Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 421–430
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 421–430
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण " यदु बाह्येन न हरन्ति । श्रग्रेण यूपम् । बहिर्द्धा ह यज्ञात् कुर्युः । तस्मा-दन्तरेण यूपं चाग्निं च हरन्ति " | इस प्रकार यूप और अग्नि के बीच में हो कर प्रतिप्रस्थाता वपा को आहवनीय से दक्षिण में ले श्राता है । दक्षिण की ओर आ कर प्रतिप्रस्थाता काय्र्यमय वपाश्रपणी पर मंढी हुई वपा को उस माहवनीय में पकाता है-" दक्षिणतः परीत्य प्रतिप्रस्थाता श्रपयति ॥ २० ॥
इस उत्तरावेदि पर एक घृत का पात्र रक्खा रहता है - जिसका नाम है ध्रुव । जब - जब श्राज्याहुति का काम पड़ता है, तब - तब ही स्रवा ( जुहू ) से इसमें से प्राज्य ले लिया जाता है । जैसे पात्र में स्थित पानी शान्त रहता है, तथैव ध्रुवास्थ आाज्य शान्त रहता है । परन्तु जब जुहू को उसमें डाला जाता है तो वह स्थिति से च्युत हो जाता है । स्थिति का विनाश हो जाता है - वह घृत हिल पड़ता है । इसी बात को बतलाने के लिए उपहत्य कहा है उस ध्रुवा में से घृत ले कर-।अस्तु, प्रकृत में कहना यही है कि वपा को पकाए बाद अध्वर्यु जुहू से १ " श्रग्निराज्यस्य वेतु स्वाहा " " वह मन्त्र बोलता हुआ उस वपा पर उस घृत की आहुति देता है -" प्रथ स्रुवेणोपहत्याज्यं - अध्वर्युर्वपामभिजुहोति - अग्निराज्यस्य वेतु स्वाहा - इति ( मन्त्रेणेति शेषः ) " । यह अग्नि प्राज्य को खाय इस आज्याहुति को अग्निदेवता ग्रहण करें । यह मन्त्रार्थ है । जैसे पितरों के लिए " स्वधा " बोला जाता है तथैव देवताओं के लिए ' स्वाहा ' बोला जाता है । बिना स्वाहा के और वौषट् के देवता लोक आहुति नहीं लेते । जैसा कि मन्त्र श्रुति कहती हैं --" स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः " इति । ( ऋग्वेद मं ० १०।११०।११ ) इसी अभिप्राय से ब्राह्मण श्रुति भी कहती है-" स्वाहाकारेण वा वषट्कारेण वा देवेभ्योऽन्नं हूयते इति " । ( इति श्री सायणाचार्य ) स्वाहाकार से दिया हुआ हव्य ही देवताओं की प्राहुति बनता है । जिस घृत की प्राहुति वपा पर डाली जाती है - यह घृत प्राग्नेय है । अतएव ' तेजोवैघृतम् ' कहा जाता है । वपा भी घृत ही है । दोनों के मेल से वपा भी समृद्ध हो जाती है एवं वपा में जो कुछ कच्चाई रह जाती है, वह भी इस घृत से पूरी हो जाती है । इस प्रकार इस आहुति से इस वपा के परमाणु ( स्तोक ) त हो जाते हैं एवं स्वाहाकृत हो १ वा ० सं ० ६।१६ । [ ४०५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण यही है कि सारे देवता आहव-कर प्राहुतियाँ बन कर आहवनीय श्रग्नि में प्राप्त हो यद्यपि जाते हैं वपा । तात्पर्य भी घृत ही है परन्तु जब इसके साथ नीयाग्नि में रहते हैं । घृत अग्नि की प्रियवस्तु है । वस्तु बन जाती वपा अग्नि की प्रत्यन्त ही प्रिय साक्षात् घृत का सम्बन्ध और कर दिया जाता है तो यह देवता हवि ग्रहण करते ही नहीं प्रतएव ' स्वाहा ' है । एवं जब तक स्वाहा न बोला जाए, तब तक चूँकि से यह हवि देवताओं की आहुति बन जाती हैं । कह दिया जाता है । इस प्रकार स्वाहा बोल कर देने देता है । वपाहुति का ग्राहवनीयाग्नि में पहुँचना श्राहवनीयाग्नि इसे ग्रहण करके सारे देवताओं को पहुँचा सारे देवताओं में पहुँचना है ---" तथो हास्य ( वपा द्रव्यस्य ) एते स्तोकाः ( परमाणवः ) - शृताः ॥ स्वाहाकृता - आहुतयो भूत्वाग्नि प्राप्नुवन्ति ॥ २१ इसके बाद प्रध्वर्यु - होता के प्रति-" स्तोकेभ्योऽनुब्रूहि - इति " ॥ वपा के परमाणु स्तोक ( हे होत:! स्तोकों के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलो ) यह प्रैष करता है जो पाँच बनते हैं । पृथिवी में रहने वाले हैं । ये ही स्तोक अग्नि द्वारा ऊपर जा कर वृष्टि का कारण घृत परमाणु हैं - वे ही अग्नि द्वारा ऊपर खिंच पशु हैं, उनकी जो वपा है अर्थात् शरीरस्थ सार भाग है - हैं, वे वृष्टि बन कर वापस आ जाते हैं । चूंकि कर वृष्टि का कारण बनते हैं । यहाँ से जो स्तोक जाते वपास्तोकों के लिए होता श्राग्नेयी अनुवाक्या-इन स्तोकों को जमीन पर से अग्नि ले जाते हैं, श्रतएव इन आग्नेयी ऋचा बोलता है- इसका कारण ऋचा बोलता है । इन वपास्तोकों के लिए किसलिए होता बतलाते हैं- " तद्यदाग्नेयी स्तोकेभ्योऽन्वाह - ( तदुच्यते ) " । इतः प्रदानां समझनी चाहिए । यदि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वर्षा ऋतु में जो वृष्टि होती है - । वह- इस भूलोक से तालाब - पक्षी - पशु ( पुरु-यहाँ से आकाश में पानी न जाए तो श्राकाश से बरसे ही नहीं में जाती हैं । अग्नि द्वारा ऊपर गया बादि ) इन तीनों में से पानी की बूंदें पार्थिवाग्नि द्वारा प्राकाश है, उसके द्वारा वायु संयोग से हुआ जो पानी है, वह द्युलोक में बरसता है । सूर्य की जो सुषुम्णानाडी । अतएव - " नाड्यो वायु संयोगादारोहणम् " अग्निदेव पार्थिव पानी के बिन्दुनों को ऊपर खींच ले जाते हैं जा कर वायु में जमा हो जाता है । आकाश यह कहा जाता है । अग्नि द्वारा गया हुआ पानी श्राकाश में दृष्टि करते हैं, एवं पर्जन्य भूलोक में में रहने वाले एक पर्जन्य देवता हैं । इस प्रकार श्रग्नि द्युलोक में वृष्टि करते हैं । श्रतएव श्रुति कहती है-" समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः । भूमि पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः " ॥ इति । [ ४०६ ] ( ऋग्वेद मं ० १।१६४ | ५१ )
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण इसी अभिप्राय से ब्राह्मण श्रुति भी कहती है-" अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति मरुतः सृष्टां नयन्ति यदा खलु वा असावादित्यो - न्यङ् रश्मिभिः पय्र्यावर्तते प्रथ वर्षति " । ( तै ० सं ० कां ० २।४।१०।२ ) हा प्रकृत में यही है कि वर्षाकाल में जो पानी बरसता है - वह इसी पृथिवी लोक की ' वस्तु है । श्राप जो पानी बरसता देख रहे हैं, वह यहाँ से गया हुआ है । यहाँ से अग्नि द्वारा जो पानी के स्तोक ऊपर जाते हैं, वे ही बरसते हैं । अपि च वृष्टि का पानी पृथिवी से गया हुआ है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जिस देश में वृक्ष अधिक होते हैं, उस देश में वृष्टि बहुत ही अधिक मात्रा में होती है, कारण इसका यही है कि वृक्षों से पानी अधिक खिंचता है, अतएव वहाँ पानी बरसता भी अधिक है । मिथिला श्रादि प्रान्तों में अधिक वृष्टि होने का यही कारण है । चूंकि रेगिस्तान में वृक्ष और तालाब वगैर: नहीं होते, वहाँ मनुष्यों के शरीर में से ही पानी खिंचता है अतः रेगिस्तान में बहुत ही स्वल्प वृष्टि होती है । इस से भी सिद्ध हो जाता है कि वृष्टि इतः प्रदाना ही । यह जो पानी है, वह घृत स्वरूप है, सोम-स्वरूप है । अतएव श्रुति कहती है-" कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति । त श्रावृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते " ॥ ( ऋग्वेद मं ० १।