Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 431–440
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 431–440
पृष्ठ 431
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मणं करते ही दे दिया जाए तो अङ्गकर्म होता है । यदि न दिया जाए तो देवता का अपमान होता है । बस, इस विप्रतिपत्ति को हटाने के लिए प्रधानाहुति से पहले सिरायण ( जलपान ) के बतौर वपाहुति दे दी जाती है । देवता के क्षोभ से यज्ञ में शुष्कता का भाव उत्पन्न हो जाता है । वपा स्निग्ध पदार्थ है इसकी आहुति से देव - प्रारण तब तक के लिए शान्त हो जाते हैं जब तक कि अङ्गकर्म नहीं हो जाते एवं हवि नहीं पक जाती । बस वपा - होम करने की यही उपपत्ति है -" यस्यै वै देवतायै पशुमालभन्ते तामेवैतद् देवतामेतेन मेधेन प्रीणाति ।
सेवा देवता- एतेन मेधेन प्रीता शान्ता - उत्तराणि हवींषि श्रप्यमाणानि उपरमति ।
तस्माद् वपया चरन्ति ॥ २ ९ ॥
वपा - होम करने के अनन्तर अध्वर्यु प्रादि ऋत्विक् चात्वाल में जा कर पानी से अपने हाथ धो डालते हैं । इस पशु को जो कि मारते हैं एवं इसका चमं खींचते हैं- ऐसा करते हुए ऋत्विक् बड़ा ही क्रूर कर्म्म करते हैं । इस से एक क्रूर विद्युत् उत्पन्न होता है जिस से वातावरण क्षुब्ध हो उठता है । उस विद्युत् का असर हाथों में भी पहुंचने लगता है । पानी शान्तिस्वरूप है । बस उस क्रूरता का शमन करने के लिए ही सब ऋत्विक् चात्वाल में जा कर हाथ धोते हैं--" क्रूरी वा एतत् कुर्वन्ति यत् संज्ञपयन्ति यद् विशासति । शान्तिरापः ।
तदद्भिः शान्त्या शमयन्ते । तदद्भिः सन्दधते । तस्माच्चात्वाले मार्जयन्ते ।
॥३० ॥
॥ इति पशुवपाब्राह्मणं समाप्तम् ॥
॥ इति माध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥
[ ४१५ ]
पृष्ठ 432
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
डाशम यति तिखर्दा पुरोडा दिति 1 मित्येव शमिता भवत्यः हविर्भव पृच्छति तद्देवान
पृष्ठ 433
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० शतपथ ब्राह्मरण पशुपुरोडाश ब्राह्मण हृदय वै पशुः । तदस्यात्मन एवाग्रेऽवद्यति तस्माद्यदि किञ्चिदवदानं हीयेत न तदाद्रियेत सर्वस्य हैवास्य तत्पशोरवत्तं भवति यद्धृदयस्याग्रेऽवद्यति तस्मान्मध्यतः सतो हृदयस्यैवाग्रेऽवद्यत्यथ यथापूर्वम् ॥ १६ ॥
अथ जिह्वा । सा हीयं पूर्वार्धात्प्रतिष्ठत्यथ वक्षसस्तद्धि ततोऽथैकचरस्य दोष्णोऽथ पार्श्वयोरथ तनिम्नोऽथ वृक्कयोः ॥ १७ ॥
गुदं धा करोति । स्थविमोपयभ्यो मध्यं जुह्वां द्वेधाकृत्वावद्यत्यरिणम sub कचरायै श्रोरेतावन्नु जुह्वामवद्यति ॥ १८ ॥
थोपभृति त्र्यङ्गस्य दोष्णो गुदं द्वेधा कृत्वावद्यति त्र्यङ्गयायै श्रोणेरथ हिरण्यशकलाववदधात्यथोपरिष्दादाज्यस्याभिघारयति ॥ १ ९ ॥ अथ वसाहोमं गृह्णाति रेडसीति लेलयेव हि युस्तस्मादाह रेडसीत्यग्नि-ष्ट्वा श्रीणात्वित्यग्निह्येतच्छ्रपयति तस्मादाहाग्निष्ट्वा श्रीणात्वित्यापस्त्वा समरिन्नित्यापो ह्येतमङ्गेभ्यो रसं सम्भरन्ति तस्मादाहापस्त्वा समरिरण-निति ॥२० ॥
