीमणिधरां पद्मप्रभाभासुराम् ।
गिरिसुतां वाणीरमासेवितां । मीनाक्षीं ॥ २ ॥
सर्वाभीष्टफलप्रदां श्रीविद्यां शिववामभागनिलयां ह्रीङ्कारमन्त्रोज्ज्वलां श्रीमत्सभानायिकाम् । श्रीचक्राङ्कितबिन्दुमध्यवसतिं
श्रीमज्जगन्मोहिनीं । मीनाक्षीं ॥ ३ ॥
श्रीमत्षण्मुखविघ्नराजजननीं भयहरां ज्ञानप्रदां निर्मलां श्रीमत्सुन्दरनायिकां
श्यामाभां कमलासनार्चितपदां नारायणस्यानुजाम् ।
नानाविधामम्बिकां । मीनाक्षीं ॰ ॥ ४ ॥
वीणावेणुमृदङ्गवाद्यरसिकां लड़ियोंसे सुशोभित मुकुट धारण किये सुन्दर मालूम होती हैं, जो मोतीकी समान है, जो झनकारते हुए नूपुर ( पायजेब ), जिनके मुखकी प्रभा पूर्णचन्द्रके धारण किये हुए हैं, कमलकी - सी किङ्किणी ( करधनी ) तथा अनेकों मणियाँ, सरस्वती और लक्ष्मी आभासे भासित होनेवाली, सबको अभीष्ट फल देनेवाली मैं आदिसे सेविता उन गिरिराजनन्दिनी करुणावरुणालया श्रीमीनाक्षीदेवीका करता हूँ ॥ २ ॥ जो श्रीविद्या हैं, भगवान् शङ्करके वामभागमें
निरन्तर वन्दन सुशोभिता हैं, श्रीचक्राङ्कित विन्दुके मध्यमें विराजमान हैं, ' ह्रीं ' बीजमन्त्रसे हैं, उन श्रीस्वामी कार्तिकेय और निवास करती हैं तथा देवसभाकी अधिनेत्री मैं निरन्तर गणेशजीकी माता जगन्मोहिनी करुणावरुणालया श्रीमीनाक्षीदेवीका ॥ ३ ॥ जो अति सुन्दर स्वामिनी हैं, भयहारिणी हैं, ज्ञानप्रदायिनी
वन्दन करता हूँ श्रीब्रह्माजीद्वारा जिनके चरणकमल पूजे हैं, निर्मला और श्यामला हैं, कमलासन ( छोटी बहन ) हैं; वीणा, हैं तथा श्रीनारायण ( कृष्णचन्द्र ) की जो अनुजा गये रसिका उन विचित्र लीलाविहारिणी करुणावरुणालया वेणु, मृदङ्गादि वाद्योंकी
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५० * स्तोत्ररत्नावली * ****************** नानायोगिमुनीन्द्रहृत्सुवसतिं नानार्थसिद्धिप्रदां
नानापुष्पविराजिताङ्घ्रियुगलां नारायणेनार्चिताम् ।
नादब्रह्ममयीं परात्परतरां नानार्थतत्त्वात्मिकां । मीनाक्षीं ॥ ५ ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं मीनाक्षीपञ्चरत्नं सम्पूर्णम् । २०– देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः । न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् । श्रीमीनाक्षीदेवीका मैं निरन्तर वन्दन करता हूँ ॥४ ॥ जो अनेकों योगिजन और
मुनीश्वरोंके हृदयमें निवास करनेवाली तथा नाना प्रकारके पदार्थोंकी प्राप्ति करानेवाली हैं, जिनके चरणयुगल विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित हो रहे हैं, जो श्रीनारायणसे पूजिता हैं तथा जो नादब्रह्ममयी, परेसे भी परे और नाना पदार्थोंकी तत्त्वस्वरूपा हैं, उन करुणावरुणालया श्रीमीनाक्षीदेवीका मैं निरन्तर वन्दन करता हूँ ॥ ५ ॥
हे मातः! मैं तुम्हारा मन्त्र, यन्त्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता; परन्तु सब प्रकारके क्लेशोंको दूर करनेवाला आपका अनुसरण करना ( पीछे चलना ) ही जानता हूँ ॥ १ ॥ सबका उद्धार
करनेवाली हे करुणामयी माता! तुम्हारी पूजाकी विधि न जाननेके कारण, धन