१६४।४७ ) यहाँ पर यह जो बपा स्तोक है, वह घृत ही है । यही ऊपर जा कर वापस बरसता है । ये स्तोक चूंकि अग्नि द्वारा ऊपर जाते हैं, अतएव इन स्तोकों के लिए आग्नेयी अनुवाक्या ऋचा बोली जाती है । जिस वपा का आज इस आहवनीय में हवन किया जाता है, वही वपा यजमान के लिए वृष्टि बन कर यजमान को संपत्तियुक्त बनाती है-वृष्टि इतः प्रदाना है । इसी पृथिवी - लोक से अग्नि ही वृष्टि की याञ्चा करते हैं । अर्थात् पार्थि-पार्थिव पानी के बिन्दुनों को आकाश में जमा कर पर्जन्य देवता से वृष्टि की श्राशा किया करते हैं । वह अग्नि इन पार्थिव घृत स्तोकों से उन वर्षमाण घृतस्तोकों की अर्थात् वुष्टि की आशा करते हैं । एवं वही स्तोक पर्जन्य द्वारा पृथिवी पर बरस जाते हैं । इस प्रकार प्रकृति यज्ञ में प्रग्ति होता अनुवाक्या द्वारा स्तोकों से - स्तोकों की याञ्चा कर वृष्टि के कारण बनते हैं । तथैव आज यह मनुष्य होता भी • स्तोकाहुति के समय वृष्टि साधक आग्नेयी अनुवाक्या बोलता है -" पार्थिव घृतस्तोक अग्नि द्वारा वृष्टि - रूप में परिणत होते हैं । यदि अग्नि घृतस्तोकों को ऊपर न भेजे तो वृष्टि हो ही नहीं । आज वैध उपायों से अध्वर्यु इन वपास्तोकों को श्राकाश में भेज कर उनके द्वारा यजमान के धन - धान्यदि की वृद्धि चाहता है । चूंकि वृष्टि ही धान्यादि की साधिका है, एवं अग्नि के अधीन है; श्रतएव प्रकृतिवत् इन वपास्तोकों के लिए श्राग्नेयी अनुवाक्या की गई है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं--[ ४०७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मणे " इतः प्रदाना वै वृष्टिः । इतो ह्यग्निर्वृष्टिं वनुते । स एतैः ( पार्थिव-घृतस्तोकैः ) स्तोकैरेतान्त्स्तोकान् ( वर्षमाणान् स्तोकान् ) वनुते । त एते स्तोका वर्षन्ति । तस्मादाग्नेय स्तोकेभ्योऽन्वाह " । जिस समय वह वपा आहवनीय अग्नि में पक कर तय्यार हो जाती है-" यदा ( वपा ) शृता भवति ॥२२ ॥
उसी समय प्रतिप्रस्थाता अध्वर्यु से कहता है - अध्वर्यो! वपा पक कर तय्यार है । अब प्राप उस से प्रचर कीजिए - अर्थात् कर्म कीजिए । तात्पर्य यही है कि जिस समय प्रतिप्रस्थाता वपा को पका कर तय्यार कर ले, उसी समय उसे अध्वर्यु से कह देना चाहिए कि अध्वर्यो! वपा तय्यार है । श्रव प्राप वपा कर्म प्रारम्भ कीजिए । " अथाह प्रतिप्रस्थाता - शृता ( जात । ) प्रचर- - ( प्रचारं कर्म कुरु ) इति " । इस प्रकार प्रतिप्रस्थाता से ' प्रचर ' यह सुन कर अध्वर्यु वपा - होम के लिए जुहू और उपभृत् को हाथ में उठाता है । प्रत्येक कर्म में प्रयाज और अनुयाज ये दो कर्म्म और होते हैं । इसमें पहले प्रयाज होता है बाद में मुख्य कर्म होता है- बाद में अनुयाज होता है । प्रयाज भी ग्यारह ( ११ ) होते हैं, अनु-याज भी ग्यारह ( ११ ) होते हैं । प्रकृत में वपा - होम के पहले - प्रतिप्रस्थाता से ' ता - प्रचार ' सुन कर अध्वर्यु प्रकृतियज्ञवत् - " श्रोश्रावय प्रस्तु- श्रौषट् स्वाकृतिभ्यः प्रेष्य " इत्यादि कह कर - जिस समय होता ' वौषट् ' बोलता है - उसी समय होता के वषट्कार करते ही स्रवा में भरे हुए घृत की ग्राहवनीय में आहुति दे देता है । प्री ब्राह्मण में प्रयाज का स्वरूप बतला दिया गया है । ये प्रयाज कुल बारह ( १२ ) होते हैं । बारह ( १२ हों ) प्रयाज निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं— १ - इध्म । २ - तनूनपात् । ३ - नराशंस । ४ - इडा | ५ - बहि । ६ - द्वार । ७ - नक्तोषासा । ८-दैव्या होतारः । ६- तिस्रो देवीः | १० - त्वष्टा । ११ - द्यावापृथिवी । १२ - स्वाहाकृतिः - इस प्रकार बारह ( १२ ) प्रयाज होते हैं । परन्तु नराशंस और तनूनपात् में विकल्प है, अतएव कुल ग्यारह ( ११ ) प्रयाज रह जाते हैं । इन ग्यारहों ( ११ हों ) में सबसे अन्तिम प्रयाज है - " स्वाहाकृतयः " । चूंकि स्वाहा के लिए स्वाहा बोलना अनुचित है, प्रतएव इस स्वाहाकृति प्रयाज के लिए - स्वाहाकृतिभ्यः स्वाहा न कह कर ' स्वाहाकृतिभ्यः प्रेष्य ' यह कहा गया है । कहना यही है कि वपा - होम से पहले अध्वर्यु वषट्कार पूर्वक प्रयाज के लिए घृताहुति देता है । " स्रुचावादाय - श्रध्वर्युः - अतिक्रम्य - श्राश्राव्याह- स्वाहाकृतिभ्यः प्रेष्येति । वषट्कृते जुहोति ॥ २३ ॥
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) धातपथ ब्राह्मण पशुपा ब्राह्मण इस वपा होम में चार काम होते हैं - ( १ ) प्रयाज ( २ ) वपाभिघारण ( ३ ) पृषदाज्याभिघारण एवं ( ४ ) वपा होम | सबसे पहले प्रयाज होता है, अन्त में वना होम होता है । मध्य में वपाभिधारण और पृषदाज्याभिघारण होता है । इन दोनों में पृषदाज्याभिघारण अनुयाज स्थानापन्न है । दधिमिश्रित को ' पृषदाज्य ' कहते हैं । इस पृषदाज्याभिघारण और वपाभिघारण में मतभेद है । भगवान् याज्ञ-घृत वल्क्य का मत है कि प्रयाजहवन करते ही पहले वपाभिघारण करना चाहिए एवं बाद में पृषदाज्या-भिघारण करना चाहिए । भगवान् याज्ञवल्क्य के शिष्य मधुश्रवा अपने गुरु का मत बतलाते हुए कहते हैं-वह अध्वर्यु जुहू से प्रयाज - हवन कर - पृषदाज्य से पहले वपाभिघारण करता है । प्रयाज करने कह के अनन्तर - जुहू में प्रयाज से शेष बचा हुआ जो घृत है, उसे वपा पर डालने का नाम ही ' वपाभिघार ' लाता है । पहले यही करता है । बाद में उस वपा पर पृषदाज्य का श्राधारण करता है । " हुत्वा ( प्रयाजं हुत्वा ) वपामेव अग्रे ( पृषदाज्यात् प्राक् ) श्रभिघार-यति - श्रथ पृषदाज्यम् ” । परन्तु कृष्ण यजुर्वेदीय चरकाध्वर्यु लोग पहले पृषदाज्याभिघारण करते हैं - बाद में ' वपाभिघार ' करते हैं । ऐसा करने में उपपत्ति वे यह बतलाते हैं - यह पृषदाज्य प्राण - स्वरूप है । इससे प्रारण उत्पन्न इस होता है । प्राकृत यज्ञ में जो पृषदाज्य है, उससे पशुनों में प्रारण उत्पन्न होता है । उसी की नकल पर बैध यज्ञ में भी प्राण - स्वरूप पृषदाज्याभिघारण किया जाता है । आज प्रलम्भन से पशु के प्राण निकल गए हैं । अतएव प्राज पशु मृत हो गया है । देवता अमृतस्वरूप हैं । वे अमृताहुति ही लेते हैं, अतएव श्री श्री कामों से पहले इस पशु में प्राण डालना चाहिए जिससे कि यह दिव्यान्न बन जाये । पृषदाज्य प्राण - स्वरूप है । बिना प्राण के वपा रद्दी चीज है । श्रतः सबसे पहले पृषदाज्याभिघार करना चाहिए, बाद में वपाभिघार करना चाहिए । इस प्रकार पृषदाज्य प्राण है- पहले प्राणाधान करना चाहिए, यह उपपत्ति बतलाते हुए चरकाध्वर्यु लोग वपाधार से पहले पृषदाज्याधार ही करते हैं-" तदु ह चरकाध्वर्यवः - पृषदाज्यमेवाग्रेऽभिघारयन्ति - प्राणः पृषदाज्य-मिति वदन्तः " | वैदिक काल में यजुर्वेद के प्राचार्य महर्षि वैशम्पायन थे । इनके पास सहस्रों शिष्य थे । इनमें से • एक याज्ञवल्क्य भी थे, जो महर्षि वैशम्पायन के शिष्य थे । याज्ञवल्क्य को छोड़ कर वे सब चरकाध्वर्यु कहलाए, जैसा कि भगवान् व्यास कहते हैं-" वैशम्पायन शिष्यास्ते चरकाध्वर्यु वोऽभवन् । यच्चेरुर्ब्रह्महत्यांहः क्षपणं स्वगुरोर्व्रतम् " इति । ( पुराण ) [ voε ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुव ब्राह्मण ये चरकाध्वर्यु ही आगे जा कर कृष्ण यजुर्वेदी कहलाए एवं ये ही - तैतिरीय नाम से प्रसिद्ध हुए । भगवान् याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेदी कहलाए । किसी कारण से इन दोनों में परस्पर शत्रुता हो गई थी । चरकाध्वर्यु याज्ञवल्क्य का खण्डन करने में तत्पर रहते थे परन्तु याज्ञवल्क्य का विज्ञान इतना बढ़ा-चढ़ा था कि जिसके सामने उनको सिर झुकाना पड़ा था । बडे - बड़े यज्ञों में प्रायः याज्ञवल्क्य ही अध्वर्यु बनाए जाते हैं । वहाँ पर और और कर्म के लिए चरकाध्वर्यु लोग भी बुलाए जाते थे । एक समय किसी ने अपने यहाँ सोमयाग किया और उसमें चरकाध्वर्युत्रों को और भगवान् याज्ञवल्क्य दोनों को बुलाया गया । याज्ञवल्क्य यद्यपि उस समय बहुत वृद्ध हो गए थे तथापि यजमान के आग्रह से उन्हें अध्वर्यु बनना पड़ा । यह देख कर चरकाध्वर्यु जल उठे । परन्तु क्या करते? लाचार थे । फिर भी वे कोई ऐसा मौका ढूँढने लगे, जिससे याज्ञवल्क्य को नतमस्तक हो जाना पड़े । आखिर होते - होते जब वपाभिघार का समय श्रय एवं याज्ञवल्क्य ने पृषदाज्य के पहले वपाभिघार किया तो इस प्रकार याज्ञवल्क्य को पृषदाज्य से पहले वपाभिघार करते देख कर उसी समय चरकाध्वर्यु ने याज्ञवल्क्य पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ' अरे देखो! देखो! यह अध्वर्यु अपने प्राण को सर्वथा खो बैठा । पृषदाज्य प्रारणस्वरूप है, इसे वपा -भिघार से पहले करना चाहिए था, परन्तु इससे उल्टा किया एवं ऐसा करके इसने अपने हाथ के प्राण खो दिए । इसके हाथों को प्रारण अभी छोड़ देंगे अर्थात् पद्धति - विरुद्ध करने से अभी इसके हाथ सूख जाएँगे । इस प्रकार चरकाध्वर्यु ने पहले वपाभिघार करने वाले याज्ञवल्क्य पर आक्षेप किया-" तदु ह याज्ञवल्क्यं चरकाध्वर्युरनुव्याजहार - एवं कुर्वन्तं ( पृषदाज्यम-तिक्रम्य वपामेवादावभिघारयन्तं याज्ञवल्क्यं चरकाध्वर्युरनुव्याजहार - आक्षिप्त-वान् ) - प्राणं वाऽप्रयमन्तरगादध्वर्युः प्राण एवं हास्यतीति ( इति व्याज-हार ) " ॥२४ ॥
इस प्रकार चरकाध्वर्यु से श्रधिक्षिप्त वृद्ध याज्ञवल्क्य ने उसी समय अपने दोनों हाथों पर दृष्टि डालते ' हुए बड़े जोर - शोर के साथ - अपने दोनों हाथ उठा कर कहा कि हे ऋत्विजो! यह देखो - ये दोनों बूढ़े हाथ अब भी जैसे के तैसे ही मौजूद हैं जैसे कि वपाभिघार के पहले थे । विज्ञान में अपने को सर्व-- श्रेष्ठ समझने वाले उस वैज्ञानिक का वचन आज कहाँ गया? " अरे देखो! याज्ञवल्क्य ने पहले वपा -भिघार करके बड़ा अनर्थ कर लिया - प्रभी इसके हाथों का प्राण निकल जाएगा " - इस प्रकार की डींग मारने वाले का वचन कहाँ चला गया? आप सब लोग मेरे इन बूढ़े हाथों पर दृष्टि डालिए । इनमें से जरा सा भी प्राण नहीं निकला है - प्रतएव हमारे खयाल से ' प्रारण एनं हास्यति ' यह डींग मार कर वपा-भिवार के प्राथम्य का विरोध करने वाले चरकाध्वर्युनों की बात का जरा सा भी आदर नहीं करना चाहिए- पहले वपाभिघार ही करना चाहिए -स ह स्म ( एवमधिक्षिप्तः सः याज्ञवल्क्यः ) बाहू - श्रन्ववेक्ष्य आह- इमौ पलितौ बाहू क्व स्विद् ब्राह्मणस्य ( वैज्ञानिकस्य चरकाध्वर्योः ) बचो बभूवेति । [ ४१० ] 1
