स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 81–90
स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
पृष्ठ 81
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* शक्तिस्तोत्राणि * ७१ ******
लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिगौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः ।
एताभिः पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ॥ १२ ॥
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः ।
वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च ॥ १३ ॥
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥
यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ १५ ॥
इति श्रीसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् । $ २६ - देव्या आरात्रिकम् प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्ये पारावारविहारिणि नारायणि हृद्ये । हे सरस्वति! लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा, धृति – इन आठ मूर्तियोंसे मेरी रक्षा करो ॥ १२ ॥ सरस्वतीको नित्य नमस्कार है,
भद्रकालीको नमस्कार है और वेद, वेदान्त, वेदाङ्ग तथा विद्याओंके स्थानोंको प्रणाम है || १३ || हे महाभाग्यवती ज्ञानस्वरूपा कमलके समान विशाल नेत्रवाली, ज्ञानदात्री सरस्वति! मुझको विद्या दो, मैं तुमको प्रणाम करता हूँ ॥ १४॥ हे देवि! जो अक्षर, पद अथवा मात्रा छूट गयी हो, उसके लिये
क्षमा करो और हे परमेश्वरि! प्रसन्न रहो ॥ १५ ॥
, वेदोंसे प्रतिपादित, क्षीरसागरविहारिणी, हे प्रवरानदीतीरवासिनी
पृष्ठ 82
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७२ * स्तोत्ररत्नावली * प्रपञ्चसारे जगदाधारे श्रीविद्ये FFFFF ********* प्रपन्नपालननिरते KKKKKKKKKKKKKKK मुनिवृन्दाराध्ये ॥ १ ॥
जय देव जय देव जय मोहनरूपे ********* मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे ॥ ध्रुवपदम् ॥ दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदने पदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने । विकसितपङ्कजनयने पन्नगपतिशयने खगपतिवहने गहने सङ्कटवनदहने ॥ जय देवि ० ॥ २ ॥
मञ्जीराङ्कितचरणे मणिमुक्ताभरणे कञ्चुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्बुजधरणे । शक्रामयभयहरणे भूसुरसुखकरणे करुणां कुरु मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ॥जय देवि ० ॥ ३ ॥
नारायणप्रिया, मनोहारिणी, संसारकी सार और आधाररूपिणी, लक्ष्मी और विद्यास्वरूपिणी, शरणागतकी रक्षामें तत्पर, मुनिगणोंसे आराधित हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! हे मनोहर रूपवाली! तुम्हारी जय हो! हे मातः! इस संसारकूपमें पड़े हुए मेरा उद्धार करो ॥ १ ॥ पूर्णचन्द्रके समान दिव्य
मुखवाली, कुन्दपुष्पके - से स्वच्छ दाँतोंवाली, अपने पैरोंकी नख - ज्योतिसे मदनको पराजित करनेवाली, मधुकैटभका संहार करनेवाली, प्रफुल्लित कमल - समान नेत्रोंवाली, शेषशायिनी, गरुडवाहिनी, दुराराध्या, सङ्कटवनको भस्म करनेवाली ( हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! ) ॥ २ ॥ चरणोंमें नूपुर
धारण करनेवाली, मणि और मोतियोंके आभूषण धारण करनेवाली, चोली और वस्त्रोंसे सुसज्जित, कमलमुखी, इन्द्रके विघ्न - बाधाओंको दूर करनेवाली,
पृष्ठ 83
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* • शक्तिस्तोत्राणि * ७३ छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान् ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान् । विहरसि दानवऋद्धान् समरे संसिद्धान्
मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् । जय देवि ० ॥ ४ ॥
इति देव्या आरात्रिकं समाप्तम् । ब्राह्मणोंके लिये आनन्ददायिनी, गज और ग्राहका उद्धार करनेवाली हे देवि! मुझ शरणागतपर कृपा करो । ( हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! ) ॥ ३ ॥ तुम राहुकी ग्रीवा काटकर देवोंकी रक्षा करती हो, असुरोंको
उनकी इच्छाके विपरीत मृत्यु और देवताओंको अमृत देती हो, युद्धकुशल और वीर दैत्योंसे रण - क्रीडा करानेवाली हो । हे मध्वमुनीश्वरको वर देनेवाली! भक्तोंका पालन करो । ( हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! ) ॥ ४ ॥
पृष्ठ 84
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विष्णुस्तोत्राणि २७ - श्रीनारायणाष्टकम् वात्सल्यादभयप्रदानसमयादार्तार्तिनिर्वापणा-दौदार्यादघशोषणादगणितश्रेयःपदप्रापणात् सेव्यः श्रीपतिरेक एव जगतामेतेऽभवन्साक्षिणः प्रह्लादश्च विभीषणश्च करिराट् पाञ्चाल्यहल्या ध्रुवः ॥ १ ॥
प्रह्लादास्ति यदीश्वरो वद हरिः सर्वत्र मे दर्शय स्तम्भे चैवमिति ब्रुवन्तमसुरं तत्राविरासीद्धरिः । वक्षस्तस्य विदारयन्निजनखैर्वात्सल्यमापादय-न्नार्तत्राणपरायणः स भगवान्नारायणो मे गतिः ॥ २ ॥
अति वात्सल्यमय होनेके कारण, भयभीतोंको अभयदान देनेका स्वभाव होनेके कारण, दुःखी पुरुषोंका दुःख हरनेके कारण, अति उदार और पापनाशक होनेके कारण और अन्य अगणित कल्याणमय पदों ( श्रेयों ) की प्राप्ति करा देनेके कारण सारे जगत्के लिये भगवान् लक्ष्मीपति ही सेवनीय हैं; क्योंकि प्रह्लाद, विभीषण, गजराज, द्रौपदी, अहल्या और ध्रुव — ये ( क्रमसे ) इन कार्योंमें साक्षी हैं ॥ १ ॥ ' अरे प्रह्लाद! यदि तू कहता है कि ईश्वर सर्वत्र
है तो मुझे खम्भेमें दिखा ' – दैत्य हिरण्यकशिपुके ऐसा कहते ही वहाँ भगवान् आविर्भूत हो गये और अपने नखोंसे उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण करके अपना
पृष्ठ 85
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* विष्णुस्तोत्राणि * ७५ श्रीरामात्र विभीषणोऽयमनघो रक्षोभयादागतः
सुग्रीवानय पालयैनमधुना पौलस्त्यमेवागतम् ।
इत्युक्त्वाभयमस्य सर्वविदितं यो राघवो दत्तवानार्त ० ॥ ३ ॥
नक्रग्रस्तपदं समुद्धृतकरं ब्रह्मादयो भो सुराः
पाल्यन्तामिति दीनवाक्यकरिणं देवेष्वशक्तेषु यः ।
मा भैषीरिति यस्य नक्रहनने चक्रायुधः श्रीधर । आर्त ॥ ४ ॥
भो कृष्णाच्युत भो कृपालय हरे भो पाण्डवानां सखे
क्वासि क्वासि सुयोधनादपहृतां भो रक्ष मामातुराम् ।
इत्युक्तोऽक्षयवस्त्रसं भृततनुं योऽपालयद्द्रौपदीमार्त ॥ ५ ॥
वात्सल्य प्रकट किया । ऐसे दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥ २ ॥ ' हे श्रीरामजी! यह निष्पाप विभीषण राक्षस रावणके भयसे
आया है — यह सुनते ही सुग्रीव! उस पुलस्त्य ऋषिके पौत्रको तुरंत ले आओ और उसकी रक्षा करो ' – ऐसा कहकर जैसा अभयदान श्रीरघुनाथजीने उसे दिया वह सबको विदित ही है; वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं || ३ || ग्राहद्वारा पाँव पकड़ लिये जानेपर सूँड़ उठाकर ‘ हे ब्रह्मा आदि देवगण! मेरी रक्षा करो । ' - इस प्रकार दीनवाणीसे पुकारते हुए गजेन्द्रकी रक्षामें देवताओंको असमर्थ देखकर ' मत डर ' ऐसा कहकर जिन श्रीधरने ग्राहका वध करनेके लिये सुदर्शनचक्र उठा लिया, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं ॥ ४ ॥ ' हे कृष्ण! हे