वातस्य त्वा प्राज्याऽइति । अन्तरिक्षं वाऽप्रयमनुपवते योऽयं पवतेऽन्त-रिक्षाय वै गृह्णाति तस्मादाह वातस्य त्वा ध्राज्याऽइति || २१ || पूष्णो ह्याऽइति । एष वै पूष्णो रंहिरेतस्मा उ हि गृह्णाति तस्मा-दाह पूष्णो ह्या इति || २२ || ऊष्मणो व्यथिषदिति । एष वा ऊष्मैतस्माऽउ हि गृह्णाति तस्मादाहो-मणो व्य free त्यथोपरिष्टाद् द्विराज्यस्याभिघारयति || २३ || अथ पार्श्वेन वा s सिना वा प्रयौति प्रयुतं द्वेष इति तन्नाष्ट्रा एवैतद्रक्षांस्य तोपहन्ति || २४ || परिशिष्यते । तत्समवत्तधान्ामानयति तदीयति जिह्वां वक्षस्तनिम मतस्ने वनिष्टुमथोपरिष्टाद् द्विराज्यस्याभिव्यक्ति । [ ४१६ ]
पृष्ठ 434
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण तद्यद्धिरण्यशकलावभितो भवतः । घ्नन्ति वा एतत्पशुं यदग्नौ जुह्वत्यमृत-मायुहिरण्यं तदमृतप्रायुषि प्रतितिष्ठति तथात उदेति तथा संजीवति तस्माद्धि-रण्यशकलावभितो भवतः ॥ २६ ॥
श्रथ दयावद्यति । सव्यस्य च दोष्णो दक्षिणायाश्च श्रोई क्षिरणस्य च दोष्णः सव्यायाश्च श्रोणस्तस्मादयं पशुरक्ष्णया पदो हरत्यथ यत्सम्यगवद्ये-समीचो हैवायं पशुः पदो हरेत्तस्मादक्ष्णयावद्यत्यथ यन्न शीर्णोऽवद्यति नांसयो -र्नानूकस्य नापरसक्थयोः || २७ || असुरा ह वाऽग्रे पशुमालेभिरे । तद्देवा भीषा नोपावेयुस्तान्हेयं पृथिव्युवाच मैतदाहवमहं व एतस्याध्यक्षा भविष्यामि यथायथैतऽऐतेन चरिष्य-उन्तीति ॥२८ ॥
सा होवाच । श्रन्यतरामेवाहुतिमहौषुरन्यतरां पर्यशिषन्निति स यां पर्य-शिवंस्तानी मान्यवदानानि ततो देवाः स्विष्टकृते त्र्यङ्गाण्यपाभजंस्तस्मात्त्र्यङ्गा-यथासुरा अवाद्यञ्छष्णसयोरनूकस्या परसक्थयोस्तस्मात्तेषां नावद्येद्यश्वेव त्वष्टानूकमभ्यवमत्तस्मादनूकस्यनावद्येदथाहाग्नीषोमाभ्यां छागस्य हविषोऽनुब्रू-हीत्याश्राव्याहाग्नीषोमाभ्यां छागस्य हविः प्रेष्येति न प्रस्थितमित्याह प्रसुते प्रस्थितमिति ॥ २ ९ ॥ अन्तरेणार्धच्चा याज्यायै वसाहोमं जुहोति । इतो वाऽप्रयमूर्ध्वो मेघ उत्थितो यमस्या इमं रसं प्रजा उपजीवन्त्यर्वाचीनं दिवो रसो वै वसाहोमो रसो मेधो रसेनैवैतद्रसं तीव्रीकरोति तस्मादयं रसोऽद्यमानो न क्षीयते ॥ ३० ॥
तद्यदन्तरेण । अर्धच्चों याज्यायै वसाहोमं जुहोतीयं वाऽश्रर्धच्चऽसौ रच्चन्त वै द्यावापृथिवी अन्तरिक्षमन्तरिक्षाय वै जुहोति तस्मादन्तरे-णार्धच्चों याज्यायै वसाहोमं जुहोति || ३१ || स जुहोति । घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरि-क्षस्य हविरसि स्वाहेत्येतेन वैश्वदेवेन यजुषा जुहोति वैश्वदेवं वाऽअन्तरिक्षं [ ४२० ]
पृष्ठ 435
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मणं तद्यदेनेनेमाः प्रजाः प्राणत्यश्चोदनत्यश्चान्तरिक्षमनुचरन्ति तेन वैश्वदेवं वषट्कृते जुहोति यानि जुह्वामवदानानि भवन्ति ॥ ३२ ॥
