शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री
Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman · 694 पृष्ठ · 70 खण्ड
विषय सूची
- शुक्लयजुर्वेदीय- माध्यन्दिन शतपथब्राह्मरण विज्ञानभाष्य " अध्वरनाम " तृतीयकाण्डान्तर्गत [ द्वितीय खण्ड ] पं. मोतीलाल शास्त्री वेद arat- पथिक ब्रह्मवचस… 1–10
- शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय विषय सूची ( द्वितीय खण्ड ) पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या हिन्दी विज्ञान - भाष्य प्रारम्भ २४७ यज्ञ - स्वरूप यूप २८६ सू… 11–20
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणे अर्थभ्यः सूर्य दक्षिणामानयत् तं प्रत्यगृहांस्तस्मादु ह स्माहुरङ्गिरसो वयं वा s त्विजीनाः स्मो… 21–30
- तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण तदन्तर ऋत्विक् शम्या ( कीला ) तथा स्फ्य ( काष्ठ की बनी हुई तलवार ) हाथ में लेता है… 31–40
- तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण गया है- दक्षिण की ओर १५ विक्रम प्रक्रमण करता है एवं वहाँ पर शकु गाड़ देता है… 41–50
- तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण [ ३३ 1 वेदिनिर्माण ब्राह्मण 1 ( ऋग्वेद मं ३ | ३०/२२ ) " तस्य ह प्रजापतेः । अर्धमेव मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ”… 51–60
- तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण इन्द्रियाँ हैं - इसके वीर्य्य हैं - इन्हें ही अन्तरङ्गवित्त कहते हैं एवं ४ अध्वर्यु बहिर्वित्त हैं… 61–70
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं पहले सूर्य से होता है - बाद में अङ्गिराम्रों से होता है अतएव श्रादित्य यज्ञ को ' अद्यसुत्या '… 71–80
- तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण-कहा जाता है एवं पृथिवी के अग्नि का नाम अङ्गिरा है… 81–90
- तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मण से दक्षिण में जाया करता है अतः सोम दक्षिण में जा कर ही स्थित रहता है… 91–100
- तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण अथ पुनः प्रपद्य । चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा सावित्रं प्रसवाय जुहोति सविता वै देवानां प्रसविता… 101–110
- तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण वो! पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक इन तीनों लोकों में से सम्पत्ति को अपनी मुट्ठी में भर कर दोनों… 111–120
- तृतीय काण्ड ( ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण इस प्रकार जब दोनों शकट रख दिए जाएँ तो उन पर चटाई रख देनी चाहिए जिससे कि ऊपर से कोई खराब वस्तु एवं… 121–130
- तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण " हे देवी ( हविर्द्धा! ) हे दुर्ये! ( गृहेषु साधुरूपे ) युवां - यजमानस्य स्वभूतं गोष्ठं प्रावदतम्… 131–140
- तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण अश्विनी कुमारों की बाहुनों से व पूषा देवता के हाथों से हे स्त्रीरूपा अनि! मैं आप को उठाता हूँ… 141–150
- तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण यही है कि ये चारों ही उपरव चार इन्द्रियाँ हैं । इन्द्रियों का अधिष्ठाता प्रारण होता है… 151–160
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण " रक्षोहरणो ह्येते - वलगहनो ह्येते । वैष्णवानिति वैष्णवा होते " । १८… 161–170
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण ( स्तुतियाँ ) समृद्धिशाली बनें । प्रजा स्तुति रूप वाणी है । इन्द्र क्षत्र है, प्रजा विट् है… 171–180
- तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण देवता है । देवता सूर्य्यं से उत्पन्न होते हैं । सूर्य्यं श्राग्नेय है- विशकलन धर्म्मा है… 181–190
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण ' जाघेरा परन्तु इतनी देर में देवता ' संभल ' चुके थे प्रतएव प्राग्नीध्र मण्डप के पास पहुँचते - पहुँचते… 191–200
- तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणं धिष्ण्या ब्राह्मण है । गायत्री के द्वारा अच्छावाक के सोम का अपहरण हो जाने से उसकी शक्ति घट जाती है… 201–210
- तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण " पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मरणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः "… 211–220
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण प्रकृति - यज्ञ में गन्धर्व ही सोम - रक्षा करते हैं अतएव यहाँ भी इस मनुष्य यज्ञ में भी - केवल… 221–230
- तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मणं श्राहवनीय में ले जाया जाता है । मध्य में अन्तरिक्ष पड़ता है… 231–240
- तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण राजानं यजमानः कुरुते । श्रथ सोमक्रयण्यै ( सोम क्रयण्याः ) पदं जघनेन गार्हपत्यं परिकिरति… 241–250
- तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्रह्माण ज्ञात्मक farm! हमारे निवास के लिए हमारे ( यजमान के ) श्रात्मा के स्वर्ग तक व्याप्त होने के लिए आप वहाँ तक… 251–260
- तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणं यूपमानं ब्राह्मण उपरिभाग से द्युलोक को पीड़ा न पहुँचाए । अध्वर्यु जो ' अन्तरिक्षं मा हिंसी: ' यह कहता है-याज्ञवल्क्य… 261–270
- तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण है, अपितु वस्त्र का गिरना है । जिस समय यह वज्र गिरता है तो इसके गिरने से सारे लोक कॉप उठते हैं, भयभीत… 271–280
- तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण तो ऐवैष एतत् । यूपशकलमेव जुहोति तदहैष स्वगाकृतो भवति तथो रक्षांसि यज्ञं नानूत्पिबन्तेऽयं वै बज्न उद्यत… 281–290
- तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण बीमारियाँ वायु के प्रकोप से ही होती हैं । रोगों में वातावरण ही प्रधान है… 291–300
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण विशालकीर्ते विष्णोः - परमं पदं - भूरि - ( प्रभूतम् ) - श्रवभाति सर्वदा प्रकाशते… 301–310
- तृतीय काण्ड ( ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणै प्रहार किया जाता है । लकड़ी जब भी चलाई जाती है, उसका पूर्व भाग पकड़ कर ही चलाई जाती है… 311–320
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मणं यूपैकादशिनी ब्राह्मण न हो कर पितृदेवत्य हो जाएगा । अतः दक्षिण के मार्ग का अवरोध करने के लिए सब से उन्नत यूप दक्षिण… 321–330
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण यूपमुच्छ्रित्य - परिव्ययणात् ( रशनापरिव्ययरणपय्र्यन्तम् ) अध्वर्युः - नान्वर्जति-( नैव हस्त… 331–340
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशूपाकरणं ब्राह्मणे देवताओं ने इनकी इस उद्दण्डता को दूर करने के लिए इन्हें अपना अर्थात् प्राण - देवताओं का अन्न… 341–350
- तृतीय काण्ड ( ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण पशु का आलम्भन किया जाता है, उस कामना को आप पूर्ण करें… 351–360
- अष्टमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' आप्रीब्राह्मणम् ' [ मूल ] तद्यत्रैतत्प्रवृतो होता होतृषदनऽउपविशति । तदुपविश्य प्रसौति प्रसूतोऽध्वर्युः स्रुचावादत्ते । १… 361–370
- तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण आब्राह्मण होने के कारण यह शिथिल हो जाता है । यद्यपि प्रकृति स्वयं इसकी थकान दूर कर सकती है परन्तु अभी इसे आगे… 371–380
- -तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) ' वा ० सं ० ६ । ११ ' । १ शतपथ ब्राह्मण ब्राह्मण [ ३६५ ] जो वाक् रश्मिवति नहीं है सर्वत्र व्यापक है - वह सर्वथा स्थिर है… 381–390
- तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पेशवा ब्राह्मणं अथ चात्वाले मार्जयन्ते । क्रूरी वाऽएतत्कुर्वन्ति यत्संज्ञपयन्ति यद्विशासति. शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या… 391–400
- तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मण तक वितत होता है, अतएव इस यज्ञ को हम श्रातान कहने के लिए तय्यार हैं चारों… 401–410
- तृतीय काण्ड ( ०८ ) वा ० सं ० ६ । १६ | १ शतपथ ब्राह्मण पशुपा ब्राह्मण [ ३६५ ] जिस जगह छुरे से निशान बना लेते हैं, उसी प्रज्ञात श्राश्री: ( कोर ) में छुरा… 411–420
- तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण " यदु बाह्येन न हरन्ति । श्रग्रेण यूपम् । बहिर्द्धा ह यज्ञात् कुर्युः… 421–430
- तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मणं करते ही दे दिया जाए तो अङ्गकर्म होता है । यदि न दिया जाए तो देवता का अपमान होता है… 431–440
- तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण पूषा काही वेग है । इसी वेग के लिए हे बसा - द्रव्य! तुम्हारा ग्रहण करता हूँ- ' पूष्णो रह्या ' इति ||… 441–450
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथं ब्राह्मणे पशुपुरोडाश ब्राह्मणे हवि पाक के अनन्तर अध्वर्यु जुहू से पृषदाज्य ले कर - श्रर्थात् हृदयावदान के लिए जुहू -… 451–460
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण स्विष्टकृद्याग और उपयट् - वे कर्म्म इन नामों से प्रसिद्ध हैं… 461–470