अच्युत! हे कृपालो! हे हरे! हे पाण्डवसखे! तुम कहाँ हो? कहाँ हो? दुर्योधनद्वारा लूटी गयी मुझ आतुराकी रक्षा करो! रक्षा करो!! ' - इस प्रकार प्रार्थना करनेपर जिसने अक्षयवस्त्रसे द्रौपदीका शरीर ढककर उसकी रक्षा, की, उद्धार करनेमें तत्पर भगवान् नारायण मेरी गति हैं ॥ ५ ॥
वह दुःखियोंका
पृष्ठ 86
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६ * स्तोत्ररत्नावली * ********** यत्पादाब्जनखोदकं त्रिजगतां पापौघविध्वंसनं
यन्नामामृतपूरकं च पिबतां संसारसन्तारकम् ।
पाषाणोऽपि यदङ्घ्रिपद्मरजसा शापान्मुनेर्मोचित । आर्त ॥ ६ ॥
पित्रा भ्रातरमुत्तमासनगतं चौत्तानपादिर्ध्रुवो
दृष्ट्वा तत्सममारुरुक्षुरधृतो मात्रावमानं गतः ।
यं गत्वा शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासनमार्तः ॥ ७ ॥
आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति ॥ ८ ॥
इति श्रीकूरेशस्वामिविरचितं श्रीनारायणाष्टकं सम्पूर्णम् । जिनके चरणकमलोंके नखोंकी धोवन श्रीगङ्गाजी त्रिलोकीके पापसमूहको ध्वंस करनेवाली हैं, जिनका नामामृतसमूह पान करनेवालोंको संसार - सागरसे पार करनेवाला है तथा जिनके पादपद्मोंकी रजसे पाषाण भी मुनिशापसे मुक्त हो गया, वे दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं || ६ || अपने भाईको पिताके साथ उत्तम राजसिंहासनपर बैठा देख उत्तानपादके पुत्र ध्रुव जब स्वयं ही उसपर चढ़ना चाहा तो पिताने उसे अङ्कमें नहीं लिया और विमाताने भी उसका अनादर किया, उस समय जिनकी शरण जाकर उसने तपके द्वारा सुमेरुगिरिके राजसिंहासनकी प्राप्ति की, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं ॥ ७ ॥ जो पीड़ित हैं, विषादयुक्त हैं, शिथिल
( निराश ) हैं, भयभीत हैं अथवा किसी भी घोर आपत्तिमें पड़े हुए हैं, वे ‘ नारायण ' शब्दके संकीर्तनमात्रसे दुःखसे मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं ॥ ८ ॥
पृष्ठ 87
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* विष्णुस्तोत्राणि * ७७ २८ - श्रीकमलापत्यष्टकम्
भुजगतल्पगतं घनसुन्दरं गरुडवाहनमम्बुजलोचनम् ।
नलिनचक्रगदाकरमव्ययं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ १ ॥
अलिकुलासितकोमलकुन्तलं विमलपीतदुकूलमनोहरम् ।
जलधिजाङ्कितवामकलेवरं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ २ ॥
किमु जपैश्च तपोभिरुताध्वरैरपि किमुत्तमतीर्थनिषेवणैः ।
किमुत शास्त्रकदम्बविलोकनैर्भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ ३ ॥
मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लभं समधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम् ।
विषयलम्पटतामपहाय वै भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ ४ ॥
न वनिता न सुतो न सहोदरो न हि पिता जननी न च बान्धवः ।
व्रजति साकमनेन जनेन वै भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ ५ ॥
रे मनुष्यो! जो शेषशय्यापर पौढ़े हुए हैं, नीलमेघ -सदृश श्याम - सुन्दर हैं, गरुड़ जिनका वाहन है और जिनके कमल - जैसे नेत्र हैं, उन शङ्ख-चक्र - गदा - पद्मधारी अव्यय श्रीकमलापतिको भजो ॥ १ ॥ भौंरोंके समान
जिनकी काली - काली कोमल अलकें हैं, अति निर्मल सुन्दर पीताम्बर है और जिनके वामाङ्कमें श्रीलक्ष्मीजी सुशोभित हैं, रे मनुष्यो! उन श्रीकमलापतिको भजो ॥ २ ॥ जप, तप, यज्ञ अथवा उत्तम - उत्तम तीर्थोंके सेवनमें क्या रखा है?