थ जुह्वा पृषदाज्यस्योपघ्नन्नाह । वनस्पतयेऽनु ब्रूहीत्याश्राव्याह वन-स्पतये प्रेष्येति वषट्कृते जुहोति तद्यद्वनस्पतये जुहोत्येतमेवैतद्वत्रं यूपं भागिनं करोति सोमो वै वनस्पतिः पशुमेवैतत्सोमं करोति तद्यदन्तरेणोभेऽप्राहुती जुहोति तथोभयं व्याप्नोति तस्मादन्तरेणोभेऽग्राहुती जुहोति ॥३३ ॥
श्रथ यान्युपभृत्यवदानानि भवन्ति तानि समानयमान श्राहाग्नये स्विष्ट-कृतेऽनुब्रूहीत्याश्राव्याहाग्नये स्विष्टकृते प्रेष्येति वषट्कृते जुहोति ॥३४ ॥
ar साहोमस्य परिशिष्यते । तेन दिशो व्याधारयति दिशः प्रदिश प्रदिशो विदिश उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहेति रसो वै वसाहोमः सर्वास्वेवैतद्दिक्षु रसं दधाति तस्मादयं दिशि दिशि रसोऽभिगम्यते ॥ ३५ ॥
अथ पशुं सम्मृशति । एतह सम्मर्शनस्य कालोऽथ यत्पुरा सम्मृशति asses उपतिष्ठन्ते ते विमथिष्यन्तऽइति शङ्कमानो यद्यु विमाथान शङ्केता-त्रैव सम्मृशेत् ॥३६ ॥
ऐन्द्रः प्राणः । प्रङ्गेऽङ्गे निदध्यदैन्द्र उदानो अङ्गे निधीत इति यदङ्गशो विकृत्तो भवति तत्प्राणोदानाभ्यां संदधाति देव त्वष्टर्भूरि ते सं समेतु सलक्ष्मा यद्विषुरूपं भवातीति कृत्स्नवृतमेवैतत्करोति देवत्रा यन्तमवसे सखा-यो s नु त्वा मातापितरोमदन्त्विति तद्यत्रैनमहौषीत्तदेनं कृत्स्नं कृत्वानुसमस्यति सो s स्य कृत्स्नो sgf मल्लोकात्मा भवति ॥ ३७ ॥
[ अनुवाद ] वपा - होम के लिए पशु - पुरोडाश क्यों किया जाता है इसकी उपपत्ति तथा पशुपुरोडाश प्राहुति की विधि इस ब्राह्मरण में बतलाई जा रही है-आहुति द्रव्य निर्वाण तथा अनुनिर्वाप भेद से दो प्रकार का है । इन में निर्वाप, द्रव्य-प्रधान होता है तथा अनुनिर्वाप, द्रव्य - गौरण । वपा - होम में पशु की प्राहुति कतिपय अन्तर्वर्ती अङ्गकर्मों के अनुष्ठान के बाद दी जाती है । तब तक समागत देवता के स्वागत सत्कार के [ ४२१ ]
पृष्ठ 436
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुपुरोडाश ब्राह्मणं लिए स्वल्पाहार रूप से वपाहोम कर दिया जाता है जिस से समागत निमन्त्रित देवता अशान्त न हों और शान्ति का प्रभाव यजमान पर न पड़े । संसार में जितने भी पशु हैं उनका मेध ( सार ) यव और चावल में है । रोदसी त्रिलोकी में पुरुष, अश्व, गो, अवि, अज ये पाँच पशु हैं । तथा किम्पुरुष, गौर, गवय, उष्ट्र, शरभ ये पाँच ही अनुपशु हैं । पूर्वोक्त पाँचों पशुओं का मेघ पृथिवी में प्रविष्ट है । तथा पृथिवी द्वारा वह अन्न में प्रविष्ट हो जाता है । पशुश्नों का जो मेघ भाग यव तथा तण्डुल में है वह पाकी आहुति देने पर भी यज्ञ में पशुओं का पूरा भाग नहीं आता है । अतः पशु के अधूरे होने से पशु - भाग अपूर्ण रहता है । उसकी पूर्ति के लिए वप्राहोम करने के बाद ही यव व तण्डुल से बने हुए पुरोडाश की आहुति भी दी जाती है, जिससे यज्ञ समृद्ध एवं पूर्ण बन जाता है और यजमानात्मा में भी पूर्णता आ जाती है । इसी लिए वपाहोम रूप निर्वाप कर्म के बाद पुरोडाश होमरूप अनुनिर्वाप कर्म किया जाता है ॥ १ ॥
