Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 451–460
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 451–460
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथं ब्राह्मणे पशुपुरोडाश ब्राह्मणे हवि पाक के अनन्तर अध्वर्यु जुहू से पृषदाज्य ले कर - श्रर्थात् हृदयावदान के लिए जुहू - दधि-मिश्रित आज्य ले कर शमिता के पास जा कर शमिता से पूछता है कि " हे शमिता! हवि पक गया? शमिता उत्तर देता है - हाँ पक गया " जिस समय शमिता " हाँ पक गया " यह कहता है, उसी समय अध्वर्यु धीरे से " यह देवताओं की चीज है " यह बोल देता है । अध्वर्यु जिस समय शमिता से " शृतं हविः " यह पूछता है, उस समय अध्वर्यु की वाक् उस हवि की ओर लगी रहती है । वाक् बिना प्रारण के नहीं रहती, प्राण बिना मन के नहीं रहता । अतएव वाक् से मन, प्राण, वाक् - तीनों का ग्रहण हो जाता है । तीनों की समष्टि का नाम ही आत्मा है । ऐसी अवस्था में " हवि पक गई न? " श्रध्वर्यु का यह पूछना - अपने मन - प्राण वाङ्मय आत्मा को हवि की ओर लगाना है । वस्तु है- देवता - सम्बन्ध हो गया अध्वर्यु का यह सर्वथा अनुचित है । बस इस अनौचित्य को हटाने के लिए - हवि पर से अपनेपन को ममत्व को हटाने के लिए ' अध्वर्यु ' " पक गया " शमिता के यह कहते ही " तद्देवानाम् " यह कहता है । " पका हुआ हवि देव-ताओं की वस्तु है, न कि मेरी " अध्वर्यु के ऐसा कहने से वास्तव में हवि से श्रध्वर्यु का ममत्व हट जाता है । अध्वर्यु जुहू में पृषदाज्य ले कर शमिता को ' शृतं हविः शमिता ' यह कहना चाहिए । उत्तर में शमिता को ' शृतम् ' यह कहना चाहिए । एवं ' शृतं ' यह सुनते ही अध्वर्यु को धीरे से " तद्देवानाम् " यह बोल देना चाहिए -" थ जुह्वा पृषदाज्यस्योपहत्य - अध्वर्युरुपनिष्क्रम्य ( शमित्रं प्रति गत्वा ) पृच्छति - शृतं हविः शमिताः इति । शृतमित्याह । तद्देवानामित्युपांश्वध्वर्युः " ॥५ ॥
इस कर्म में - जिसलिए कि अध्वर्यु और शमिता में प्रश्नोत्तर होते हैं - उसकी उपपत्ति बत-लाते हैं--" तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) पृच्छति ( तदुच्यते ) " । हवि है, वही देवतानों की होती है । देवता स्वयं श्राग्नेय हैं, प्रतएव वे उसी हवि का ग्रहण करते हैं जो कि अग्नि से परिपक्व हो - अग्नि- परमाणुयुक्त हो । जो वस्तु अपरिपक्व होती है, उसमें आसुर भाव रहता है । ऐसे हवि का देवता तिरस्कार कर देते हैं, प्रतएव देवता को त हवि ही देनी चाहिए । पुरोडाश अनुनिर्वापानन्तर अध्वर्यु शृत हवि से प्रधान याग करने वाला है । परन्तु इसे यह पता नहीं है कि हवि पक्वे है या अपक्व । रसोई बनी या न बनी - इसका पता रसोईदार को है न कि परोसने वाले को । अध्वर्यु परोसगारा है- शमिता रसोईदार है । हवि पकी या नहीं यह शमिता जानता है । चूंकि देवता को पक्व ही हवि दी जाती है एवं इसका पता शमिता को है, अतएव अध्वर्यु शमिता से पूछता है कि हे शमिता! हवि पकी या नहीं । जिसके सुपुर्द जो काम होता है, उसके बारे में उसी से पूछताछ किया जाना उचित है । अतएव अध्वर्यु का शमिता से " शृतं हविः शमिता " यह पूछना उचित ही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— [ ४३७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मणं " शृतं वै देवानां हविः । नाशृतम् । शमिता वै तद्वेद यदि शृतं वा भवति अनृतं वा " || ६ || शमिता ' यह पूछना चूंकि शृत प्रत का परिज्ञाता शमिता ही है, इसलिए शमिता से सिद्ध ' शृतं हो हविः जाता है । पूछने पर उचित ही है । अपिच - इस प्रश्न- सामर्थ्य से एक बड़ा भारी कार्य्यं और यज्ञ कर्म का आचरण करता हूँ । शमिता उत्तर दे देता है- " शृतेन प्रचराणि " अर्थात् मैं शृत हवि जाता से है । अध्वर्यु के प्रश्न करने पर एवं इस प्रकार इस प्रश्न से अध्वर्यु