स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 71–80

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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* शक्तिस्तोत्राणि * ६१ तथा तत्तत्पापैरतिमलिनमन्तर्मम यदि त्वयि प्रेम्णासक्तं कथमिव न जायेत विमलम् ॥ १२ ॥

त्वदन्यस्मादिच्छाविषयफललाभे न नियम-स्त्वमर्थानामिच्छाधिकमपि समर्था वितरणे । इति प्राहुः प्राञ्चः कमलभवनाद्यास्त्वयि मन-स्त्वदासक्तं नक्तं दिवमुचितमीशानि कुरु तत् ॥ १३ ॥

स्फुरन्नानारत्नस्फटिकमयभित्तिप्रतिफल-त्वदाकारं चञ्चच्छशधरकलासौधशिखरम् । विजयते मुकुन्दब्रह्मेन्द्रप्रभृतिपरिवारं तवागारं रम्यं त्रिभुवनमहाराजगृहिणि ॥ १४ ॥

निवासः कैलासे विधिशतमखाद्याः स्तुतिकराः कुटुम्बं त्रैलोक्यं कृतकरपुटः सिद्धिनिकरः । पड़कर पवित्र हो जाता है उसी प्रकार भिन्न - भिन्न पापोंसे मलिन हुआ मेरा यदि प्रेमपूर्वक तुममें आसक्त हो गया तो वह कैसे निर्मल नहीं होगा अन्तःकरण ? ॥ १२ ॥ हे ईशानि! तुमसे अन्य किसी देवतासे मनोवाञ्छित फल

प्राप्त हो ही जाय, ऐसा नियम नहीं है, परन्तु तुम तो पुरुषोंको उनकी इच्छासे अधिक वस्तु भी देनेमें समर्थ हो - इस प्रकार ब्रह्मादि प्राचीन पुरुष कहा करते हैं । इसलिये अब मेरा मन रात - दिन तुममें ही लगा रहता है, अब तुम जो समझो करो ॥ १३ ॥ हे त्रिभुवनमहाराज शिवकी गृहिणी शिवे! जहाँ

उचित रत्न और स्फटिकमणिकी भीतपर तुम्हारा आकार प्रतिबिम्बित हो नाना प्रकारके शिखरपर प्रतिबिम्बित होकर चन्द्रमाकी कला रहा है, जिसकी अट्टालिकाके और इन्द्र आदि देवता जिसे घेरकर खड़े सुशोभित हो रही है, विष्णु, ब्रह्मा हो रहा है ॥ १४॥ हे

रहते हैं, वह तुम्हारा रमणीय भवन विजयी आदि तुम्हारी ! तुम्हारा कैलासमें निवास है, ब्रह्मा और इन्द्र गिरिराजनन्दिनि

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६२ * स्तोत्ररत्नावली * महेशः प्राणेशस्तदवनिधराधीशतनये न ते सौभाग्यस्य क्वचिदपि मनागस्ति तुलना ॥ १५ ॥

वृषो वृद्धो यानं विषमशनमाशा निवसनं श्मशानं क्रीडाभूर्भुजगनिवहो भूषणविधिः । समग्रा सामग्री जगति विदितैवं स्मररिपो-र्यदेतस्यैश्वर्यं तव जननि सौभाग्यमहिमा ॥ १६ ॥

अशेषब्रह्माण्डप्रलयविधिनैसर्गिकमतिः श्मशानेष्वासीनः कृतभसितलेपः पशुपतिः । दधौ कण्ठे हालाहलमखिलभूगोलकृपया भवत्याः संगत्याः फलमिति च कल्याणि कलये ॥ १७ ॥

त्वदीयं सौन्दर्यं निरतिशयमालोक्य परया भियैवासीद्गङ्गा जलमयतनुः शैलतनये । स्तुति किया करते हैं, समस्त त्रिभुवन ही तुम्हारा कुटुम्ब है, आठों सिद्धियोंका समुदाय तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है और महेश्वर तुम्हारे प्राणनाथ हैं; तुम्हारे सौभाग्यकी कहीं अल्प भी तुलना नहीं हो सकती ॥ १५ ॥ हे जननि! कामारि शिवका बूढ़ा बैल ही वाहन है, विष ही

भोजन है, दिशाएँ ही वस्त्र हैं; श्मशान ही रङ्गभूमि है और साँप ही आभूषणका काम देते हैं; उनकी यह सारी सामग्री संसारमें प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनके पास ऐश्वर्य है, वह तुम्हारे ही सौभाग्यकी महिमा है ॥ १६ ॥ हे

