स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 61–70

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

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* शक्तिस्तोत्राणि * ५१ तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः । मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि । अभावमें, आलस्यसे और उन विधियोंको अच्छी तरह न कर सकनेके कारण, तुम्हारे चरणोंकी सेवा करनेमें जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत कुपूत हो जाता पर माता कुमाता नहीं होती ॥ २ ॥ माँ! भूमण्डलमें

तुम्हारे सरल पुत्र अनेकां हैं पर उनमें एक मैं विरला ही बड़ा चञ्चल हूँ, तो भी हे शिवे! मुझे त्याग देना तुम्हें उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कु जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ॥ ३ ॥ हे जगदम्ब! हे मातः! मैंने

हो चरणोंकी सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिये प्रचुर धन भी समर्पण तुम्हारे नहीं किया; तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है कि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ॥४ ॥

हे गणेशजननि! मैंने अपनी पचासी वर्षसे अधिक आयु बीत जानेपर

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५२ स्तोत्ररत्नावली, * KKKKKKKK ********* इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । विविध विधियोंद्वारा पूजा करनेसे घबड़ाकर सब देवोंको छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किसकी शरणमें जाऊँ? ॥ ५ ॥

हे माता अपर्णे! यदि तुम्हारे मन्त्राक्षरोंके कानमें पड़ते ही चाण्डाल भी मिठाईके समान सुमधुरवाणीसे युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बनकर चिरकालतक निर्भय विचरता है तो उसके जपका अनुष्ठान करनेपर जपनेसे जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है? ॥ ६ ॥ जो चिताका भस्म रमाये हैं, विष खाते हैं, नंगे रहते हैं, जटाजूट

बाँधे हैं, गलेमें सर्पमाल पहने हैं, हाथमें खप्पर लिये हैं, पशुपति और भूतोंके स्वामी हैं, ऐसे शिवजीने भी जो एकमात्र जगदीश्वरकी पदवी प्राप्त की है, वह हे भवानि! तुम्हारे साथ विवाह होनेका ही फल है ॥ ७ ॥ हे चन्द्रमुखी माता!

मुझे मोक्षकी इच्छा नहीं है, सांसारिक वैभवकी भी लालसा नहीं है, विज्ञान

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* शक्तिस्तोत्राणि * ५३ अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९ ॥

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १० ॥

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।

अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११ ॥

तथा सुखकी भी अभिलाषा नहीं है; इसलिये मैं तुमसे यही माँगता हूँ कि मेरी सारी आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव - शिव, भवानी आदि नामोंके जपते - जपते ही बीते ॥ ८ ॥ हे श्यामे! मैंने अनेकों उपचारोंसे तुम्हारी सेवा नहीं की ( यही

नहीं, इसके विपरीत ) अनिष्टचिन्तनमें तत्पर अपने वचनोंसे मैंने क्या नहीं किया? ( अर्थात् अनेकों बुराइयाँ की हैं ) फिर भी मुझ अनाथपर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हें बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो ॥ ९ ॥ हे दुर्गे! हे दयासागर महेश्वरी! जब मैं किसी विपत्तिमें पड़ता हूँ तो

तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ, इसे तुम मेरी दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे-प्यासे बालक अपनी माँको ही याद किया करते हैं ॥ १० ॥ हे जगज्जननी!

मुझपर तुम्हारी पूर्ण कृपा है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? क्योंकि अनेक

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५४ * स्तोत्ररत्नावली * *

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।

एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥ १२ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् । २१ – भवान्यष्टकम् न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः पपात प्रकामी प्रलोभी कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं ।

न भर्ता ।

भवानि ॥ १ ॥

प्रमत्तः ।

गतिस्त्वं ॥ २ ॥

अपराधोंसे युक्त पुत्रको भी माता त्याग नहीं देती ॥ ११ ॥ हे महादेवि! मेरे

समान कोई पापी नहीं हैं और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करनेवाली नहीं है, यह जानकर जैसा उचित समझो, वैसा करो ॥ १२ ॥