पाहोम में पशु का सारभाग निकल जाता है और पशु सर्वथा मर जाता है । अमृत-रूप देवता मर्त्यहवि को ग्रहण नहीं करते । पुरोडाश हवि का अनुनिर्वाप करने पर पशु की पूर्णता हो जाती है । पुरोडाश पशु का ही मेध भाग है । अतः पशु चेतन हो, अमृतरूप हो जाता है और उसकी आहुति को देवता ग्रहण कर लेते हैं । यही वपा - होम के बाद पशुपुरोडाश हुति देने का तात्पर्य है ॥ २ ॥
पुरोडाश का अनिर्वाण करने के बाद अध्वर्यु शमिता ( पशु को मारने वाले ) को आज्ञा देता है कि हे शमिता! आगे किये जाने वाले प्रधान याग, स्विष्टकृत् याग तथा उप-यड्याग के लिए इस मृत पशु को तीन भागों में विभक्त करो । चूँकि ये तीनों भाग क्रम से होते हैं । अतः प्रच्युत पशु के उत्तम भाग हृदय को सब से ऊपर रक्खो जिससे कि प्रधान याग करना है । मृत पशु को तीन भागों में विभक्त इसलिए किया जाता है कि प्रकृतियाग प्रातः सवन, माध्यन्दिन - सवन, सायं सवन भेद से त्रिवृत् हैं एवं तद्वत् यह पशुयाग भी त्रिवृत् किया जाता है || ३ || तदनन्तर अध्वर्यु शमिता का अनुशासन करता है ' और आज्ञा देता है कि जब तुम से पूछा जाय कि ' शमिता! हवि पक कर तय्यार है? ' तो तुम्हें उसके उत्तर में ' हाँ, पक कर तय्यार है ' यही कहना चाहिए । अभी पक कर तय्यार नहीं हुई है ऐसा कभी नहीं कहना चाहिए || ४ || इसके बाद अध्वर्यु जुहू में पृषदाज्य ( दधिमिश्रित आज्य ) ले कर शामित्रशाला में जा कर शमिता से पूछे कि क्या हवि पक गई है? शमिला जब यह उत्तर दे कि हाँ पक गई है १ भाष्यानुसार व्याख्या में ' श्रुतमित्येव ब्रूतान्न शृतं भगवो न शृतं हीति ' इस मूल के स्वा-रस्य का भङ्ग होता है | अतः जो व्याख्या ( स्वर्गीय ) पं ० मोतीलाल शास्त्री जी ने की है, वही सङ्गत है । [ ४२२ ]
पृष्ठ 437
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण तब अध्वर्यु धीरे से यह कहे कि यह हवि देवताओं की वस्तु है । अध्वर्यु यह इसलिए कहता है कि जिससे अध्वर्यु की प्रात्मा का सम्बन्ध उस हवि से हट जाता है । देवताओं की वस्तु पर अध्वर्यु के आत्मा का सम्बन्ध अनुचित है । अतः उस के परिहार के लिए अध्वर्यु यह देवताओं की वस्तु है - ऐसा कर अपना सम्बन्ध हवि से हटा लेता है ॥ ५ ॥
देवता आग्नेय होने से अग्नि से परिपक्व हवि को ग्रहण करते हैं । और हवि पक्व हैं या पक्व यह हवि को पकाने वाला शमिता ही जानता है ॥ ६ ॥