अपनी जिम्मेदारी से अलग हो ' कहने पर भी यदि वह हवि परिपक्व शमिता के ' शृतं ' कहने पर एवं फिर अध्वर्यु के - ' तेन प्रचारिण वह हवि देवताओं के लिए परिपक्व है । रहती है, तब भी कोई हर्ज नहीं है । अपरिपक्व होते हुए भी को अश्वत से ही तहवि की आहुति से यजमान को जो फल मिलना चाहिए, हवि वह - जन्य फल पाप यजमान का सम्बन्ध अध्वर्यु को मिल जाता है एवं अध्वर्यु भी सर्वथा अपाप रहता है । शमिता अमृत पर गिरता है । तज्जन्य फल शमिता नहीं जाता । होता यह है कि वह प्रवृत जन्य पातक इस से थाल पहुंचाता है एवं उसी समय को भोगना पड़ता है । - राजाजी के पास उनका टहलवा रसोईघर है - हाँ सब ठीक - ठाक है । बस, पूछ लेता है कि क्यों भाई! सब ठीक - ठाक है न? रसोईदार कह थाल देता राजा के पास भी पहुँच जाता है । इतना सुनते ही टहलवा राजा के पास थाल पहुँचा देता है । वह में कोई खराबी रहती है तो उसकी सजा टहलवा अपनी मजदूरी प्राप्त कर लेता है, परन्तु यदि भोजन के ' त ' कहने के अनन्तर यदि हवि उस रसोईदार को भोगनी पड़ती है । ठीक इसी प्रकार शमिता है । अतएव शमिता से ही प्रश्न अत रह जाती है तो उसका दण्ड केवल शमिता को भोगना पड़ता पाप से यजमान - प्रध्वर्यु बच जाता किया जाता है । शमिता से प्रश्न कर लेने के अनन्तर प्रवृत जन्य ' श्रुतं हविः शमिता ' यह बोलता है । है - शमिता फँस जाता है । बस, इसलिए भी अध्वर्यु शमिता से उसे मिलनी चाहिए । जब अध्वर्यु ने बात वास्तव में ठीक है । जिससे जो गलती है, उसकी सजा वह तो इस आपत्ति से मुक्त हो गया । ' शृतं हविः ' पूछ कर शमिता से ' श्रुतम् ' यह उत्तर सुन लिया तो तो इसका बोझभार ' शमिता ' के ऊपर ही परन्तु यदि ' शृतम् ' के बाद भी वह हवि अश्वत ही रह गया से कहते हैं-होगा । बस, प्रश्नात्मिका श्रुति का यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय देवानां " तद्यत् पृच्छति - शृतेन प्रचराणीति । तद्यशृतं भवति प्रविकलं - शृतमेव भवती-हविर्भवति । तं यजमानस्य ( शृते यत् फलं तदतेऽपि तदेनो भवति " | त्यर्थः ) अनेना: ( पापः ) अध्वर्युर्भवति । शमितरि है-वह अध्वर्यु शमिता को - " शृतं हविः शमिता " यह तीन बार के पूछता लिए है किया । चूँकि जाता यज्ञ है त्रिवृत् । देवता-अतएव तीन बार ही पूछना उचित है । अपि च - यह यज्ञ देवताओं कहा जाता है । देवता ही क्या? संसार में त्रिसत्य हैं । वेद, नियति, सूत्र भेदेन " त्रिसत्या वै देवाः " यह । इसमें भी सफेद, काला, काले की जो सत्य पदार्थ होते हैं - वे सब त्रिवृत् कहलाते है । चक्षु सत्य है भागों में विभक्त है, देवता सत्यमय हैं, भीतर कृष्ण कनीनिका - तीन सत्य विद्यमान हैं । चूंकि सत्य तीन उचित है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— उन्हीं के लिए यज्ञ किया जाता है; अतएव तीन बार ही कहना [ ४३८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण “ त्रिष्कृत्वः पृच्छति । त्रिवृद्धि यज्ञः " 1 पशुपुरोडाश ब्राह्मण " शृतं हविः शमिता " इस प्रश्न के उत्तर में - शमिता से " श्रुतम् " यह सुन कर जो कि फिर " तद्देवानाम् " - यह कहता है - इसका कारण यही है कि जो त हवि होती है - वही देवताओं की वस्तु है । त के अधिष्ठाता देवता हैं अतएव " तद्देवानाम् " - कहना न्यायसंगत ही है-" अथ यदाह - तद्देवानामिति - तद्धि देवानां यच्छ्रुतं तस्मादाह - तद्देवाना-मिति " ॥७ ॥