हे भवानि! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति — इनमेंसे कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ १ ॥ मैं अपार भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, महान् दुःखोंसे भयभीत हूँ;

कामी, लोभी, मतवाला तथा घृणायोग्य संसारके बन्धनोंमें बँधा हुआ हूँ, हे भवानि! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ॥ २ ॥ हे देवि! मैं न तो दान देना

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* शक्तिस्तोत्राणि * ५५ न जानामि दानं न च ध्यानयोगं

न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।

न जानामि पूजां न च न्यासयोगम् । गतिस्त्वं ॰ ॥ ३ ॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं

न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।

न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं ॥ ४ ॥

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः

कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।

कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम् । गतिस्त्वं ॥ ५ ॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं

दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।

न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये । गतिस्त्वं ॰ ॥ ६ ॥

जानता हूँ और न ध्यानमार्गका ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र - मन्त्रोंका भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदिकी क्रियाओंसे तो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ३ ॥ न पुण्य जानता हूँ न तीर्थ, न

मुक्तिका पता है न लयका । हे मातः! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि! अब केवल तुम्हीं मेरा सहारा हो ॥ ४ ॥ मैं कुकर्मी, बुरी संगतिमें

रहनेवाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचारसे हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखनेवाला और सदा दुर्वचन बोलनेवाला हूँ, हे भवानि! मुझ अधमकी एकमात्र तुम्हीं गति हो ॥ ५ ॥ मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य,

चन्द्रमा, तथा अन्य किसी भी देवताको नहीं जानता, हे शरण देनेवाली भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ६ ॥

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५६ * • स्तोत्ररत्नावली * विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे

जले चानले पर्व शत्रुमध्ये ।

अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि । गतिस्त्वं ॥ ७ ॥

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो

महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।

विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं । गतिस्त्वं ॰ ॥ ८ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् । २२ – आनन्दलहरी भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः

प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि ।

न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति-स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः ॥ १ ॥

हे शरण्ये! तुम विवाद, विषाद, प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, वन तथा शत्रुओंके मध्यमें सदा ही मेरी रक्षा करो, हे भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ७ ॥ हे भवानि! मैं सदासे ही अनाथ, दरिद्र, जरा - जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल,

दीन, गूँगा, विपद्ग्रस्त और नष्ट हूँ, अब तुम्हीं एकमात्र मेरी गति हो ॥ ८ ॥

हे भवानि! प्रजापति ब्रह्माजी अपने चार मुखोंसे भी तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, त्रिपुरविनाशक महादेवजी पाँच मुखोंसे भी तुम्हारा स्तवन नहीं कर सकते, कार्तिकेयजी तो छः मुखोंके रहते हुए भी असमर्थ हैं, इने - गिने मुखवालोंकी तो बात ही क्या है, नागराज शेष हजार मुखोंसे भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्हीं बताओ, जब इनकी यह दशा है तो दूसरे

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* शक्तिस्तोत्राणि * ५७ घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै-विशिष्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः । तथा ते सौन्दर्य परमशिवदृङ्मात्रविषयः कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे ॥ २ ॥

मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता । स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥ ३ ॥

विराजन्मन्दारद्रुमकुसुमहारस्तनतटी नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कुण्डलगुणा किसीको और किस प्रकार तुम्हारी स्तुतिका अवसर प्राप्त हो सकता है? ॥ १ ॥ घी, दूध, दाख और मधुकी मधुरताको किसी भी शब्दसे

विशेषरूपसे नहीं बताया जा सकता, उसे तो केवल रसना ( जिह्वा ) ही जानती है । इसी प्रकार तुम्हारा सौन्दर्य केवल महादेवजीके नेत्रोंका ही विषय है, उसे हम क्योंकर बतावें? हे देवि! तुम्हारे गुणोंका वर्णन तो सारे वेद भी नहीं कर सकते ॥ २ ॥ तुम्हारे मुखमें पान है, नेत्रोंमें काजलकी पतली