अथवा अधिक शास्त्रावलोकनके पचड़ेमें पड़नेसे ही क्या होना है? रे मनुष्यो बस श्रीकमलापतिको ही भजो ॥ ३ ॥ इस संसारमें यह मनुष्य - शरीर अति
दुर्लभ और देवगणोंसे भी वाञ्छित है — ऐसा जानकर विषय - लम्पटताको त्याग कर रे मनुष्यो! श्रीकमलापतिको भजो ॥४ ॥ इस जीवके साथ स्त्री,
पुत्र, भाई, पिता, माता और बन्धुजन कोई भी नहीं जाता, अतः रे मनुष्यो!
पृष्ठ 88
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७८ E स्तोत्ररत्नावली * KK
सकलमेव चलं सचराचरं जगदिदं सुतरां धनयौवनम् ।
समवलोक्य विवेकदृशा द्रुतं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ ६ ॥
विविधरोगयुतं क्षणभङ्गरं परवशं नवमार्गमलाकुलम् ।
परिनिरीक्ष्य शरीरमिदं स्वकं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ ७ ॥
मुनिवरैरनिशं हृदि भावितं शिवविरिञ्चिमहेन्द्रनुतं सदा ।
मरणजन्मजराभयमोचनं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥ ८ ॥
हरिपदाष्टकमेतदनुत्तमं परमहंसजनेन समीरितम् ।
पठति यस्तु समाहितचेतसा व्रजति विष्णुपदं स नरो ध्रुवम् ॥ ९ ॥
इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीकमलापत्यष्टकं सम्पूर्णम् । श्रीकमलापतिको भजो ॥ ५ ॥ यह सचराचर जगत्, धन और यौवन सभी
अत्यन्त अस्थिर हैं — ऐसा विवेकदृष्टिसे देखकर रे मनुष्यो! शीघ्र ही श्रीकमलापतिको भजो ॥ ६ ॥ यह शरीर नाना प्रकारके रोगोंका आश्रय, क्षणिक,
परवश तथा मलसे भरे हुए नौ मार्गोंवाला है — ऐसा देखकर रे मनुष्यो! श्रीकमलापतिको भजो ॥ ७ ॥ मुनिजन जिनका अहर्निश हृदयमें ध्यान करते हैं,
शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्रादि समस्त देवगण जिनकी सर्वदा वन्दना करते हैं तथा जो जरा, जन्म और मरणादिके भयको दूर करनेवाले हैं, रे मनुष्यो! उन श्रीकमलापतिको भजो ॥ ८ ॥ दास परमहंसद्वारा कहे गये इस अत्युत्तम भगवान्
हरिके अष्टकको जो मनुष्य समाहितचित्तसे पढ़ता है, वह अवश्य ही भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
पृष्ठ 89
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* विष्णुस्तोत्राणि * ७ ९ * 55555555 ******* २ ९ - श्रीदीनबन्ध्वष्टकम् यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाद्यं यस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूले यत्रोपयाति विलयं च समस्तमन्ते दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ १ ॥
चक्रं सहस्रकरचारु करारविन्दे
गुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य ।
पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो । दृग्गोचरो ॰ ॥ २ ॥
येनोद्धृता वसुमती सलिले निमग्ना
नग्ना च पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलैः ।
संमोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेन्द्रो । दृग्गोचरो ० ॥ ३ ॥