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुवपां ब्राह्मण ( अर्थात् प्रारण एनं हास्यति - इत्येतदात्मकं वचः क्व बभूव - कुत्र गतम् ) इति । न तदाद्रियेत - ( तस्मात् तद् वचनं नादर्त्तव्यम् ) ” । अपि च पहले वपाधार करने में पद्धति भी अनुकूल है । कुछ दोष है नहीं - एवं " प्रकृतिवद् विकृतिः प्रकृति कर्त्तव्या इस " ' सिद्धान्त का पालन हो जाता है । अतएव पहले वपाभिघार ही करना चाहिए पर उस । हवि-यज्ञ में ( दर्शपूर्णमास में ) पाँच ही प्रयाज होते हैं और पाँच ही अनुयाज होते हैं । वहाँ ध्रुवा का ही यज्ञ में पाँचवें प्रयाज के अनन्तर जो कि उत्तम ( आखिरी ) प्रयाज हैं - और कर्म से पहले के अभिचार करते हैं एवं उसी ध्रुवा के लिए पहले के आाज्य भाग की आहुति दी जाती यहाँ है । पर उसी पहले ध्रुवा वपा-लिए पहले प्राज्य भागाहुति देता हुआ अध्वर्यु पहले ध्रुवाभिघार ही करता है । बाद चूंकि में पृषदाज्याभिघार हवन करेगा अतः इसे पहले प्रकृतियज्ञवत् वपाभिघार ही करना चाहिए एवं है - पहले उसी का करना चाहिए | तात्पर्य यही है कि हविर्यज्ञ में जिसके लिए पहले प्राहुति वपाभिघार दी जाती ही होना चाहिए अभिधार होता है, और काम बाद में होता है । तद्वदेव यहाँ पर पहले इस प्रकार -क्यों कि स्वाहाकृति नाम के उत्तम ( ग्यारहवें ) प्रयाज के अनन्तर वपा कहते की हैं ही --- आहुति होती है । उभयथा- पहले वपाभिघार ही करना चाहिए । इसी अभिप्राय से " उत्तमो वा एष ( स्वाहाकृति नामकः ) प्रयाजो भवति । इदं वै हविर्यज्ञ उत्तमे प्रयाजे ध्रुवामेवाग्रेऽभिघारयति - तस्यै हि प्रथमावाज्यभागौ होण्यन् भवति श्रथ । ari वा s श्रत्र प्रथमां होष्यन् भवति । तस्माद् वपामेवाग्रेऽभिघारयेत् । पृषदाज्यम् " - इति । , वह भी तो हबि यहाँ पर एक प्रश्न होता है कि जैसे वपा हवि है तैसे ही वपातिरिक्त जो । ऐसी पशु है अवस्था में केवल ही है । इतना ही नहीं, यदि वास्तव में देखा जाए तो असली हवि पशु ही है किया जाए? इसी का उत्तर पा का ही अभिघार क्यों किया जाता है? क्यों न पशु का भी अभिघार देते हैं-" अथ यत् पशुं नाभिघारयति - ( तस्य कारणमुच्यते ) " । तो अग्नि सम्बन्ध हो यह पशु अभी कच्चा है । वपा का तो परिपाक हो गया है - वपा के उसी साथ में ब्राह्मणस्पत्य पवित्र गया है । जिसके परमाणु अग्निसम्बद्ध हो जाते हैं, वह तप्ततनू कहलाता है, है, कच्चा है उसमें सोम - सत्ता रहती है; एवं यही हवि देवता ग्रहण करते हैं । परन्तु जो प्रतप्ततनू । जैसा कि श्रुतिकहती है-श्रासुर भाव रहता है । जो वस्तु कच्ची रहती है, वह अपवित्र रहती है
" पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्रारिण पर्येषि विश्वतः ।
अप्ततनूनं तदामो अश्नुते शृतास इद् वहन्तस्तत् समाशत " ॥
( ऋग्वेद मं ० 1८३ | १ ) [ ४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण तो बस, हम कच्चे हवि का, जो कि होम के प्रयोग्य है- प्रासुरभाव युक्त है - प्रभिघार न कर डालें, श्रतएव पशु का श्रभिघार नहीं किया जाता-" थ यत् पशुं नाभिघारयति - नेत्- अशृतमभिघारयाणि " - इति । प्रश्न होता है कि पशु - यज्ञ में पशु ही का अभिघार नहीं हो - यह कैसे हो सकता है? पशु - यज्ञ हो रहा है, उसमें पशु ही का अभिधार नहीं । इसी प्रश्न का समाधान करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-यह श्रध्वर्यु जो कि इस पशु वपा का अभिघार कर देता है, इसी से सारा पशु अभिघारित हो जाता है । क्यों कि वपा पशु का सार भाग है, हृदय का मेद है । हृदय का नाम ही तो प्रजापति है । इसी प्रजापति के आधार पर तो सारा शरीर अवलम्बित है । वपा सारभाग है, प्रधान है । जैसे राजा के बुलाने पर राजा के अनुयायी बिना बुलाये ही श्रा जाते हैं, एवमेव सारभाग के अभिवार से सारे पशु का अभिधार हो जाता है । कहना यही है कि पहले वपाभिघार करना चाहिए एवं बाद में पृषदा-ज्याभिचार करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" एतदेवास्य सर्वपशुरभिघारितो भवति यद् वपामभिघारयति । तस्माद् वपामेवाग्रेऽभिघारयेत् श्रथ पृषदाज्यम् " ॥ २५ ॥