इसका दूसरा प्रयोजन यह भी है कि शमिता के यह उत्तर देने पर कि हवि पक गई । है, अध्वर्यु कहता है कि पक्व हवि की आहुति दे रहा हूँ । ऐसा कहने से हवि यदि अपक्व भी है तो देवताओं के लिए तथा यजमान के लिए भी वह पक्व ही हो जाती है । अतः अपक्व हवि की आहुति से भी पक्व हवि की आहुति का फल प्राप्त हो जाता है और अध्वर्यु भी पाप-रहित हो जाता है । अत ( अपक्व ) हवि प्रदान करने के पाप का भागीदार केवल शमिता होता है । अध्वर्यु शमिता से तीन बार ' शृतं हविः शमितः ' यह पूछता है क्यों कि यज्ञ त्रिवृत् है । ध्वर्यु शमिता से ' शृतं हविः ' यह सुनने बाद जो ' तद्द वानाम् ' कहता है उसका तात्पर्य यह है कि पंक्व हवि ही देवताओं की होती है ॥ ७ ॥
श्रध्वर्यु के आदेशानुसार शमिता जब पशु के अवयवों को क्रमानुसार रख देता है तब अध्वर्यु जुहू में गृहीत पृषदाज्य को हृदय पर सिक्त कर देता है । पशु के उत्तम हवि हृदय पर घृत डाल देता है । शरीर में जो हृदय है, यह मन है । क्यों कि हृदय में ही मन, प्रतिष्ठित रहता है - ' चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् ' यह ऐतरेय श्रुति तथा ' हृत्प्रतिष्ठं यदजरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' यह यजुश्रुति मन की हृदय में प्रतिष्ठा बतला रही हैं । चैतन्य के प्रतिबिम्ब से युक्त मन ही आत्मा ( प्रज्ञानात्मा ) कहलाता है । अतः हृदय, मन तथा प्रज्ञानात्मा एक प्रकार से एक ही हैं । इसीलिए ऐतरेयोपनिषद् में - ' यदेतद् हृदयं मन-श्चैतत् ' संज्ञानमाज्ञानं - विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा....... ' ऐसा कहा है । हृदय पर घृत से चयन करता हुआ अध्वर्यु ग्रात्मरूप मन प्राण का प्रधान करता है । इस प्राणाधान से हृदयरूप जीवित अर्थात् अमृतरूप हवि को ही अमृतरूप देवताओं के लिए प्रदान करता है ॥ ८ ॥
पशु के जो प्राण शरीर से हृदय को निकालने से मन व प्रारण से रहित हो गए हैं वे पृषदाज्य के आधार से मन व प्रारण से युक्त हो जाएँ । हृदय पर घृताभिघार करते समय ' स्वाहा ' का उच्चारण नहीं किया जाता क्यों कि घृताभिघार श्राहुति नहीं है । अग्नि में आहुति दी जाती है तब ' स्वाहा ' कहा जाता है । पश्चात् उल्मुकाग्नि में पकाये हुए हृदय एवं पशु के अवयवों को ठण्डा करते हैं ॥ ६ ॥
पकाने तथा ठण्डा करने के बाद उन श्रवयवों को शामित्रशाला से आहवनीय में लाया जाता है क्योंकि उनकी आहुति वहीं दी जाती है । पशु के उन अवयवों को चात्वाल से [ ४२३ ]
पृष्ठ 438
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अं ० ८ ) शतपथं ब्राह्मणं पशुपुरोडाश ब्राह्मणं पश्चिम में हो कर आहवनीयाग्नि व यूप के बीच से और आहवनीय के दक्षिण भाग में लाते हैं । क्यों कि वहीं उत्तराभिमुख बैठ कर इस की ग्राहुति श्रध्वर्यु श्राहवनीय अग्नि में देता है, क्यों कि श्राहवनीय यज्ञ का मुख है । इसका पश्चिम भाग इसका उदर है । ऐसी स्थिति में आहवनीय से पश्चिम हो कर हवि को ले जाना उदर में पशु की आहुति देना है । ऐसा करने से अङ्ग अङ्ग से विकृत अतएव क्रूरीकृत पशु की आहुति से क्रूरभावयुक्त यज्ञ उत्पन्न होगा । प्रतः