हमने बतलाया है कि अध्वर्यु के आदेशानुसार शमिता उस पशु के अवयवों को यथाक्रम रख देता है एवं सबके ऊपर हृदय रख देता है । श्रध्वर्यु जुहू में गृहीत पृषदाज्य को उस हृदय पर डारता है - प्रर्थात् - उस हृदय पर दधिमिश्रित प्राज्य डालता है । हृदय के नीचे और और प्रवयव रक्खे हुए हैं । परन्तु चूँकि हृदय सब अवयवों में प्रधान है, अतएव और और अवयवों से पहले इस हृदय का ही अभिघार करते हैं । हृदय के बाद में और अवयवों पर प्राधार किया जाएगा -" स ( अध्वर्युः ) हृदयमेवाग्रेऽभिघारयति ” । हृदय पर पृषदाज्य प्राधार क्यों किया जाता है? - इसका कारण बतलाते हैं कि शरीर का जो हृदय - बल है - उसी का नाम ' मन ' है । हृत्शक्ति ही मन कहलाती है । यह मन प्रज्ञा नाम से व्यवहृत होता है । श्वोवसीयस प्रज्ञा, अनिन्द्रिय- तीनों में से हृदय में प्रतिष्ठित रहने वाला मन " प्रज्ञा " मन कह-लाता है । अन्न से यही मन उत्पन्न होता है । " अन्नमयं हि सोम्य मनः १ यह इसी प्रज्ञामन के लिए कहा जाता है जो कि हृदय में प्रतिष्ठित है । इसी प्रज्ञामन का स्वरूप बतलती हुई श्रुति कहती है-" हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " इति ॥ ( यजुर्वेद ३४१६ ) प्रज्ञामन को चिदाभास के कारण " श्रात्मा " कहने लगते हैं । " प्रज्ञानात्मा " मन पर प्रतिबिम्बित चिदाभास का नाम है । अतएव प्रज्ञानात्मा को मनोमय बतलाया जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है-" मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकम्म सर्वकामः सर्वगन्धः - सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः " । ( छा ० उ ० ३।१४।२ ) चूंकि मन पर प्रतिबिम्बित चिदाभास का नाम ही आत्मा है, अतएव हम मन को आत्मा कहने के लिए तय्यार हैं । चूंकि मन हृदय में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव हृदय को मन कहा जा सकता है । १. ' छा ० उ ० ६।६।५ ' । [ ४३६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मरण पशुपुरोडाश ब्राह्मण इस श्रात्मस्वरूप हृदय पर जो पृषदाज्य डाला जाता है, वह प्राणस्वरूप है । पृषदाज्य प्रारण उत्पन्न करता है । यह प्रज्ञानात्मा - प्रज्ञामन बिना प्रारण के मुर्दा है । प्रज्ञामन बिम्ब है, प्राण रश्मियाँ हैं । जब तक प्रज्ञा प्रारण से नहीं मिलती, तब तक वह शरीर मुर्दा ही रहता है । पशु शरीर में से हृदय को निकाल लेने से उसका प्राण निकल गया है, एवं हृदय - वा मन वा आत्मा- प्राण शून्य हो गया है, मुर्दा हो गया है । देवता मृत प्राहुति नहीं लेते । अतएव इस आत्मा मन में प्राणाधान करने के लिए प्रारण उत्पन्न करने वाले पृषदाज्य का आधार किया जाता है । उस प्राणाधान से जीव ही ( अमृत ही ) देवताओं का हवि हो जाता है । अमृत देवताओं का अमृत ही हवि हो जाता है । तो बस यह श्रात्मा श्रर्थात् पशु आत्मन्वी बन कर देवताओं का अन्न बन जाए, इसलिए पृषदाज्याघार किया जाता है । ऐसा करने से - " अमृतम-मृतानां " सिद्धि का व्याघात नहीं होता है-" आत्मा वै मनो हृदयम् । प्राणः पृषदाज्यम् । श्रात्मन्येवैतन्मनसि प्राणं दधाति । तज्जीवमेव देवानां हविर्भवति श्रसृतममृतानाम् ॥८ ॥
पृषदाज्याभिघार क्यों करना चाहिए? - इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु ~~ " सन्ते मनो मनसा सं प्राणः प्राणेन गच्छताम् " । ( वा ० सं ० ६।१८ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस हृदय पर पृषदाज्य डालता है-" हे अभिधार्यमाण हृदय! ते मनः - मनसा ( पृषदाज्यलक्षणेन मनसा ) संगच्छताम् । ( संगतं भवतु ) तथा ते प्रारण: - प्राणेन ( पृषदाज्यलक्षणेन ) संग-च्छताम् ” । अथवा " हे पशो! ते यौ मनः प्राणौ- प्रपगतौ - ताभ्यां मनः प्रारणाभ्यां हृदय-रूपेणावस्थिताभ्यां संगच्छताम् " । मन और प्राण दोनों हृदय में रहते हैं । दोनों की प्रतिष्ठा हृदय ही है । हृदय ग्राश्रव है, मनः प्राण आश्रयी हैं । अतएव हृदय से कहा जाता है कि हे हृदय! तुम्हारा मन - मन से अर्थात् पृषदाज्यरूप मन से युक्त हो । यद्यपि पृषदाज्य प्राणोत्पादक है, तथापि प्रज्ञामन और प्रारण अविनाभूत हैं- दोनों प्रभिन्न हैं, जैसा कि श्रुति कहती है--" यो वै प्राणः सा प्रज्ञा । या वा प्रज्ञा स प्रारणः " । ( कौ ० उप ० ३।