इस प्रकार वपाभिघार और पृषदाज्याभिचार - पक्ष को सिद्धान्त बना कर प्रागे की इति कर्त-व्यता बतलाते हैं- जुहू में सबसे पहले घृतास्तरण करते हैं । इसके बाद उस घृत पर एक सोने की टिकड़ी रखते हैं । इसके ऊपर वपा रखते हैं-" प्रथाज्यमुपस्तृणीते । प्रथ हिरण्यशकलमवदधाति " । हमने बतलाया था कि वपाश्रपणी लकड़ियों में वपा लगी हुई है । इस समय उन दोनों लकड़ियों से दोनों वपानों को अलग कर लेता है । बस, जिस समय अध्वर्यु वपा का अवदान ( हिस्सा - विभाग-पृथक् करण ) करता है, उसी समय होता के प्रति अनुवाक्या के लिए-" अग्नीषोमाभ्यां द्यागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि " । यह करता है | ( हे होता:! श्रग्नीषोम देवता के लिए अग्नीषोमीय इस प्रतिष्ठा पशु की जो वपा है, उसके लिए अनुवाक्या करो ) -इस प्रकार अनुवाक्या के लिए प्रेष करके उस वपा को आज्यास्तरण के ऊपर रक्खे हुए हिरण्य-शकल पर रख देता है । वपा को रख कर उस पर एक सोने की टिकिया और रखता है । इसके बाद उस सोने की टिकिया पर दो बार घृत को डारता है । सबसे पहले घृतास्तरण करता । बाद में सुवर्ण रखता है । उस पर वपा रखता है । उस पर फिर वपा रखता है । उस पर फिर सोना रखता है । उस पर दो बार घृत डारता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--[ ४१२ ] !
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मणं " प्रथाज्यमुपस्तृणीते । श्रथ हिरण्यशकलमवदधाति । श्रथ वपामवद्य-नाह अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि इति । अथ हिरण्यशकलमव-दधाति । अथोपरिष्टाद् द्विराज्यस्याभिघारयति ॥२६ ॥
१. घृत ( अमृतोपमः ), २. हिरण्य, ३. वपा, ४. हिरण्य, ५. द्विराज्याभिधार ( मृतापिधान ) । हविर्यज्ञ में प्रधान हवि के दोनों श्रोर घृत का - उपस्तरण और अपिधान किया जाता है । इसी को अमृतोपस्तरण श्रौर अमृतविधान कहते हैं । इसी प्रकार प्रकृतियज्ञवत् यहाँ पर भी वपा के दोनों ओर घृत का सम्बन्ध करना तो उचित है, परन्तु प्रकृतियज्ञ से अतिरिक्त हिरण्यशकल और रक्खे जाते हैं । यहाँ वपा के दोनों ओर सोने की टिकिया और रक्खी जाती हैं- इसका कारण क्या? - यही बत लाते हैं-" तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् कारणात् ) हिरण्यशकलावभितो भवतः -( तदुच्यते ) " । ऋत्विक् लोग - इस पशु को ( वपा को ) जिसे कि अग्नि से युत कर देते हैं - अर्थात् वपा की आह-वन अग्नि में आहुति देते हैं - वे ऋत्विक् उस पशु को सदा के लिए मार डालते हैं । वपा पशु का सार-भाग है । इसे श्रग्नि में डाल देना पशु को सदा के लिए मृत्यु - शय्या पर सुला देना है । देवता अमृत-रूप हैं - वे अमृत को ही खाते है, न कि मर्त्य पदार्थ को । यह सुवर्ण अमृत है, प्रायु है । सुवर्ण से सौर तेज अभिप्रेत है । सौर तेज ही सुवर्ण बना हुआ है । यही सौर तेज जड़चेतन का आत्मा है । अतएव " सूथ्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " " यह कहा जाता है । ऐसी अवस्था में सौरतेज स्वरूप अतएव आयुरूप हिरण्य को इस पशुरूप वपा के दोनों श्रोर लगा देना पशु को अमृतस्वरूप आयु में प्रतिष्ठित करना है- प्रर्थात् सुवर्ण लगा कर उसमें प्रारणाधान करना है । ऐसा करने से यह पशु ऊर्ध्वलोक की ओर चला जाता है अर्थात् उठ खड़ा होता है एवं जीवित हो जाता । इस का अर्थ यह न समझ लेना कि वापस पशु चलने - फिरने लगता है । नहीं नहीं - उसे देवता ग्रहण कर लेते हैं - वह देवताओं में चला जाता है - देवतालोक के लिए वह जीवित हो जाता है- " उदेति तथा संजीवति का यही तात्पर्य है । मरने से जो प्रांसुर भाव प्रविष्ट हो जाता है, सुवर्ण - विद्युत् से वह आसुर - भाव निकल जाता है- यही तात्पर्य्यं है । बस इसीलिए वपा के दोनों ओर सोने की टिकिड़ी लगाई जाती है - इसी अभिप्राय से कहते हैं ---" घ्नन्ति वा एतत् पशुं यदग्नौ जुह्वति । श्रमृतमायुहिरण्यम् । तदमृत प्रायुषि प्रतितिष्ठति । तथा त ( पृथिवीस्थानात् ) उदेति । तथा संजीवति । तस्माद्धिरण्यशकलावभितो भवतः " । १ ऋग्वेद मं ० १ ११५।१ । [ ४१३ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मण - इस प्रकार वपा के दोनों ओर घृत एवं सुवर्ण सम्बद्ध कर - श्रीश्रवयेत्यादि आश्रावण प्रत्याश्रावण कर्म कर अध्वर्यु ऋत्विक् के प्रति-यह प्रेष करता है-' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपां मेदः प्रेष्य - इति " ।
" न प्रस्थितमित्याह प्रसुते प्रस्थितमिति । वषट्कृते जुहोति " ॥२७ ॥
इस प्रकार वपा की आहुति दे कर उन दोनों वपाश्रपणियों को श्रामने- सामने करके ( एक का मुख पूर्व की ओर एवं एक का पश्चिम की ओर करके ) वह अध्वर्यु उन दोनों को स्वाहा बुलते ही निम्न मन्त्र बोलते हुए आहवनीय में डाल देता है--" ऊर्ध्वनभसं मारुतं गच्छतम् " । ( वा ० सं ० ६।१६ ) जिन लकड़ियों में वपा को पकाया था, वे लकड़ियाँ व्यर्थ न हो जाएँ जिनसे देवता का अन्न पकाया था, ऐसी पवित्र वस्तु किसी अपवित्र स्थान में न चली जाए, अतएव उन्हें मन्त्रपूर्वक ग्राहवनीय में डाला गया है । ऊर्ध्व आकाश में वायु लोक में जहाँ पर कि देवता रहते है, आप चले जाइए । मन्त्र का यही अर्थ है-" नेदिप्रमुया सतो याभ्यां वपामशिश्रपामेति ” ॥ २८ ॥
पा की आहुति देने की क्या आवश्यकता है, यह बतलाते हैं-" तद् यद् वपया चरन्ति ( तदुच्यते ) " । जिस देवता के लिए पशु का श्रालम्भन करते हैं, उसी देवता को इस मेध से खुश करते हैं । इस प्रकार मेधाहुति से तृप्त हो कर वह देवता शान्त हो कर जब तक याग की हवियाँ पकती हैं - तब तक शांत रहता है । तात्पर्य यही है कि जिस समय जिस देवता का नाम ले कर पशु - यज्ञ में लाया जाता है, बस तभी से उस देवता का मन उस पशु में डाला जाता है । अतएव उचित यही है कि पशु का आलम्भन करते ही देवता को दे दिया जाए । परन्तु ऐसा नहीं होता । श्रालम्भन के बाद कितने ही श्रङ्गकर्म श्रौर करने पड़ते हैं, बाद में पशु की आहुति होती है । ऐसी अवस्था में उस आगत देवता का अपमान होता है । यदि कोई निमन्त्रित मनुष्य द्वार पर आए और उस समय यदि उसे भोजन न करा कर हम और और कामों में लग जाएँ तो उसी समय अतिथि नाराज हो जाता है । उसकी नाराजगी मिटाने के लिए पहले उसका पान - बीड़ी से तथा और प्रौर विनोद - सामग्री से सत्कार करना पड़ता है । ऐसा करने से उसका क्षोभ मिट जाता है । भोजन में यदि थोड़ा विलम्ब भी हो जाए तो उसे भी बर्दाश्त कर जाता है । बस ठीक वही हालत यहाँ भी है । पशु के आलम्भन करते ही देवता श्रा जाता है । परन्तु आहुति और और कर्म के बाद दी जाती है । ऐसा करना देवता को क्षुब्ध करना है । यदि श्रालम्भन [ ४१४ ]