क्रूरभावयुक्त क्षत - विक्षत यज्ञात्मा उत्पन्न न हो इस कारण पश्चिम में हो कर इस पशु-रूप हवि को नहीं ले जाता है । इस दोष के परिहार के लिए यूप के बाहर से भी पशु को नहीं ले जाते क्यों कि ऐसी स्थिति में - पशु, यज्ञ से बहिर्भूत होकर अयज्ञिय व प्रासुरभावापन्न हो जाएगा । अतः ऋत्विक् लोग पशु को यूप और ग्राहवनीयाग्नि के बीच में से ही ले जाते हैं । पश्चात् प्राहवनीय से दक्षिण के भाग में पशु को रख कर प्रतिप्रस्थाता ऋत्विक् उस पशु के प्रधान कर्म, स्विष्टकृद् यांग व उपयाट् भाग के लिए तीन अवदान ( भाग ) करता है । जिस स्थान पर पशु के ये अवदान रखे जाते हैं वहाँ पर कुश का प्रस्तरण रहता है तथा कुश पर प्लक्ष ( पाखरपीपल ) की शाखा रहती है । प्लक्षशाखायुक्त बहिं पर ही अवदान रक्खे जाते हैं ॥ १० ॥
संसार में यावन्मात्र प्रारणी सविता, सरस्वती, इन्द्र, वरुरण, त्वष्टा, पूषा आदि प्राण-देवताओं से ही उत्पन्न होते हैं । ये प्रारणदेवता योनि में वीर्य के सिक्त होते ही वीर्य में प्रविष्ट हो जाते हैं और कार्य करने लगते हैं । इनमें हस्त, पाद, मस्तक, श्रोत्र, नासिका चक्षु आदि अवयवरूप भिन्न - भिन्न आकारों का निर्माता त्वष्टा प्रारण है और वर्णरूपों का निर्माता इन्द्र-प्रारण है । इसीलिए ' त्वष्टा रूपाणि पिंशति ' इन्द्रोरूपारिण करीकृदचरत् इत्यादि श्रुतियाँ इन दोनों प्राणों को आकारात्मक व वर्णात्मक रूप का अधिष्ठाता या निर्माता बतला रही हैं । हृदय का मेदोभाग ही मस्तक व मस्तिष्क बनता है । प्रकृति में प्राकृतिक प्राणदेवता- पुरुष, अश्व आदि पाँचों का प्रलम्भन करते हैं और उनका भक्षण करते हैं । देवताओं द्वारा किये गए पश्वालम्भन के समय पशुस्वामी त्वष्टादेवता ने भविष्य में पश्वालम्भन न हो एतदर्थ पशु के मस्तक पर वमन कर दिया । त्वष्टा के द्वारा वमन के उच्छिष्ट भाग से ही शिर में मस्तिष्क बना । अतः शिरः सम्बद्ध मस्तिष्क, शिरः, कपाल, अनूक्य अर्थात् कपाल का मांस तथा तदाश्रित मज्जा आदि का भक्षरण नहीं करना चाहिए क्यों कि ये त्वष्टादेवता के वमन किये हुए भाग हैं ॥ ११ ॥
देवताओंों के द्वारा आलभ्यमान उस पशु के मध्य का जो मेध ( सारभाग ) नीचे गिरा, वही वृक्ष बना, जिसका देवताओं ने प्रकर्षरूप से कथन किया । प्रकर्षेण आख्यान के कारण ही वह प्रख्य कहलाया । इस समय लोक में जो प्लक्ष नाम से प्रसिद्ध है वह प्रख्य ही है । पशु के हृदय की वपा को बहि के ऊपर प्रस्तृत प्लक्षशाखा पर रख कर ही पशु को समृद्ध व कृत्स्न बनाया जाता है क्यों कि प्लक्ष पशु का मेध ही है । इसीलिए कुशा के ऊपर प्लक्षशाखा रख कर उस पर वपा को रक्खा जाता है ॥१२ ॥
[ ४२४ ]
पृष्ठ 439