रेखा है, ललाटमें केसरकी बेंदी है, गलेमें मोतीका हार सुशोभित हो रहा है, कटिके निम्नभागमें सुनहली साड़ी है, जिसपर रत्नमयी मेखला ( करधनी ) चमक रही है, ऐसी वेष - भूषासे सजी हुई गिरिराज हिमालयकी कन्या तुमको मैं सदा ही भजता हूँ ॥ ३ ॥ जहाँ पारिजात - पुष्पकी

गौरवर्णा हो रही है, उन उरोजोंके समीप बजती हुई वीणाका मधुर माला सुशोभित कानोंमें कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जिनका अङ्ग नाद श्रवण करते हुए जिनके

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५८ * स्तोत्ररत्नावली * नताङ्गी मातङ्गीरुचिरगतिभङ्गी भगवती सती शम्भोरम्भोरुहचटुलचक्षुर्विजयते ॥ ४ ॥

नवीनार्कभ्राजन्मणिकनकभूषापरिकरै-वृताङ्गी सारङ्गीरुचिरनयनाङ्गीकृतशिवा । तडित्पीता पीताम्बरललितमञ्जीरसुभगा ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ॥ ५ ॥

हिमाद्रेः संभूता सुललितकरैः पल्लवयुता सुपुष्पा मुक्ताभिर्भ्रमरकलिता चालकभरैः । कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्तिसरसा रुजां हन्त्री गन्त्री विलसति चिदानन्दलतिका ॥ ६ ॥

झुका हुआ है, हथिनीकी भाँति जिनकी मन्द - मनोहर चाल है, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर और चञ्चल हैं, वे शम्भुकी सती भार्या भगवती उमा सर्वत्र विजयिनी हो रही हैं ॥ ४ ॥ जिनका अङ्ग नवोदित बाल रविके समान

देदीप्यमान मणि और सोनेके आभूषणोंसे अलङ्कृत है, मृगीके समान जिनके विशाल एवं सुन्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिवको पतिरूपसे स्वीकार किया है, बिजलीके समान जिनकी पीत प्रभा है, जो पीत वस्त्रकी प्रभा पड़नेसे और अधिक सुन्दर प्रतीत होनेवाले मञ्जीरको चरणोंमें धारण करके सुशोभित हो रही हैं, वे निरतिशय आनन्दसे पूर्ण भगवती अपर्णा मुझपर सुप्रसन्न हों ॥ ५ ॥

समस्त रोगोंको नष्ट करनेवाली एक चलती - फिरती चिदानन्दमयी लता ( उमा ) सुशोभित हो रही है, वह हिमालयसे उत्पन्न हुई है, सुन्दर हाथ ही उसके पल्लव हैं, मुक्ताका हार ही सुन्दर फूल है, काली - काली अलकें भ्रमरोंकी भाँति उसे आच्छन्न किये हुई हैं, स्थाणु ( शङ्करजी अथवा ठूंठ वृक्ष ) ही उसके रहनेका आश्रय है, उरोजरूपी फलोंके भारसे वह झुकी हुई है और

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( * शक्तिस्तोत्राणि * ५ ९ 5555555 सपर्णामाकीर्णां कतिपयगुणैः कतिपयगुणैः सादरमिह श्रयन्त्यन्ये वल्लीं मम तु मतिरेवं विलसति । अपर्णैका सेव्या जगति सकलैर्यत्परिवृतः पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किल कैवल्यपदवीम् ॥ ७ ॥

विधात्री धर्माणां त्वमसि सकलाम्नायजननी त्वमर्थानां मूलं धनदनमनीयाङ्घ्रिकमले । त्वमादिः कामानां जननि कृतकन्दर्पविजये सतां मुक्तेर्बीजं त्वमसि परमब्रह्ममहिषी ॥ ८ ॥