३ ) अतएव मन को भी पृषदाज्य कहा जा सकता है । एवं हे हृदय! तुम्हारा जो प्रारण है, वह पृष-दाज्य लक्षण प्रारण से युक्त हो जाए-[ ४४० ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण अथवा दूसरा अर्थ समझना चाहिए । है पशु! प्रालम्भन करने से तुम्हारे जो मन - प्राण निकल गए हैं, इस पृषदाज्य से तुम उन विनिःसृत मन - प्राण से वापस युक्त हो जाओ । यहाँ पर ' अध्वर्यु ' स्वाहा नहीं बोलता है । अग्नि में जो प्राहुति डाली जाती है, वहाँ स्वाहा बोला जाता है । चूंकि यह आहुति नहीं है - प्रभिघार मात्र है, अतएव यहाँ " स्वाहाकार " नहीं किया जाता -----" न स्वाहाकरोति - न ह्येषाहुतिः " । उल्मुकाग्नि में पशु को पका लिया गया । अब उसे ठंडा करते हैं-“ उद्वासयन्ति पशुम् " ॥९ ॥
उत्तरावेदि से उत्तर भाग में शामित्रशाला होती हैं । उसी शामित्रशाला में पशु का श्रालम्भन किया जाता है । एवं वहीं पर उसके प्रधान, स्विष्टकृत्, उपयट् भेदेन तीन विभाग किए जाते हैं एवं वहीं पर उल्मुकाग्नि से तय्यार किए हुए अङ्गाराग्नि में उन पशु - अवयवों का परिपाक किया जाता है । परि-पाक करके उन पशु श्रवयवों को वहीं उसी शामित्रशाला में ठंडा कर लिया जाता है । उस उद्वासित पशु की आहुति चूंकि उत्तरावेदिस्थ ग्राहवनीय में होती है, प्रतएव उस पशु को शामित्रशाला से यहाँ लाना पड़ता है । किधर से लाया जाए - इसका निर्णय करते हैं । उस पशु को चात्वाल से पश्चिम हो कर आह atta अग्नि और यूप के बीच में हो कर आहवनीय से दक्षिण भाग में लाते हैं, क्यों कि वहीं उत्तराभि-मुखबैठ कर पशु की आहुति दी जाएगी । जिस प्रकार और और इष्टियों में सीधी तरह से हवि का आहरण होता है, वैसा यहाँ नहीं होता । यहाँ चात्वाल से पश्चिम हो कर यूप और अग्नि के बीच में हो कर ले जाया जाता है । कारण इसका यही है कि आहवनीय यज्ञ का मुख है । इसका पश्चिम भाग इसका उदर है । ऐसी अवस्था में आहवनीय से पश्चिम में हो कर ले जाना उदर में पशु की आहुति देना है । एवं ऐसा करना अङ्ग - प्रङ्ग से विकृत अतएव क्रूरीकृत जो पशु है, उससे क्रूरभावयुक्त यज्ञ को उत्पन्न यदि से क्षत - विक्षत यज्ञ भी को यज्ञोदर में हो कर ले जाया जाएगा तो करना है - अर्थात् श्रङ्ग - प्रङ्ग पशु वैसा ही उत्पन्न होगा । बस, हम क्रूरभावयुक्त क्षत - विक्षत यज्ञात्मा उत्पन्न न कर डालें, अतएव श्राहव-नी से पश्चिम में हो कर इस पशु को नहीं ले जाते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तं ( पशु ) जघनेन चात्वालं - प्रन्तरेण यूपं चाग्निं च हरन्ति । तद्यत् समया न हरन्ति - येनान्यानि हवींषि हरन्ति । शृतं सन्तं नेदङ्गशो विकृतेन क्रूरीकृतेन समया यज्ञं प्रसजामेति " । श्राहवनीय से पश्चिम में हो कर ले जाना यज्ञात्मा को क्रूरता से युक्त उत्पन्न करना है । कदाम् चित् कोई प्रश्न करे कि यदि ऐसा ही है तो फिर इस पशु को यूप से भी बाहर हो कर ही क्यों न ले जाया जाए । विकृत अङ्ग वाला श्रतएव क्रूरभावयुक्त पशु - यज्ञ में शामिल हो, इसीलिए तो उसे प्राप [ ४ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मणे पशुपुरोडाशं ब्राह्मण उदर स्थानीय आहवनीय से पश्चिम भाग में हो कर नहीं ले जाते । यज्ञ में क्रूरभावयुक्त पशु शामिल न हो, यही तो आपका उद्देश्य है । इस पर हम कहते हैं कि तब तो यूप के बाहर हो कर ही ले जाना उचित होगा- क्योंकि यज्ञ - पुरुष का वितान यूपपय्यंन्त है । इस प्रकार पूर्वोक्त तर्कानुसार यूप के बाहर हो कर ही ले जाना उचित मालूम होता है, फिर भी जो यूप के बाहर हो कर पशु को नहीं ले जाते श्रपितु यूप और श्राहवनीय श्रग्नि के मध्य में कर ही ले जाते हैं - इसका एकमात्र कारण है - पशु को यज्ञ से बाहर जाने से बचाना । हमने बतलाया है कि यूपपय्यन्त यज्ञ - पुरुष