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण पहले यह बतलाया जा चुका है कि प्रालब्ध पशु के तीन अवदान किये जाते हैं और उन को क्रमश: जुहू, उपभृत् तथा वसाहोमहवनी में स्थापित किया जाता है । तीनों अवदानों में से थोड़ा - थोड़ा भाग ले कर उसे समवत्तधानी नामक इडापात्री में रख कर ऋत्विक् लोग खाते हैं । इस प्रकार चार अवदान हो जाते हैं । जुहू, उपभृत्, वसाहोमहवनी और समवत्त-धानी नामक इडापात्री में उन्हें रख कर प्राज्य का उपस्तरण किया जाता हैं । ' पश्चात् अध्वर्यु जुहू तथा उपभृत् में हिरण्यशकल ( सोने की टिकियाँ ) रखता है ॥१३ ॥
तदनन्तर अध्वर्यु हवि - सम्बन्धी मनोता देवताओं के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलने के लिए होता को प्रैष करता है । जिस समय पशु का आलम्भन किया गया है, उस समय देवता का नाम नहीं लिया गया है अतः सारे ही देवता उस आलभ्यमान पशु की ओर उन्मुख हो जाते हैं । इन मनों का समूह ही ' मनांसि ओतानि सम्बद्धानि यत्र ' इस व्युत्पत्ति से मनोता कहा जाता है । इस अनुवाक्या के द्वारा सभी मनोता देवताओं को तृप्त कर देता है । ' त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोता ( ऋ. ६।१।१ ) इस मन्त्र के द्वारा अग्नि के प्रथम मनोता होने से आग्नेय अनुवाक् के द्वारा सभी देवताओं के मन तृप्त हो जाते हैं ॥ १४ ॥
जुहूसे जो प्रधान याग होता है, वहाँ पशु के हृदयादि अवयव रक्खे जाते हैं । यद्यपि उन अवयवों में हृदयावदान का चौथा नम्बर है तथापि अध्वर्यु सब अवदानों से पहले हृदय काही अवदान करता है, क्यों कि हृदय में ही प्रज्ञा - मन प्रतिष्ठित रहता है । प्रज्ञा और प्राण सदा रहते हैं । जैसा कि - यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राण: ' इस सिद्ध हो रहा है । वस्तु का अस्तित्व प्रारण पर ही निर्भर है । प्रारण ( श्वास ) हृदय से ही उठता है अतः पशुत्व भी प्रारण ( हृदय ) पर ही अवलम्बित है । जब तक प्राणनव्यापार ( अर्थात् श्वास - सञ्चार ) होता रहता है तभी तक पशु कहलाता है ॥ १५ ॥
हृदय ही पशु का आत्मा है । अतः सर्वप्रथम हृदय का अवदान करता है । हृदय अवदान से पशु का अवदान हो जाता है । अतः पशु के मध्य भाग में वर्तमान हृदय का ही
प्रथम अवदान किया जाता है । शेष अवदान क्रमानुसार ही होते हैं ॥ १६ ॥
हृदय के अवदान के बाद जिह्वा का अवदान करता है । शिरोभाग का अवदान नहीं होता । नेत्र से ऊपर का भाग शिरोभाग माना जाता है । जिह्वा मस्तक के बाद शरीर के पूर्वार्द्ध में प्रथम है । अतः पहले इसी का अवदान होता है । जिह्वा के बाद वक्षःस्थल का १ अन्न खाने से पूर्व तथा अन्त में अर्थात् अन्न के दोनों ओर अमृत का सम्बन्ध किया । पूर्व का अमृतसम्बन्ध अमृतोपस्तरण तथा अन्त का अमृतापिधान कहलाता है । इसीलिए भोजन के प्रारंभ में तथा अन्त में आचमन किया जाता है । क्यों कि हवि देवताओं का न है, अतः उस हवि को रखने से पूर्व हवि - पात्र में आज्य का उपस्तरण किया जाता है । [ ४२५ ]
पृष्ठ 440