कल्याणि! जिनकी बुद्धि स्वभावतः समस्त ब्रह्माण्डका संहार करनेमें ही प्रवृत्त होती है, जो अङ्गोंमें राख पोतकर श्मशानमें बैठे रहते हैं, [ ऐसे निठुर स्वभाववाले ] पशुपतिने जो समस्त भूमण्डलपर दया करके कण्ठमें हालाहल विष धारण कर लिया, उसे मैं आपके सत्संगका ही फल समझता हूँ ॥ १७ ॥

हे शैलनन्दिनि! आपके सर्वोत्कृष्ट सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त भयके

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* शक्तिस्तोत्राणि * * ६३ 999999999 ******** तदेतस्यास्तस्माद्वदनकमलं वीक्ष्य कृपया प्रतिष्ठामातन्वन्निजशिरसिवासेन गिरिशः ॥ १८ ॥

विशालश्रीखण्डद्रवमृगमदाकीर्णघुसृण-प्रसूनव्यामिश्रं भगवति तवाभ्यङ्गसलिलम् । समादाय स्रष्टा चलितपदपांसून्निजकरैः समाधत्ते सृष्टिं विबुधपुरपङ्केरुहदृशाम् ॥ १ ९ ॥ वसन्ते सानन्दे कुसुमितलताभिः परिवृते स्फुरन्नानापमे सरसि कलहंसालिसुभगे । सखीभिः खेलन्तीं मलयपवनान्दोलितजले स्मरेद्यस्त्वां तस्य ज्वरजनितपीडापसरति ॥ २० ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता आनन्दलहरी सम्पूर्णा । कारण ही गङ्गाजीने जलमय शरीर धारण कर लिया, इससे गङ्गाजीके दीन मुखकमलको देखकर दयावश शङ्करजी उन्हें अपने सिरपर निवास देकर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं ॥ १८ ॥ हे भगवति! जिसमें विशाल चन्दनके रस, कस्तूरी और

सर फूल मिले हुए हैं ऐसे तुम्हारे अनुलेपनके जलको और चलते हुए तुम्हारे चरणोंकी धूलिको ही लेकर ब्रह्माजी सुरपुरकी कमलनयनी वनिताओं ( अप्सराओं ) की सृष्टि करते हैं ॥ १ ९ ॥ हे देवि! वसन्त ऋतुमें खिली हुई लताओंसे मण्डित, नाना कमलोंसे सुशोभित एवं हंसोंकी मण्डलीसे अलङ्कृत सरोवरके भीतर, जहाँका जल मलयानिलसे आन्दोलित हो रहा है, [ उसमें ] सखियोंके साथ क्रीडा करती हुई आपका जो पुरुष ध्यान करता है, उसकी ज्वर - रोगजनित पीड़ा दूर हो जाती है ॥ २० ॥

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६४ * स्तोत्ररत्नावली * २३ - श्रीभगवतीस्तोत्रम्

जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।

जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे, प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ॥ १ ॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे, जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।

जय भैरवदेहनिलीनपरे, जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ॥ २ ॥

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे, जय लोकसमस्तकपापहरे ।

जय देवि पितामहविष्णुनते, जय भास्करशक्रशिरोऽवनते ॥ ३ ॥

जय षण्मुखसायुधईशनुते, जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।

जय दुःखदरिद्रविनाशकरे, जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ॥ ४ ॥

हे वरदायिनी देवि! हे भगवति! तुम्हारी जय हो । हे पापोंको नष्ट करनेवाली और अनन्त फल देनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो! हे शुम्भ-निशुम्भके मुण्डोंको धारण करनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो । हे मनुष्यों की पीड़ा हरनेवाली देवि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥ हे सूर्य - चन्द्रमारूपी

नेत्रोंको धारण करनेवाली! तुम्हारी जय हो । हे अग्निके समान देदीप्यमान मुखसे शोभित होनेवाली! तुम्हारी जय हो । हे भैरव - शरीरमें लीन रहनेवाली और अन्धकासुरका शोषण करनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो ॥ २ ॥

हे महिषासुरका मर्दन करनेवाली, शूलधारिणी और लोकके समस्त पापोंको दूर करनेवाली भगवति! तुम्हारी जय हो । ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और इन्द्रसे नमस्कृत होनेवाली हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो ॥ ३ ॥ सशस्त्र शङ्कर और