का वितान है । यूप शिखा स्थानापन्न है, श्राहव-नीय मुख स्थानापन्न है, आहवनीय से पश्चिम भाग उदर स्थानापन्न है । ऐसी अवस्था में पशु को यूपसे बाहर करना - उसे यज्ञ से बाहर कर प्रयज्ञिय बनाना है, आसुर भावयुक्त बनाना है । अतएव ऋत्विक् लोग पशु को यूप और अग्नि के बीच में से ही ले जाते हैं । इस स्थान से ले जाना मुख के सामने से ले जाना है । अतएव यह पशु इधर हो कर ले जाने से आहुति नहीं बनता । चूँकि आहवनीय का पश्चिम-भाग उदर है, अतः उधर से ले जाना पशु को यज्ञोदर में प्रविष्ट करना । अतः उधर से ले जाने में ही दोष हैं न कि यूप और अग्नि के बीच में से ले जाने में । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" यदु ( यत् पुनः ) बाह्येन न हरन्ति प्रग्रेण यूपम् - बहिर्द्धा ह यज्ञात् कुर्युः ( तस्मात् बाह्येन न हरन्ति - प्रग्रेण यूपमित्यर्थः ) तस्मादन्तरेण यूपंचाग्नि च हरन्ति " | इस प्रकार चात्वाल से पश्चिम हो कर अग्नि और यूप के बीच में से उस पशु को शामित्र - शाला से लाकर आहवनीय से दक्षिण भाग में रख कर प्रतिप्रस्थाता प्रधान, स्विष्टकृत्, उपयट् भेदेन उस पशु का प्रदान करता है - आहुति के लिए अवयव - विभाग करता है— " दक्षिणतो निधाय प्रतिप्रस्थाता प्रवद्यति " । जिस जगह पशु के अवदान रक्खे जाएँगे, उस जगह बहि ( कुशा ) का आस्तरण रहता है । एवं बह के ऊपर लक्ष ( पाखर पीपल ) की शाखा रहती । इस पर अवदान रक्खे जाते हैं । प्लक्ष शाखा है ऊपर जिनके ऐसे बहि होते हैं । एवं उन बर्हियों के ऊपर श्रवदान रखते हैं । प्रकृति ( दर्शपूर्ण ) यज्ञ में पुरोडाश के अवदान केवल बहि पर ही रक्खे जाते हैं, परन्तु यहाँ पर पहले बहि का आस्तरण होता है । उस पर प्लक्ष वृक्ष की शाखा का प्रस्तरण किया जाता है । इस प्रकार प्लक्ष वृक्ष शाखायुक्त बहि पर वह प्रतिप्रस्थाता पशु अवदान रखता है-" प्लक्षशाखा उत्तरबहिर्भवन्ति । ( प्लक्षशाखा बहिष उपरिभूता भवन्ति ) - ता प्रध्यवद्यति ( तासामुपरि - प्रवद्यति प्रतिप्रस्थाता ) " । यहाँ पर प्रश्न होता है कि जब - प्रकृति यज्ञ में केवल बहि ही होती है, एवं " प्रकृतिवद् विकृतिः . कर्त्तव्या " यह सिद्धान्त है तो फिर इस कर्म में बहि- प्लक्ष शाखा उत्तरा क्यों की जाती है? बस, किस G लिए यहाँ इस कर्म में बहि - प्लक्ष -शाखा उत्तरा होती है - इसका कारण बतलाते हैं-[ ४४२ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण " तत् ( तंत्र ) यत् ( यस्मात् ) प्लक्षशाखा उत्तरबर्हिर्भवन्ति ( तस्य-मीमांसा क्रियते - इतिशेषः ) " ॥१० ॥
" जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः " । इस श्रुति -प्रमाण से मानना पड़ता है कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं, वे सब सविता, सरस्वती त्वष्टा, पूषा, इन्द्र, बृहस्पति, वरुण, अग्नि, सोम, विष्णु - इत्यादि प्राण - देवताओं से ही उत्पन्न होते हैं । ये सारे प्राण देवता वीर्य के योनि में सिक्त होते ही वीर्य में प्रविष्ट हो जाते हैं एवं प्रविष्ट हो अपना-अपना काम करने लगते हैं । कोई रूप बनता है, कोई वाक् शक्ति का निर्माण करता है, कोई पशु-प्राण की सत्ता स्थापित करता है, कोई श्रोत्रेन्द्रिय - सामर्थ्य उत्पन्न करता है । इस प्रकार सारे प्राण-देवता अपना - अपना काम करने लगते हैं । इन्हीं प्राण - देवताओं के आदानविसर्गात्मक व्यापार से वही अस्थिमसादि में परिणत हो जाता है । वह वीर्य्यं ही एवयामरुत् ' द्वारा विशकलित हो हाथ - पैर वाला बन जाता है | हमारे शरीर में दो प्रकार के रूप होते हैं । हमारे शरीर में ही नहीं अपितु संसार के यच्चयावत् पदार्थों में दो ही प्रकार के रूप होते हैं - ( १ ) आकारात्मक और वर्णात्मक । इनमें आका-रात्मक रूप के अधिष्ठाता त्वष्टा हैं । हाथ, पैर, मस्तक, कान, नाक - इनका आकार बनाना त्वष्टा प्राण का काम है, अतएव ' त्वष्टा रूपाणि पिंशति कहा जाता है । एवं काला, सफेद, गेरुआ इत्यादि जो वर्णात्मक रंग हैं, उनका अधिष्ठाता इन्द्र है । श्रतएव ' इन्द्रो रूपाणि करोकृदचरत् रूपं रूपं मघवा बोभ-वीति ' ४ - यह कहा जाता है । हमने बतलाया है कि हृदय में एक मेद होता है, यही सारे शरीर का सार होने के कारण मेध कहलाता है । इसे ही ' वपा ' कहते हैं । हमारे शरीर के पृष्ठ भाग में जो मेरुदण्ड होता है, उसके द्वारा यह मेद - यह वपा त्वष्टाप्राण द्वारा ऊपर की ओर फेंका जाता है । मेरु - दण्ड से त्वष्टाप्राण द्वारा फेंका गया जो मेद है, वही मस्तक का भेजा बनता है ।वही मस्तक बनता है । वही पशु पाँच प्रकार के होते हैं । अनूक्य बनता है । हमने बतलाया है कि पुरुष, अश्व, गो, अवि, अज भेदेन इन पाँचों ही पशुओं का प्राण देवता आलम्भन करते हैं । आलम्भन करके इन्हें खाते हैं । जैसे हमारे प्राण- देवता हमारे शरीर की रक्षा के लिए बाहर के पशुओं का प्रलम्भन करके इन्हें खाते हैं । तथैव हम पशुओं को दूसरे प्राण देवता खाया करते हैं । हम खाते भी हैं एवं खाये भी जाते हैं । हम दूसरों के अन्न हैं, एवं अन्न खाने वाले को खाया भी करते हैं । अतएव श्रुति कहती है-" यो मा ददाति स इदेवमावत् श्रहमन्नमन्नमदन्तमद्भि " ( सामवेद पू ० ६ | १ | | ) यह कहा जाता है । कहने का तात्पर्य यही है कि जब वीर्य्य गर्भाशय में प्रविष्ट होता है तभी से प्रारण देवता उस गर्भाविष्ट पशु का श्रालम्भन करने लगते हैं । श्रालम्भन करते ही त्वष्टा प्राण उस मेद १. ' भू - वायु ' । २. बृहद ० प्रा ० उप ० ६।४।२१ । ३. सामसंहिता उत्तरभाग ६ । ७ । ३ । ४. ऋग्वेद मं ० ३।५३८ । [ ४४३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मरंग पशुपुरोडाश ब्राह्मण भाग को मेरुदण्ड द्वारा बाहर ऊपर की ओर फेंक देता है । वही मस्तक बनता है । शरीर का जो भी चूँ कि मस्तक शरीर के श्री भाग से बना हुआ है, अतएव भाग है - सार भाग है - वही मस्तक बनता है । यही है कि मस्तक को ' शिर ' कहा जाता है । मस्तक सारे शरीर का सार भाग है, इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण मस्तक सारे शरीर के ऊपर रह कर सारे प्रानन्दों का अनुभव करता है । वही अन्न खा कर सारे शरीर की रक्षा करता है । मस्तक त्वष्टा द्वारा वमन किए गए सार भाग से बनता है, अतएव उसे शिर कहते हैं- इसमें निम्नलिखित श्रुति ही प्रमाण है । श्रुति कहती है-" थ ये तेषां सप्तानां पुरुषाणां श्रीः । यो रस श्रासीत् - तमूर्ध्वं समुदौहन् । स्तदस्य शिरोऽभवत् । यच्छ्रियं समुदौहंस्तस्माच्छिरः । तस्मिन्नेतस्मिन् प्रारणा श्रयन्त तस्माद्वेवैतच्छिरः " - इति । ( शत ० ब्रा ० ६ । १ । १ । ४ ) त्वष्टा प्राण ने प्राण - देवताओं द्वारा आलम्भ्य पशु के मेघ भाग को " इसे कोई न खाए " - ऊपर फेंके हुए - वमन किए हुए मेघ का आलम्भन कोई न करे - अर्थात् वमन समझ कर इसे कोई न खाए इस लिए ऊपर फेंका | जैसे त्वष्टा रूप का अधिष्ठाता है, तथैव पशु का भी अधिष्ठाता है । पशु - प्राण का स्वामी त्वष्टा है । जब त्वष्टा ने देखा कि देवता गण अपनी पशु - प्रजा का आलम्भन कर उसे खाना चाहते हैं तो उसने उस प्रजा के सार भाग को देवताओं के आक्रमण से बचाने के लिए मेरु - दण्डं द्वारा मस्तक की ओर फेंक दिया । उसने इसी खयाल से ऊपर फेंका कि चूंकि यह वमन किया हुआ हिस्सा रहेगा, अतएव इसे देवता लोग न खाएँगे । तात्पर्य यही है कि हमारा शिर त्वष्टा द्वारा ऊपर फेंके गए, वमन किए हुए, शरीर के मेध से बना है । शिरभाग में वमन हुआ जो मेद है वही मस्तिष्क, अनूक्य और मज्जा बना है । शिर - कपाल का नाम मस्तिष्क है । कपाल में चारों ओर से गोभी के माफिक संश्लिष्ट जो मांस - ग्रन्थियाँ हैं, ' प्रत्वय ' कहलाती हैं । एवं