- तृतीय काण्ड ( अ ० 5 ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण करते हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि पशु अपने स्वरूप से अक्ष्णया क्रम से ही चलता है… 471–480
- तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण " थ पशुं सम्मृशति । एतहि संमर्शनस्य कालः… 481–490
- तृतीय काण्ड ( ०८ ) १. ' ऋग्वेद मं ० ७ । ६३ | ४ | २. ' प्रश्नोपनिषद् ११८ ' । शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण ( सामवेद पू ० ६ | १ | ३. ' ऋग्वेद मं ० १… 491–500
- तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्राजानुयाज ब्राह्मणे उदय मांस से गुद की पुष्टि ( गुद- प्रारण की कमी ) क्यों कर पूरी हो जाएगी? - इस प्रश्न का उत्तर… 501–510
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मरण प्रयाजानुयाज ब्राह्मणे " श्री कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्यं च… 511–520
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) पानी से व्याप्त हो रहा है । अवस्था में ' यज्ञ गच्छ ' कहना याज्ञवल्क्य कहते हैं-' वा ० सं ० ६ । २१ '… 521–530
- नवमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' पश्वेकादशिनी - ब्राह्मणम् ' [ मूल ] प्रजापतिर्वै प्रजाः ससृजानो रिरिचान - इवामन्यत… 531–540
- तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण [ ५२७ ] पश्वेकादशिनी ब्राह्मण ( ऋग्वेद मं ० १० । १२१ । १० ) ( यजुर्वेद ८३६ ) उसे भी प्रजापति कह सकते हैं… 541–550
- तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) ये तीस - वही एक अग्नि है । ही है । अन्त के बारहवें आदित्य का नाम सारे देवता हैं… 551–560
- नवमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' वसतीवरी- ब्राह्मणम् ' [ मूल ] यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत । तस्य रसो द्रुत्वापः प्रविवेश तेनैवैतद्रसेनापः स्यन्दन्ते… 561–570
- -तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) १ ' रामपूर्व ० उप ० ३ । ६ ' । ३ ' ऐ ० ब्रा ० अ ० १ । १५ ' । शतपथ ब्राह्मण २ ' तां ० ब्रा ० ६ । ६ । १० ' । ४ ' ऐ ० ब्रा ० १ । १६ '… 571–580
- तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण सतीवरी ब्राह्मणे वसतीवरी पानी को वपा मार्जन के अन्त में ही ले आया जाता है… 581–590
- तृतीय काण्ड ( श्र ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण प्रद्भिरम्मत समोषधीभिरोषधीरिति यश्चासौ पूर्वेद्युराहृतो यज्ञस्य रसो यश्चा-द्याहृतस्तमेवैतदुभयं… 591–600
- तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण [ ५८७ ] सुत्या ब्राह्मण रहने वाली आग्नीध्रीय वेदि पर यह अग्निष्टोम ग्रहीन यज्ञ ( एक तीन कर्म होते हैं… 601–610
- / तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मणं जाता है तो फिर छन्द - रूप प्रातर्य्यावारण के लिए भी देवेभ्यः यही कहना चाहिए… 611–620
- तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण जब यज्ञ का सार भाग निकल कर गन्धर्वो के अधिकार में चला गया तो देवताओं ने विचार किया कि " लो, अब तक तो असुर… 621–630
- तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मरण सुत्या ब्राह्मण " तके - श्रा एव मैत्रावरुणचमसे वसतीवरर्नयन्ति ( मैत्रावरुणचमसे एव आनयन्ति )… 631–640
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिपवणं ब्राह्मण अथ निग्राभ्याभ्यो ग्रहान्विगृह्णते । आपो ह वै वृत्रं जघ्नुस्तेनैवैतद्वीर्ये -पापः स्यन्दन्ते… 641–650
- तृतीय काण्ड ( अ ० 2 ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवरण ब्राह्मण यज्ञकर्त्ता यजमान मनुष्य है- प्रतएव अनृतस्वरूप है । जिस सोम की प्राहुति दी जाएगी, वह सोम देवता है… 651–660
- तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मणे अधिषवण ब्राह्मण यह कहा जाता है | कण्ठ से हृदय तक प्राण रहता है - यह स्थान भी प्रादेश ( १०३ अंगुल ) मात्र ही है… 661–670
- तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राहारण जगति का विक्षेप का - क्षोभ का - प्रशान्ति का - हलचल का - महकमा है, सब के अधिष्ठाता इन्द्र ही हैं… 671–680
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण यह अध्वर्यु -" प्रागपागुदगधराक् सर्वतस्त्वा दिश श्राधावन्तु । श्रम्ब निष्पर समरी-विदाम् "… 681–690
- शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / -भाष्य / सं ० / पंक्ति - संख्या २६८ श्र ०११७ 33 श्र ०११८.. २७१ अ ०… 691–694