कार्तिकेयजीके द्वारा वन्दित होनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो । शिवके द्वारा प्रशंसित एवं सागरमें मिलनेवाली गङ्गारूपिणी देवि! तुम्हारी जय हो । दुःख और दरिद्रताका नाश तथा पुत्र - कलत्रकी वृद्धि करनेवाली हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो ॥ ४ ॥

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* शक्तिस्तोत्राणि * ६५

जय देवि समस्तशरीरधरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।

जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे, जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे ॥ ५ ॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः ।

गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ॥ ६ ॥

इति व्यासकृतं श्रीभगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् । २४ - महालक्ष्म्यष्टकम् इन्द्र उवाच

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।

महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥

शङ्खचक्रगदाहस्ते

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि ।

सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥

हे देवि! तुम्हारी जय हो । तुम समस्त शरीरोंको धारण करनेवाली, स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाली और दुःखहारिणी हो । हे व्याधिनाशिनी देवि! तुम्हारी जय हो । मोक्ष तुम्हारे करतलगत है, हे मनोवाञ्छित फल देनेवाली अष्ट सिद्धियोंसे सम्पन्न परा देवि! तुम्हारी जय हो ॥ ५ ॥ जो कहीं भी रहकर पवित्र

भावसे नियमपूर्वक इस व्यासकृत स्तोत्रका पाठ करता है अथवा शुद्ध भावसे ही पाठ करता है, उसके ऊपर भगवती सदा ही प्रसन्न रहती हैं ॥ ६ ॥

घरपर बोले— श्रीपीठपर स्थित और देवताओंसे पूजित होनेवाली हे इन्द्र । तुम्हें नमस्कार है । हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाली हे महामाये! तुम्हें प्रणाम है ॥ १ ॥ गरुड़पर आरूढ़ हो कोलासुरको भय

महालक्ष्मि

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६६ * स्तोत्ररत्नावली *

सर्वज्ञे FKKKKKKKK सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।

सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।

मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।

योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।

महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।

परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते ।

जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥

देनेवाली और समस्त पापोंको हरनेवाली हे भगवति महालक्ष्मि! तुम्हें प्रणाम है ॥ २ ॥ सब कुछ जाननेवाली, सबको वर देनेवाली, समस्त दुष्टोंको भय

देनेवाली और सबके दुःखोंको दूर करनेवाली, हे देवि महालक्ष्मि! तुम्हें नमस्कार है ॥ ३ ॥ सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देनेवाली हे मन्त्रपूत भगवति

महालक्ष्मि! तुम्हें सदा प्रणाम है ॥ ४ ॥ हे देवि! हे आदि - अन्त - रहित

आदिशक्ते! हे महेश्वरि! हे योगसे प्रकट हुई भगवति महालक्ष्मि! तुम्हें नमस्कार है ॥ ५॥ हे देवि! तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो,

महाशक्ति हो, महोदरा हो और बड़े - बड़े पापोंका नाश करनेवाली हो । हे देवि महालक्ष्मि! तुम्हें नमस्कार है ॥ ६ ॥ हे कमलके आसनपर विराजमान

परब्रह्मस्वरूपिणी देवि! हे परमेश्वरि! हे जगदम्ब! हे महालक्ष्मि! तुम्हें मेरा प्रणाम है ॥ ७ ॥ हे देवि तुम श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली और नाना प्रकारके

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* शक्तिस्तोत्राणि * ६७

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥ ९ ॥

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।

द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥ १० ॥

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥ ११ ॥

इतीन्द्रकृतं महालक्ष्म्यष्टकं सम्पूर्णम् । २५ - श्रीसरस्वतीस्तोत्रम् या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । आभूषणोंसे विभूषिता हो । सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोकको जन्म देनेवाली हो । हे महालक्ष्मि! तुम्हें मेरा प्रणाम है ॥ ८ ॥ जो मनुष्य भक्तियुक्त

होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्रका सदा पाठ करता है, वह सारी सिद्धियों और राज्यवैभवको प्राप्त कर सकता है ॥ ९ ॥ जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता

है, उसके बड़े - बड़े पापोंका नाश हो जाता है । जो दो समय पाठ करता है, वह धन - धान्यसे सम्पन्न होता है ॥ १० ॥ जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता

है उसके महान् शत्रुओंका नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं ॥ ११ ॥

कुन्दके फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हारके समान श्वेत हैं, जो शुभ्र कपड़े पहनती जो हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणासे सुशोभित हैं, जो श्वेत कमलासनपर

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६८ * स्तोत्ररत्नावली * या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ १ ॥