इस मांसयुक्त कपाल के बीचों - बीच जो सार-भाग है - जो कि भेजा कहलाता है, जिसे कि मींगी कहते हैं - वही मज्जा कहलाती है । ये तीनों ही ( मस्तिष्क - अनूक्य - मज्जा ) त्वष्टा द्वारा फेंके गए शरीर के मेद से बने हैं । चूंकि ये तीनों वमन - द्रव्य से बने हैं, अतएव तीनों में परिणत मेद वान्तवत् ही खाया करता है - प्रर्थात् शरीर मांस से घृणा नहीं होती अपितु मस्तक से घृणा होती है । मांसाशी लोगों को अनुभव होगा कि श्रज के मस्तक के ऊपर स्वभावतः ही ग्लानि हो जाती है । इसका कारण यही है कि त्वष्टा द्वारा इसका वमन किया गया है । तात्पर्य्यं सारे प्रपञ्च से यही निकलता है कि मस्तक ( कपाल ), अनूक्य ( मांस ) मज्जा ( तदाचित सार भाग - भेजा नाम से प्रसिद्ध ) ये तीनों त्वष्टा प्राण द्वारा मेरुदण्ड से वान्त जो मेद है - उससे बने हैं । तीनों ही उच्छिष्ट हैं- अभिवान्त हैं । अतएव तीनों ही अभक्ष्य हैं । शरीर में से शिरोभाग सर्वथा अभक्ष्य है, उसे कभी नहीं खाना चाहिए । इसी शरीर विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" यत्र वै देवाः ( प्रारण - देवा: ) अग्रे पशुमालेभिरे तं त्वष्टा शीर्षतोऽग्रे-s भ्युवाम - " उत एवं चिन्नालभेरन् " - ( इत्यभिप्रायेण ) । त्वष्टुर्हि पशवः । स एष ( वान्त भागः ) शीर्षन् ( शीष्णि ) मस्तिष्को ( कपाल: ) इतूक्यश्च ( मांसः ) [ ४४४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण
मज्जा । तस्मात् स वान्त इव । त्वष्टा ह्येतमभ्यवमत् । तस्मात् तं नाश्नीयात् ।
त्वष्टुतदभिवान्तम् " ॥११ ॥
शरीर का मेद भाग मेरुदण्ड द्वारा त्वष्टा द्वारा वान्त हो कर मस्तक बनता है । वमन - द्रव्य अभक्ष्य होता है । चूँकि शिर वमन - द्रव्य से बना है - त्वष्टा का वमन है, अतएव इसे कदापि नहीं खाना चाहिए || ११ || शरीर विज्ञान का विवेचन कर अब वृक्ष - विज्ञान का विवेचन करते हैं जिस प्रकार अस्मदादि पशुओं का प्रलम्भन होता है तथैव वृक्षादि पशुओं का भी प्रालम्भन होता है । स्थूल दृष्टि से देखने पर पुरुषादि पाँच ही पशु प्रतीत होते हैं, परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर सारे पार्थिव पदार्थों को पशु मानना पड़ता है । जैसे पशु - प्राण के त्वष्टा श्रधिष्ठाता हैं तथैव पूषा भी है । चूंकि सारे पार्थिव पदार्थ पशु हैं एवं पशु के अधिष्ठाता पूषा हैं, अतएव ' इयं ( पृथिवी ) वै पूषा ' ' यह कहा जाता है । इस परिभाषा के अनुसार वृक्षादि को भी पशु मानना पड़ता है । जिससे वृक्ष उत्पन्न होता है, वह बीज दो पत्तों वाला होता है । बीच में संकुचित अवस्था में परिणत दो पत्ते होते हैं । उस बीज को मिट्टी में गाड़ दिया जाता है । पानी और मिट्टी धुल जाती हैं । उन दोनों पत्तों के बीच में एक सूक्ष्म मेरुदण्ड होता है जो कि पोला है । सूर्य्य - रश्मियाँ श्रग्निमयी हैं । उनका स्वभाव है पानी को चूसना | चूँकि यह बीज पानी में रहता है, अतएव सौर - रश्मि उस मेरुदण्ड में हो कर बीज के भीतर प्रविष्ट होती हैं । सौर- रश्मिमय प्रकाशी प्रारण का नाम ही देवता है । पानी धुले पार्थिव मृत भाग को सौर रश्मियां अलग कर देती वह मृत भाग पशु है । सौर देवता ( रश्मि ) वहाँ जा कर उस पशु का आलम्भन कर डालते हैं - पानी का शोषण कर लेते हैं । शोषण करके जब रश्मि पानी को ऊपर खींचती है तो उसके साथ ही मिट्टी भी ऊपर उठती है जो कि पशु का मेध है । बस, जितनी दूर मिट्टी ऊपर जाती है, वही पहला अङ्कुर कहलाता है । पानी ऊपर चला जाता है, मिट्टी ( मेघ ) नीचे ही रह जाती है । यही मेघ का नीचे गिरना है । फिर पानी डाला जाता है । फिर प्रालम्भन होता है । फिर मिट्टी ऊपर चढती है । वह शाखा बनती है । इस प्रकार इसी आलम्भन - पतन क्रम से वृक्ष बन जाता है । देवताओं द्वारा प्रालब्ध पशु का नीचे की ओर गिरा हुआ मेध ही वृक्ष बन जाता है । संसार के यच्चयावत् वृक्ष इसी क्रम से बनते हैं । इसी वनस्पति विज्ञान को बतलाती हुई श्रुति कहती है-" तस्य ( पशो: ) अवाङ्मेधः पपात । स एष वनस्पतिरजायत " । चूँकि पशुत्वेन वृक्ष निर्माता पशुप्राण और शब्द से व्यवहृत पशु का निर्माता पशुप्राण एक है श्रतएव शरीर विज्ञान के साथ अभेद व्यवहार कर दिया गया है । पहले शरीर - पशु का प्रलम्भन बत-लाया एवं उसी के लिए " तस्यावाङ्मेधः पपात " यह कह दिया गया है । जब वह मेध नीचे गिर गया तो पानी का शोषण कर ऊपर जाते हुए प्रारण- देवताओं ने उसे देखा । उन्होंने देखा कि अरे जिस पशु १. ' शत ० ब्रा ० ६।३।२१८ ' । [ ४४५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण ने उसे का अपन ने श्रालम्भन किया था, उसका मेघ इधर ही नीचे की ओर गिर गया । चूंकि देवताओं । देवतानों ने देखा - प्रतएव इस विज्ञान को जानने वाले महर्षियों ने इस वृक्ष का नाम ' प्रख्य ' रख दिया नाम प्रकर्षेण इसका स्वरूप ध्यान में लिया, अतएव इसे " प्राख्य " कहने लग गए । आज जिस वृक्ष का वृक्ष " प्लक्ष " सुना जाता है, उसका वास्तविक नाम प्रख्य ही समझना चाहिए । सारे विश्व में पांच ही प्रधान माने जाते हैं-गूलर, पीपल, बड़, प्लक्ष, चन्दन ये ही पाँचों कल्पवृक्ष कहलाते हैं । ये पाँचों है स्वर्गीय एवं पीपल वृक्ष • कहलाते हैं । स्वर्ग - व्यवस्था में गूलर को कल्प वृक्ष कहा जाता है । गूलर जीव - रस प्रदाता, श्रतएव को सन्तान कहा जाता है । इस पीपल की जड़ सर्वथा अमोघ है । इसका बीज व्यर्थ नहीं जाता इस प्लक्ष को इसे सन्तान कहा जाता है । बड़ को पारिजात कहते हैं । प्लक्ष को मन्दार कहते हैं । " पाकर पीपल " भी कहा जाता है एवं चन्दन हरिचन्दन कहलाता है । पीपल का वृक्ष मकान में शुभ के पृष्ठ है । भाग में शुभ है । गूलर का पूर्व भाग में शुभं है, प्लक्ष का उत्तर में शुभ है, बड़ का दक्षिण परन्तु दरवाजे पर रहना - दरवाजे के ठीक सामने किसी भी वृक्ष का होना - सर्वथा अशुभ है । अतएव शास्त्रकार कहते हैं-" अपि सर्वाणिकं वृक्षं गृहद्वारे न रोपयेत् " । अपि च जो स्वयं कटने वाले वृक्ष हैं ( केला आदि ) उनको भी अपने घर में नहीं रखना चाहिए । चाहिए । इस वनस्पति विज्ञान का विस्तृत विवेचन - " संस्कार कौस्तुभ " और " उपवन - विनोद " में देखना जिस पशु प्रकृत में हमें यही कहना है कि यह प्लक्ष वृक्ष देवताओं द्वारा प्रालब्ध पशु का मेध है । आज मेघ की हमने श्रालम्भन किया है, उसका सार भाग इस प्लक्ष में आ गया है- अर्थात् शुरू से ही पशु का प्लक्ष में बँटा हुआ है, अतएव पशु श्रधूरा है । यदि अधूरे पशु की ही आहुति दी जाएगी तो इस आहुति से बनने वाला यज्ञात्मा भी अपूर्ण ही रहेगा ।ऐसा न हो - पशु - मेध पूर्ण हो जाय, अतएव इस अवदान कर्म में प्लक्ष - शाखा का सम्बन्ध कराया जाता है । इसके सम्बन्ध से पशु का जो मेध भाग प्लक्ष में श्रा गया था जिसके बिना कि पशु प्रकृत्स्न था, प्लक्ष सम्बन्ध से कृत्स्न बन जाता है । इस प्रकार प्लक्ष का सम्बन्ध करता हुआ यह ऋत्विक् उसी प्लक्ष मेध से पशु को समृद्ध करता है एवं प्रकृत्स्न पशु रखने को की कृत्स्न यही बनाता है । अतएव इस कर्म में बर्हि प्लक्ष शाखोत्तरा होती है । बहि पर प्लक्ष शाखा उपपत्ति है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" तस्यावाङ्मेधः पपात । स एष वनस्पतिरजायत । तं देवाः प्रापश्यन् । तस्मात् प्रख्यः । प्रख्यो ह वै नामैतत् यत् प्लक्ष इति । तेनैवैनमेतन्मेधेन
समर्द्धयति । कृत्स्नं करोति । तस्मात् प्लक्षशाखा उत्तर बहिर्भवन्ति ॥१२ ॥
इस प्रकार आहवनीयाग्नि से दक्षिण बहि बिछा कर उस पर प्लक्ष शाखा रख कर उस पर पशु के अवदान रख दिए जाते हैं । हमने बतलाया था कि इस पशु से तीन कर्म होते हैं- प्रधान याग-[ ४४६ ]