प्रभूता भक्तिस्ते यदपि न ममालोलमनस-स्त्वया तु श्रीमत्या सदयमवलोक्योऽहमधुना । पयोदः पानीयं दिशति मधुरं चातकमुखे भृशं शङ्के कैर्वा विधिभिरनुनीता मम मतिः ॥ ९ ॥

सुन्दर वाणीरूपी रससे भरी है || ६ || दूसरे लोग कुछ ही गुणोंसे युक्त सपर्णा ( पत्तेवाली ) लताका आदरपूर्वक सेवन करते हैं, परन्तु हमारी बुद्धि तो इस प्रकार स्फुरित होती है कि इस जगत्में सभी लोगोंको एकमात्र अपर्णा ( पार्वती या बिना पत्तेकी लता ) का ही सेवन करना चाहिये, जिससे आवृत पुराना स्थाणु ( ठूंठ वृक्ष अथवा शिव ) भी कैवल्यपदवी ( मोक्ष ) रूप होकर फल देता है ॥ ७॥ सम्पूर्ण धर्मोकी सृष्टि करनेवाली और समस्त आगमोंको

जन्म देनेवाली तुम्हीं हो । हे देवि! कुबेर भी तुम्हारे चरणोंकी वन्दना करते समस्त वैभवका मूल हो । हे कामदेवपर विजय पानेवाली माँ! हैं, तुम्हीं आदि कारण भी तुम्हीं हो । तुम परब्रह्मस्वरूप महेश्वरकी कामनाओंकी हो । अतः तुम्हीं संतोंके मोक्षका बीज हो ॥ ८ ॥ मेरा मन चञ्चल

पटरानी यद्यपि मैंने आपकी प्रचुर भक्ति नहीं की है तथापि आप है, इसलिये

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६० * स्तोत्ररत्नावली * ******** 5555555 ************* 5555555555 कृपापाङ्गालोकं वितर तरसा साधुचरिते न ते युक्तोपेक्षा मयि शरणदीक्षामुपगते । न चेदिष्टं दद्यादनुपदमहो कल्पलतिका विशेषः सामान्यैः कथमितरवल्लीपरिकरैः ॥ १० ॥

महान्तं विश्वासं तव चरणपङ्केरुहयुगे निधायान्यन्नैवाश्रितमिह मया दैवतमे । तथापि त्वच्चेतो यदि मयि न जायेत सदयं निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ११ ॥

अयः स्पर्शे लग्नं सपदि लभते हेमपदवीं यथा रथ्यापाथः शुचि भवति गङ्गौघमिलितम् । श्रीमतीको इस समय मुझपर अवश्य ही दया - दृष्टि करनी चाहिये । चातक चाहे प्रेम करे या न करे, पर मेघ तो उसके मुखमें मधुर जल गिराता ही है अथवा मुझे बड़ी शङ्का हो रही है कि मेरी बुद्धि किन - किन विधियोंसे आपमें अनुनीत हो, आपकी ओर लगे ॥ ९ ॥ हे साधु चरित्रोंवाली मा! तुम बहुत शीघ्र अपनी

कृपाकटाक्षयुक्त दृष्टिसे मुझे निहारो । मैं तुम्हारी शरणकी दीक्षा ले चुका हूँ, अब मेरी उपेक्षा करना उचित नहीं है । यदि कल्पलता पग - पगपर अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति न कर सके तो अन्य साधारण लताओंसे उसमें विशेषता ही कैसे रह सकती है? ॥ १० ॥ हे लम्बोदर गणेशको जन्म देनेवाली उमे!

मैंने तुम्हारे युगल चरणारविन्दोंमें बहुत बड़ा विश्वास रखकर किसी अन्य देवताका आश्रय नहीं लिया, तथापि यदि तुम्हारा चित्त मुझपर सदय न हो तो अब मैं किसकी शरण जाऊँगा? ॥ ११ ॥ जिस प्रकार लोहा पारससे छू

जानेपर तत्काल सोना बन जाता है और गलियों [ के नाले ] का जल गङ्गाजीमें