आशासु राशीभवदङ्गवल्ली-भासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम् । मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देऽरविन्दासनसुन्दरि त्वाम् ॥ २ ॥

शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।

सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥ ३ ॥

सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम् ।

देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः ॥ ४ ॥

पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्नः सरस्वती ।

प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ॥ ५ ॥

बैठती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकारकी जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें ॥ १ ॥

हे कमलपर बैठनेवाली सुन्दरी सरस्वति! तुम सब दिशाओंमें पुञ्जीभूत हुई अपनी देहलताकी आभासे ही क्षीर - समुद्रको दास बनानेवाली और मन्द मुसकानसे शरदऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत करनेवाली हो, तुमको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २॥ शरत्कालमें उत्पन्न कमलके समान मुखवाली और सब

मनोरथोंको देनेवाली शारदा सब सम्पत्तियोंके साथ मेरे मुखमें सदा निवास करें ॥ ३ ॥ उन वचनकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीको प्रणाम करता हूँ, जिनकी

कृपासे मनुष्य देवता बन जाता है ॥ ४ ॥ बुद्धिरूपी सोनेके लिये कसौटीके

समान सरस्वतीजी, जो केवल वचनसे ही विद्वान् और मूर्खोकी परीक्षा कर देती हैं, हमलोगोंका पालन करें ॥ ५ ॥

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शक्तिस्तोत्राणि: * ६ ९ ££££££ ***** शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ ६ ॥

वीणाधरे विपुलमङ्गलदानशीले भक्तार्तिनाशिनि विरञ्चिहरीशवन्द्ये । कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महा विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ७ ॥

श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे श्वेताम्बरावृतमनोहरमञ्जुगात्रे उद्यन्मनोज्ञसितपङ्कजमञ्जुलास्ये विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ८ ॥

जिनका रूप श्वेत है, जो ब्रह्मविचारकी परम तत्त्व हैं, जो सब संसारमें फैल रही हैं, जो हाथोंमें वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अन्धकारको दूर करती हैं, हाथमें स्फटिकमणिकी माला लिये रहती हैं, कमलके आसनपर विराजमान होती हैं और बुद्धि देनेवाली हैं, उन परमेश्वरी भगवती सरस्वतीकी वन्दना करता हूँ ॥ ६ ॥ हे वीणा धारण

आद्या, अपार मङ्गल देनेवाली, भक्तोंके दुःख छुड़ानेवाली, ब्रह्मा, विष्णु करनेवाली और शिवसे वन्दित होनेवाली, कीर्ति तथा मनोरथ देनेवाली, पूज्यवरा और सरस्वति! तुमको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ हे श्वेत

विद्या देनेवाली विराजनेवाली, श्वेत वस्त्रोंसे ढके सुन्दर कमलोंसे भरे हुए निर्मल आसनपर मुखवाली और विद्या शरीरवाली, खुले हुए सुन्दर श्वेत कमलके समान मञ्जुल

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७० * स्तोत्ररत्नावली * मातस्त्वदीयपदपङ्कजभक्तियुक्ता ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय । ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण भूवह्निवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन ॥ ९ ॥

मोह्मन्धकारभरिते हृदये मदीये मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे । स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभिः शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥ १० ॥

ब्रह्मा जगत् सृजति पालयतीन्दिरेशः शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावैः । न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे न स्युः कथञ्चिदपि ते निजकार्यदक्षाः ॥ ११ ॥

देनेवाली सरस्वति! तुमको नित्य प्रणाम करता हूँ! ॥ ८ ॥ हे मातः! जो

( मनुष्य ) तुम्हारे चरण - कमलोंमें भक्ति रखकर और सब देवताओंको छोड़कर तुम्हारा भजन करते हैं, वे पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश और जल- - इन पाँच तत्त्वोंके बने शरीरसे ही देवता बन जाते हैं ॥ ९ ॥ हे उदार बुद्धिवाली माँ!

मोहरूपी अन्धकारसे भरे मेरे हृदयमें सदा निवास करो और अपने सब अङ्गोंकी निर्मल कान्तिसे मेरे मनके अन्धकारका शीघ्र नाश करो ॥ १० ॥ हे

देवि! तुम्हारे ही प्रभावसे ब्रह्मा जगत्‌को बनाते हैं, विष्णु पालते हैं और शिव विनाश करते हैं; हे प्रकट प्रभावशाली! यदि इन तीनोंपर तुम्हारी कृपा न हो, तो वे किसी प्रकार अपना काम नहीं कर सकते ॥ ११ ॥