यस्यार्द्रदृष्टिशतस्तु सुराः समृद्धिं जिन परमात्मासे यह ब्रह्मा आदिरूप जगत् प्रकट होता है और सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत जिस परमेश्वरमें यह समस्त संसार स्थित है तथा अन्तकालमें यह समस्त जगत् जिनमें लीन हो जाता है - वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें ॥ १ ॥ जिनके करकमलमें सूर्यके समान प्रकाशमान चक्र, भारी
गदा और श्रेष्ठ शङ्ख शोभित हो रहा है, जो पक्षिराज ( गरुड़ ) की पीठपर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें ॥ २ ॥
जिन्होंने जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया, नग्न की जाती हुई पाण्डववधू ( द्रौपदी ) को वस्त्रोंसे ढक लिया और ग्राहके मुखसे गजराजको बचा लिया – वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रोंके समक्ष हो जायँ ॥ ३ ॥ जिनकी स्नेहदृष्टिसे देखे
पृष्ठ 90
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८० * विष्णुस्तोत्राणि * *** KKKKK कोपेक्षणेन दनुजा विलयं भीताश्चरन्ति च यतोऽर्कयमानिलाद्या । गायन्ति सामकुशला यमजं मखेषु ध्यायन्ति धीरमतयो यतयो पश्यन्ति योगिपुरुषाः पुरुषं शरीरे । आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि भक्तानुकम्पननिमित्तगृहीतमूर्तिः यः सर्वगोऽपि कृतशेषशरीरशय्यो । यस्याङ्घ्रिपङ्कजमनिद्रमुनीन्द्रवृन्दै-व्रजन्ति दृग्गोचरो ० ॥ ४ ॥
विविक्ते ।
दृग्गोचरो ० ॥ ५ ॥
1 दृग्गोचरो ० ॥ ६ ॥
राराध्यते भवदवानलदाहशान्त्यै ।
सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा 1 । दृग्गोचरो ० ॥ ७ ॥
जानेके कारण देवतालोग ऐश्वर्य पाते हैं और कोपदृष्टिके द्वारा देखे जानेसे दानव-लोग नष्ट हो जाते हैं तथा सूर्य, यम और वायु आदि जिनके भयसे भीत होकर अपने - अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रोंके सामने हो जायँ ॥४ ॥ सामवेदके गानमें चतुरलोग यज्ञोंमें जिन अजन्मा भगवान्के
गुणोंको गाते हैं, धीर बुद्धिवाले संन्यासीलोग एकान्तमें जिनका ध्यान करते हैं और योगीजन अपने शरीरके भीतर पुरुषरूपसे जिनका साक्षात्कार करते हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रोंके सामने हों ॥ ५ ॥ जो भगवान् आकार, रूप और गुणके
सम्बन्धसे रहित होकर भी भक्तोंके ऊपर दया करनेके निमित्त अवतार धारण करते हैं और जो सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी शेषनागके शरीरको अपनी शय्या बनाये हुए हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रोंके प्रत्यक्ष हों ॥ ६ ॥ आलस्यहीन
मुनिवरोंका समूह संसारके दुःखरूपी दावानलकी जलन शान्त करनेके लिये जिन भगवान्के चरणकमलकी आराधना करता है, वे समस्त जगत्के आत्मभूत दीनबन्धु मेरे सब अपराधोंको भूलकर आज मेरे नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें ॥ ७ ॥