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण और पश्चात् वामभाग के हाथ के मांस का अवदान करता है, तदनन्तर दोनों पार्श्वभागों का । पश्चात् यकृत् का अवदान करता है । यह प्रति कोमल होता है । इसलिए इसे ' तनिमन् ' शब्द से कहा गया है । इसके बाद दोनों वृक्कों का अवदान होता है ॥१७ ॥
इसके बाद पशु के गुदाभाग के तीन खण्ड करता है - एक भाग सब से बड़ा, दूसरा उससे छोटा, तथा तीसरा सब से छोटा होता है । गुदा का सब से बड़ा ( स्थूल ) भाग उपयड् याग के लिए, मध्यम भाग के दो भाग कर प्रधानयाग साधनभूत जिह्वा में रक्खा जाता है तथा गुदा का सबसे छोटा भाग स्विष्टकृद् याग के लिए है । वृक्क के अवदान के बाद प्रधानयाग साधक जुहू में पशु की गुदा का मध्य खण्ड रक्खा जाता है । इसके बाद दाहिनी तरफ की श्रोणि के मांस का अवदान रखते हैं । प्रधानयाग के लिए जुहू में इतने ही अवदान रखे जाते हैं || १८ || तदनन्तर उपभृत् में, त्र्यङ्ग ( तीन अंग वाली ) हवि के - जिसकी कि स्विष्टकृद् याग में हवि दी जाती है, दो भाग कर उनका अवदान करता है, तथा स्विष्टकृद् यागार्थ हवि के लिए वाम श्रोणि के मांस का अवदान करता है । इस प्रकार प्रधानयागसाधन जुहू में तथा स्विष्टकृद्यागसाधन उपभृत् में घृत का श्राधार कर पश्चात् दोनों में सोने की टिकियाँ रख कर उस पर पूर्वोक्त अवदानों को रख कर बाद में फिर सोने की टिकियाँ रखता है और उसके ऊपर घृत का अभिघार करता है ॥ १६ ॥
इसके बाद अध्वर्यु वसाहोमहवनी में वसाहोमद्रव्य मांसरस को रखता है । साथ ही निम्न मन्त्र का उच्चारण करता है - " रेडसि अग्निष्ट्वा श्रीरणातु, श्रापस्त्वा समरिणन् " " प्रयुतं द्वेषः " इति । इस यजुर्मन्त्र की व्याख्या निम्न प्रकार से है - ' रेडसि ' हे वसाद्रव्य! तुम रेड् हो । क्योंकि मांसरस द्रव द्रव्य होने के कारण इधर - उधर हिलता रहता है अतः इसे ' रेड सि ' कहा है । वसा द्रव्य मांस के साथ पका हुआ जल ही है जो कि द्रव द्रव्य होने के कारण वसा-होमहवनी में रखने पर हिलता रहता है- ' प्रापस्त्वा समरिन् ' । हे मांसरस! जल तुम्हें मांस के अङ्ग - प्रत्यङ्गों से बाहर निकाल ले, क्यों कि जल ही मांस के सर्वाङ्गों में से रस को निकालता है || २० ॥ ' वातस्य त्वा ध्राज्यै ' इति । वायु में जाने के लिए मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ । यह वायु अन्तरिक्ष में ही बह रहा है । जिस समय इस वसा द्रव्य की अग्नि में आहुति दी जाएगी, तब यह वाष्प बन कर अन्तरिक्षस्थ वायु में ही जाएगा । इसलिए ' वातस्य त्वा ध्राज्यै ' कहा है ॥२१ ॥
' पूष्णो ह्या ' इति । हे वसाद्रव्य! पूषा के वेग के लिए मैं तुम्हारा ग्रहण करता हूँ । इन्द्रादि द्वादश प्रारण ही अनित्य कहलाते हैं । इन में पूषाप्राण रूप आदित्य पृथिवीपिण्ड का निर्माण करता है । पूषा नामक आदित्य भी वायु की भाँति अन्तरिक्ष में रहता है । वायु का [ ४२६ ]